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आदत
कविता

आदत

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मुझ तुम संग रहने की आदत है। मुझ तुमसे बाते करने की आदत है। मुझ तुम संग सब कहने की आदत है। मुझ तुम संग जीने की आदत है। मुझ तुम संग हर लम्हा बीताने की आदत है। मुझ तुम संग मस्ती में खोने की आदत है। मुझ तुम संग मुस्कुराने की आदत है। मुझ तुम संग हर खामोसी कहने की आदत है। मुझ तुम संग हर गम भुलाने की आदत है। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्र...
ट्रंप पुराण
दोहा

ट्रंप पुराण

विजय गुप्ता "मुन्ना" दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** जो दशकों बनता रहा, सकल विश्व सिरमौर। शौर्य शस्त्रागार का, ठहरेगा किस ठौर।।। दुनिया के लघु देश फिर, जकड़न से आजाद। कम ज्यादा सामान का, खुशी कभी अवसाद।। विकास के सोपान की, जकड़ रखे कुछ देश। एटम बॉम्ब निर्माण से, बदल लिया परिवेश।। टैरिफ खौफ बढ़ा गया, छीना जग का चैन। उधर मुनाफा ही बढ़ा, तकते सारे नैन।। हमला भी ईरान पे, सतत चले जब बात। अकड़ ठसन में ट्रंप था, उल्टी पड़ गई लात।। काला सफेद झूठ सब, ट्रंप सोच के तर्क। केंद्र ही व्यापार है, साफ झलकता फर्क।। जब तक डॉन गिरी चली, खूब लिया आनंद। सहनशक्ति अब अन्य की, गले पड़ा है फंद।। जीवन डॉन उमर सदा, कुछ कड़ियों का तोड़। आस पास के देश भी, कभी नहीं रणछोड़।। धरा तुला कमजोर को, खूब दिखाई आंख। अस्त्र शस्त्र गिरवा दिए, दाबे उनको कांख।। भारत देश गिरफ्त में, आए कब...
इस चंचल मन को
गीत

इस चंचल मन को

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** हिरणी के इस चंचल मन को हवा वसंती महकाती। खिलता हरसिंगार चमन में, हम गाते गीत प्रभाती।। सौरभ सरिता उर में बहती, खिलती आशा की कलियाँ। पिया कहे सिंगार सलौना, चाहत में डूबी अँखियाँ।। यादें लेतीं हैं अँगड़ाईं, मुस्कानें सब मदमाती। प्रणय वल्लरी झूम रही है, अंग-अंग यौवन छाया। सजा कुंतलों पर गजरा है, देख मदन भी बौराया।। प्रेम तूलिका लिखती पाती, भेद खोलकर हर्षाती। प्रीति हमारी यह मधुमासी, प्रिय मधुर मुलाकातें हैं।। संबंधों के गठबंधन में, भ्रमरों की बारातें हैं।। मधुरस छलके तृषित अधर से, धड़कन -धड़कन इतराती। प्रियतम तेरी बनी मेनका, आशाएँ आलिंगन की। मन राधा बन बैठा व्याकुल, राह तके अनुमोदन की।। लगती आग मिलन की ऐसी, प्रेम क्षितिज में इठलाती। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवास...
परीक्षा
कविता

परीक्षा

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** तन गई प्रत्यंचा, खींचा गया डोर, दागे जा रहे अक्षर-तीर चहुं ओर, लड़ रहे नन्हे योद्धा अदम्य साहस के साथ, अनजान अभी भी नैतिक-अनैतिक के व्यूह-पथ, अक्षरों के ये शर चीरते मन-मस्तिष्क की दीवार, फिर भी सजग हैं बच्चे, करने प्रत्युत्तर प्रहार, एकाग्रता का कवच ओढ़े, संकल्पों की ढाल लिए, क्षणिक विचलन भी यहाँ अंधकार के द्वार दिए, जीतना यह रण अनिवार्य, त्यागने होंगे संशय-संघार, हर बहाना, हर बाधा को रखना होगा दूर अपार, दुश्मन के वही पुराने दाँव, पर अब सुसज्जित है नई पीढ़ी, ज्ञान-शस्त्रों से सुसज्जित, लिख रही अपनी तकदीर नई, यह जंग लौटे हर वर्ष, प्रश्नों के जंजाल लिए, उत्तर बन कर काटना है हर संशय के जाल लिए, महायुद्ध अब भी जारी है, विजय-किला दृष्टि में साकार, पताका फहराने को साध रहे है...
खिड़की पर ठहरी धूप
कविता

