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जुल्फों का साया
हास्य

जुल्फों का साया

राम प्यारा गौड़ वडा, नण्ड सोलन (हिमाचल प्रदेश) ******************** आशिक बोला हे प्रिये! मुझे अपनी काली, घुंघराली नागिन सी जुल्फों के साये में क्षण भर रहने दीजिए। थोड़ा विश्राम... तनिक बतियाने दीजिए। दिल बहलाने को मन करता है प्यार भरी दो बातें कीजिए, मधुर आवाज सुनने को मन करता है। तुम्हारी जुल्फों के साये में बैठ सब कुछ भूलने को मन करता है ऊब, खीज, घुटन निराशा छोड़ हर्षित मन हो जाने को दिल करता है। बिखरे सपनों का ताना-बाना बुन, हसीन दुनिया बसाने को मन करता है। सुनकर महबूबा बोली... माफ कीजिये मुझ पर करें एहसान...। फेसबुक हूं चला रही, नेटवर्क की कमी से, पहले से हूं मैं परेशान। जुल्फें बिखेरने का मेरे पास नहीं वक्त, देखते नहीं, ऊपर से जमाना है सख्त। मेरी मानो... किसी वृक्ष तले चले जाओ घनी छाया में बैठ हवा संग खूब बतियाओ। बुझे मन आशिक उठा......
भागदौड़ की दुनिया
कविता

भागदौड़ की दुनिया

ओमप्रकाश श्रीवास्तव 'ओम' तिलसहरी (कानपुर नगर) ******************** आकर इस धरती पर मानव कब सुख का पल तूने पाया। भागदौड़ की इस दुनिया में, ढूंढ रहे सब शीतल छाया। रोटी-रोटी करता मानव दिन-दिन भर फिरता रहता है। पाने को वह सुख की रोटी, भरपूर मेहनत करता है। भूख और माया चश्मे ने, मानव को है खूब थकाया। भागदौड़ की इस दुनिया में, ढूंढ रहे सब शीतल छाया। सूरज की किरणों संग सदा चिंता का पहाड़ है आता। क्या करना किसको पूरे दिन सब विधान वही तो बताता । अर्थ-अर्थ की दुनिया सारी, भूख अर्थ की है इक माया। भागदौड़ की इस दुनिया में, ढूंढ रहे सब शीतल छाया।। परिचय :- ओमप्रकाश श्रीवास्तव 'ओम' जन्मतिथि : ०६/०२/१९८१ शिक्षा : परास्नातक पिता : श्री अश्वनी कुमार श्रीवास्तव माता : श्रीमती वेदवती श्रीवास्तव निवासी : तिलसहरी कानपुर नगर संप्रति : शिक्षक विशेष : अध्यक्ष राष्ट्रीय...
उनकी रहती आँख तनी
ग़ज़ल

उनकी रहती आँख तनी

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** उनकी रहती आँख तनी। जिनकी हमसे है बिगड़ी। होती अक़्सर आपस में, बातों की रस्सा-कस्सी। सुनकर झूठी लगती है, बातें सब चिकनी-चुपड़ी। सम्बन्धों पर भारी है, जीवन की अफ़रा-तफ़री। चेहरा जतला देता है, अय्यारी सब भीतर की। आगे - पीछे चलती है, परछाई सबकी, अपनी। चाहे थोड़ी लिखता हूँ, लिखता हूँ सोची-समझी। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच...
रक्षाबंधन कैसे मनाऊँ मैं
कविता

रक्षाबंधन कैसे मनाऊँ मैं

सुरेश चन्द्र जोशी विनोद नगर (दिल्ली) ******************** ग्यारह मास बिताये मातु बिना तो पर्व रक्षाबंधन कैसे मनाऊँ मैं | वर्ष-वर्षी तक मातृ शोक का तो, पर्व रक्षाबंधन कैसे मनाऊँ मैं || नहीं नियम पर्व कुछ भी मनाने का, सात्विकता अब्द यह बिताता मैं | आहार को आशीष से चला रहा, तो पर्व रक्षाबंधन कैसे मनाऊँ मैं || रहे दिन छियालीस अब वर्षी के, स्मृति पटल से नहीं बिसराऊं मैं | सिर पर सदैव ही जननी आशीष, तो पर्व रक्षाबंधन कैसे मनाऊँ मैं || रक्षित जीवन तेरे आशीष से, रक्षाबंधन को कैसे मनाऊँगा मैं | तेरी अनुकम्पा होगी जननी तो, पर्व रक्षाबंधन को आगे मनाऊँगा मैं || दिया लेखनी को आशीष तूने, इसे आजीवन अब चलाऊंगा मैं | तेरे आशीष से ही तेरे आदर्श हे जननी, लेखनी से आगे अब बढाऊँगा मैं || वर्ष वर्षी तक मातृ-शोक का तो, पर्व रक्षाबंधन कैसे मनाऊँ मैं | ग्यारह मास बीते मातु बिना तो, पर्व रक्...
रक्षा का बंधन
कविता

रक्षा का बंधन

नंदिता माजी शर्मा मुंबई, (महाराष्ट्र) ******************** एक दिन का त्यौहार नहीं ये, अनंतकाल तक का नाता है, भाई-बहनों का अद्भुत दर्पण, इस बंधन में बंधकर आता है, नहीं बंधन ये, निज स्वार्थ का , ना है कोई दबाव है, अंतर्मन का, भावनाएं बंधती है, बनकर प्रेममंजरी , नाता है ये निष्छल समर्पण का, बंधन नहीं कोई, इस रिश्तें में, ना तनाव है, बेगैरत उम्मीदों की, रिश्ता ये गंगाजल सा पवित्र है होता, जगह नहीं इसमे मतलबी ख़रीदो की परिचय :- नंदिता माजी शर्मा सम्प्रति : प्रोपराइटर- कर्मा लाजिस्टिक्स निवासी : मुंबई, (महाराष्ट्र) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हि...
जीवनसंगिनी
कविता

जीवनसंगिनी

शैलेष कुमार कुचया कटनी (मध्य प्रदेश) ******************** साथ तुम्हारा देता है मन को बड़ा सुकून, दूर मत होना कभी मेरी जीवन संगिनी.....!! कह नही पाया जो बात दोस्तो से, उन्हें तुमने लफ्जो से समझ कर हल कर दिया.......!! दुःख में भी साथ थी परछाई की तरह, सच कहूँ तो जीवन का सार तुम्ही हो.....!! बच्चो को बड़ा किया दिया माँ का प्यार ऑफिस भी गई, साथ मे संभाला किचिन का सारा काम......!! पूजा,व्रत ढेर रखे दिया ना खुद पर ध्यान, परिवार कि खातिर छोडा ना कोई मंदिर का द्वार..…!! कपल डे पर यही करता हूं पुकार, सात जन्मों तक बंधा रहे हमारा इस जनम का प्यार....!!!! परिचय :-  शैलेष कुमार कुचया मूलनिवासी : कटनी (म,प्र) वर्तमान निवास : अम्बाह (मुरैना) प्रकाशन : मेरी रचनाएँ गहोई दर्पण ई पेपर ग्वालियर से प्रकाशित हो चुकी है। पद : टी, ए विधुत विभाग अम्बाह में पदस...
अधूरा प्यार
लघुकथा

अधूरा प्यार

अतुल भगत्या तम्बोली सनावद (मध्य प्रदेश) ******************** रिमझिम बारिश में झूमती हुई सत्रह-अठारह की उम्र की एक बाला शायद उन्नीस बरस की उम्र में पहुँचे केशव के सपनों की रानी है। कभी अपने पैरों से पानी को उछालती तो कभी अपने दोनों हाथों को फैलाकर, बारिश की बूँदों का अपने चेहरे पर अहसास करते हुए मुस्कुराती हुई घूमती। दूर एक पेड़ के नीचे केशव खड़ा होकर उसे देख रहा है। उसका खुशी से झूमना, मुस्कुराना बच्चों की तरह कूदना उसे भा गया था। वो उस बाला को एक टक देख रहा है तभी अचानक बारिश तेज होने लगी बिजलियाँ कड़कने लगी। बिजली की चमक और बादलों की गड़गड़ाहट से वह भयभीत हो गई और उसी जगह पहुँच गई जहाँ केशव खड़ा था। थरथराते हुए होंठ व काँपती हुई लड़की को देख केशव उससे कुछ कहना चाहता था। कुछ मिनटों के बाद ही वह उससे बात करने लगा। वह जानता है कि बातों बातों में उसका ध्यान कपकपाहट से परिवर्तित ह...
मैं देश के प्रहरी को राखी बांधूगी
कविता

मैं देश के प्रहरी को राखी बांधूगी

संगीता सूर्यप्रकाश मुरसेनिया भोपाल (मध्यप्रदेश) ******************** आया रक्षा बंधन पर्व। मैं तो सर्वप्रथम अपने भारत। देश के समस्त प्रहरियों को राखी। बांधूगी, मेरा रक्षा बंधन पर्व तभी। पूर्ण होवेगा। जब मैं थल, जल और वायु तीनों। सेनाओ के सैनिकों को जो। भारत के प्रहरी बन हमारी। रक्षा करते हैं, मैं उन्हें राखी बांधूगी। भारत देश के प्रहरियों के कारण ही। हम सब भारतवासी अपने देश में। अपने घरों में सुरक्षित हैं। देश के प्रहरी हमारी रक्षा। दिन और रात जाग कर माइनस। डिग्री तापमान में खड़े रहकर। हमारी रक्षा करते हैं। अपने परिवार को छोड़। भारत देशवासियों की रक्षा रखते। सर्वोपरि, इसलिए मैं उन सब। प्रहरी भाईयों को सर्वप्रथम। रक्षाबंधन पर्व पर राखी बांधूगी। परिचय :- श्रीमती संगीता सूर्यप्रकाश मुरसेनिया निवासी : भोपाल (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि ...
जिसकी रज चंदन सम है
कविता

जिसकी रज चंदन सम है

श्रीमती विजया गुप्ता मुजफ्फरनगर, (उत्तर प्रदेश) ******************** जिसकी रज चंदन सम है, कण-कण हीरे मोती माटी उगले सोना, शस्य श्यामला है धरती ऐसा देश है मेरा, प्यारा देश है मेरा। बेकार न होगी कुर्बानी जलियां वाले बाग की चिंगारी नहीं बुझेगी अब देश प्रेम की आग की ले तिरंगा हाथों में हुई शहीद वीरों की टोली कभी खेली न किसी ने, ऐसी खेली खून की होली ऐसा देश है मेरा, प्यारा देश है मेरा। "भारत छोडो़ " नारा ले बापू आए समरांगण में असहयोग के अस्त्र से कांपे अंग्रेज़ अपने मन में आजा़द कराया भारत, भारत मां के तोडे बंधन देश है ऋणी बापू का, करते हम उनका वंदन ऐसा देश है मेरा, प्यारा देश है मेरा। शहीदों ने खून से सींचा, आज़ादी के पौधे को व्यर्थ न जाये बलिदान, सूखने देंगे न इसको याद रखेंगे सब कुर्बानी, जन-गण के हर मन में अमर असीम त्याग की गाथा, महके कण-कण में ...
ये कैसी दूरी सावन में
गीत

ये कैसी दूरी सावन में

धैर्यशील येवले इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** ये कैसी दूरी सावन में रात उतर आई आंगन में पवन के झोंके ले हिलोरे चांद कहे हमें आ मिलो रे रुत मिलन की है आई रे बदली गगन में है छाई रे जिले जो पल मिले जीवन मे ये कैसी दूरी सावन में रात उतर आई आंगन में ।। महकता जो हर सिंगार है रजनीगंधा का खुमार है टिप-टिप बरसे है रसरंग तन मन मे उठी है तरंग है ताप अनल का यौवन में ये कैसी दूरी सावन में रात उतर आई आंगन में ।। भोर में खनकते है कंगन कसमसाती देह के बंधन कजरा गजरा रूठा-रूठा प्रीतम मेरा झूठा-झूठा मयूर नांचे ना चितवन में ये कैसी दूरी सावन में रात उतर आई आंगन में ।। परिचय :- धैर्यशील येवले जन्म : ३१ अगस्त १९६३ शिक्षा : एम कॉम सेवासदन महाविद्याल बुरहानपुर म. प्र. से सम्प्रति : उप पुलिस अधीक्षक के पद पर पीटीसी इंदौर में पदस्थ। सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्ष...
बलिदान वीरों का
कविता

बलिदान वीरों का

दुर्गादत्त पाण्डेय वाराणसी ******************** बलिदान उन वीरों का याद हमें रखना होगा न्योछावर किए वो प्राण एहसास हमें रखना होगा मातृभूमि के चरणों में मस्तक अपना चढ़ा दिए देश-प्रेम की खातिर काँटों पर खुद को बिछा दिए माँ भारती के सपूतों का इतिहास हमें पढना होगा न्योछावर किए वो प्राण एहसास हमें रखना होगा भगत सिंह के जज़्बे को नमन व सलाम है आजाद के हौसले से आजाद हिंदुस्तान है गद्दारों से लड़ते-लड़ते मातृभूमि वो छोड़ गए बलिदान देकर वो इतिहास तक को मोड़ गए इनकी देशभक्ति की वंदना करना होगा न्योछावर किये वो प्राण एहसास हमें रखना होगा भारत की, ये आजादी उस मंजिल तक पहुंचना होगा जाति-पाति के भेदभाव को जड़ से हमें मिटाना होगा राष्ट्रपिता के अल्फाजों को अभिनंदन करना होगा न्योछावर किए वो, प्राण एहसास हमें रखना होगा !! परिचय : दुर्गादत्त पाण्डेय सम्प्रति : परास्नातक ...
अधूरी ख्वाइशें
कविता

अधूरी ख्वाइशें

रुचिता नीमा इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** चाहतें कुछ अधूरी सी कुछ पाने की, कुछ कर दिखाने की, कहाँ गुम हो जाती है? अपने आप को ढोती सी, हर बार मन को समझाने की, संयम दिखाने की, क्यों जरूरत आ जाती है? क्यों अपने वजूद को तराशती सी, वो अपने हिसाब से अपनी जिंदगी अपनी मर्जी की, जी नहीं पाती है? कब तक किस्मत पर रोती सी, वो दूसरों के ताने सुनती हुई, जमाने को दिखाने की, अपने अस्तित्व को नकारती जाती है? आखिर कब तक? वो ऐसे कमजोर सी, नहीं अब नहीं, अब वो खुद के लिये जीने की, मुस्कुराने की वजह बनाती जाती है।। परिचय :-  रुचिता नीमा जन्म २ जुलाई १९८२ आप एक कुशल ग्रहणी हैं, कविता लेखन व सोशल वर्क में आपकी गहरी रूचि है आपने जूलॉजी में एम.एस.सी., मइक्रोबॉयोलॉजी में बी.एस.सी. व इग्नू से बी.एड. किया है आप इंदौर निवासी हैं। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ क...
कृष्ण
कविता

कृष्ण

रीमा ठाकुर झाबुआ (मध्यप्रदेश) ******************** बुला रही हूँ कबसे तुमको अब तो कान्हा आ जाओ! पंथ हार आखियां अब तरसी, अब तो दरश दिखा जाओ!! जन्म से कारागार चुना, क्यू इतनी लीला रच डाली! माता पिता से दूर हुए "यशोदा की गोदी भर डाली!! शिशु रुप में ही कितने ही पापियों को, तार दिया! तारनहार बने प्रभु मेरे, पापों से उद्धार  किया!! प्रेम मूक था, राधा के प्रति, प्रेम क्या होता समझाया! ये काया है, भ्रमित हमारी, दुनिया को है बतलाया!! प्रेम अमर  है, न है बंधन, मुक्त  भाव जी पाएगा! तेरा होगा मुक्त रहेगा, फिर भी कही न जाऐगा!! मीरा ने प्रेम किया, वैराग्य में विष को पी डाला! समा गयी हृदय प्रभु के, प्रेम इतिहास ही लिख डाला!! रूक्मिणी के प्रेम को समझा, राधा को भी न भूले! साथ निभाया, जन्मों जनम का, विरह को भी जो जीले!! गीता का उपदेश दिया, कर्मो की प्रधानता को ...
राखी का त्योहार
कविता

राखी का त्योहार

रामसाय श्रीवास "राम" किरारी  बाराद्वार (छत्तीसगढ़) ******************** राखी का त्योहार सभी को प्यारा है। प्रेम बहन भाई ने इस पर वारा है।। तिथी पूर्णिमा सावन की लेकर आया। खुशियों की सौगात सभी से न्यारा है।। युग युग से है चली आ रही ये रश्मे। इसे मानता आज भी जहां ये सारा है।। रेशम की डोरी में इतनी है शक्ति। बड़े बड़े शूरमों ने इस पर हारा है।। राखी बांध बहन भाई के हाथों में। नीर नयन से बहती नेह की धारा है।। रोली अक्षत चंदन टीका माथे पर। करी आरती रीत निभाया सारा है।। भाई की खुशियां मागी उसने रब से। एक वही तो उसका बड़ा दुलारा है।। भाई बहन की प्रीत निराली है सबसे। सारे जहां में इसका अलग नजारा है।। मिलकर यह त्योहार मनायें आओ हम। *राम*मिला ये अवसर हमको प्यारा है।। परिचय :- रामसाय श्रीवास "राम" निवासी : किरारी बाराद्वार जिला- जांजगीर चाम्पा (छत्त...
पंचतत्व मे विलीन होकर में सदगति पांऊगा
कविता

पंचतत्व मे विलीन होकर में सदगति पांऊगा

गगन खरे क्षितिज कोदरिया मंहू (मध्य प्रदेश) ******************** सोचता हूं मैं पंचतत्व में विलीन होकर सदगति में पाऊंगा। दुःखी न होना मेरे लिए सन्तावना अपने पराये सभी से मेरी यही हैं, ईश्वर के प्रति आस्था लिए प्रभु के चरणों में समर्पित होकर नवजीवन में फिर पाऊंगा। सृष्टि को खूबसूरत, शांति एवं धर्य संयम धीरज से सकारात्मक सोच के साथ, मनमोहक सबसे प्रिय इंसान के लिए सृष्टिकर्ता पालनकर्ता ईश्वर ने निस्वार्थ भाव से बनाई है ये दुनिया इस दुनिया के पालनार्थ में सृष्टि पर बार-बार आऊंगा। अच्छे बुरे कर्मों का हर बार फल मुझे ही पाना है गगन सांसारिक सुख दुःख मौह माया जीवन चक्र इस धरा पर इंसानों को समय की गति से बांधा है, जीवन और मृत्यु के पालने में खुद ईश्वर ने अपने आपको ढाला है, पालनार्थ बार-बार में आंऊगा पंचतत्व में विलीन होकर सदगति में पांऊगा। परिचय :-...
लालकिला
कविता

लालकिला

डाॅ. रेश्मा पाटील निपाणी, बेलगम (कर्नाटक) ******************** इस प्राची ने देखा वो मंजर जो कभी किसी ने सोचा न था शर्मसार खडा तिरंगा था सब का अपना अपना झंडा था सत्ता अपने अधिकारों पे अडी रही जनता कर्तव्य बिसार गयी देखा जो बवाले लालकिला वीरों की कुर्बानी रोयी रक्षक मेरे कुछ समझ ना पाये किस पे बंदूक चलानी है सीना ताने अपने ही लाल खडे आगे तो बस शौर्यता का गुमान गया इतिहासो के पन्नों को क्यू आज ये हिंद बिसार गया मुगलों की आन बान कभी था भारत की जान और शान हुवा वो लालकिला बस आज आपने ही पुतोंसे पशेमान हुवा आज उसे भूला वो इतिहास का पन्ना याद आया अपने ही पीता के अंगों पे विषमलता बेटा देखा भाई ने भाई का कत्ल किया मूक साक्षी खडा था लालकिला कितने बादशाह बदलते देखे कितने तख्ते पलटते देखे मुगलों के गृहकलह से आहत अंग्रेजो का दास हुवा फिर भी माँ भारती के ...
पेड़ की पीड़ा
लघुकथा

