Notice: Function wp_get_inline_script_tag was called incorrectly. Unable to set inline script data. Please see Debugging in WordPress for more information. (This message was added in version 7.0.0.) in /home4/hindim8d/public_html/wp-includes/functions.php on line 6170
Wednesday, July 22राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर आपका स्वागत है... अभी सम्पर्क करें ९८२७३६०३६०

BLOG

यादें
कविता

यादें

काजल कुमारी आसनसोल (पश्चिम बंगाल) ********************110 कभी-कभी कुछ रिश्ते बहुत खूबसूरती से शुरू होते हैं, पर वक़्त के साथ वही रिश्ते सबसे ज़्यादा रुला जाते हैं। शुरुआत में हर बात अपनी लगती है, फिर अचानक हालात ऐसे बनते हैं कि दूरी मजबूरी बन जाती है। ना कोई ग़लती साफ़ दिखाई देती है, ना ही कोई पूरी तरह बेगुनाह होता है। कभी कोई बदल जाता है, तो कभी हालात इंसान को बदल देते हैं। वो वादे, वो कसमें सब अधूरी रह जाती हैं, और हम चाहकर भी उन्हें पूरा नहीं कर पाते। धीरे-धीरे अजनबी बन जाते हैं, जिन्हें कभी अपनी जान से ज़्यादा चाहा था। सबसे दर्दनाक बात ये होती है कि ना वो पास होते हैं, ना हम उनसे दूर हो पाते हैं। बस यादों में जीते रहते हैं, और सोचते हैं। अगर मिलना ही नहीं था, तो किस्मत ने मिलाया ही क्यों ... परिचय :- काजल कुमारी निवासी : ...
माता के नवरूप
कविता

माता के नवरूप

उषाकिरण निर्मलकर करेली, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** प्रथम दिवस नवरात्र का, सजा मातु दरबार। शैलसुता माता सदा, करती है उपकार।।१।। दूजे दिन आराधना, ब्रम्हचारिणी रूप। संयम तप वैराग्य की, देवी छटा अनूप।।२।। माँ के मस्तक पर सजा, चंद्र घंट आकार। मात चंद्र घंटा करे, असुरों का संहार।।३।। आलोकित ब्रह्मांड है, जिनके तेज प्रताप। माँ कुष्मांडा जाप से, मिटे शोक सब पाप।। ४।। स्कन्दमात सुमिरन करो, पंचम दिन नवरात। शुभ्र वर्ण पद्मासना, शुभता की सौगात।।५।। षष्टम माँ कात्यायनी, सिंह पर है आरूढ़। माँ महिषासुर मर्दिनी, महिमा जिनकी गूढ़।।६।। कालरात्रि माता भजो, शुभंकरी शुभ नाम। रक्तबीज आतंक को, जिनसे मिला विराम।।७।। महाशक्ति फलदायिनी, करे सदा कल्याण। अष्टम दिन गौरी भजो, माँ भक्तों की त्राण।।८।। मात सिद्धिदात्री तुम्हें, बारम्बार प्रणाम। नवम रूप में मातु को, पूज...
नीम का पेड़
कविता

नीम का पेड़

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** हर साल की तरह नवोदित हुई एक नई सुबह ले आई जीवन का एक नव वर्ष नव चिंतन, नव मनन ले नव आशाओं का दीप.... जलते ही आस-दीप मानो सिमट गये हों जीवन के अंधेरे मगर ये प्रकाश उघाड़ गया जीवन के प्रत्यक्ष-परोक्ष तन, मन पर लगे आघाती घावों को एक पल खुशी हुई अतीत के सुनहरे पल देख तो कभी व्यथित हुआ मन छद्म हंसी के दुशाले के आवरण में छिपे रेशा-रेशा, रिसते दर्दीले घावों को.... मगर मन ने आज जाना सच्चा साथी है कौन..? वो है मेरा हम उम्र दालान में खड़ा नीम का पेड़ जिसने पिया है छिप-छिप मेरे तिक्त आँसूओ का जल और.. बदलते कैलेंडर में भी मुस्कुराता रहा है और.. होने दिया खारा अपने ही अस्तित्व को मुस्कान स्वरूप रहा हरा-भरा... साक्षी था मेरे हर गुण-दोष रक्त के ढक लेता था सब अपने हरे पत्तों के जाल ...
श्री पार्वती शक्ति तांडव स्तुति
स्तुति