खिड़की पर ठहरी धूप

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** नित ही, खिड़की पर ठहरी धूप बात करती है। खिड़की पर ठहरी धूप से सौगात झरती है।। खिड़की पर ठहरी धूप मुहब्बत को समेटे है। खिड़की पर ठहरी धूप भावनाओं को लपेटे है।। खिड़की पर ठहरी धूप हर पीर को हरती है। खिड़की पर ठहरी धूप से सौगात झरती है।। खिड़की पर ठहरी धूप अहसासों का दर्पण है। खिड़की पर ठहरी धूप में प्रीति का समर्पण है।। खिड़की पर ठहरी धूप विश्वासों को धरती है। खिड़की पर ठहरी धूप से सौगात झरती है।। खिड़की पर ठहरी धूप में तो प्रखर मुस्कान है। खिड़की पर ठहरी धूप में तो प्रबल अरमान है।। खिड़की पर ठहरी धूप अंतस में इस भरती है। खिड़की पर ठहरी धूप से सौगात झरती है।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मेरिट होल्डर), एल.एल.बी, पी-एच.डी. (इ...
राम जन्मे कौशल्या के
भजन

राम जन्मे कौशल्या के

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** राम जन्मे कौशल्या के कैकई के भरत लाल सुमित्रा ने जाए लखन शत्रुघ्न जन्मे देखो अयोध्या धाम। राजा दशरथ प्रसन्न है दान करें धन धन्य, हीरा-मोती-माणक-पन्ना लूटा रहे दे थाल। नगरवासी थाल सजाये करें आरती दीप जलाएं, मन हरषे कौशल्या, केकई सुमित्रा ने भी देखो दो- दो लाल है जाये, दशरथ आंगन बटे बधाई सखिया देखो मंगल गान है गाये लाला के जनम की देखो बधाई गाये देखो बधाई गाये। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मंडल जबलपुर से सम्मानित २. अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना उज्जैन से सम्मानित ३. राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "साहित्य शिरोमणि अंतर्र...
विरह की व्यथा
कविता

विरह की व्यथा

भारमल गर्ग "विलक्षण" जालोर (राजस्थान) ******************** प्राण-पखेरू उड़ गया डाली से, छूट गया संग, रह गई काली से। चाँदनी रातें अब सूली बनीं, तारों भरी छत पलकों पर ढली। हवा के झोंके सिसकियाँ लिए, दीवारों से टकराकर रुली। बिना बादल बरसा करती आँखें, नींद रूठी पलकों पर ठहरी। तकिया सूनापन लिए खड़ा है, सपनों के टुकड़े बिखरे पड़े हैं। सावन की फुहारें याद दिलाएँ, उस रात की बातें जो बीती। घनघोर घटा गरजे मन भीतर, बिजली सी चमकी आँखों में पीड़ा। पुरवैया के पैरों में लिपटी, कागज की नाव संदेशा ले चली। पर लौटकर वह खाली हाथ आई, मिला न पता उस पथिक का कहीं। दीपक की लौ सी काँपता मन, हर छाया में वह मूरत दिखती। पुकारूँ तो प्रतिध्वनि हँस देती, दौड़ूँ तो राह रोती-सी खड़ी। हे विधाता! लौटा दे मेरा साजन, नभ के तारे गवाही देंगे। विरह की अँधियारी टूटेगी जब, प...
अंतिम तुमको मेरी पुकार
गीत

