
सूर्यपाल नामदेव “चंचल”
जयपुर (राजस्थान)
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दर्द की दरारें चेहरे पर
उभरने लगी जो इस कदर ,
होठों की सलवटें और मुखौटे
दिखने लगे हर तरफ।
मुफलिसी की निशानी
पैबंद लिबास न होते अगर,
मासूम की मासूमियत को
मौसम की होती नहीं खबर।
बाजारों की भीड़ में खोजते रहे
वो आईना उम्र भर,
बिंब सच के नकार,
मुखौटे ही बदलते रहे मगर।
पद मद शान ओ संपत्ति लिए
भटकते रहे सदा दर ब दर,
मिथ्या स्वार्थ के पसीने ही
मुखौटे से रिसते रहे तर ब तर।
कोई भूख से लड़ता रहा कोई
उठ गया नींद से हार कर,
मुखौटों के पीछे कोई
ख्वाब की होती नही नजर।
सब अपने हिस्से का
अंधेरा ढो रहे हर डगर,
यहां मुखौटों में उजाले की
किसको कहां खबर।
शिक्षा : एम ए अर्थशास्त्र , एम बी ए ( रिटेल मैनेजमेंट)
व्यवसाय : उद्यमी, प्रबंधन सलाहकार, कवि, लेखक, वक्ता
निवासी : जयपुर (राजस्थान) ।
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