श्री पार्वती शक्ति तांडव स्तुति

बाल कृष्ण मिश्रा रोहिणी (दिल्ली) ******************** कुचेल-केश-पाश-बद्ध-मल्लिका-सुगन्धिनी, उमेश-वाम-भाग-नित्य-केलि-कंज-धारिणी। अशोक-पुष्प-पल्लवैः सु-रञ्जित-स्व-मूर्धनी, करोतु शक्ति-ताण्डवं सदा शिवा भवानी ||१|| ललाट-बिन्दु-सिन्धु-रक्त-रञ्जिता-स्व-भालका, धनुर्धरा त्रिशूलिनी कपाल-पाश-धारिणी। कराल-काल-मर्दिनी समस्त-दुःख-हारिणी, नमामि शैल-पुत्रिणीं सदा शिवा भवानी ||२|| रणत्-क्वणत्-कणत्-किङ्किणी-नूपुर-घोष-मण्डिता, चलत्-चलत्-पद-क्रमैः सु-विश्व-चक्र-चालिनी। अघोर-रूप-धारिणी घोर-शत्रु-घातिनी, प्रचण्ड-शक्ति-रूपिणी सदा शिवा भवानी ||३|| जगज्जननी पावनी प्रसन्न-मन्द-हासिनी, सु-भक्त-वृन्द-वन्दिता समस्त-विघ्न-नाशिनी। प्रलय-वह्नि-रञ्जिता महानिभय-दायिनी, जयतु जयतु पार्वती सदा शिवा भवानी ||४|| जटा-कटाह-संभ्रम-भ्रमन्-निलिम्प-निर्झरी, विलोम-शक्ति-रूपिणी कराल-खड्ग-धारिणी। धगद्...
सफेद पोश
कविता

सफेद पोश

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** आज समाज के सभागारों में खामोशी का साम्राज्य क्यों है, सफेदपोश चेहरों पर सन्नाटा, अंतरमन में आज भी राज क्यों है। जब अन्याय की आंधी चलती है, दीपक भी कांपने लगते हैं, पर विचारों के सूर्य होकर भी, ये लोग मौन में ढलने लगते हैं। भीष्म, पांडव, विदुर की तरह सब दृश्य निहारते रह जाते हैं, सत्य सामने रोता रहता, ये कर्तव्य से नज़र चुराते हैं। कलम जिनकी तलवार थी, आज म्यान में सोई क्यों है, विवेक की आवाज़ होते हुए भी, अंतरात्मा खोई क्यों है। सम्मानित मस्तिष्कों का मौन, समाज को पीड़ा देता है, जब प्रहरी ही सो जाए तो, अन्याय खुलकर जीता है। उठो, तुम्हारी वाणी में ही परिवर्तन का सार छिपा है, मौन तो केवल बंधन है, सत्य बोलना ही असली तप है। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : 25 अप्रैल निवास : आबिदजान (अफ्रीका) मू...
जीवन की लीला
कविता

जीवन की लीला

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** जीवन का खेल है खूब निराला अमृत म घुलता विष का प्याला कहीं अमृत का लाजबाव स्वाद निस्वार्थी का वही महाप्रसाद ।।१।। सांस जबतक, आस तबतक ईश्वर की भक्ति है जप और तप ।।२।। स्वार्थ का भरता जीवन संसार भ्रमित क्यों करो त्वरित दरकिनार जीवन जब अविराम चलती गाड़ी असीम आंनद, सच्ची होती खाड़ी ।।३।। राह पाने में बने जो स्वर्थी खिलाड़ी भ्रमित भाषा में कहे, है वो अनाड़ी।।४।। राह को मतलबी जीवन क्यों बनाते जीवन में स्वयं रोढ़ा, दिख आते दुख वेदनाओं का ज्ञान समझ पाते जीवनसंसार की लीला समझ जाते ।।५।। कामक्रोध लोभमोह की मौजमस्ती जीवन में बन जाती है हरदम सस्ती उदारता त्याग सेवाभाव करुणाप्यार यहीजीवनसाथी, यही सच्चा संसार।।६।। परिचय :- ललित शर्मा निवासी : खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) संप्रति : वरिष्ठ पत्रकार व लेखक घोषणा पत्...
नवरात्रि का संदेश: मातृशक्ति, राष्ट्रभाव और भारतीय संस्कृति की अमर चेतना
आलेख

नवरात्रि का संदेश: मातृशक्ति, राष्ट्रभाव और भारतीय संस्कृति की अमर चेतना

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** जब विश्व की अनेक प्राचीन सभ्यताएँ समय के प्रवाह में विलीन हो गईं, तब भी भारत की संस्कृति आज उतनी ही जीवंत, जाग्रत और प्रेरणादायी बनी हुई है। इसका कारण केवल इसका प्राचीन इतिहास या विशाल भूभाग नहीं, बल्कि वह गहरी सांस्कृतिक चेतना है, जिसकी जड़ें मातृत्व, शक्ति और आध्यात्मिक मूल्यों में निहित हैं। भारतीय जीवन-दृष्टि में शक्ति का अर्थ केवल सामर्थ्य नहीं, बल्कि संरक्षण, करुणा, सृजन और संतुलन की वह शक्ति है जो समाज को दिशा देती है। यही कारण है कि भारत में शक्ति की उपासना केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक दर्शन है- और इसी दर्शन का विराट उत्सव है नवरात्रि। भारतीय संस्कृति का मूल स्वर यदि किसी एक भाव में व्यक्त किया जाए तो वह है- मातृत्व और शक्ति का सम्मान। यहाँ मातृभूमि को केवल भूमि नहीं माना गया,बल्कि ...
ये दौर और है
कविता

ये दौर और है

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जीना है चैन से तो मिलजुलकर रहो, गर पता हो राज की कोई बात तो इशारों में भी न बताओ मुंह सिलकर रहो, एकलव्यों मुगालते में न रहना हर शाख पर चिपके हुए हैं द्रोणाचार्य, बिना बताए कब काट ले अंगूठा जो मुस्तकदिल के लिए न हो स्वीकार्य, मुट्ठी भर मस्तिष्क रहते हैं सदा सक्रिय, सूर्य की दिशा मोड़ सकते हैं कभी भी जब आ जाए अपने लिए स्थिति अप्रिय, अब सोचो जरा क्या व कैसा हो कदम, मिले कामयाबी और टूटे न मन का भरम, झूठों और शोषेबाजों का है अब तो दौर, साथ न दो तो शायद बचे न कोई ठौर, गिरवी रहने दो अपना मन मस्तिष्क, विरोध से मिट न जाए बचा खुचा भविष्य, तो मिलाओ उनके हां में हां, बचा रह जाए शायद अपना और अपनों की जां, झूठ खूबसूरत और यकीं लायक है ये वक्त काबिले गौर है, ये दौर और है, ये दौर और है। ...
नैनिका
कविता

