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तिरंगे की अभिलाषा
कविता

तिरंगे की अभिलाषा

डॉ. सत्यनारायण चौधरी "सत्या" जयपुर, (राजस्थान) ******************** चाह नहीं मैं फरेबी नेता के हाथों में इठलाऊँ। चाह नहीं मैं झूठे लोकतंत्र के मंदिर पर फहराया जाऊँ। चाह नहीं मैं भगवा और हरे में बंट जाऊँ। चाह नहीं मैं किसी वीआईपी की गाड़ी की शोभा बन पाऊँ। चाह नहीं मैं विरोध स्वरूप लालकिले पर चढ़ जाऊँ। चाह नहीं मैं किसी लालची नेता के तन पर लपेटा जाऊँ। चाह नहीं मैं किसी खेल की शोभा बन पाऊँ। चाह नहीं मैं किसी धर्म-ध्वज के साथ लहराया जाऊँ। है अभिलाषा यही मेरी भारत माता की शान बढाऊँ। है अभिलाषा यही मेरी केसरिया से शौर्य को दिखलाऊँ। है अभिलाषा यही मेरी हरे रंग से विकास को दर्शाऊँ। है अभिलाषा यही मेरी सफ़ेद से शांति का पाठ पढ़ाऊँ। है अभिलाषा यही मेरी चक्र से मानव धर्म को सिखलाऊँ। है अभिलाषा यही मेरी मैं सबके मन मंदिर में बस जाऊँ। बाहर भले ही न फहराओ सब के अन्तर्...
एक पल
आलेख

एक पल

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** समय का महत्व हर किसी के लिए अलग अलग हो सकता है। इसी समय का सबसे छोटा हिस्सा है "पल"। कहने सुनने और करने अथवा महत्व देने में अधिकांशतः हम लापरवाही में, भ्रमवश भले ही एक पल को अधिक भाव नहीं देते, परंतु हम सबको कभी न कभी इस एक पल के प्रति अगंभीरता, लापरवाही अथवा अनजानी भूल की भारी कीमत चुकानी पड़ जाती है। बहुत बिर मात्र एक पल के साथ कुछ ऐसा हो जाता है कि उसका विस्मरण असंभव सा होता है। वह अच्छा और खुशी देने वाला भी हो सकता है और टीस देता रहता ग़म भी। उदाहरण के लिए एक पल की देरी से ट्रेन छूट जाती है, एक पल की लापरवाही या मानवीय भूल बड़ी दुर्घटनाओं का कारण बन जाती है, धावक विजयी हो जाता है और नहीं भी होता। एक पल में लिए निर्णय से जीवन की दशा और दिशा बदल जाता। बहुत बार एक पल के आगे या पीछे के निर्णय अविस्मरणीय खुशी ...
मुस्कान
कविता

मुस्कान

निरूपमा त्रिवेदी इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** प्रिये ! मधुर मधु-सी तुम्हारी मुस्कान सजाने लगी आकर अधरन बंधनवार स्मृति विथियों से ध्वनित तुम्हारी पदचाप हृदय बसी छवि ले आई यादों का मधुमास जूही-सी सुकुमार कली चंपे सी सुवास तन-मन महका गई महकी-सी हर सांस हिय हिलोर नित-नित निहारन की आस सांझ सवेरे रहती हरदम दिल के पास मैं तितलि अजान-सी तुम भ्रमर बन गाते गान फूल-फूल मंडराते हम दिखलाते अपना मान सुमन रस पगी तुम्हारी कोमल सुरभित गात उपवन खिल उठता था मानो पाकर हमारा साथ तरु-तरु शाख-शाख थी झूमती-सी डोलती अल्हड़ समीर मस्ती में मस्त सी हर्षित हो बरसाती थी अपने झर-झर पात प्रिये!! तुम संग मधुर मिलन फिर आया याद परिचय :-  निरूपमा त्रिवेदी निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना,...
असीम तुम्हारी कविता
संस्मरण

