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शांत चेहरा
कविता

शांत चेहरा

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** शांत चेहरा कभी कमजोर नहीं होता स्थिर चेहरे के पीछे अनकहे तूफान छिपे होते है उनके चेहरों पर कल के संजोए स्वप्न नहीं होते समाज के थपेड़ों से चेहरे की लकीरें गहरी हो जाती हैं ! अश्रु उनके कभी दिखाई नहीं देते सबकी खुशी में वो बस मुस्करा देते हैं उनके खामोश झूले की पेंग बहुत ऊंची होती है दर्द का गीत उनकी धड़कनों में पिरोया होता है! उनकी जिंदगी की किताब का हर एक पन्ना किस्सा होता है किसी पन्ने पर चैन तो किसी पर कठिनाइयों का बसेरा होता है! शांत चेहरा उनकी कमजोरी नहीं होती उनकी ताकत, उनके संयम और दृढ़ता की परिभाषा होती है ऐसे व्यक्तित्व में कोई दिखावा नहीं होता इसीलिये उम्र भार ये चेहरा भीड़ में तन्हा होता है! उनके दिलों के टूटने की आवाज नहीं होती आग का एक दरिया बहता है जिसमें बहुत कु...
हिंदी आत्मा में बस्ती
कविता

हिंदी आत्मा में बस्ती

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** हिंदी आत्मा में बस्ती है, संस्कारों की उजली हस्ती है। माँ की लोरी, पिता का विश्वास, मिट्टी की सोंधी खुशबू-सी पास हर धड़कन में इसकी मस्ती है। यह भाषा केवल शब्द नहीं, यह भावों की निर्मल सरिता है। आँसू बनकर भी चुपके बहती, मुस्कान बन ओठों पर ठहरती हिंदी जीवन की स्वर गीत है। तुलसी की चौपाइयों में धर्म, मीरा के पदों में प्रेम पुकारे। रसखान की भक्ति में डूबी हुई, कबीर की वाणी में सत्य जली हिंदी युग-युग तक पथ रहे भली। यह खेतों की हरियाली बोले, यह श्रमिक के पसीने की गंध। यह पर्वों की थाली सजाए, यह त्याग, तपस्या का संदेश जन-जन की आशा की है कंध। जब तक आत्मा में प्राण बसे, हिंदी का दीप जलता रहेगा। समय बदले, दुनिया बदले, पर संस्कृति का यह अमिट स्वर हृदय-हृदय में पलता रहेगा। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म ...
रात्रि का दृश्य
कविता

रात्रि का दृश्य

साक्षी लोधी नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) ******************** ओढ़ निशा को चपल चांदनी मन को आकर विचलित करती नीरवता की ध्वनि विकट है दृश्य गगन का अतुल मनोरम तारों की झिलमिल सेना के बीच खड़ा है ये मेरा मन शीतलता सी लिए हवाएं आएं जाएं जुगनू आकर आस-पास राहें चमकाएं तमस ने रंग के नील गगन को श्याम रंग कर डाला और गले में डाल सितारों की उज्जवल सी माला दुग्धमेखला बेणि बनकर नागिन सी लहराए चंद्रकिरण अपनी किरणों से और अधिक चमकाएं जगह जगह पे उमड़े घुमड़े बनकर मानो प्रहरी ये घन तारों की झिलमिल सेना के बीच खड़ा है ये मेरा मन परिचय :-  साक्षी लोधी निवासी : नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। प्रिय मित्र, शुभचिंतक एवं परिवारजन आपको प्रेषित मेरी नई स्वरचित रचना, कृपया ल...
स्त्री की आवाज
कविता