नैनिका

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** प्यारी इस मुस्कान पर, सब जाते बलिहार। अधरों पर उँगली रखी, बहती है रसधार।। बहती है रसधार, माथ ज़ुल्फें घुँघराली। मिश्री जैसे बोल, बड़ी है भोली- भाली।। लाल-लाल हैं गाल, देख आँखें कजरारी। करते सभी दुलार, नैनिका लगती प्यारी।। जाती शाला नैनिका, बरसे सावन झूम। बारिश से बचके चली, माँ का माता चूम।। माँ का माथा चूम, लगाती बचने छाता। होती गीली फ्राक, मगर सावन है भाता।। हर पग रखे सँभाल, बूँद रिमझिम है गाती। हर्षित होकर आज, नैनिका शाला जाती।। पानी में सँग खेलती, निशदिन करे दुलार। मछली भाती नैनिका, करती उसको प्यार।। करती उसको प्यार, खिलाती उसको दाना। निहिरा रहती साथ, मधुर फिर गाती गाना।। रंग-बिरंगी मीन, कहें सब जल की रानी। देती है संदेश, सुनो जीवन है पानी।। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी...
भारत माता
कविता

भारत माता

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** गाती रहेगी युगों-युगों तक गीत तेरे मां धरा फूलों की घाटी से होगी पुष्पों की बरखा मां कन्या कुमारी के सागर की लहरें करेगी पद प्रक्षालन प्रस्तर-प्रस्तर गान गाएंगे जन-गण-मन। वीर सैनिक करेंगे केशरिया फूलों से स्वागत साधनारत साधक सुनाएंगे ॐ शान्ती का मन्त्र हरियाली की पगड़ी बांधे कृषक करेंगे जय-जय कार यही भारत के तिरंगे की शान। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं ...
वो कम ख़ुदा न थी
कविता

वो कम ख़ुदा न थी

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* चार जने बैठे थे जीमने रात का भोजन सब बच-बच कर खा रहे तीनों बच्चे तक समझदार पीते बीच-बीच में पानी पिता लेते नक़ली डकार. पर कम ख़ुदा न थी परोसने वाली बहुत है खुदा अभी इसमें मैंने तो देर से खाया कहते परोसती जाती. माँ थी सबके बाद खाने वाली जिसके लिए दाल नहीं देवकी में बची थी हलचल चुल्लू भर पानी की और कटोरदान में भाप के चंद्रमा जैसी रोटी की छाया थी। परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी निवासी : पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "समाजसेवी अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४" से सम्मानित घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स...
एक युग, एक विचार
कविता

एक युग, एक विचार

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** ग्वालियर, मध्यप्रदेश की पावन धरा ने जन्म दिया एक बालक को, नाम हुआ अटल, स्वरों में कविता, शब्दों में सत्य, वाणी थी सरल, मन प्रखर, अडिग, स्थिर, निर्मल। पिता शिक्षक संस्कारों की छाया, माँ की ममता, राष्ट्र का स्वप्न, बाल्यकाल से ही चेतना जागी, भारत बने विश्व में उज्ज्वल स्वर्ण-रत्न। कलम उठी तो कविता बह चली, राजनीति आई तो सेवा बन गई, विचारों में मतभेद रहे होंगे, पर मर्यादा कभी न टूटी, न झुकी, न गई। जनसंघ से संसद तक की यात्रा, संघर्षों से रचा हुआ इतिहास, एक नहीं, कई बार पराजय मिली, पर हर हार बनी भविष्य का प्रकाश। “हार नहीं मानूँगा” कहने वाला, स्वयं उस पंक्ति का प्रमाण था, लोकतंत्र का सच्चा प्रहरी वह, विपक्ष में भी जिसकी वाणी समाधान था। तीन-तीन बार बने प्रधानमंत्री, पर सत्ता कभी स...
साहस
कविता

साहस

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** साहस रखिए उर सदा, श्रम को करिए नित्य। लक्ष्य मिलेगा फिर मनुज, चमको बन आदित्य।। चमको बन आदित्य, सत्य की पकडो डोरी। दृढ़ निश्चय हो साथ, काम से मत कर चोरी।। आलस को तू छोड़, बनोगे मानव पारस। अपने मन को जीत, सदा उर रखिए साहस।। बाधा सारी तोड़ कर, साहस से लो काम। कर्मवीर आगे बढ़ो, होगा जग में नाम।। होगा जग में नाम, तिलक लगता है माथा। रिपु का करना नाश, विजय की फिर है गाथा।। स्वयं गढ़ोगे भाग्य, भजो नित कृष्णा राधा। रखो सदा विश्वास, तोड़ कर सारी बाधा।। गाथा गाओ शोर्य की, गढ़ कर नूतन पाथ। साहस से नित काम लो, धैर्य सदा हो साथ।। धैर्य सदा हो साथ, गान आल्हा हो न्यारा। जिसमें हो उत्साह, जीत लेता जग सारा।। सत्पथ की हो चाह, विजय टीका है माथा। मन हो उर्जावान, शौर्य की गाओ गाथा।। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धा...
बाप रे बाप
व्यंग्य

बाप रे बाप

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आज हम बात करेंगे ‘बाप’ की। भगवान ने सबको एक ही बाप दिया, लेकिन दुनिया में तो बापों की बाढ़ आई हुई है। हर कोई ‘बाप’ बनने पर तुला है, कोई ‘बेटा’ बनना नहीं चाहता। एयरपोर्ट, ट्रैफिक लाइट या रेलवे लाइन पर झगड़ते लोग अक्सर चिल्लाते मिलते हैं- “तू जानता है, मेरा बाप कौन है?” और कई बार कोई सीधा-सादा आदमी उन्हें जूतों से याद भी दिला देता है कि उनका बाप कौन है। जिसका बाप विधायक है, वो मोहल्ले में कोतवाल बनकर घूमता है। ‘बाप का आशीर्वाद’ लेकर गालियाँ बाँटता है, लोगों को डराता है। बाप बेचारा अपने बेटों की परवरिश में खुद कूट-कूटकर संस्कार भरता है और बदले में वही बेटे उसके सिर पर सवार होकर बाप के बाप बन जाते हैं। कहते है- “गुरु गुड़ रह गया, चेला चीनी हो गया”, और अब तो बेटा बाप का भी बाप बन गया है, ज...
मन के वैचारिक भूत
कविता

मन के वैचारिक भूत

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** रक्तरंजित माटी ले लहू का लाल रंग पल-पल करती आक्रोशित इंसानी मन चंचलता वश डोलता मन कभी करुण तो कभी क्रोधित अलग समय पर मन के भाव अलग मन बदले पल-पल ... हर बदलते पल राहें बदलती सोच की सब निर्धारित करता है अपना स्वयं का मन जब सोचता है सवार रहते हैं मन पर भांति-भांति के वैचारिक भूत चंद भूत बाहर निकल आते हैं अतीत के दड़बे से कुछ भूत घूमते रहते हैं इंसान के वर्तमान से और... चंद काल्पनिक भूत टपक जाते हैं भविष्य के ऐसे में उलझा रहता है इंसान इन्हीं भूतों के गठबंधन में फंसता जाता है पल-पल ... इंसानी कलेजे में भँवर सा घूमता है उफनती लहरों से रचता रहता है भूतों का अंतर्द्वन्द्व अपना कपोल-कल्पित संसार लोटपोट हो रहता अपने ही भावों के बवंडर में छटपटाता रहता है अद्भुत मगर भयंकर काल्पनिक...
होली-परंपरा, प्रतीक और वर्तमान की वैचारिक चुनौती
आलेख

होली-परंपरा, प्रतीक और वर्तमान की वैचारिक चुनौती

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** होली भारतीय सांस्कृतिक जीवन का केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना की परीक्षा भी है। रंगों की उन्मुक्तता, सामूहिक उल्लास और लोक परंपराओं की जीवंतता के बीच यह पर्व हर वर्ष हमें यह प्रश्न पूछने के लिए विवश करता है कि क्या हम अपने मूल मूल्यों के प्रति उतने ही प्रतिबद्ध हैं, जितने अपने उत्सवों के प्रति? बदलते सामाजिक परिदृश्य, तीव्र होती वैचारिक प्रतिस्पर्धा और डिजिटल माध्यमों की प्रभावशाली उपस्थिति के बीच होली का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठा है। पौराणिक कथा में हिरण्यकशिपु का अहंकार, प्रह्लाद की दृढ़ आस्था, होलिका का छल और अंततः भगवान नरसिंह का न्याय- ये घटनाएँ केवल धार्मिक आख्यान नहीं है, ये सत्ता और सत्य के शाश्वत संघर्ष का रूपक हैं। हिरण्यकशिपु उस मानसिकता का प्रतीक है, जो शक्ति के मद में असहमत...
बसंत के दिन
कविता

बसंत के दिन

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** तुम्हें देती हूँ बसंत के दो दिन क्या अपने हाथों की लकीरों से थोड़ी सी दूब मुझे दोगे, जिसको रख शिव के चरणों में मांग लूंगी तुम्हारे सुने पलों की रौनक !! प्रकृति का जो स्नेह बरसा है तुम पर वो स्नेह वो करुणा मुझे प्यारी है, ये धरा ये गगन ये जीव इन सभी में तुम्हें पाती हूँ, क्या इन बिखरे इंद्रधनुषी रंगों में मुझे समेट पाओगे ! क्या ले चलोगे एकबार नदी के तट पर मुझे मांग लूँगी उसकी कोमलता- निर्मलता, तुम्हारे उम्र भर के लिए , अच्छा लगता है रोज मुझे चांद को निहारना क्या थोड़ी देर मेरे पास बैठ पाओगे!! जीवन जीने का नाम है मगर जो कभी धड़कने टूटी मेरी, क्या ढलते सूरज के बसंती रंगों से मुझे सजा पाओगे !! ज्यादा कुछ नहीं मांगती इस पल-पल बदलते दौर मे, क्या आपने अंतर्मन में मुझे थोड़ी सी...
आज की विभिषिका
दोहा

आज की विभिषिका

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** चलें मिसाइल ध्वंस है, बम की है भरमार। जानें कैसा हो गया, अब तो यह संसार।। आग लगी धनहानि है, बरबादी का दौर। घातक सबके मन हुए, नहीं शांति पर गौर।। अहंकार में विश्व है, भाईचारा लुप्त। दिन पर दिन होने लगा, नेहभाव सब सुप्त।। अमरीका इजरायला, और आज ईरान। नहीं नियंत्रित आज ये, धारें मिथ्या मान।। मध्य-पूर्व में आग है, जीना हुआ मुहाल। जानें क्योंकर विश्व में, होता रोज़ बवाल।। घातक सबके मन हुए, ख़ूनी हैं अंदाज़। कपटी सब ही लग रहे, आवेशित आवाज़।। रोक नहीं सकता इन्हें, सारे धारें क्रोध। नहीं आज इनको रहा, मानवता का बोध।। हिंसा से मिलता नहीं, कुछ भी जग में सोच। धन-जन की बर्बादियां, करुणा के पग मोच।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) ...
संभल सको तो संभल
कविता

संभल सको तो संभल

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** देश से टूट कर प्यार करने वालों के लिए देश को समझना आसान है, जो देश को ना समझ पाने की बात करे वो या तो चालाक या नादान है, अधिकार बहुतों को पता है मगर कर्तव्य उनको पता नहीं, दूर प्रकृति की गोद में रचे बसे भोले भाले लोगों की खता नहीं, चालाक और धूर्त स्वार्थ में पूरी तरह अंधे होते हैं, गोली वो चलाता जरूर है पर किसी और के कंधे होते हैं, इनका फंडा एकदम न्यारा है, वतन से पहले जेब भरना ही इन्हें प्यारा है, ये उपद्रव या उन्माद फैला सकते हैं, शांत पानी में सैलाब ला सकते हैं, अपने इशारे पर ये दंगे भी फैलाते हैं, सर पर चोट दे पैरों पर मरहम लगाते हैं, धन की लालच में अपने आप वो चलते हैं, देश के दुश्मनों के धृष्ट इशारों पर मचलते हैं, अरे इस मिट्टी के कण कण से प्यार कर तो देख, मिला हुआ मौका यूं न फ...
लाला लाजपत राय : चरित्र की शिल्पशाला
कविता

लाला लाजपत राय : चरित्र की शिल्पशाला

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** पंजाब की माटी ने जिस दीप को थामा, त्याग की लौ में तपकर वह सूरज बन जाना। वाणी में वेदना, दृष्टि में निर्भीक राय, चरित्र की शिल्पशाला थे लाला लाजपत राय। जहाँ राष्ट्र प्रथम, वहाँ स्वार्थ का अंत हुआ, न्याय की कसौटी पर हर भय स्वयं झुक हुआ। कर्म ही उपासना, संघर्ष ही उनका मार्ग, आत्मबल से गढ़ा उन्होंने जीवन का सुदृढ़ शिल्पकार्ग। साइमन की लाठियाँ जब देह पर बरसीं घोर, अभिमान नहीं टूटा, बढ़ा स्वाधीनता का शोर। रक्त की स्याही से लिखी आज़ादी की गाथा, मौन शहादत बनकर भी बोल उठी उनकी व्यथा शिक्षा, समाज, स्वराज-तीनों का समन्वय भाव, विचारों की कार्यशाला, कर्मों का उज्ज्वल प्रभाव। युवक को साहस सिखाया, जन-जन को दिया विश्वास, चरित्र की गढ़ाई में था उनका प्रत्येक प्रयास। आज भी समय की भट्टी में जब मूल्य पिघलते जाएँ, लाला जी क...
स्वच्छ भारत स्वस्थ भारत
कविता

स्वच्छ भारत स्वस्थ भारत

निकिता तिवारी हलद्वानी (उत्तराखंड) ******************** एक ऐसा कदम बड़ाते है स्वच्छता को अपनाते हैं धरती के हर कोने पर हरियाली हम पाते हैं। स्वयं पहले खु से शुरुआत करना कर्त्तव्य समझते हैं आस-पास की मलिनता को स्वच्छ करके दिखलाते हैं, कूड़ा करकट ना जलाकर प्रदूषण संरक्षित करते हैं प्लास्टिक को हटाने की आज से हम ठानते हैं। रोज सवेरे स्नान करके खाने से पूर्व हाथ धोना शुद्ध कपड़े पहनने को स्वच्छता में सम्मलित करते हैं। स्वच्छता को संग लिए स्वस्थ की उम्मीद रखते हैं पौष्टिक आहार ग्रहण कर बीमारी को मात देते हैं। विकसित भारत के सपनों को साकारने में जुटते हैं स्वच्छ और स्वस्थ भारत की शुभकामनाएँ आज देते हैं परिचय :-  निकिता तिवारी निवासी : जयपुर बीसा, मोटाहल्दू, हलद्वानी (उत्तराखंड) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित म...
जोगिरा छंद (कबीर छंद)
छंद

जोगिरा छंद (कबीर छंद)

