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सुंदर अहसास
कहानी

सुंदर अहसास

राकेश कुमार तगाला पानीपत (हरियाणा) ******************** विनीता रिक्शा में नए घर की तरफ जा रही थी। उसे बार-बार ऐसा लग रहा था किसी की निगाहें उसका पीछा कर रही है। वह भी चाहती थी कि एक बार पलट कर देख लें। पर पता नहीं क्यों उसका मन नहीं मान रहा था? वह रिक्शा वाले से बोली, भैया थोड़ा जल्दी करो। मौसम खराब हो रहा है। ऐसा लग रहा है कोई तूफान आने वाला है। नहीं-नहीं, यह बस तेज हवाएं हैं। आप यहां पर नई है ना। इसलिए यहाँ के मौसम से अनजान हैं। यहाँ, मौसम पल-पल बदलता है। मेरा मतलब यह नहीं था। मैडम पहाडों में तो इस तरह की तेज हवाएं चलती रहती हैं। कभी-कभी तेज हवाओं के साथ तेज बौछारें भी हो जाती हैं। तभी तो यहाँ पर दूर-दूर से लोग घूमने आते हैं। इस शानदार मौसम का आनंद लेते हैं। विनीता, को वह रिक्शावाला कम, गाइड ज्यादा लग रहा था। वह पूरे रास्ते उसे पहाड़ियों के बारे में ही बताता रहा था। उसका सफर भी आराम ...
रक्तदान कार्य महान
कविता

रक्तदान कार्य महान

ओमप्रकाश श्रीवास्तव 'ओम' तिलसहरी (कानपुर नगर) ******************** रक्त दान सब मिलकर अपनाओ, जग में खुशियाँ चहुंओर बरसाओ। हुई दुर्घटना मानव खून बह रहा, देखो प्राण संकट अब बढ़ रहा, रोगी के लिए फरिश्ता बन जाओ जग में खुशियाँ चहुंओर बरसाओ। रक्तदान सब मिल.... आज मानव ईर्ष्या अग्नि में तप रहा, मानव ही मानवता का शत्रु बन रहा मानवता संग प्रेम का दीप जलाओ, जग में खुशियाँ चहुंओर बरसाओ। रक्तदान सब मिल.... जीवन में कुछ कुछ दान सभी करते, अन्न, धन, विद्यादान तो सभी करते, एक विशिष्ट दान का संकल्प उठाओ, जग में खुशियाँ चहुंओर बरसाओ। रक्तदान सब मिल.... इस जगत में रक्तदान है कार्य महान, मानव के प्राण रक्षा का सुंदर विधान, विधान में पुण्य भागीदार बन जाओ, जग में खुशियाँ चहुंओर बरसाओ। रक्तदान सब मिल.... परिचय :- ओमप्रकाश श्रीवास्तव 'ओम' जन्मतिथि : ०६/०२/१९८१ शि...
हिन्दी कविता में आम आदमी
आलेख

हिन्दी कविता में आम आदमी

सलिल सरोज नई दिल्ली ******************** हिन्दी कविता ने बहुधर्मिता की विसात पर हमेशा ही अपनी ज़मीन इख्तियार की है। इस बात की पुष्टि हर युग के कवियों द्वारा की गई कृत्यों से प्रतीत होती रही है। हिंदी कविता ने रामधारी सिंह दिनकर की क्षमता का उपयोग कर के राष्ट्र आह्वान का मार्ग प्रशस्त किया और साथ ही साथ आम आदमियों की दिक्कतों और रोज़मर्रा की समस्याओं को भी बेहद गंभीरता से उजागर किया है। अगर कोई साहित्य उस वर्ग की बात नहीं कर पाता जो मूक और बधिर है तो फिर साहित्य को अपने नज़रिये को बदलने की महती आवश्यकता होती है। रामधारी सिंह दिनकर सरीखे कवियों ने अपनी लेखनी में जनमानस की विपरीत परिस्थितियों का सजीव चित्रण ही नहीं किया बल्कि धनाढ्य और रसूखदारों पर करारा प्रहार भी किया और यह प्रश्न अक्षुण्ण रखा कि गरीबी और लाचारी के लिए क्या गरीब स्वयं जिम्मेदार है या फिर वह वर्ग भी जिमीदार है ज...
खामोशी
कविता

खामोशी

कु. आरती सिरसाट बुरहानपुर (मध्यप्रदेश) ******************** हर जुबां कुछ कहती है, खामोशी से हर दर्द सहती है...! कुछ दर्द का नाम खामोशी है तो कुछ खामोशी दर्द के नाम है..!! रात के अंधेरों मे निकलते है, जो आँसू उनको सह लेती है खामोशी...! दिन के उजालों मे झूठी सी मुस्कान दे जाती है खामोशी..!! न जाने कितनी ही फाइलों मे दर्ज हुई है, खामोशी...! कुछ खुली तो कुछ अभी-भी छुपाई गई है खामोशी..!! खामोश है आज भी वह अखबार इस बात से...! कि फेल न जाए, कोई अफवाह सच के नाम से..!! खामोशी से आज भी सह लेता है, वो टूटा हुआ दिल हर गम...! कि कोई आँख न हो जाए उसकी वजह से नम..!! परिचय :- कु. आरती सुधाकर सिरसाट निवासी : ग्राम गुलई, बुरहानपुर (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानि...
रूठ न जाए
गीत