पेड़ की पीड़ा

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हर आठ-दस दिन बाद शासकीय कार्य से जीप द्वारा उधर से निकलना होता था सड़क कच्ची व पथरिली थी, सड़क की दोनों और विराट विराना वन था मैं समीप से गुजरती अजीब सा सन्नाटा लगता एक दिन उसवनके समीप से गुजरते हुए मुझे कुछ ठोकने टकराने की आवाज सुनाई दी मैंने वहां चालक से पूछा तो मैं भी कुछ सुनाई दे रहा है वह बोला हां कुछ ठोकने की आवाज सुनाई दे रही है जैसी कोई पेड़ काट रहा हो मेरी धड़कन बढ़ गई थोड़ा अंदर जाकर देखा पेड़ को काटा जा रहा था पेड़ पर लगे आघात मुझे आहत कर रहे थे। आंखों से आंसू बहाता आकाश तपती धरती को ताकता मानो कह रहा है सुन रही हो रुदन कटते पेड़ का जो कभी मुझे छूने का यत्न कर रहा था, तुम्हारे द्वारा भेजा गया तुम्हारा सन्देश सुनाने के लिए मेरे पास आ रहा था किन्तु हाय रे मानव की लालसा स्वार्थी मानव ने उसे ऊपर चढ़ते ही नीचे गिरा दिया तुम्...
रक्षाबंधन गीत
गीत

रक्षाबंधन गीत

रशीद अहमद शेख 'रशीद' इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** सुखदाई वर्षा ऋतु आई, धरती पर सावन मुस्काया। राखी पर बहना उदास है, सब आए पर अनुज न आया। सात समंदर पार बसा है, पत्र बहुत लम्बे लिखता है। मोबाइल पर करता बातें, मुखड़ा भी उसका दिखता है। मन में कुछ बदलाव नहीं है। बदल गई पर उसकी काया। राखी पर बहना उदास है, सब आए पर अनुज न आया। अधिक व्यस्त है वह कहता है, उसे मिला अवकाश नहीं है। है विदेश में दुनिया सारी, पर भारत-सा प्राश नहीं है। माँ के हाथों निर्मित लड्डू, जग में अनुपम कहीं न पाया। राखी पर बहना उदास है, सब आए पर अनुज न आया। पापा स्वस्थ नहीं रहते हैं, मौन बहुत रहतीं हैं माता। केवल सात महीने बीते, दादी त्याग गईं हर नाता। सभी कुशल-मंगल है घर में, भाई को बस यही बताया। राखी पर बहना उदास है, सब आए पर अनुज न आया। परिचय -  रशीद अहमद शेख 'रशीद' साहि...
कुछ अलग सृजन प्रयास
कविता

कुछ अलग सृजन प्रयास

विजय गुप्ता दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** कुछ अलग सृजन प्रयास बिना सहारे-१२८ शब्द (काव्य-अर्थ भी नीचे वर्णित है) ************************ गहन दमन अटक खटक, पहट फकत कदर पटल। भरत अदब नयन छलक, गज़ब सड़क महल सजल। बहस डगर तड़प सबब, रहन सहन ठसन खलल। तमस गमन हवन तहत, नज़र कसक समझ पहल। तपन पवन अमन चलन, सरस जतन कलश कमल। कथन कसर कहर कलह, महक चहक सहज सफल। वतन वचन असर सबक, तड़क कड़क परख अटल। अगर मगर गरज ललक, मनन वजह नमन सबल। हवस चरस तरस भनक, सनक धमक धधक गरल। हनन दहन खनक भड़क, अहम वहम खतम शकल। नवल धवल चपल असर, कलम समझ असल सरल। अकल फसल अमल सनम, पलक फलक लहर तरल। अलख खबर मगज पलट, समझ चमक दमक बदल। धरम करम बचत ललक, शरण तनय बहन चहल। नसल मचल छनन सनन, शहर शजर करम अचल। लगन मगन सनद अलग, दहक भभक रजत ग़ज़ल। प्रत्येक लाइनों का क्रमवार अर्थ भी प्रस्...
टूटे ख्वाब
कविता

टूटे ख्वाब

मनीष कुमार सिहारे बालोद, (छत्तीसगढ़) ******************** मां के डांट से रोते मैंने, बालक का आवाज लिखा है। टपक गेसुऐ नयनों से उसके, हाथों मे एक किताब लिखा है।। कि मैंने एक ख्वाब लिखा है, आंसुओं से भीगी एक किताब लिखा है । मानव के हरेक शीर्षक से, पुरे कर्मोकाज़ लिखा है।। लोग डरते हैं जहां तर जाने से, वही गहरे पानी का तालाब लिखा है।। सोंच से पहले डर को आगे, लोगों का नया इजाद लिखा है। खुद अंधेरे मे रहकर, प्रकाश के खिलाफ लिखा है।। कि मैंने एक ख्वाब लिखा है, आंसुओं से भीगी एक किताब लिखा है। कि मैंने एक ख्वाब लिखा है, आंसुओं से भीगी एक किताब लिखा है।। एक महल के राजा का मैंने, बदले का अभिशाप लिखा है। राजकुमार का राह निहारे, एक कन्या का घर मे साज लिखा है।। नई नवेली दुल्हन को मैंने, मां लक्ष्मी के दो पांव लिखा है। लगे तीर सीने में आकर, सीने में वो घाव लिखा है।। गिर...
लाशों से सजाते क्यों धरती?
कविता

लाशों से सजाते क्यों धरती?

रामकेश यादव काजूपाड़ा, मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** लाशों से सजाते क्यों धरती, मानवता से घबराते हो। सब कुछ नहीं पद, सत्ता पैसा, क्यों मजलूमों को रुलाते हो? इतनी बर्बरता ठीक नहीं, जिल्लत का जहर पिलाते हो। इस नश्वर जग में आखिर क्यों, अपनों पे सितम तू ढाते हो? उस उपवन के हो तू माली, क्यों पहचान मिटाते हो। दफ़न करो तू अंधकार को, क्यों कांटे के आँसू बोते हो? चीख, दर्द, चीत्कार से दुनिया, निशि-दिन घायल होती है। शक्ति प्रदर्शन देख-देखकर, फिज़ा वहाँ की रोती है। सिर्फ विकास की बात करो, तब सुख के बादल बरसेंगे। मोहब्बत की किरनें झूमेंगी, ज़ब सर न किसी के उतरेंगे। अमनो चैन की उस दुनिया में, तब मानवता करवट लेगी। फांकों के दिन टल जायेंगे, खुशहाली तब थिरकेगी। मत रौंदों, न मसलों इज्जत, अब ना तू नर-संहार करो। अपने पथ से भटके लोगों, एक दूजे से प्यार करो। प...
लिए संग-संग आपको जीती… मैं आपका ही अंश
स्मृति

लिए संग-संग आपको जीती… मैं आपका ही अंश

डॉ. पंकजवासिनी पटना (बिहार) ******************** बड़ा अभिमान होता है मुझे कि मैं मानवता के पैरोकार, ४८ पुस्तकों के रचनाकार प्रोफेसर श्यामनंदन शास्त्री जी की बेटी हूंँ! जिन्होंने आज से आधी सदी पूर्व ईश्वर से विकल प्रार्थना में मुझे मांँगा और मेरे जन्मोत्सव में विवाह जैसा भव्य आयोजन कर रिश्तेदारों में १०,००० के कपड़े मारे खुशी के बाँट दिए....... ये सब उस देश, प्रदेश और समाज में जहांँ बेटियों के जन्म की खबर पाकर मांँ-बाप और रिश्तेदारों की छाती सूख जाती है! चेहरे पर मुर्दनी छा जाती है!! तथा मन और घर में मातम पसर जाता है!!!.... जहांँ आज के इस इकीसवीं सदी में भी कन्या भ्रुण-हत्या जैसा क्रूर, घिनौना और अमानवीय कृत्य बेखटके चलन में है!! फिर बड़े नेह से, छोह से, जतन से पाला मुझे.... रेशा-रेशा गढ़ा मुझे ... भाइयों से जायदा दुलारा मुझे... पढ़ाया मुझे... डबल एम.ए., पीएच. डी. नेट. स्लेट कराया मुझे....
राखी की हिफाज़त
कविता

राखी की हिफाज़त

मुकेश गोगड़े टोंक (राजस्थान) ******************** बेख़ौफ घर से निकलने का वादा मांगती है। बहन क्या इतना सा भी ज्यादा मांगती है। जमानेभर में प्रसारित ख़बरों को देखकर। कलाई की राखियां भी हिफाज़त मांगती है।। क़दम से क़दम मिलाकर जीत दिलाती है। बेसुरे अल्फाज़ो को भी सुरीला बनाती है। प्रीत के सरोवर में इतनी कलुषिता देखकर। कलाई की राखियां भी हिफाज़त मांगती है।। कोख में घुटती सांसे भी रिहाई मांगती है। भाई-बहन का समान अधिकार मांगती है। पौरुष प्रधानता का इतना ढ़ोंगीपन देखकर । कलाई की राखियां भी हिफाज़त मांगती है।। प्रीत के धागों में कितनी सत्यता वो जानती है। सौतेला व्यवहार देखकर भी दुआएं मांगती है। बंजर हो जाएगा जहाँ,माँ, बहन,बेटी के बिना। कलाई की राखियां भी हिफाज़त मांगती है।। परिचय :-  मुकेश गोगड़े निवासी : टोंक (राजस्थान) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स...
प्यार का बंधन
कविता

प्यार का बंधन

दीप्ता नीमा इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** भाई-बहन का रिश्ता न्यारा लगता है हम सबको प्यारा भाई बहन सदा रहे पास रहती है हम सभी की ये आस इस प्यार के बंधन पर सभी को नाज़।। भाई बहन को बहुत तंग करता है पर प्यार भी बहुत उसी से करता है बहन से प्यारा कोई दोस्त हो नहीं सकता इतना प्यारा कोई बंधन हो नहीं सकता इस प्यार के बंधन पर सभी को नाज़।। बहन की दुआ में भाई शामिल होता है तभी तो ये पाक रिश्ता मुकम्मिल होता है अक्सर याद आता है वो जमाना रिश्ता बचपन का वो हमारा पुराना इस प्यार के बंधन पर सभी को नाज़।। वो हमारा लड़ना और झगड़ना वो रूठना और फिर मनाना एक साथ अचानक खिलखिलाना फिर मिलकर गाना नया कोई तराना इस प्यार के बंधन पर सभी को नाज़।। अपनी मस्ती के किस्से एक दूजे को सुनाना माँ-पापा की डांट से एक दूजे को बचाना सबसे छुपा कर एक दूजे को खाना खिलाना बहुत खास होता है...
हालात
कविता

हालात

मंजिरी "निधि" बडौदा (गुजरात) ******************** आज उजड़ा सा लगे, देख तेरा संसार संकट में दिखे मानव और घर द्वार कैसे और क्या करें लगे यह मन कहाँ विपदा हैं आन पड़ी दुःखी जन जन यहाँ बहोत ही दुःखी संसार लोग रोते हुए देख मानव भेड़ियों को स्वप्न खोते हुए कितने हुए गोलियों के शिकार कितने मार खा-खा कर मरने को तैयार छीन कर वे लोकतंत्र को ले गये अपने जाते दूर देख बिलखते हुए सारी इच्छाओं को बंदूक की नोक पर पूर्ण करवा रहे महिलाएँ और बच्चे जुल्म का शिकार हो रहे शर्मसार हुई सम्पूर्ण मानवता कहाँ जाए वो सारी जनता ? छोड़ निज घर द्वार तड़पकर, जन चले विकट विपदा से हारकर कठपुतली बन नाच डोर उनके हाथ छोड़ चलें दुनिया नहीं है कोई साथ मचा हुआ हाहाकार खोज रहे हैं नव आधार नहीं उठा पा रही भू भार त्राहि-त्राहि करती सरकार कुछ तो करो भगवन कब तक यूँ मूक खड़े रहोगे? डर के साये म...