तिरंगे की अभिलाषा
डॉ. सत्यनारायण चौधरी "सत्या"
जयपुर, (राजस्थान)
********************
चाह नहीं मैं फरेबी नेता के
हाथों में इठलाऊँ।
चाह नहीं मैं झूठे लोकतंत्र के
मंदिर पर फहराया जाऊँ।
चाह नहीं मैं भगवा और
हरे में बंट जाऊँ।
चाह नहीं मैं किसी वीआईपी की
गाड़ी की शोभा बन पाऊँ।
चाह नहीं मैं विरोध स्वरूप
लालकिले पर चढ़ जाऊँ।
चाह नहीं मैं किसी लालची
नेता के तन पर लपेटा जाऊँ।
चाह नहीं मैं किसी खेल की
शोभा बन पाऊँ।
चाह नहीं मैं किसी धर्म-ध्वज के
साथ लहराया जाऊँ।
है अभिलाषा यही मेरी
भारत माता की शान बढाऊँ।
है अभिलाषा यही मेरी
केसरिया से शौर्य को दिखलाऊँ।
है अभिलाषा यही मेरी
हरे रंग से विकास को दर्शाऊँ।
है अभिलाषा यही मेरी
सफ़ेद से शांति का पाठ पढ़ाऊँ।
है अभिलाषा यही मेरी
चक्र से मानव धर्म को सिखलाऊँ।
है अभिलाषा यही मेरी
मैं सबके मन मंदिर में बस जाऊँ।
बाहर भले ही न फहराओ
सब के अन्तर्...

