स्त्री की आवाज

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* तुम पुकारे जा रहे हो और मुझसे पूछते हो कि अजनबी सी ख्वाहिशें क्यों पाल बैठी हूँ? मैं उसी आदमी से चाहत कर बैठी हूँ जो अपने ही शोर में खुद को खो चुका है। न तुम इत्मिनान से बैठ पाते हो, न नींद तुम्हें पूरा अपना मानती है और फिर भी पूछते हो मुझसे कि इस मुख़्तसर सी ज़िंदगी से मैं क्या चाहती हूँ? मैं तो बस इतना चाहती थी कि तुम थक कर किसी शाम मेरे पास बैठ सको, बिना कुछ साबित किए, बिना खुद से लड़े। पर तुम तो अपनी तन्हाई की शाम का भी चराग़ नहीं जला पाए… और अब मुझसे पूछते हो कि मैं हवा जैसी चाहत क्यों लेकर आई हूँ? शायद मेरी गलती यही थी कि मैंने उस आदमी से दिल लगा लिया जो खुद से ही दोस्ती निभा नहीं पाया. परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे ज...
वीर जवान
दोहा

वीर जवान

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** खूनी होली खेलते, भारत के ये लाल। लाल रक्त का है तिलक, चमक रहा हर भाल।। पालो मत आतंक को, करे शांति वह भंग। वार कराता पीठ पर, कुटिल शत्रु का ढंग।। आग जले प्रतिशोध की, उर में मेरे राम। नोंचे बोटी शत्रु की, करते काम तमाम।। सूनी माँ की गोद की, आतंकी शैतान । रहना अब तैयार तुम, होना लहू-लुहान।। रूठ गया सिंदूर है, चूड़ी टूटी हाथ । क्रूर युद्ध परिणाम है, बच्चे हुये अनाथ।। खोलो आज त्रिनेत्र तो, दुखी शंभु संसार । भस्म करो अब शत्रु को, हैं धरती पर भार । भारत का कश्मीर है, बदलो अपने ढंग। मृतक अनगिनत देख कर, काँप रहा है अंग।। भारत प्राण प्रतीक है, आजादी का गान। ध्वजा तिरंगा का करें, भारतवासी मान।। गौरव गाथा गाइए, करते हैं कल्याण। भारत माँ के वीर सब, तजें देश हित प्राण।। परिचय :- मीना...
कभी कभी सोचती हूँ मैं
कविता

कभी कभी सोचती हूँ मैं

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** कभी कभी सोचती हूँ मैं कौन हैं हम, खुद को साबित करने के लिए क्यों बनना चाहते हैं कुछ हम। बाहर से रंगों से भरे हुए तन की सजावट को प्राथमिकता देते हैं हम भले ही भीतर से खोखले हों मगर रंगीन आवरण से ढके हैं हम। शांत चेहरे की मुस्कान काफी नहीं लगती खुद को ओहदे की चमक से संवारना चाहते हैं हम सूकून हमारा क्यों पर्याप्त नहीं सब कुछ पाने की होड़ में लगे हैं हम। मन की शांति कोई धन नहीं प्रकृति ने जो दिया उसका का कोई मोल नहीं अर्थिक धन से तौल रहे रिश्ते क्यों राजगद्दी की दौड़ में शामिल हैं हम। परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी शिक्षा : एम. ए., एम.फिल – समाजशास्त्र, पी.जी.डिप्लोमा (मानवाधिकार) निवासी : लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ...
हुक्का-वार्ता
व्यंग्य

हुक्का-वार्ता

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** चौपाल पर दो हुक्के पड़े थे। दोनों पुराने थे इतने पुराने कि इतिहास उन्हें पहचानता था, पर वर्तमान उनसे कतराता था। एक की चिलम में बीते ज़माने की राख जमी थी, दूसरे की नली में राजनीति की नमी। हवा ठंडी थी, पर माहौल में गरमाहट थी वो गरमाहट जो सिर्फ जाति और सत्ता के मेल से पैदा होती है। हुक्का नंबर एक ने गला साफ़ किया- “सुना है भाई, सरकार फिर से लोगों को उनकी जाति याद दिलाने में लगी है।” हुक्का नंबर दो ने गुड़गुड़ाहट भरी- “तो इसमें नई बात क्या है? भूल गए थे क्या लोग?” हुक्का नंबर एक भावुक हो उठा- “हाँ यार, लगता है हमारे दिन फिरेंगे। एक ज़माना था जब हमारी कितनी पूछ थी! हर जाति का अलग हुक्का, अलग शान। ऊँची जात वालों के हुक्के तो जैसे राजमहल की शोभा मीनाकारी, फुँदे, चाँदी की नली। जमींदार जब म...
बच्चों को चाइल्ड हेल्पलाइन एवं बाल विवाह निषेध अधिनियम के बारें में किया जागरूक
देश/विदेश/प्रदेश

बच्चों को चाइल्ड हेल्पलाइन एवं बाल विवाह निषेध अधिनियम के बारें में किया जागरूक

* चाइल्ड हेल्पलाइन कांगड़ा ने राजकीय उत्कृष्ट वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला गाहलियां में बाल अधिकारों के साथ चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 की कार्यप्रणाली के बारें में किया जागरूक। * बाल विवाह मुक्त भारत अभियान क़े अंतर्गत उपस्थित प्रतिभागियों कों "बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006" की जानकारी साँझा की। चाइल्ड हेल्पलाइन कांगड़ा ने राजकीय उत्कृष्ट वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला गाहलियां के बच्चों, अध्यापकों ब अन्य स्टॉफ के लिए एक जागरूकता कैंप का आयोजन किया गया, जिसकी अध्यक्षता स्कूल के प्रधानाचार्य अजय कुमार ने की व शिविर मे उपस्थित प्रतिभागियों का स्वागत किया। आज क़े जागरूकता कार्यक्रम मे जिला कार्यक्रम अधिकारी अशोक कुमार शर्मा ने बतौर मुख्यातिथि शिरकत की और शिविर मे मौजूद प्रतिभागियों कों बाल शिक्षा, स्वास्थ्य, एवं संरक्षण पर जागरूक किया और बाल कल्याण क़े लिए महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा चलाई ज...
राणा सांगा
कविता

राणा सांगा

साक्षी लोधी नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) ******************** वीरता की सीढ़ियों पर जन्म से जो चढ़ गए खेलने की उम्र में जो शत्रुओं से भिड़ गए मातृभूमि को जो अपनी लहू से ही सींचते आंख से ही सत्रुओं के प्राण आधे खींचते रक्तरंजित भाल जिसके, कंठ सबके सोखते नख प्रखर वीर महाराणा सांगा वीरता की सीढ़ियों पर जन्म से जो चढ़ गए खेलने की उम्र में जो शत्रुओं से भिड़ गए मातृभूमि को जो अपनी लहू से ही सींचते आंख से ही सत्रुओं के प्राण आधे खींचते रक्तरंजित भाल जिसके, कंठ सबके सोखते प्रखर नख से दुश्मनों कि छातियों को नोंचते जिनके वंशज शोर्य गाथा रक्त से ही गढ़ गए जो झुके नहीं सर भला कटे, धर ही जिनके लड गए बो वीर मेवाडी की जिसने युद्ध सो सो जय किए जिनका हर कण कण धरा का, शोर्य का गायन करे जिनकी गर्जना सुन भागते, दुश्मन भी उल्टे पाव लिए वो राणा सांगा चलते थे, छाती पर अ...
प्रभु कृपा
स्तुति

प्रभु कृपा

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** श्रेष्ठ योनी में भेजा है प्रभु ने तुझे, नाम सुमिरन से सार्थक बनाते चलो। जग के कार्यों के संग, नाम जपते रहो, प्रभु की किरपा का नित लाभ पाते चलो। श्रेष्ठ योनी में ... है मनुजतन तुझे मुक्ति हेतू मिला, जो भी दे शीश धर, कर न कोई गिला। राम का नाम जप, मुक्ति साधन सरल, बस इसे तुम सदा गुनगुनाते चलो। श्रेष्ठ योनी में ... सृष्टि के सृजनकर्ता का बालक है तू, उसने सृष्टि रची, उसका पालक है वो। श्रेष्ठ अवसर मिला, मुक्ति पाने के मित, पग इसी मार्ग पर, नित बढ़ाते चलो। श्रेष्ठ योनी में ... भक्त हनुमानजी राम जप में रमे, करके सेवा बने, रामजी के सगे। तुझको भी मुक्ति पानी इसी जन्म,तो नाम में डूब सबको डुबाते चलो। श्रेष्ठ योनी में ... परिचय :- प्रेम नारायण मेहरोत्रा निवास : जानकीपुरम (लखनऊ) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित क...
सतरंगी दुनिया- १६
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया- १६

