Monday, February 2राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर आपका स्वागत है... अभी सम्पर्क करें ९८२७३६०३६०

औचित्य क्या?

राजेन्द्र लाहिरी
पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
********************

यथार्थ को त्याग,
सच्चाई को कुचल,
कल्पनाओं को सच बता
इतराऊं मचल-मचल,
सारे संसार का ज्ञान
ठूंस लूं अपने अंदर,
पर यकीन करूं हो जाए
कोई अलौकिक चमत्कार,
तो फिर औचित्य क्या
उस ठूंसे हुए ज्ञान का,
लदे रहूं हीरे मोतियों से,
ढका रहूं नवीन वसनाें से,
और रखूं अस्वच्छ तन को,
तो औचित्य क्या
अथाह धन का,
सबको पढ़ाता फिरूं विज्ञान,
बटोरूं नित सम्मान,
जा जा व्याख्यान दूं
विद्यालयों में,
महाविद्यालयों में,
और अंधा यकीन करूं
पाखंडों और अन्धविश्वास पर,
तो औचित्य क्या
अथाह ज्ञान का,
प्रकृति से प्रेम करूं,
हर जीव की उपयोगिता समझूं,
सिर्फ अपनी सनक खातिर
कैद में रखूं तोता,
मैना, बुलबुल,
तो औचित्य क्या
खुले आसमान का,
कामना है न बंधूं
किसी ऐसे नियम से
जो मुझे इंसान न रहने दे,
और हां जिसे जो
कहना है कहने दे।

परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी
निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

प्रिय मित्र, शुभचिंतक एवं परिवारजन आपको प्रेषित मेरी नई स्वरचित रचना, कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें …🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ
प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें
hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर 98273 60360 पर सूचित अवश्य करें …🙏🏻 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच का सदस्य बनने हेतु हमारे चलभाष क्रमांक 98273 60360 पर अपना नाम और कृपया मुझे जोड़ें लिखकर हमें भेजें…🙏🏻

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *