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कविता जीवन में बस लड़ना

ललित शर्मा
खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम)
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जीवन में जन्म से
मृत्यु तक के
हर मोड़ पर
पड़ता है स्वयं को
खुशी गम से
पड़ता है लड़ना,

सांस चलती रहती है
मन कहता है नहीं रुकना
धीमे तेज बस, है चलना
जीवन में बस है लड़ना

भरोसा नहीं कब कहां कैसे
खड़ी मुसीबतों मंडराती
संबलकर बुद्धि
विवेकपूर्ण विचारों से
खुद को आसानी से
कहीं सँघर्षरत रहकर
कहीं दिमागी संतुलन से
आखिरकार पड़ता है लड़ना

आंधी तूफान ओला बरसात की
बिन कहे दिखती है, अद्भुत मार
पड़ता है खुद के निर्णयों से
सुरक्षित कवज पहनना
अधर में पड़े रहने की घड़ी में
चाहे अंधकार हो या हो उजाला,
जीवन में हरवक्त,
जीवन सिखाता बस नाम है जीवन
जीवन में बस है, लड़ना

परिचय :- ललित शर्मा
निवासी : खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम)
संप्रति : वरिष्ठ पत्रकार व लेखक
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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