असीम तुम्हारी कविता

प्रीति शर्मा "असीम" सोलन हिमाचल प्रदेश ******************** आज तुम्हारी फाइलों को तुम्हारे जाने के बाद लोगों को वापस देने के लिए कुछ किताबों के पन्नों में से एक डायरी का पन्ना निकला। मेरे छोटे भाई अनुज ने वह पेज उठाया और कहा दीदी आप की कविता। मेरी कविता मुझे हैरानी हुई कि असीम की फाइलों में मेरी कविता। लेकिन जब मैंने देखा तो मैंने उसे लिखावट देख कर बताया कि यह मेरी नहीं उनकी (असीम) कविता है। शीर्षक लिखा था....दर्द     दिल में ऐसा ...क्या होता है। खून के आंसू क्यों रोता है। निष्ठुरता की चादर ओढ़े, पैर पसारे जग सोता है। प्यार की भाषा कहां खो गई। भावनाएं लाचार हो गई। मतलब तक इंसान है सीमित। हमदर्दी भी कहां सो गई। नेक दिली थी ...सीखी हमने। सिर्फ आज तक "अपनों" से, चोट लगी तो संभलें ऐसे। जागे जैसे सपनों से। चोट पे चोट लगी दिल पे। पर रा...
गर्भ में बेटी की पुकार
कविता

गर्भ में बेटी की पुकार

सुनील कुमार बहराइच (उत्तर-प्रदेश) ******************** गर्भ में बेटी करे पुकार मेरी मैया मुझे न मार। दिल में मेरे है अरमान मैं भी देखूं जग-संसार पाऊं मैं सब का प्यार मेरी मैया मुझे न मार। पाकर तुम्हारा स्नेह-दुलार मैं भी भरूंगी ऊंची उड़ान छू कर मैं अनंत आकाश सपने सभी करूंगी साकार सुन ले तू मेरी मनुहार मेरी मैया मुझे न मार। ऊंचा करूंगी कुल का नाम पूरा करूंगी सबका अरमान जीने का दो तुम अधिकार मेरी मैया मुझे न मार। परिचय :- सुनील कुमार निवासी : ग्राम फुटहा कुआं, बहराइच,उत्तर-प्रदेश घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानिय...
माँ
कविता

माँ

डॉ. मोहन लाल अरोड़ा ऐलनाबाद सिरसा (हरियाणा) ******************** जिसने मुझे लिखा उसके लिए मै क्या लिख दुँ कोई पुछे मुझ से रब का तो मै बस माँ ही लिख दुँ वतन के लिए जिन्होंने कुर्बान किए अपने बेटे सबसे पहले उन्ही माताओ का नाम लिख दुँ जिन की आँखो से देखी मैने दुनिया वो नाम बस माँ लिख दुँ कही झोपड़ी तो कही सड़क पर रो रही थी माताऐ मोहन कैसे मै लिख दुँ मेरी माँ खुश थी जिस ने मुझे लिखा उसके लिए मै क्या लिख दुँ...। परिचय :- डॉ. मोहन लाल अरोड़ा कवि लेखक एवं सामाजिक कार्यकर्ता निवासी : ऐलनाबाद सिरसा (हरियाणा) प्रकाशन : ३ उपन्यास, ७२ कविता, ७ लघु कथा १२ सांझा काव्य संग्रह प्रकाशित, काव्याअंकुर मे ३७ रचना प्रकाशित उपलब्धियां : मुलतानी साहित्य मे प्रसंशा पत्र, हिंदी रचनाओ मे बहुत प्रसंशा पत्र घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एव...
आओं तुम्हें राजस्थान दिखाता हूँ।
कविता

आओं तुम्हें राजस्थान दिखाता हूँ।

नरपत परिहार 'विद्रोही' उसरवास (राजस्थान) ******************** आओं तुम्हें राजस्थान दिखाता हूँ। विज्ञान धरती और पोकरण दिखाता हूँ। शाश्वत समाधि रामा पीर दिखाता हूँ। आओ तुम्हें खनिजों का भण्डार दिखाता हूँ। इन रेतीले धोरों में मृगतृष्णा का संसार दिखाता हूँ। भेड़-बकरी, ऊँट और गोडावन का घर दिखाता हूँ। आओ तुम्हें केर-काचरी, कुमट-सांगरी का साग खिलाता हूँ। जबरौ जैसलमेर अर जवानों की देवी तमाम दिखाता हूँ।। ख्वाइशें हैं मन के भीतर, तुम्हें पुरा राजस्थान दिखाता हूँ। आओ तुम्हें राजस्थान दिखाता हूँ। गढ़ चिंतामणि चिडि़याटूँक दिखाता हूँ। परि-देवताओं से निर्मित मेहरानगढ़ दिखाता हूँ। आओ तुम्हें बलिदानी रखिया राजाराम दिखाता हूँ। मण्डोर, ओसिया अर जसवन्त थडा़ तमाम दिखाता हूँ। भली धरती जोधाणे री, आओ तुम्हें सूर्यनगरी और घंटाघर दिखाता हूँ। सुवर्णनगरी में काहन्ड़देव का शौर्य ...
करते है चिकित्सक का सम्मान
कविता

करते है चिकित्सक का सम्मान

धर्मेन्द्र कुमार श्रवण साहू बालोद (छत्तीसगढ़) ******************** पढ़ लिखकर जो पाए ज्ञान, सेवा करें जो जीव कल्याण। मरीजों की जो बचाएँ जान, बनता वही चिकित्सक महान। करते हैं चिकित्सक का सम्मान। सचमुच में हैं वे धरती के भगवान।। कोई मन की इलाज करते हैं, कोई रोगियों की सेवा करते हैं। कोई मीठी बोली ही बोलते हैं , कोई धैर्य का पालन करते हैं। स्वस्थ हो जाते हैं आखिर इंसान। सचमुच में हैं वे धरती के भगवान।। मरीजों से करते हैं जो प्यार, मिट जाते हैं सब मनो विकार। अस्वच्छता से होते हैं बीमार, जांच परख से करते हैं उपचार। तंदुरुस्त कर देते हैं जीवन महान। सचमुच में हैं वे धरती के भगवान।। योद्धा बनकर सेवा करते, रात दिन मेहनत वो करते। शल्यक्रिया समय देख करते, संयम नियम का पालन करते। श्रवण करते हैं चिकित्सक का मान सचमुच में हैं वे धरती के भगवान।। परिचय :...
बदलता वक्त… बदलते लोग…
कहानी

बदलता वक्त… बदलते लोग…

अरविन्द सिंह गौर इंदौर (मध्यप्रदेश) ******************** राकेश के पिता का देहांत १० वर्ष की उम्र में ही हो गया वह गांव में रहता था। उसकी मां ने उसे शहर लाकर पढ़ाने के लिए सब जमीन जायदाद छोड़कर वो शहर में आ गए और उसकी जमीन जायदाद पर उनके रिश्तेदारों ने कब्जा कर लिया। इस बीच जब थोड़ा बहुत समझदार हुआ तो उसने अपने गांव जाकर अपनी जमीन जाकर को देखनी चाही‌। राकेश की जमीन में अच्छी पैदावार नहीं होती थी पर वहां नहर निकलने के कारण वह जमीन पर अच्छी पैदावार होने लगी कीमत भी बढ़ गई। जब वह अपने गांव गया तो उनके रिश्तेदारों ने उसे जमीन कि कागजात भी दिए ना ही जमीन के पैसे भी दिए और उन्हें उल्टा मारने की धमकी दी इस कारण वह वापस शहर में आ गए। वक्त बदलता गया पढ़ाई करके राकेश सरकारी महकमे में बड़ा अधिकारी बन गया था उसकी शादी हो गई और शहर में उसने अपना स्वयं का बड़ा मकान बना लिया था। राकेश के एक लड़का एक...
प्रेम और स्पर्श
कविता

प्रेम और स्पर्श

श्वेता अरोड़ा शाहदरा (दिल्ली) ******************** किसी के साथ की जरूरत होती है जब हम पूरी तरह टूट जाते है, चाहते है किसी ऐसे पवित्र स्पर्श को जो हमे अहसास दिलाए कि टूटे दिल भी जुड जाते है! तपती धूप मे थोडी सी सहानुभूति भी जरूरी है, सच्चे प्रेम और स्पर्श की अनुभूति भी जरूरी है! कभी-कभी तो अनजान भी अपनो से ज्यादा गहरा रिश्ता निभाते है, दिलासा के दो बोल मरहम का काम करते है, जब दिल पर गहरे घाव आते है! जब हो भीड मे हम अकेले, तो प्यार भरा स्पर्श पाकर आनंदित हम हो जाते है, नीर भरे नैना भी समंदर बन जाते है, जब हम सच्चा प्रेम और स्पर्श किसी का पाते है! परिचय :-  श्‍वेता अरोड़ा निवासी : शाहदरा दिल्ली घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्...
नूर गुलाबी ओढ़कर
कविता

नूर गुलाबी ओढ़कर

होशियार सिंह यादव महेंद्रगढ़ हरियाणा ******************** नूर गुलाबी ओढ़कर, प्रभु करे निवास, मनोकामना पूर्ण हो, आये सबको रास, उसकी कृपा से ही, आये जन को सांस, उसके ही आधीन, बनकर उनका दास। नूर गुलाबी ओढ़कर, करता है इंसाफ, दोषी को सजा मिले, निर्दोष हो माफ, उसके ही प्रताप से, करते सभी जाप, पापी कितने ही हो, कर देता है साफ। नूर गुलाबी ओढ़कर, जन को देता बल, गरीब इंसान सदा, बन जाता है सबल, हर समस्या का वो, करता पल में हल, हर जगह मिलता है, वायु हो या जल। नूर गुलाबी ओढ़कर, दिखलाता है रूप, इज्जत मान बढ़ जाये, बेशक हो कुरूप, पूजा सभी हैं करते, लेकर हाथ में धूप, उसके ही आधीन है, रंक हो या भूप। नूर गुलाबी ओढ़कर, भर दे मन में जोश, उसकी लाठी जब पड़े, खो देता है होश, जिसने नाम ना जपा, उसे है अफसोस, अंतिम सत्य रूप में, ले लेता आगोश। नूर गुलाबी ओढ़कर, बूझा देता है प्य...
श्री गोवर्धन चालीसा
दोहा

श्री गोवर्धन चालीसा

डाॅ. दशरथ मसानिया आगर  मालवा म.प्र. ******************* गोवर्धन गौआ चरण, घांस पात भंडार। कणकण में राधारमण, कहे मसान विचार।। जय जय गोवर्धन महराजा। ग्वालबाल के तुम ही राजा।।१ छप्पन भोग तुम्हें लगाऊं। नित उठ पूजा कर गुण गाऊं।।२ गौ माता के पालन हारा । घांस पात के तुम भंडारा।।३ पर्यावरण के हो तुम रूपा। छाया फल दे संत स्वरूपा।।४ जीव जन्तु के तुम रखवारे। पंछी करते कलरव सारे।।५ सात कोस की करे चलाई। कोई चलते दंडवत जाई।।६ लाल लंगुरों की चपलाई। फल फूलों को लेत छुडाई।।७ लाला ने जब तुम्हे उठाये। तब से गिरधारी कहलाये।।८ जय गिरधर जय पर्वत राजा। माथमुकुट भौ तिलक विराजा।।९ जतीपुरा अरु मानस गंगा। दान घाटी से धरम प्रसंगा।।१० नंगे पैर अरु हाथन माला। मुख में नाम भजें गोपाला।।११ हर पाथर है सालग रामा। तेरी रज मे बसती श्यामा।।१२ सात दिनों की बरसा भारी। हा हा...
कबाड़ी किंग
व्यंग्य

