Friday, August 28राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर आपका स्वागत है... अभी सम्पर्क करें ९८२७३६०३६०

अभी बाकी है

डॉ. राम रतन श्रीवास
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
********************

┈┉═❀❀═┉┈
अभी आँखों में कुछ सपने,
अभी अरमान बाकी है।
अभी इस जिंदगी में कुछ,
नया अभियान बाकी है।।

अगर इंसान हैं हम तो,
किसी के काम आ जाएँ….
अभी मंज़िल नहीं आई,
अभी गगन के पार बाकी है।।

अभी माँ की दुआओं में,
वहीं दूध की शक्ति बाकी है।
अभी पिता के आशीष में,
वही वज्र सा बल बाकी है।।

अभी बहन की हँसी और,
बच्चों में खुशियां खिलानी है…
अभी रिश्तों की साँसों में,
बहुत-सा प्यार बाकी है।।

अभी बच्चे किताबों में,
नया संसार पढ़ते हैं।
अभी सपनों के पंखों से,
नई ऊँचाइयाँ चढ़ते हैं।।

उन्हें कैसी धरा देंगे,
यही प्रश्न आज अपना है?…
अभी आने वाली पीढ़ी का,
हम पर भार बाकी है।।

अभी रूठे हुए अपनों को,
हमें फिर पास लाना है।
अभी टूटे हुए रिश्तों का,
भरोसा फिर से जगाना है।।

न दौलत साथ जाएगी,
न ये ऊँची हवेली जाएगी….
अभी परिवार की चौखट पर,
प्रेम का संसार बाकी है।।

अभी कुछ लोग भूखे हैं,
अभी कुछ आँख नम हैं।
अभी कुछ हाथ खाली है,
अभी कुछ पाँव थके हैं।।

अगर हम साथ चल दें तो,
बदल सकता है ए मौसम…
अभी रिश्तों में जीने का,
सलीका खास बाकी है।।

अभी इस देश की मिट्टी का,
हम पर कर्ज़ बाकी है।
अभी सैनिक के सम्मान,
और प्रगति में विज्ञान बाकी है।।

“राष्ट्रीय तिरंगे” को नमन करके,
यही संकल्प लेता हूंँ…
अभी भारत को विश्व गुरु बनाना,
नया उत्कर्ष बाकी है।।

अभी खेतों में हरियाली,
अभी गाँवों में उजियाली।
अभी किसानों के चेहरे पर,
लौटानी है खुशहाली।।

जिसे धरती माँ ने पाला है,
उस धरती को भी बचानी है…
अभी माटी के आँचल में,
बहुत-सी आस बाकी है।।

अभी नदियाँ पुकारेंगी-
“मुझे निर्मल रहने दो।”
अभी झरने कहेंगे-
“मुझे फिर से बहने दो।।”

बचा लें आज पानी को,
तो कल जीवन बचेगा…
अभी हर बूँद के भीतर,
हमारा श्वास बाकी है।।

अभी वृक्षों की शाखों पर,
नए पंछी उतरनें हैं।
अभी पतझड़ हुए जंगल में,
हरे मौसम सँवरनें हैं।।

न काटो इन दरख़्तों को,
ये जीवन के रखवाले हैं….
अभी धरती के सीने में,
बहुत-सी साँस बाकी है।।

अभी आकाश को धुएँ से,
बचाना भी जरूरी है।
अभी जीने के लिए,
पंच तत्व बचाना भी जरूरी है।।

प्रकृति माँ है हमारी,
सिर्फ़ संसाधन नहीं कोई….
अभी उसके आँचल में,
बहुत संसार बाकी है।।

अभी मंदिर में दीपक,
जलाना है मनुजता का।
अभी मस्जिद में भी गूँजे,
तराना एकता का।।

अलग पूजा, अलग भाषा,
मगर धड़कन वही…
अभी भारत के सीने में,
अखंड प्यार बाकी है।।

अभी अन्याय के आगे,
मुझे आवाज़ उठानी है।
अभी गिरती हुई मानवता को,
फिर राह दिखानी है।।

बहुत आसान है कहना,
दुनिया! बदल नहीं सकती…
मगर! इंसान के भीतर,
अभी भी इंसानियत बाकी है।।

लोगों ने लाख कोशिश की,
मुझे पत्थर बनाने की।
नफरत की धूल चाहे जितनी,
जम जाए दुनिया पर।।

अँधेरी रात चाहे जितनी हो,
सवेरा आएगा निश्चित…
मेरे भीतर अब भी,
मांँ भारती का वरदान बाकी है।।

न पूछो मुझसे उम्र मेरी,
न मेरी कोई थकन गिनना।
अभी मंज़िल से पहले,
मेरे कदमों को मत गिनना।।

मैं गिरकर भी उठूँगा ,
फिर संभल! आगे बढ़ूँगा…
अभी जीवन की पुस्तक में,
बहुत-सा सर्ग बाकी है।।

अभी कुछ स्वप्न आँखों में,
अभी कुछ रंग बाकी हैं।
अभी कुछ गीत अधरों पर,
अभी कुछ छंद बाकी हैं।।

कलम ने हार मानी हो,
भला ऐसा कभी हो सकता है?…
मेरी हर एक पन्ने में,
सुन्दर कांड सा संवाद बाकी है।।

बहुत कुछ कह गया हूँ मैं,
मगर इतना समझ लेना।
मेरी ख़ामोशियों में भी,
कई एहसास बाकी है।।

अभी मंज़िल नहीं आई,
सफ़र जारी है मेरे दोस्त…
अभी जीने की खातिर,
पूरा संसार बाकी है।।

और काल भी सम्मूख खड़ा हो,
समय मुझसे विदा माँगे।
तब दुनिया से यही कहता हूंँ,
नहीं सब कुछ हुआ पूरा।।

तो भारत-माँ के चरण और,
मुख में गंगा जल दे देना…
“राधे” मातृभूमि से मिलकर भी,
बेटा का फर्ज बाकी है।।

और अगर पूछे कोई,
“क्या बचा है जिंदगी में अब भी?”
तो सीना तानकर कहता हूंँ-
“अभी श्वास बाकी है।।”

अभी माँ भारती की चरण में,
कुछ दीप जलने हैं…
अभी देश के माथे पर,
सूर्य का तिलक बाकी हैं।।

अभी उम्मीद बाकी है…
अभी संघर्ष बाकी है…
अभी इतिहास बाकी है…
अभी विश्वास बाकी है…
क्योंकि-
अब भी मैं ज़िंदा हूंँ,
बहुत कुछ करना बाकी है।।

┈┉═❀❀═┉┈

परिचय :-  डॉ. राम रतन श्रीवास
निवासी : बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
साहित्य क्षेत्र : कन्नौजिया श्रीवास समाज साहित्यिक मंच छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष
सम्मान : कोरबा मितान सम्मान २०२१ (समाजिक चेतना एवं सद्भाव के क्षेत्र में)
शिक्षा : हिन्दी साहित्य (स्नातकोत्तर)
अतिरिक्त : रेल परिवहन एवं प्रबंधन में डिप्लोमा
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।

कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें …🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर 98273 60360 पर सूचित अवश्य करें …🙏🏻 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच का सदस्य बनने हेतु हमारे चलभाष क्रमांक 98273 60360 पर अपना नाम और कृपया मुझे जोड़ें लिखकर हमें भेजें…🙏🏻

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *