वाककला जीवन की प्रगति के मोड़ में भरती मुस्कान
ललित शर्मा
खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम)
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इंसान कलाओं के भंडार में पारंगत है। वह उपयोग कहां कब किस तरीके से कला को दर्शाता है उसका निखार लाता है यह व्यक्ति का व्यक्तिगत विषय है। इसमें व्यक्ति का व्यक्तित्व साफ झलकता है । कला का रूप प्रत्यक्ष होता है। व्यक्ति अपनी प्रतिभा का परिचय देने में सक्षम संबल होता है। अपने अंदर छुपी कला कब कहां किस रूप में उभारता है यह अपनेआप में पेचीदा प्रश्न है। यह जरूर है कि अवसर सुअवसर में श्रोता ही कला का निर्णयकारी सहित मूल्यांकन करता है। यकीनन मानिए तालियां की गड़गड़ाहट में वाक कला प्रमाणित करती है कि वक्ता के भावनात्मक विचार श्रोताओं के ह्र्दयमन में स्पर्श कर गए है।
व्यक्ति की प्रतिभा औऱ उसकी कला जब प्रकट होती है तो वह निश्चित चर्चित होती है। यह बयां करती है कि वाक कला में पारंगत है। इंसान वाक कला कौशलता में बोलकर खरा उतरता है। वाक कला ...




