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  आप गलती करके सुन रहे हैं तो आप ऑफिस में हैं, और अगर आप बिना गलती के सुन रहे हैं तो आप निश्चय ही घर पर हैं। दुनिया की हर चीज ठोकर लगने से टूट जाती है, लेकिन कामयाबी एक ऐसी चीज है जो कि ठोकर खाकर ही मिलती है। गरीब मांगे तो भीख, अमीर मांगे तो चंदा, करोड़पति मांगे तो डोनेशन और अरबपति मांगे तो सब्सिडी। यहाँ सभी लोग अपने हिसाब से भीख मांगते हैं। मुहुर्त के चक्कर में मत पड़िए, बिना मुहुर्त के पैदा होकर जीवनभर 'शुभ मुहुर्त' के चक्कर में फंसा इंसान एक दिन बिना मुहुर्त के प्राण त्याग देता है। पुरूष की आदत होती है हमेशा महिलाओं के बीच घुसने की, इसलिए शायद 'फीमेल' शब्द में 'मेल' आता है और 'वुमेन' में 'मेन' आता है। झूठ बोलने से पाप लगता है और सच बोलने से आग। अब आप ही बताइए, आप क्या बोलेंगे ? जिसका कोई नहीं होता, उसका खुदा होता ह...
बिखर सा गया हूं मैं…
कविता

बिखर सा गया हूं मैं…

शोभा रानी खूंटी, रांची (झारखंड) ******************** ऐ वक्त तेरी अदाओं को देख... बिखर सा गया हूं मैं.... बहुत याद आती है मुझे.... खुद की.... मुनासिब होगा अगर तू मुझे पहले जैसा कर दे..!! बहुत याद आती है मुझे... वो बचपन के ख्याली पुलाव... वो लड़कपन के हजारों खिलौने... वो अल्हड़ आजादी... वो निश्चल हृदय... वो बेख्याल सा मन... वो सुकून भरी नींद... वो सुनहरी खुशनुमा सुबह... भरी दोपहरी में दोस्तों संग... कच्ची अंबिया चुराना... यारों संग बर्फ के गोलो को... मां से छुपा कर खाना.. वो बारिश के पानी मे... कागज की कश्ती चलाना... वो पूस की ठिठरन में .... अपनो संग आग सेकना... वो सावन के झूले मे... गूंजती हंसी और ठिठोलियां.... वो ख्वाबो का जहँ।... और मुट्ठी भर आसमा... वो बचपन के दिन.... वो इंद्रधनुषी सा सतरंगी समा.... बदलते वक्त के साथ .... खोता हुआ झिलमिलाता सा.... व...
दोष किसे दूँ
कविता

दोष किसे दूँ

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** वही ब्रह्मांड, वही दुनिया, वही मुल्क, वही प्रकृति, वही पर्यावरण, वही आबो-हवा, वही नैतिकता, वही संस्कार, वही जीव-जगत… फिर भी गिरते स्तर के लिए दोष किसे दूँ? मानव, अब मानव नहीं रहा दानव हो चुका है। संस्कार, अब संस्कार नहीं रहे सिर्फ़ दिखावे का आवरण बन चुके हैं। नैतिकता, अब आत्मबोध नहीं दूसरों से की जाने वाली उम्मीद बन गई है। इंसान ढीठ हो चला है, ढिठाई ऐसी कि हर जगह दिखता है “मैं… और सिर्फ़ मैं!” किसी के पास अब हृदय शेष नहीं, जिसे त्यागना चाहिए उसे कसकर पकड़ा जाता है। होड़ मची है- अपने स्तर को सबसे नीचे ले जाने की, और गर्व से दिखाने की। तो कहो… इस पतन के लिए दोष किसे दूँ? परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प...
माँ शारदा वंदन
स्तुति

