परिंदों की व्यथा
मनोरमा पंत
महू जिला इंदौर म.प्र.
********************
इंसानों ने छीन ली बस्ती हमारी
विरोध की नहीं हस्ती हमारी
चुन-चुन काटे हमारे आशियाने
आग के हवाले हमारे आशियाने
नहीं सूझता रास्ता कहाँ जाऐं
उड़ते-उड़ते अब कहाँ ठहर जाऐं
धीमें-धीमें सिमट रहे हैं रास्ते,
धीमे-धीमे घट रहे चाहने वाले
जलाशय हैं, पर पानी नहीं मिलता,
छते तो हैं बहुत सकोरा नहीं मिलता,
नमभूमियाँ तो है, नमी ही नहीं मिलती
घोंसलों के बदले अट्टालिकाऐं मिलती
थक कर बैठ गये, फैली है विरानी
हम बिन यह दुनियाँ है, बेमानी
हमसे ही सतरंगी है, पूरासंसार
हमारे मीठे रव बिन, सब निस्सार
परिचय :- श्रीमती मनोरमा पंत
सेवानिवृत : शिक्षिका, केन्द्रीय विद्यालय भोपाल
निवासी : महू जिला इंदौर
सदस्या : लेखिका संघ भोपाल जागरण, कर्मवीर, तथा अक्षरा में प्रकाशित लघुकथा, लेख तथा कविताऐ
उद्घोषणा : मैं यह प्रमा...
