कबाड़ी किंग

रमेशचंद्र शर्मा इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** कबाड़ी वाला और व्यंग। सुनने में बड़ा अटपटा लगता है। कबाड़ में तो कचरे की भरमार रहती है। कचरे से व्यंग का उत्पादन सचमुच बड़ा ही विस्मयकारी है। इधर कबाड़ी वालों की देश में भरमार है। सोचता हूं यदि हिंदुस्तान में कबाड़ वाले नहीं होते तो अटालों का क्या होता है? पूरे देश का अटाला सड़कों पर जमा हो जाता। कुछ लोग जो अटाले को घरों में बड़े करीने से सजाकर रखते हैं। कबाड़ हमेशा कबाड़ नहीं रहता। यदि किस्मत बल्लियों मचले तो कबाड़ भी एंटीक की कैटेगरी में आ जाता है। कबाड़ने कितने ही कावड़ियों की लाइफ बना दी। मतलब जो सड़क छाप थे आज राजमार्ग पर फराटे दार अंग्रेजी में बतिया रहे हैं। हमारे शहर का एक कबाड़ी तो रातों रात लखपति की श्रेणी में आ गये। कावड़ची चाची बेगम के दिन इतनी जल्दी बदल गए। पूरे शहर के कबाड़ी उससे जलने लगे। शायद घूड़े के दिन भी इतनी ज...
बदलाव निश्चित है चाहे समय हो या भाग्य
कहानी

बदलाव निश्चित है चाहे समय हो या भाग्य

अतुल भगत्या तम्बोली सनावद (मध्य प्रदेश) ******************** रघु बड़ा उदास लग रहा था। उसके मन में न जाने कैसे कैसे विचार जन्म ले रहे थे जिसका कारण था उसके खेत की फसल। जी तोड़ मेहनत करने के बाद भी अब हर बार उसकी फसल बहुत कम आ रही थी। निराशा उसके मन मे घर बना रही थी। अखबारों में आए दिन किसानों के आत्महत्याओं की खबरें सुन-सुनकर उसका मन पसीजने लगा था, करे भी तो क्या? सामने बेटी ब्याह लायक हो चुकी और बेटा खेती करना नही चाहता उसका मन पढ़ लिखकर अफसर बनने के सपने देख रहा था। कर्जदारों का कर्ज चुकाना है, बेटे जो पढ़ाना है और बेटी ब्याहना है। कैसे होगा सब सोच सोचकर ही वह टूटता जा रहा है। अंततः उसने भी आत्महत्या का विचार बना ही लिया लेकिन वह एक दिन वह अपने परिवार के साथ सुकून से रहना चाह रहा था तभी उसकी पत्नी उसके पास आकर कहने लगी "आप व्यर्थ चिंता करते हो। इस पूरी दुनिया में सिर्फ हम ह...
जब तुम आये थे
मुक्तक

जब तुम आये थे

सुखप्रीत सिंह "सुखी" शाहजहांपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** तूफ़ान थमने लगे थे, जब तुम आये थे अरमान जगने लगे थे, जब तुम आये थे रुह भी जिस्म से निकलने को बेचैन थी हाथ सज़दे में उठने लगे थे, जब तुम आये थे परिचय :-  सुखप्रीत सिंह "सुखी" निवासी : शाहजहांपुर (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर ९८२७३ ६०३६० पर सूचित अवश्य करें …🙏🏻 आपको ...
आओ फिर लौट चले बचपन की ओर
कविता