माँ शारदा वंदन

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** हे शारदे करुणामयी माँ, भक्त को पहचान दो। श्वेतांबरा ममतामयी माँ, श्रीप्रदा हो ध्यान दो।। गूँजे मधुर वाणी जगत में, वल्लकी बजती रहे। कामायनी माँ चंद्रिका सुर, रागिनी सजती रहे।। वागीश्वरी है याचना भी, भक्त का उद्धार हो। विद्या मिले आनंद आए, प्रेम की रसधार हो।। आभार शुभदा है शरण लो, बुद्धि का वरदान दो। उल्लास दो नव आस दो प्रिय, ज्ञान की गंगा बहे। चिंतन मनन हो भारती का, लेखनी चलती रहे।। मैं छंद दोहे गीत लिख दूँ, नव सृजन भंडार हो। आकाश अनुपम गद्य का हो, प्रार्थना स्वीकार हो।। भवतारिणी तम दूर हो सब, नित नवल सम्मान हो। तुम प्रेरणा संवाहिका हो, चेतना संसार की। वासंतिका हो ज्ञान की माँ, पद्य के शृंगार की।। साहित्य में नवचेतना हो, कामना कल्याण भी। संजीवनी हिंदी सुजाता, श्रेष्ठ हो मम प्राण भी।। आलोक प्...
इंतजार
कविता

इंतजार

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** कोयल को इंतजार है सावन की हो फुहार, प्रेमी को इंतजार है प्रियतमा की चाह, एक भक्त को इंतजार है ईश्वर का सानिध्य, शिष्य को इंतजार है गुरु का मिले आशीष, धरती को इंतजार है कब बरसेंगे मेघ, सागर को इंतजार है नदियों का समावेश, एक मोरनी को इंतजार है स्वाति नक्षत्र की एक बूँद। निषाद को इंतजार है श्री राम सा मित्र, शबरी को इंतजार है गुरू का है उपदेश बैर खाये श्री राम प्रभु कई जन्मो का मेल। अहिल्या बैचैन है पाषाण का मिला अभिश्राप प्रभु राम की रज मिले होवे आज उद्वार। केवट को इंतजार है कब नाव चढ़े श्री राम, रावण को इंतजार है योद्धा कौशल राम। जटायू के पर कटे इंतजार हे राम बेटे का सा प्रेम मिला उद्वारक श्री राम, कोसल्या को इंतजार है कब आयेगे मेरे राम। सूनी अयोध्या मै खुशियाँ फिर लौट आयेगी आ...
निस्तब्धता
कविता

निस्तब्धता

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** निस्तब्धता जब बोल न पाए, मन भीतर से टूट जाता है, शब्दों के अभाव में पीड़ा का शोर और गूंज जाता है। खामोशी की चादर ओढ़े, दर्द अकेला सोता है, भीड़ में रहकर भी इंसान खुद से ही रोता है। निस्तब्ध क्षणों में स्मृतियाँ तीखे तीर चलाती हैं, अनकहे सवाल बनकर रातों की नींद चुराती हैं। जहाँ संवाद थम जाए, वहाँ संबंध दम तोड़ते हैं, निस्तब्धता में ही कई अपने पराए हो जाते हैं। खामोशी का बोझ कभी-कभी शब्दों से भारी है, यह भीतर-भीतर जलाती है, पीड़ा इसकी न्यारी है। निस्तब्धता में मन खुद से ही लड़ जाता है, हर मौन क्षण एक नया घाव दे जाता है। बिना आवाज़ की पीड़ा भी गहरी चोट लगाती है, निस्तब्धता अक्सर आत्मा को चुपचाप रुलाती है। जब भावों को मार्ग न मिले, वे आँसू बन बहते हैं, निस्तब्धता में ही कई सपने दम तोड़ते रहते हैं। खा...
खेल शुरू बजाओ ताली, खेल ख़त्म बजाओ ताली
व्यंग्य

खेल शुरू बजाओ ताली, खेल ख़त्म बजाओ ताली

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** एक कवि सम्मेलन में हमें आगे की पंक्ति में बैठा दिया गया। यह आयोजकों की कृपा कम और हमारी जुगाड़-साधना का प्रतिफल अधिक था। वीआईपी दीर्घा का टिकट हमने कबाड़ से खोज निकाला था, पर मंच पर बैठे कवि महोदय ने हमारे भीतर का सारा वीआईपी-पन झाड़कर बाहर कर दिया। इतनी तालियाँ बजवाई गईं कि क्षण भर को आत्मा कांप उठी कहीं पिछले जन्म में हम पेशेवर तालीबाज़ तो नहीं थे? फिर सांत्वना मिली नहीं, वीआईपी दीर्घा में वही बैठ सकता है जो समय-असमय ताली बजाने में पारंगत हो। मन में यह भी संतोष रहा कि यदि इस जन्म में ठीक से तालियाँ बजा दीं, तो शायद अगले जन्म में घर-घर ताले बजाने वाली योनि में जन्म न लेना पड़े। कवि ने इशारों-इशारों में यह आश्वासन भी दिया था। नेता और कवि में एक अद्भुत समानता है दोनों तालियों के भूखे होते...
अरमानों की पतंगे
कविता

अरमानों की पतंगे

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** अरमानों की डोर से सपनों की पतंग उड़ा लेता हूं। मेरे सपनों की कई आकार, प्रकार की पतंगे। इनमें से अपनी हसरतों को हवा में लहरा लेता हूं। कभी-कभी अपनी मेहनत के कन्ने बांधकर सपनों की पतंग, उड़ा लेता हूं। कभी अरमानों की पतंग ऊपर उड़ती, कभी गोते लगती, कभी ढील पाकर, नीचे आ जाती। हार जीत खुशियों के आलम से, आसमां में उड़ती पतंगो से, एक ही संदेश पाता हूं। हर पतंग उलझी है, एक दूसरे की डोर से। फिर भी कुछ रिश्ते उलझे से, उड़कर भी खुशी से झूम रहे हैं। एक डोरी से इन पतंगों से दिल और नजरे, एक दूसरे पर लगाये बैठे है। आसमां में उड़ती पतंगों से, हर दिल भी पतंग सा बंधा, टक टकी लगाए बैठा है। परिचय :- संजय कुमार नेमा निवासी : भोपाल (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्व...
पिता-पुत्र
कविता

पिता-पुत्र

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** एक पिता अपने नन्हें से पुत्र का पालन पोषण करते उसे स्नान कराते, खाना खिलाते कितना खुश हो रहा है खिलखिलाहट से गूंज रहा है उसका घर-आंगन-आशियाना! नन्हें-नन्हें पांव शैतानियां करते कभी इधर तो कभी उधर इठलाते अद्भुत है प्रेम पिता का अपने पुत्र के प्रति समेटना चाहता है पिता इन अनमोल लम्हों को अपने सीने में ! समय मानो पंख पर लगा कर उड़ता जा रहा है, पिता के बाजुओं में ताकत है, नन्हा बच्चा अपने को सुरक्षित महसूस करता है। समय अपनी गति से चलायमान हो रहा है। वहीं आशियाना, वहीं घर-आंगन है, किन्तु आज पिता के कंधे झुके हुए से है हाथों में कंपकंपाहट है, आज वो पिता चलने से लाचार है, पिता की नजरे झुकी है मानो उनसे कोई गुनाह हुआ हो ! वही पुत्र आज पिता को खिला रहा है किन्तु कोई खिलखिलाहट नहीं, कोई खु...
औचित्य क्या?
कविता

औचित्य क्या?