शिमला शर्मा "लक्ष्मी प्रिया" ग्वालियर (मध्यप्रदेश) ******************** जोगिरा छंद (कबीर छंद) पवन फागुनी बहे सुहानी, मन में भरे उमंग। झूम रही खिल के तरुणाई, घुली हवा में भंग।। जोगीरा सररर रा जोगीरा सररर रा....... आया फागुन लेकर खुशियाँ, मन में भरा उमंग। ब्रज की होली देख सभी का, मनवा होता चंग।। जोगिरा सररर रा जोगीरा सररर रा....... गोप-गोपियाँ राधा रानी, कृष्ण कन्हैया संग। भर पिचकारी रंग लगायें, बरसा प्रेमिल रंग।। जोगीरा सररर रा जोगीरा सररर रा....... बरसाने की मस्त गुजरियाॅं, ढूॅंढ रहीं गोपाल। आज नहीं छोड़ें कान्हा को, रंग दें दोनों गाल। जोगीरा सररर रा जोगीरा सररर रा....... वृंदावन बरसाने देखो, मची हुई हैं धूम। अद्भुत प्रेम समर्पण गाथा, हिय को लेती चूम। जोगीरा सररर रा जोगीरा सररर रा....... निर्मल मन से हम भी खेलें, होली सबके संग। मानवता की भर पिचकारी, डा...
चंद उदासियां
कविता

चंद उदासियां

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** बैठ जाता है इंसान शाम को, छत पर चंद उदासियों के साथ। समय और भाग्य कोसने को, हालात की सिसकियों के साथ। विचारों के घोर द्वन्द में उलझा, ओढ़े हुएं आशंका की कालिमा। अंधेरे की टीस में देखता नहीं, वह डूबते सूरज की लालिमा। कल की फिक्र में आज विकल, जबकी "कल किसने देखा" है। दिशा और दशा पलटती पल में, बहती हवा कान में समझाती है। जब हमारी चाहत के मुताबिक, यह ज़िंदगी थोड़ा मचलती नहीं। हो जाता है मन बड़ा दुखी जब, बेलगाम ख्वाहिशें मुस्कराती नहीं। रास्ता जारी हर दिन प्रयास कर, कुंदन निखरता है दहकने पर। लौटती है शाखाओं पर खुशबू, पतझड़ की जद से निकलने पर। परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्यापक राजस्थान सरकार) निवासी : बाड़ा पदम पुरा, जयपुर, राजस्थान घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार ...
एकाकीपन
कविता

एकाकीपन

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** अनमना सा बच्चा झांक रहा है खिड़की के पार करे भी तो क्या घर में होकर भी वह अकेला है बच्चा ... माँ को वक्त कहाँ है जी रही है आधुनिक परिवेश में व्यस्त है कभी कीट्टी में कभी किसी गोष्ठी में कभी किसी क्लब फंक्शन में तो कभी फैशन शो में वक्त बचता ही कहाँ है खबर लेने, संभालने बच्चा क्या चाहता है वह घर में निपट अकेला है वो मासूम बच्चा ... पिता उलझा है व्यवसायिक उलझनों में व्यवसाय हो या नौकरी समस्या बनी रहती है "कंपीटीटिव मार्केट" जिन्दगी भरी है भांति-भांति की व्यस्तताओं से येन-केन-प्रकारेण थका हारा घर पहुँचता है भान नहीं रहता अर्धरात्रि में सोई है आत्मा लेटता है काँटो भरी सुमन शैया पर वक्त बचता कहाँ जानने का वो चाहता है क्या घर में पड़ा निपट अकेला बच्चा ... टूट रहे संयुक्त परिव...
तेरी दोस्ती
कविता

तेरी दोस्ती

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** तेरी दोस्ती ने हमको जीवन जीना सिखा दिया उदास रहता था मेरा चेहरा उसको मुस्कुराना सिखा दिया। न मिली मोहब्बत जीवन में इसका अब कोई गम नहीं रहा तेरी दोस्ती ने मुझको हर लम्हा जीना सिखा दिया। रब करे तू हमेशा खुश रहे मेरी हर दुआ में शामिल रहे तेरी दोस्ती ने मुझको जीवन का बदलाव सिखा दिया। मेरी रिद्धियां मेरी सिद्धियां तुमको सदा सलामत रखें तेरी दोस्ती ने मुझको मानव से महामानव बना दिया। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को ल...