आओ फिर लौट चले बचपन की ओर

कीर्ति सिंह गौड़ इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** जब लड़ते थे झगड़ते थे, बात बात पर यारों से अकड़ते थे। सहेली की गुड़ियों की शादी में, जब सज-धज कर जाते थे और दावत भी उड़ाते थे। तब माँ का ये कहना कुछ रास नहीं आता था, कि जल्दी आना। अभी तो घर से निकले ही कहाँ थे, कि माँ का ये फ़रमान सुनाना। शाम के वक़्त का इन्तज़ार, जब मिलेंगे यार और खेलेंगे बेशुमार। बड़ों की दुनियाँ से दूर, अपनी ही मस्ती में चूर। खेलने का वक़्त ख़त्म होने पर, माँ का बुलावा आना और कहना। अगर वक़्त का ख़याल नहीं तो, घर मत आना अपने दोस्त के घर ही सो जाना। नज़दीक आता इम्तिहान का वक़्त और बढ़ती बेचैनी, किसी का पास तो किसी का फेल हो जाना। होली के रंगों की ख़रीदारी लिए, साथ में बाज़ार जाना। छत पर संक्रांति की पतंग साथ उड़ाना। जन्मदिन पर मावे का केक, और ढेर सारी भेंट और न जाने क्या ...
बदरा घिर आये
कविता

बदरा घिर आये

मनोरमा जोशी इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** गगन घन घिरे, पवन फिर उड़े, घटा बन छायों रे, सावन आयो रे। उगेगीं अब नयी कोपलें, लहरायेगी बैले, अठखेली कर रही रशमियां, हरियाली खेले, घरती ने श्रृंगार किया है, रुप अनोखा पायो रे। सावन आयो रे। गुन-गुन कर रहीं चिरैयां, नया संदेशा लाये, भंवरें की गुंजन सुनके, कलियां भी मुस्काये, फूलों से सज गया बगीचा राग मल्हार सुनाये रे सावन आयो रे। चैती की गर्मी से उबरे, जीवन नया मिला है, दुखः के बौने पाँव हुऐ है, सूरज मुखी खिला है, धरती से अंबर तक किसने धानी रंग बगरायो रे, सावन आयो रे। परिचय :-  श्रीमती मनोरमा जोशी का निवास मध्यप्रदेश के इंदौर में है। आपका साहित्यिक उपनाम ‘मनु’ है। आपकी जन्मतिथि १९ दिसम्बर १९५३ और जन्मस्थान नरसिंहगढ़ है। शिक्षा - स्नातकोत्तर और संगीत है। कार्यक्षेत्र - सामाजिक क्षेत्र-इन्दौर शहर ही है। ले...
ये देखो कैसा आया जमाना है।
कविता

ये देखो कैसा आया जमाना है।

विरेन्द्र कुमार यादव गौरा बस्ती (उत्तर-प्रदेश) ******************** घराती को पानी खरीद कर लाना है, ये देखो कैसा अब आया जमाना है। बारात में यदि खाना हमें खाना है, तो खाना खड़े होकर ही खाना है। रसोई में खाना खड़े-खड़े बनाना है, ये कैसा देखो अब आया जमाना है। खुद थाली व खाना लेकर आना है, खड़े-खड़े सबको खाने को खाना है। ये देखो कैसा अब आया जमाना है, प्लेट कूड़ेदान के ठिकाने लगाना है। पानी स्वयं निकाल कर ही पीना है, चाहे शादी का कोई भी महीना है। खड़े खाना व खड़े ही पानी पीना है, भला व्यक्ति का जीना कोई जीना है। अब बारात नौटंकी नाच के बिना है, बारात में अब केवल नाच नगीना है। ये देखो कैसा अब आया जमाना है, खड़े-खड़े ही सबको खाना खाना है। परिचय :- विरेन्द्र कुमार यादव निवासी : गौरा बस्ती (उत्तर-प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक ह...
पनघट पे नीर भरेगा कौन
कविता

पनघट पे नीर भरेगा कौन

हंसराज गुप्ता जयपुर (राजस्थान) ******************** भक्ति दान नेह धर्म कर्म, जन्मों तक साथ निभाते हैं, परिपाटी, घर देह चौपाटी, माटी में मिल जाते हैं, पूरी आहुति सांसों से, खुद को ही देनी होती है, अवशेष धर्म की बागडोर, सबको मिल लेनी होती है, गंभीर समय की सीमा में, अधीर हो, पीर हरेगा कौन, अभीष्ट ईष्ट के स्वागत को, पनघट पे नीर भरेगा कौन, रैन सुखचैन, दे सेन लुभाने, छुप छुप नयनन में उतरे, अमर प्यार की ज्योति जगाने, बनके बाती घृतधार जरे, थके हंस की हार मिटाने, निश दिन पांवों में विचरे, प्रेम कहानी, मीठी वाणी, हियभर अधरों से उचरे, गहरे घावों पर भावों से, धीरे मधुचीर धरेगा कौन, अवशेष समर, सरसाने को, पनघट पे नीर भरेगा कौन ।। शरदरात्रि को अक्षय पात्र में, चँदा से अमृत लाते थे, व्रत घृत मधु करवा घरवा, दीपों की थाल सजाते थे, होली मंगल कर जल झलका, रंग चंग त्योहार मना...
अभिलाषा
कविता

अभिलाषा

ओंकार नाथ सिंह गोशंदेपुर (गाजीपुर) ******************** सृजन तो दिल की उद्गार है। दिनों दिन बढ़े, सब लिखे सब पढ़े, आदान-प्रदान होता रहे यही जगत व्यवहार है।। कौन हारा कौन जीता, अभी सभी है रीता रीता, सीखने को ही तो सभी तलब गार है। नर्सरी के ही सब सही, उच्च शिक्षा में सब नहीं, सरस्वती की याचना में ही सबका उद्धार है।। ना तेरा है ना मेरा है दिल से हो सृजन कह रहा ओंकार है। परिचय :-  ओंकार नाथ सिंह निवासी : गोशंदेपुर (गाजीपुर) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं...
सुख के क्षण
कविता

सुख के क्षण

दीपानिता डे दिल्ली यूनिवर्सिटी (दिल्ली) ******************** जीवन में समस्या कितनी हैं सुख में दिन बीत रहे हो तो सब साथ है दुख में दिन बीत रहे हो तो अपना ना कोई सुख में दिन इतनी जल्दी बीते प्रतीत हुआ क्षण भर दुख के क्षण भी ऐसे गुजरे जैसे वर्ष समान सुख में इतने खो जाए कि कोई याद ना आए दुख में ईश्वर स्मरण पहले आए सुख में बिन बुलाए महमान घर आए दुख में सब साथ छोड़ जाए सुख में अहम भाव आ जाए दुख में अवसाद घेर जाए मनुष्य मौन हो जाए अपना भी उसे कोई ना भाए सुख के क्षण मानव जल्द भूल जाए परंतु दुख के क्षण सर्वत्र याद आये परिचय :- दीपानिता डे निवासी : दिल्ली यूनिवर्सिटी (दिल्ली)  घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, र...
पिता की छांव
कविता

पिता की छांव

अभिजीत आनंद बक्सर, (बिहार) ******************** ग़र कर सकूँ समर्पित कुछ बंद उस त्याग की प्रतिमूर्ति को, जो ग़र परिभाषित कर सकूँ उतरदायित्व की उस कृति को, मेरी लेखनी आज धन्य हो जाए पितृत्व रचना से अलंकृत होकर... हर कदम पर अपने संतान के रहनुमा होते हैं पिता, परिवार की बगिया के बागबान होते हैं पिता.. संपूर्ण जीवन की धरी पूंजी संतान पर न्यौछावर कर देते हैं पिता कर्ज का आवरण ओढ़े भी बिटिया को विदा कर देते हैं पिता... विपदा में सतत संघर्ष की आँधियों में हौसलों की दीवार हैं पिता, पूरे परिवार की अटूट विश्वास, उम्मीद, और आस हैं पिता.. जिंदगी की धूप में बरगद की गहरी छांव होते हैं पिता, बेटे के लिए राजा तो बेटी के सर का ताज होते हैं पिता.. खुद के अरमानों को परे रख हर फर्ज निभाते हैं पिता, संस्कार और अनुशासन की बीज संतान में पनपाते हैं पिता... मेरी शोहरत,...
नारी तुम बदल न पाओगी….
कविता

नारी तुम बदल न पाओगी….