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** यथार्थ को त्याग, सच्चाई को कुचल, कल्पनाओं को सच बता इतराऊं मचल-मचल, सारे संसार का ज्ञान ठूंस लूं अपने अंदर, पर यकीन करूं हो जाए कोई अलौकिक चमत्कार, तो फिर औचित्य क्या उस ठूंसे हुए ज्ञान का, लदे रहूं हीरे मोतियों से, ढका रहूं नवीन वसनाें से, और रखूं अस्वच्छ तन को, तो औचित्य क्या अथाह धन का, सबको पढ़ाता फिरूं विज्ञान, बटोरूं नित सम्मान, जा जा व्याख्यान दूं विद्यालयों में, महाविद्यालयों में, और अंधा यकीन करूं पाखंडों और अन्धविश्वास पर, तो औचित्य क्या अथाह ज्ञान का, प्रकृति से प्रेम करूं, हर जीव की उपयोगिता समझूं, सिर्फ अपनी सनक खातिर कैद में रखूं तोता, मैना, बुलबुल, तो औचित्य क्या खुले आसमान का, कामना है न बंधूं किसी ऐसे नियम से जो मुझे इंसान न रहने दे, और हां जिसे जो कहना है कहने ...
कलम का शहीद
कविता

कलम का शहीद

सूर्यपाल नामदेव "चंचल" जयपुर (राजस्थान) ******************** वो शख्स शब्द बहुत सुंदर लिखता था तन नंगा था ढूंढने कपड़े सड़को पर निकला था लेखनी उसकी चलती तो ज्वाला उगला करती थी आग भूख से पेट में उसकी सदा जला करती थी शब्दों में उसके भावनाएं बारिश की बूंदों सी बहती थी आंखों से अश्रु की धारा कहानी जुदा जुदा कहती थी दुनिया की चकाचौंध के अद्भुत सुख सदा लिखता था बिन छत की कुटिया से उन्मुख मुख लदा दिखता था शहरों की सड़कों सी सर्पिल कलम नहीं रुकती थी घिसती हाथों की लकीरें होनी में उसके भी चुभती थी भूमिहर भी बरसातों में बो बीज फसल उगाया करता था कागज के खेतों में बो शब्दों को अलख जगाया करता था देश की खातिर सीमाओं पर सैनिक जान दिया करता था वो फकीर समाज में अपनी स्याही से ज्ञान दिया भरता था भूमि न बंदूक रही हाथों में उसके शब्द प्रहार करता था पाखंड आडम्बर से लड़कर रिवाज ...
इस चांदनी रात की चादर में
कविता

इस चांदनी रात की चादर में

शोभा रानी खूंटी, रांची (झारखंड) ******************** कुछ बर्फ सी बिखरने लगती है... इस चांदनी रात की चादर में.... एक ख्वाब सा लगने लगता है.. यह लाल रंग सा इश्क लिए... मन शोर शराबा करता है ... फिर एक खामोशी सी छा जाती है... कैसे बताऊं ए ग़ालिब तुझे मैं... तन्हाइयो मैं खामोशी जान ले जाती है.... कुछ बर्फ सी बिखरने लगती है... इस चांदनी रात की चादर में... वह मेरा ख्वाब उलझता जाता है.. फिर यह इश्क बिखर सा जाता है... ओस की इन बूंदों के तले ....... वह पत्थर सा जम जाता है .... फिर से पिघल के बहने को..... उस भोर की सुनहरी रोशनी में... कुछ बर्फ सी बिखरने लगती है... इस चांदनी रात की चादर में... फिर खामोशी से निंदिया में ... तेरा अक्स कुछ कह जाता है... चुरा के फिर मेरी नींदों को... पलकों को सहलाता है... दर्द भी यही मेरा मर्ज भी यह... कुछ बर्फ सी बिखरने लगती है... इस चांद...
भारत मां से पंचतत्व ले
कविता

भारत मां से पंचतत्व ले

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** भारत मां से पंचतत्व ले, ईश्वर ने है हमें बनाया। इसीलिए भारत मां है, सब संतों ने है यही बताया। भारत मां से... मां की सेवा, रक्षा करना, सर्वोत्तम कर्तव्य हमारा। भारत भूमि ने ही अबतक, सात्विक पोषण किया हमारा। जो दायित्व दिया ईश्वर ने, उसने ही है पूर्ण कराया। भारत मां से... जो अर्पित सीमा रक्षा को, उनको प्रति पल नमन हमारा। उनको भी है नमन, जिन्होंने, राष्ट्र पे अपना सब कुछ वारा। जो विकास का लक्ष्य ले चले, अखिल विश्व में मान बढ़ाया। भारत मां से ... जो भी जहां दे रहा सेवा, सर्वोत्तम का लक्ष्य बना ले। सब कुछ दिया देश ने हमको, निष्ठा से वो कर्ज चुका ले। जो निष्काम लगा सेवा में, उसने सबका प्यार है पाया। भारत मां से... परिचय :- प्रेम नारायण मेहरोत्रा निवास : जानकीपुरम (लखनऊ) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमा...
धन्य धरा ये भारती
दोहा

धन्य धरा ये भारती

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** धन्य धरा ये भारती, भारत देश महान। स्वर्गिक सुख की खान है, करे विश्व सम्मान।। मुकुट हिमालय देश का, सागर छूता पाँव। पावन गंगा बह रही, है खुशियों की मृदु छाँव।। माटी चंदन देश की, रत्नों की है खान। बरसे कंचन मेघ से, हिन्द है कृषि प्रधान।। मानवता ही धर्म है, समरसता पहचान। सत्य अहिंसा हिन्द की, सकल विश्व प्रतिमान।। राम श्याम से बहुगुणा, अवतारित बलवीर गौरव गाथा गा रहे, मोहक है तस्वीर।। लक्ष्मी अरु दुर्गावती, शासक हुईं महान। दीप शिखा बन देश पर, प्राण किये बलिदान।। गाते गाथा शौर्य की, फौलादी है शान। करते जय वीरांगना, देश करे अभिमान। वीर शहीदों की धरा, गौरवमय इतिहास। बोस तिलक की भूमि का, होता नित्य विकास।। प्रहरी सीमा पर खड़े, रक्षक हैं वो वीर। रखवाली करते सदा, होते नहीं अधीर।। संस्कृति...
सरस्वती वन्दना : पञ्चचामर छ्न्द
छंद

सरस्वती वन्दना : पञ्चचामर छ्न्द

डॉ. भावना सावलिया हरमडिया, राजकोट (गुजरात) ******************** पञ्चचामर छ्न्द तुम्हें करूँ प्रणाम आठ याम मैं सुहासिनी। लुभा रहा स्वरूप दिव्य आपका सुभाषिनी। विमोहिनी सुतान छेड़ दो कि जो सुधा बने। नया-भावयुक्त गीत, छन्द प्रेम से सने ।। हरो समाज के विकार, शीघ्र कष्ट नाशिनी। लुभा रहा स्वरूप दिव्य आपका सुभाषिनी।। रुके न लेखनी कभी कृपा मनाक कीजिए। समाज में सप्रेम मान हो प्रसाद दीजिए। मिले अपार प्यार नित्य वेदहस्त- धारिणी। लुभा रहा स्वरूप दिव्य आपका सुभाषिनी । सरस्वती, कृपा सदैव दिव्य ज्ञान की करो।। तुम्हीं दयालु कोष, वर्ण, शब्द, भाव से भरो। उबार दीजिए हमें सनेह नाव-तारिणी। लुभा रहा स्वरूप दिव्य आपका सुभाषिनी।। अपार शक्ति दो समाज के विकास के लिए। दरिद्र-दीन के सहाय के लिए सदा जिए। रखो विशुद्ध भाव युक्त मर्म ज्ञान दायिनी। लुभा रहा स्वरूप दिव्य आपका सुभाषिनी।। प...