
अमित राव पवार
देवास (मध्य प्रदेश)
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भारतीय इतिहास का गगन अनेक वीरों की गाथाओं से आलोकित है, किंतु कुछ नाम ऐसे हैं जो केवल इतिहास का हिस्सा नहीं बनते, बल्कि राष्ट्र की आत्मा में सदैव जीवित रहते हैं। श्रीमंत छत्रपति संभाजी महाराज ऐसे ही एक अमर व्यक्तित्व हैं, जिनका जीवन साहस, स्वाभिमान, विद्वता और बलिदान का अद्वितीय संगम था। दुर्भाग्य से इतिहास के अनेक पन्नों में उनके व्यक्तित्व को उतनी व्यापकता नहीं मिली, जिसके वे वास्तविक अधिकारी थे। उनके जीवन को केवल युद्धों और बलिदान तक सीमित कर दिया गया, जबकि सत्य यह है कि संभाजी महाराज केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि राष्ट्रचेतना के प्रखर प्रहरी थे। आज जब समाज वैचारिक भ्रम, सांस्कृतिक विस्मृति और इतिहास की अधूरी व्याख्याओं से जूझ रहा है, तब संभाजी महाराज का जीवन हमें यह स्मरण कराता है कि राष्ट्र केवल तलवारों से नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, संस्कृति और दृढ़ संकल्प से सुरक्षित रहता है।
१४ मई १६५७ को पुरंदर किले में जन्मे श्रीमंत संभाजी महाराज ने बाल्यकाल से ही संघर्ष को अपनी नियति के रूप में देखा। वे श्रीमंत छत्रपति शिवाजी महाराज के ज्येष्ठ पुत्र थे, किंतु राजमहलों का वैभव उनके जीवन की पहचान नहीं बना। बाल्यकाल में ही माता सईबाई का साया सिर से उठ गया। इसके बाद उनका पालन-पोषण राजमाता जीजाबाई के संरक्षण में हुआ, जिन्होंने उनके भीतर धर्म, स्वराज्य और राष्ट्रगौरव के ऐसे संस्कार रोपे, जो अंतिम सांस तक उनके व्यक्तित्व की आधारशिला बने रहे। मात्र नौ वर्ष की आयु में पुरंदर की संधि के तहत उन्हें मुगल दरबार में राजनीतिक बंधक बनाकर भेज दिया गया। सोचिए, जिस आयु में सामान्य बालक खेल और सपनों की दुनिया में जीता है, उस आयु में संभाजी महाराज को शत्रुओं के बीच रहकर राजनीति, छल और सत्ता का कठोर यथार्थ देखना पड़ा। किंतु यही परिस्थितियाँ आगे चलकर उन्हें अदम्य साहस का प्रतीक बनाने वाली थीं। उन्होंने भय को कभी अपने व्यक्तित्व पर हावी नहीं होने दिया। विपरीत परिस्थितियों ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि लोहे से भी अधिक मजबूत बना दिया।
संभाजी महाराज की छवि प्रायः केवल रणभूमि के योद्धा के रूप में प्रस्तुत की जाती है, जबकि वे असाधारण विद्वान भी थे संस्कृत, मराठी, हिंदी, फारसी और पुर्तगाली जैसी भाषाओं पर उनका अधिकार था। उन्होंने कम आयु में ही “बुधभूषणम्” जैसे संस्कृत ग्रंथ की रचना की। यह तथ्य बताता है कि उनकी तलवार जितनी तेज थी, उनकी बुद्धि उससे कहीं अधिक प्रखर थी। वे जानते थे कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल सेना में नहीं, बल्कि उसकी संस्कृति और ज्ञान परंपरा में निहित होती है। १६८० में श्रीमंत छत्रपति शिवाजी महाराज के निधन के बाद मराठा साम्राज्य व हिंदवी स्वराज तथा भारतभूमि पर संकटों का पहाड़ टूट पड़ा। भीतर सत्ता संघर्ष और बाहर मुगलों का भीषण आक्रमण। उस समय मुगल सत्ता का सबसे शक्तिशाली शासक औरंगजेब दक्षिण में स्वराज्य की जड़ों को समाप्त करने के लिए अपनी विशाल सेना के साथ उतर चुका था। उसे विश्वास था कि महाराज शिवाजी के बाद मराठा साम्राज्य ओर स्वराज का स्वप्न इस देश से शीघ्र ही बिखर जाएगा। किंतु यही वह क्षण था,जब संभाजी महाराज ने अपने अद्वितीय नेतृत्व से इतिहास की दिशा बदल दी।