डॉ. संगीता आवचार परभणी (महाराष्ट्र) ******************** नारी तुम बदल न पाओगी! सबकुछ सौंप जीवनसाथी को, तुम जोगीनी बन जाओगी, नारी तुम बदल न पाओगी! फूल सी नाजुक काया को, नारी तुम सम्भाल न पाओगी! पुरुष पर जान लुटाने मे ही, तुम अपना सुकून पाओगी! नारी तुम दुनिया के बदलाव को! ग़र अपनाना भी चाहोगी, तो पुरुष के खयाल मात्र से ही, तुम भ्रमित सी हो जाओगी! नारी तुम अपने सुख चैन को, पुरुष पे न्यौछावर कर जाओगी! सूद बुध अपनी खो बैठोगी, खुद को देख ही न पाओगी! पाकर अनमोल जीवन को! नारी तुम जी न पाओगी, दूसरों के लिए जीने मे ही, अपना अस्तित्व लुटाओगी! दुनिया के छल कपट को! नारी तुम समझ ही न पाओगी, सीधी राह चलते हुए भी, समझौतों पर उतर आओगी! इस पत्थरदिल दुनिया को, नारी तुम पहचान न पाओगी! मोम सी पिघल ही जाओगी, हसते ज़ख्म सहती जाओगी! पहचानकर लोगों के स्वार्थ को, ना...
बिछड़ रहे हैं हम
कविता

बिछड़ रहे हैं हम

आदर्श उपाध्याय अंबेडकर नगर उत्तर प्रदेश ******************** बिछड़ रहे हो तुम बिछड़ रहे हैं हम, फिर भी दिल से दिल मिला रहे हैं हम। ये जुदाई भी नस़ीब वालों को ही मुकम्मल होती है, तभी तो आँखों में समन्दर होठों पर मुस्कान लिए हैं हम। हमारी उल्फ़तों ने इक ऐसे मुकाम पर हमें खड़ा कर दिया, की सबकुछ याद करके भी भूल रहे हैं हम। मोहब्बत के इस शज़र पर कभी कोयल गाया करती थी, आज कौवे कि कर्कश ध्वनि सुन रहे हैं हम। तुमको फिर से मोहब्बत से ज्यादा मोहब्बत मिले, यही "वर" महादेव से माँग रहे हैं हम। नज़ाकत तुम्हारी हमेशा यूँ ही बनी रहे, इसीलिए तो तुमसे जुदा हो रहे हैं हम। कभी तुम्हारी आवाज से ही हमारी सुबह-शाम होती थी, आज उसी को याद करके जी रहें हैं हम। पिया घर जाओगी आँगन महकाओगी, यही हर रोज अब सोच रहे हैं हम। अब बाहों में तुम्हारी न हमारा हक होगा, बस ...
दर्द की दास्तां
कविता

दर्द की दास्तां

डॉ. तेजसिंह किराड़ 'तेज' नागपुर (महाराष्ट्र) ******************** दुनिया के गमों में बंटी ये जिंदगी अपनों से पटी ये बेरूखी बंदगी दर्द की दास्तां हैं हर घर की कहानी किसको बयां करें ये अपनी जुबानी हालात के मारे हैं हम बेबस हैं जिंदगी रब से गिला नहीं बस पाक रहे जिंदगी तन का बोझ भी अब संभलता नहीं मन की बातें दिल से कोई कहता नहीं जिंदगी के टूटें अरमानों को आंखों में सहेजकर रखा हैं। मुसीबतों के दर्द को चेहरें की मुस्कराहट में छिपाएं रखा हैं। मैं कोसो दूर से एक उम्मीद लिए इस शहर में आकर बसा हूं। कहना मुश्किल हैं यहां पर पता नहीं कब पहले खुलकर हंसा हूं। एक दर्द हैं जो दिखाई नहीं देता हैं रोज की जिंदगी में तन्हा हूं मैं। दोस्त की तलाश का इंतजार हैं मुझें कहीं फिर से यहां भटक ना जाऊ मैं। ये कमबख्त उम्र भी कुछ ऐसी हैं अब गिला करू तो किससे करू मैं। मुझें समझ सकें...