अंतिम तुमको मेरी पुकार

राम राज सिंह उन्नाव (उत्तर प्रदेश) ******************** प्रणय-गीत अंतिम तुमको मेरी पुकार।। नवल विटप जो पीट हो रहा उसके तुम हो प्राण। नयन मेघ से आज करा दो अमिय प्रेम रस पान। प्रकृति सजाती निज आँगन में नित नूतन उद्यान। मेरे मन मधुवन में गुंजित किन्तु विरह का गान। आज विदाई की बेला है, द्वार खड़े है मेरे कहार।। अंतिम तुमको मेरी पुकार।।१।। प्रतिदिन पथ में पुष्प बिछाता साथ मधुर मुस्कान। औचक ही मै खिल जाता हूँ तुम्हे निकट ही जान। किन्तु मिलन वह एकाकी बस क्षण भर का अवधान। फिर उसी वेदना के क्रंदन का होता नित्य वितान। सुखद प्रणय की अभिलाषा में, जीवन रण न मै जाऊ हार। अंतिम तुमको मेरी पुकार ।।२।। मन में है छवि बसी तुम्हारी और तुम्हारा ध्यान। कभी तो होगा दुःख रजनी का मंगल एक विहान। स्वाति बूँद बिनु सीप सम अधर-कमल, मुख म्लान। आकर जीवन सुधा पिला दो बन वियोग वरदान। प्...
जब-जब बिखरता समाज, तब-तब याद आते हैं श्रीराम
आलेख

जब-जब बिखरता समाज, तब-तब याद आते हैं श्रीराम

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** क्या आज का समाज उस आदर्श की ओर अग्रसर है, जिसे हम ‘रामराज्य’ के नाम से जानते हैं, या हम उससे लगातार दूर होते जा रहे हैं? यह प्रश्न केवल दार्शनिक नहीं, बल्कि हमारे समय की सबसे बड़ी सामाजिक चुनौती भी है। श्री राम नवमी का पावन पर्व हमें इसी आत्ममंथन का अवसर प्रदान करता है। त्रेतायुग में श्रीराम का अवतरण केवल एक धार्मिक घटना नहीं, बल्कि मानवता को दिशा देने वाला एक युगांतरकारी क्षण था। आज, जब समाज अनेक प्रकार के नैतिक और सामाजिक संकटों से जूझ रहा है, तब श्रीराम के आदर्श पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। भगवान विष्णु के सातवें अवतार के रूप में जन्मे श्रीराम ने अयोध्या में राजा दशरथ और माता कौशल्या के यहाँ जन्म लेकर यह सिद्ध किया कि महानता वंश या वैभव से नहीं, बल्कि चरित्र और आचरण से निर्धारित होती है। उनके ज...
लक्ष्मी सी मेरी पहचान
कविता

लक्ष्मी सी मेरी पहचान

शशि चन्दन "निर्झर" इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** लक्ष्मी सी मेरी पहचान। देता देव और इंसान।। भ्रमित कर स्वयं को हर लेता इक दिन प्राण।। मेरी ही कोख से निकल.... पलता वो वक्ष स्थल से.... खोट भर नैनों में फिर... दामन भरता अश्रुजल से।। कभी अग्नि में स्वाह तो कभी पत्थर होना पड़ा।। कभी टुकड़े हुए हज़ार, तो कभी बेघर होना पड़ा।। क्रोध करूं या हास्य करूं। या स्वयं का परिहास करूं।। निर्णय तो करना होगा.... मौन रहूं या विनाश करूं।। सोचती हूं उठा लूं कोरा कागज़, दिखा दूं अपनी कलम की ताकत। ताकि जन्में, जब-जब "कविता".. "दिनकर" आकर छंदों से करें स्वागत।। परिचय :- इंदौर (मध्य प्रदेश) की निवासी अपने शब्दों की निर्झर बरखा करने वाली शशि चन्दन एक ग्रहणी का दायित्व निभाते हुए अपने अनछुए अनसुलझे एहसासों को अपनी लेखनी के माध्यम से स्याह रंग कोरे कागज़ पर उतारतीं हैं,...
मरिचिका
कविता

मरिचिका

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** तपती दुपहरी की सङको पर ङगमगाते पैरो की थाप पर मृग मरिचिका भागती जा रही दूर बहृत दूर, दूर जैसे जिन्दगी से दूर भागता है कोई ऐसे समय हवाओ का बवन्ङर साथ नही देता सिर्फ देखता है अपनी उचाई, अपनी गोलाई रेत के ढेर मे क्षीण काया भटकती है मरिचिका के पीछे जल को खोजती है। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "हिंदी रक्षक राष्ट्रीय...
समय का बदलाव
कविता

समय का बदलाव

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** सब कुछ बदल जाता है वक़्त के साथ प्रतिष्ठा, परंपरा, मर्यादा मगर नहीं बदलता व्यक्ति का व्यक्तित्व। सब कुछ चला जाता है वक़्त के साथ अपने, पराये, हमराही मगर नहीं जाता व्यक्ति का अपनेपन का वहम। सब कुछ खो जाता है समय के साथ बचपन, यौवन, पद मगर नहीं खोता अपनों के लिए दिया वक़्त। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिं...
हे राम धरा पर आ जाओ
गीत

हे राम धरा पर आ जाओ

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** हे राम धरा पर आ जाओ, प्रभु फिरती अकुलाई। खोई है मानवता जग ने, कली कली मुरझाई।। ‌ दानवता प्रभु खूब बढ़ी है, रक्षक बनकर आओ। संस्कार सब भूल गये हैं, आकर नाथ सिखाओ।। समरसता का पाठ पढ़ा दो, दूर करो कठिनाई। भ्रष्टाचारी पनप रहे हैं, भ्रष्टाचार मिटा दो। भय से हीन जगत् हो सारा, अत्याचार हटा दो।। अंत करो मन के रावण का, हर उसकी परछाई। राह प्रगति की खोलो सारी, हो संस्कृति संस्थापक। पोषित कर दो धर्म सनातन, प्रभु हो शांति उपासक।। राम-राज्य फिर से आ जाए, सुरभित हो अँगनाई। रघुकुल रीति निभाने वाले, प्रभु हो अन्तर्यामी। तकती राह अहल्या फिर से, दे दो दर्शन स्वामी।। कलियुग के सब कलुष दूर हों, मुक्तिधाम रघुराई । विनती करते रघुकुल भूषण, शरणागत आते हैं। वंदन अभिनंदन हैं प्रभुजी, रामचरित गाते हैं...
जूता शास्त्र
व्यंग्य

जूता शास्त्र

सुधा गोयल बुलंद शहर (उत्तर प्रदेश) ******************** पता नहीं लोग कहां से टूटे-फटे पुराने जूते उठा लाते हैं और मंचों पर फेंकने लगते हैं। कुछ को जूते लग भी जाते हैं तो कुछ माइक स्टैंड का सहारा लेकर बच भी जाते हैं। जोश में कुछ लोग अपने नए जूते भी उछाल देते हैं। मैं भी बचपन में कई बार इमली और अमिया तोड़ने के लिए पत्थर की जगह चप्पल उछाल देती थी। पर जब भी चप्पल पेड़ की फुनगी पर अटक गई और लाख कोशिशें के बाद भी नीचे नहीं गिरी तो चप्पल उछालना छोड़ दिया क्योंकि चप्पलों का उछालना कई बार बड़ा महंगा पड़ा। लोग चप्पल जूते की जगह सड़े टमाटर और सड़े अंडे उछालते हैं जो सामने वाले को घायल कम रंगीन अधिक कर देते हैं। महंगाई का जमाना है पुराने जूते काम आ सकते हैं पर सड़े टमाटर फेंकने के अलावा और किसी काम के नहीं रहते। अब इन्हें कहां फेंका जाए यह आपकी जरूरत पर निर्भर करता है। सड़कों पर जूते चलना आम बात ...
नवदुर्गा तुम आ गईं
दोहा

नवदुर्गा तुम आ गईं

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** नवदुर्गा तुम आ गईं, हरने को हर पाप। संभव सब कुछ आपको, तेरा अतुलित ताप।। सद्चिंतन तजकर हुआ, मानव गरिमाहीन। जगजननी माँ दुख हरो, सचमुच मानव दीन।। ममता है तुझ में भरी, तू सचमुच अभिराम। माता जी तेरे सदा, हैं नित नव आयाम।। तू करुणा करती सदा, तेरा पावन नाम। यह जग तेरा है सदा, दुर्गा पावन धाम।। माँ तेरी आराधना, करे सदा कल्याण। नौ रूपों में तुम रहो, पापी खाते बाण।। करते हैं सब साधना, हम सब तेरे लाल। दर्शन दो, हमको करो, हे माँ ! आज निहाल।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मेरिट होल्डर), एल.एल.बी, पी-एच.डी. (इतिहास) सम्प्रति : प्राध्यापक व विभागाध्यक्ष इतिहास/प्रभारी प्राचार्य शासकीय जेएमसी महिला महाविद्यालय प्रकाशित रचनाएं व गतिविधि...
पर्वत जैसा अडिग रहो
कविता

पर्वत जैसा अडिग रहो

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** अडिग रहो तुम, भीड़ की दिशा नहीं विचारों की दिशा चुनो, जहाँ सच कठिन हो, वहीं अपने कदमों का संकल्प बुनो, क्यों भटकते हो नारों में, जब मार्ग तुम्हारे पास लिखा है, भारतीय संविधान की रोशनी में हर उत्तर सुस्पष्ट दिखा है, याद करो वो कर्मपथ, जहाँ शब्द नहीं, संघर्ष बोलता था, भीमराव अंबेडकर का हर एक विचार अन्याय के विरुद्ध डोलता था, और चेतना की मशाल लिए चल पड़ा एक और पथिक महान, कांशीराम ने सिखाया जागृत समाज ही होता है सच्चा बलवान, समता का स्वर केवल कहने से नहीं, जीवन में उतारना पड़ता है, समानता का दीप जलाने को अहंकार खुद ही हारना पड़ता है, बंधुत्व की बात अगर करते हो, तो भेदभाव से रिश्ता तोड़ो, अपने भीतर के छोटेपन को पहचानो, समझो और छोड़ो, युवा हो तुम केवल उम्र से नहीं, विचारों की ...
ऋतुराज बंसत
कविता

ऋतुराज बंसत

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** बसंत आज तू भी है, खिला-खिला सा , निर्मल जल नदियों में बहता, शुद्ध हवा पवन है बहता, खेतों में पीले है फूल, ऋतु को आगाज है करता, ऋतुओ का राजा है बसंत, हरियाली अंगड़ाई लेती, कोयल पपीहा करे है शोर, मन चंचल मदमस्त है रहता, चहूं दिशा हरियाली ओढ़, वन में देखो मोर हे नाचे, बसंत भी देखो इतराए, आमो पर छाया हे मोड, बने हे देखो कान्हा के सिर का मोड, बसंती फूल, बसंती साडू, बसंती राग, बसंती जामा, बसंती रंग से खेले हे कान्हा, बरसाने में देखो फाग, किरण कोर जडी़ है साड़ी, पीले फूल और हरियाली, ओड़े देखो धरती आज, भारत माँ की यही पहचान।। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां :...
एयर इंडिया की हवाई यात्रा
यात्रा वृतांत

एयर इंडिया की हवाई यात्रा

माधवी तारे लंदन ******************** मैं हर साल अपने बड़े बेटे के साथ कुछ समय रहने के लिए ब्रिटेन जाती हूं और इस बार आते समय मेरे ज्येष्ठ सुपुत्र ने कहा कि मां इस आपकी उम्र काफी है और एक दो दिन की यात्रा में आप थक जाओगी, सामान्य क्लास में बैठ कर आपको परेशानी होगी. मैं हम दोनों के लिये इस बार फर्स्ट कलास का टिकट निकालता हूं। जरा वहां का माहौल भी देख लो। मैं उसकी बात सुन कर घबरा सी गई क्योंकि मुझे मालूम है कि फर्स्ट क्लास का टिकट और वो भी अंतरराष्ट्रीय काफी महंगा होता है। लेकिन मेरा बेटा जिद पर अड़ गया मैंने उसे बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन वह नहीं माना। मैंने कहा बेटा रेलवे में भी फर्स्ट क्लास सेकंड क्लास रहते है ना अब क्या विशेष है... वो बोला मां देख यह भी अनुभव होना चाहिए आप मुंबई तक आपको १ दिन से ज्यादा समय लगने वाला है इसलिए ये ठीक रहेगा। आखिरकार यात्रा का दिन आ गया, समय के हिसाब स...
आश्वासन पुराण
व्यंग्य

आश्वासन पुराण

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** सभा-मण्डप में धूप के छिन्न-भिन्न कण थिरक रहे थे। मध्य आसन पर विराजित महामुनि ने दीर्घ श्वास लेकर अपनी दृष्टि उस नवदीक्षित राजकुमार पर स्थिर की, जो राजनीति के रणक्षेत्र में प्रविष्ट होने के लिए अभिमन्यु- सा उत्साह लेकर आया था। राजकुमार ने करबद्ध होकर निवेदन किया “गुरुदेव, राजनीति का मार्ग कठोर और दुर्गम कहा गया है। कृपा कर वह दिव्य अस्त्र बताइए जिसके बल पर जनमानस जीता जा सके और सिंहासन की अक्षुण प्राप्ति हो।” मुनि के अधरों पर मंद मुस्कान उदित हुई; बोले- “वत्स, राजनीति में न शस्त्र काम आता है, न शास्त्र का गहन अध्ययन। यहाँ एक ही महामंत्र है आश्वासन। यही वह अदृश्य अस्त्र है जिसके बल पर राजसिंहासन डोलता भी है और टिका भी रहता है।” मुनि का स्वर गंभीर हुआ, “लोकतंत्र की भूमि में जो सबसे हरी-भरी...
मॉं अम्बे गीत
गीत

मॉं अम्बे गीत

शिमला शर्मा "लक्ष्मी प्रिया" ग्वालियर (मध्यप्रदेश) ******************** मातु अम्बे करें नित्य आराधना। ध्यान तेरा धरें हम करें अर्चना। बुद्धि करदो विशद मॉं करें वंदना। नित नवल छंद कविता करें सर्जना। शीश रख दो वरद हस्त मॉं शारदे, छंद - निर्झर बहा दो करें याचना।। मातु अम्बे करें नित्य आराधना। ध्यान तेरा धरें हम करें अर्चना। जाह्नवी कर्म यमुना बहे संग में। मानसी शारदा संगमी अंग में।। तीर्थ संगम बना दें सफल शारदे, भाव से भारती माॅं करूॅं साधना।। मातु अम्बे करें नित्य आराधना। ध्यान तेरा धरें हम करें अर्चना।। आप से ही चले मातु संसार यह। है दुखी ये हिया मॉं करो प्यार है।। आप जननी जगत की हरो कष्ट सब, टूट जाऊॅं नहीं बाॅंह को थामना। मातु अम्बे करें नित्य आराधना। ध्यान तेरा धरें हम करें अर्चना।। परिचय :- श्रीमती शिमला शर्मा "लक्ष्मी प्रिया" निवासी ...
नवरात्रि
दोहा

नवरात्रि

डॉ. भावना सावलिया हरमडिया, राजकोट (गुजरात) ******************** आई माँ विश्वंभरी, आज तुम्हारे धाम। भटक गए हम राह हैं, बाँह लीजिए थाम।। नौ दुर्गा माँ को नमन, करते बारंबार। जोडे दोनों हाथ हम, खड़े तुम्हारे द्वार।। प्रथम शैलपुत्री तुम्हें, करते नित्य प्रणाम। जगत नियन्त्री शक्ति का, हम रटते हैं नाम।। ब्रह्मचारिणी शक्ति हे, सविनय तुम्हें प्रणाम। मन में जलता भक्ति का, दीपक आठों याम।। करो चंद्रघंटा सदा, प्रेम-भक्ति संचार। द्वेष-भाव को दूर कर, दो पावन संस्कार।। माँ कूष्माण्डा त्याग का, मन में हो विस्तार। मानवता के द्वार से, रहे बरसता प्यार।। करो स्कंदमाता सदा, दोष हृदय के दूर। जनहित की शुभ भावना, मन में हो भरपूर।। हे माता कात्यायनी, सबकी पालनहार। पाप मिटाकर जीव का, शीघ्र करो उद्धार।। कालरात्रि माता करो, दुष्टों का संहार। हे जगदंबा शक्ति तुम, हो सबका आधार।। शि...
शिव-शक्ति श्रृंगार
स्तुति

शिव-शक्ति श्रृंगार

बाल कृष्ण मिश्रा रोहिणी (दिल्ली) ******************** विराजमान भाल चंद्र, गंग धार मस्तकम्, प्रिये सुअंग गौरि वाम, शोभते सुहस्तकम्। सुगंध पुष्प माल कण्ठ, मुण्ड माल राजते, अनंत प्रेम रूप देखि, कामदेव लाजिते ॥१॥ ललाट नेत्र दग्ध काम, भस्म अंग लेपनम्, उमा विलोकि मुग्ध भाव, अर्पते सुजीवनम्। मृदंग ताल डमरूअं, निनाद व्योम गुंजते, सुरेश देव दानवा, सप्रेम पाद पूजते ॥२॥ सुवर्ण वर्ण शैलजा, कपूर गौर शंकरम्, विचित्र सौम्य रूप धार, मोहते चराचरम्। सुहाग भाग माँग बीच, सेंदुरं सुसोभितं, प्रसन्न चित्त देखि भक्त, होत मोद मोहितं ॥३॥ नगाधिराज पुत्रिका समक्ष देव देवताम्, अनन्त कोटि सृष्टिदां नमामि शक्ति रूपिणीम्। जटा कलाप मध्य बाल, चंद्रिका चकाचुपं, निहारि गौरि रूप सौम्य, भूलि जात आपुपं ॥४॥ झुलात प्रेम-दोलना हिमालयं सुशृंग में, अनंत रंग घोरि-घोरि भीजतें सुअंग में। न वर्ण्यते मु...
है शारदे तार दो।
स्तुति

है शारदे तार दो।

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** है विनय, आपसे, शारदे तार दो। द्वार हम, हैं खड़े, शारदे प्यार दो।। ज्ञान हो, ध्यान हो, वेद की साधना। हम करें, नित्य ही, मातु आराधना।। तेज हो, सूर्य सा, कर कृपा हैं शरण। नंदिता, पूजिता, हैं गिरे हम चरण।। मीत हो, जीत का, आप उपहार दो। द्वार हम, हैं खड़े, शारदे प्यार दो।। राह हम, जो चलें, सत्य का पाथ हो। द्वेष मन, में न हो, श्रेष्ठ का साथ हो।। हो हृदय, भी विमल, मातु भयहारिणी। मंत्र हो, प्रेम का, हो जगततारिणी।। कंठ पे, नाम हो, माँ अमिय धार दो। द्वार हम, हैं खड़े, शारदे प्यार दो।। यह धरा, देश की, मातु है पावनी। ताज हो, सिर सदा, शांति की आसनी।। हम सदा, हों सफल, पूर्ण हर काम हो। ओम ही, ओम हो, माँ अमर नाम हो।। पाप का, नाश हो, हाथ तलवार दो। द्वार हम, हैं खड़े, शारदे प्यार दो।। पाठ हम, तो पढ़े, म...
जिंदगी की सीख
कविता

जिंदगी की सीख

चेतना सिंह प्रकाश "चितेरी" प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) ******************** जिंदगी रुला रही है-रो लें, जिंदगी हँसा रही है-हँस लें। जिंदगी अभिनय करा रही है- मुस्कुरा निभा लें, जिंदगी एक सफर है- अनंत की ओर बढ़ चलें। जिंदगी मुसाफिर है इस संसार में, आना-जाना इसका नियम पुराना है। रुक न पाया कोई यहाँ कभी, यादों का ही बस खजाना है। यहीं मोह का बंधन है, गहरे रिश्तें भी टूट जाना है । अपनों का बिछड़ना- यहीं रोना है। सबको एक दिन छोड़ जाना है, चाहे जितना चाहें भी कुछ न भूल पाना है। परिचय :- चेतना सिंह प्रकाश "चितेरी" निवासी : प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपन...
जाने की जल्दी
कविता

जाने की जल्दी

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** फर्राटे भरती कार, बाइक, ट्रक, हर ओर बिखरी है आपाधापी, होड़ है आगे निकल जाने की, आगे वालों को भी पछाड़ आने की। जिंदगी बन गई है महज़ रफ्तार, चाहे शांत कछुआ हो, या फुर्तीला चीता, या चालाक सियार। संभलो- ज़रा ठहरो, एक पल ब्रेक लगाओ, सुरक्षित आओ, सुरक्षित जाओ। क्या पता यह जाने की जल्दी तुम्हें कहीं दूर ले जाए, इतना दूर- जहाँ से लौटने की कोई राह न आए। यह दौड़ किसे दिखानी है? किसे हराने की ठानी है? हिरण-सी दौड़ में कौन-सी कस्तूरी पाना है? और इस अकड़े हुए अहंकार से आख़िर किसे झुकाना है? कहते हो- जिंदगी कम पड़ जाती है जीने को, फिर क्यों अनदेखा करते हो इन धड़कनों, इन जख्मों को सीने में सीने को? भाई, जीवित रहोगे- तो हर मंज़िल पा जाओगे, पर अगर रफ्तार को ही चुन लिया, तो रास्ते ही तुम्ह...