१६ जनवरी १६८१ को उन्होंने मराठा साम्राज्य (हिंदवी स्वराज) की बागडोर संभाली और मुगलों के विरुद्ध ऐसा प्रतिरोध खड़ा किया, जिसने औरंगजेब की वर्षों पुरानी महत्वाकांक्षाओं को ध्वस्त कर दिया। कहा जाता है कि उन्होंने अपने नौ वर्षों के शासनकाल में १४० से अधिक युद्ध लड़े और एक भी युद्ध नहीं हारे। यह केवल वीरता नहीं थी, बल्कि असाधारण रणनीति, नेतृत्व क्षमता और राष्ट्रनिष्ठा का परिचायक था उन्होंने मुगलों को हर मोर्चे पर चुनौती दी। संभाजी महाराज का सबसे प्रेरक पक्ष था- उनका अटूट स्वाभिमान। वे जानते थे कि यदि स्वराज्य झुक गया, तो केवल एक राज्य नहीं, बल्कि भारतीय अस्मिता पर आघात होगा। इसलिए उन्होंने संघर्ष को जीवन का धर्म बना लिया वे सत्ता के लिए नहीं, बल्कि स्वाभिमान और स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे थे। फरवरी १६८९ में संगमेश्वर में विश्वासघात के कारण वे मुगलों के हाथों बंदी बना लिए गए। इसके बाद इतिहास ने क्रूरता की वह पराकाष्ठा देखी, जो विश्व मे ओर कहि नही दिखाई दी। जिसे सुनकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। औरंगजेब ने उन्हें धर्म परिवर्तन कर जीवनदान पाने का प्रस्ताव दिया। यह केवल एक व्यक्ति के धर्म परिवर्तन का प्रश्न नहीं था, बल्कि स्वराज्य की आत्मा को झुकाने का प्रयास था। किंतु संभाजी महाराज ने स्पष्ट कर दिया कि मृत्यु स्वीकार है, परंतु आत्मसमर्पण नहीं। उन पर (लगभग ४० दिनों से भी अधिक) अमानवीय यातनाएँ दी गईं। शरीर को क्षत-विक्षत किया गया, अपमानित किया गया, लेकिन उनकी आत्मा को झुकाया नहीं जा सका। वे अंत तक दृढ़ रहे। ११ मार्च १६८९ को तुलापुर में उनकी निर्मम हत्या कर दी गई, किंतु वास्तव में उस दिन एक योद्धा नहीं मरा- एक विचार अमर हो गया। संभाजी महाराज के बलिदान ने मराठा साम्राज्य और हिंदवी स्वराज को समाप्त नहीं किया, बल्कि उसे और अधिक प्रचंड बना दिया। उनकी मृत्यु के बाद स्वराज्य की ज्वाला और अधिक भड़क उठी। अंततः वही संघर्ष मुगल साम्राज्य के पतन का कारण बना। जिस ‘औरंगजेब’ ने हिंदवी स्वराज तथा मराठाओं को मिटाने का सपना देखा था, वह स्वयं दक्कन की धरती पर संघर्ष करते-करते टूट कर मृत्यु को जा मिला परंतु हिंदवीस्वराज, मराठाओं ओर सम्पूर्ण भारतभूमि पर एकाधिकार नही कर पाया।
आज आवश्यकता इस बात की है कि श्रीमंत संभाजी महाराज को केवल इतिहास की पुस्तकों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उन्हें भारतीय स्वाभिमान के जीवंत प्रतीक के रूप में समझा जाए। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, यदि मनुष्य के भीतर राष्ट्रप्रेम, आत्मबल और सत्य के प्रति निष्ठा हो, तो वह किसी भी साम्राज्य की नींव हिला सकता है। श्रीमंत छत्रपति संभाजी महाराज केवल मराठा इतिहास के नायक नहीं हैं, वे उस भारतीय आत्मा के प्रतीक हैं, जो अन्याय के सामने कभी झुकते नहीं। उनका जीवन और बलिदान आने वाली पीढ़ियों को सदैव यह प्रेरणा देता रहेगा कि स्वाभिमान की रक्षा के लिए संघर्ष करना ही सच्चा राष्ट्रधर्म है।
निवासी : देवास (मध्य प्रदेश)
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