रूठ न जाए

संजय जैन मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** इस बात का डर है, वो कहीं रूठ न जायेंI नाजुक से है अरमान मेरे, कही टूट न जायें।। फूलों से भी नाजुक है, उनके होठों की नरमी। सूरज झुलस जाये, ऐसी सांसों की गरमी। इस हुस्न की मस्ती को, कोई लूट न जायें। इस बात का डर है, वो कहीँ रूठ न जायें।। चलते है तो नदियों की, अदा साथ लेके वो। घर मेरा बहा देते है, बस मुस्कारा के वो I लहरों में कही साथ, मेरा छूट न जायें I इस बात का डर है, वो कहीं रूठ न जायें I। छतपे गये थे सुबह, तो दीदार कर लिया I मिलने को कहा शामको, तो इनकार कर दिया I ये सिलसिला भी फिरसे, कहीं टूट न जायें। इस बात का डर है, वो कहीं रूठ न जायें I। क्या गारंटी है की फिरसे, कही वो रूठ न जाएं। मिलने का बोल कर कही भूल न जाये। हम बैठे रहे बाग़ में, उनका इंतजार करके। वो आये तो मिलने पर देखकर हमें चले गये।।...
उत्तर बंग के महाविद्यालय में वेबिनार् का आयोजन
साहित्यिक

उत्तर बंग के महाविद्यालय में वेबिनार् का आयोजन

रुपेश कुमार (स्वतंत्र पत्रकार) : - परिमल मित्र स्मृति महाविद्यालय, मालबजार, जलपाईगुड़ी, पश्चिम बंगाल के हिंदी विभाग द्वारा आयोजित १७ दिवसीय छात्र वेबिनार का दूसरे दिन भी कार्यक्रम पूर्णरूपेण सफल रहा। मुख्य अतिथि के रूप में महाविद्यालय की प्रभारी अध्यक्ष श्रीमती नंदिता मुखर्जी ने छात्रों का उत्साहवर्धन करते हुए उन्हें कोरोना से सुरक्षित रहने और सुरक्षा के नियमों का पालन करने का संदेश दिया। उन्होंने इस आयोजन को छात्रों के हित मे एक नई पहल माना। साथ ही विषय विशेषज्ञ के रूप में ननी भट्टाचार्य स्मारक महाविद्यालय की विभागध्यक्ष डॉ सरोज कुमारी शर्मा ने पत्रकारिता और अनुवाद तथा काव्य लक्षण के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण और सारगर्भित विचार रखें। पत्रकार रीता दास ने भी छात्र-छात्राओं का मार्ग दर्शन किया। विभाग के छात्रों द्वारा इन विषयों पर पत्र भी पढ़े गए। प्रश्नोंत्र सत्र के अंतर्गत सभी बढ़ चढ़ क...
क्या रोजगार पा सकेंगे हम
गीत

क्या रोजगार पा सकेंगे हम

अख्तर अली शाह "अनन्त" नीमच (मध्य प्रदेश) ******************** एक बात पूंछनी है रेहबरों बताओगे, सच-सच बताओगे, क्या रोजगार पा सकेंगे हम। यूँ रोजगार पा सकेंगे हम।। वादा किया था आप हमको देंगे रोजगार। आएंगी रोनकें घरों में आएंगी बहार।। उतरेगा बदन का लिबास जो है तार-तार। सरकारी नौकरियों से कर पाएंगे श्रृंगार।। सोचा न था निजीकरण पे आप जाओगे। सारी ही नौकरियाँ ठेकों पे उठाओगे।। कुछ को बढ़ाओगे, क्या रोजगार पा सकेंगे हम। यूँ रोजगार पा सकेंगे हम।। विश्वास किया आपको हम चुनके ले आए। परचम उठाए आपके गुणगान भी गाए।। कुर्सी पे बिठाया है ऐसे पैर जमाए। जिनको हिलाने कोई शूरवीर न पाए।। उम्मीद न थी हमसे यूँ नजरें चुराओगे। विश्वास एक जगा था बड़े काम आओगे।। खुशियां लुटाओगे, क्या रोजगार पा सकेगें हम। यूँ रोजगार पा सकेंगे हम।। जाकर के नजर फेर लोगे किसको पता था। आश्वासनो...
जीवन जीने के लिए लड़े जाने वाले अंतहीन युद्ध को समर्पित है पुस्तक “यही सफलता साधो”
पुस्तक समीक्षा

जीवन जीने के लिए लड़े जाने वाले अंतहीन युद्ध को समर्पित है पुस्तक “यही सफलता साधो”

आशीष तिवारी "निर्मल" रीवा मध्यप्रदेश ******************** पुस्तक का नाम - यही सफलता साधो रचनाकार - कवि संदीप द्विवेदी प्रकाशक - ब्ल्यूरोज़ संस्करण - प्रथम (मार्च २०२१) कीमत - १६० रूपये समीक्षक - आशीष तिवारी निर्मल अपने दौर को तो सभी साहित्यकार अपनी कलम के माध्यम से दर्ज करने का सफल प्रयास करते हैं, लेकिन ऐसे चंद ही रचनाकार होते हैं, जिन्हें उनका दौर इतिहास में उनके प्रभावी लेखन के कारण कुछ ख़ास तरह से दर्ज करता है। जी हाँ! मै आज एक ऐसे ही उर्जावान रचनाकार और उनकी रचनात्मकता की चर्चा करने जा रहा हूँ, जो अपने सुघड़ लेखन के कारण हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तान के बाहर सुने जाते हैं और पढ़े जाते हैं। कवि श्री संदीप द्विवेदी देश के उन युवा रचनाकारों की श्रेणी में आते हैं जो किसी भी पाठक या श्रोता के हृदय में सदैव सकारात्मक प्रभाव डालते हैं। कवि संदीप द्वारा विरचित काव्य कृति "यही सफ...
अदाकारा नहीं है वो
कविता

अदाकारा नहीं है वो

रुखसाना बानो अहरौरा, चुनार, (मिर्ज़ापुर) ******************** अदाकारा नहीं है वो फिर भी, उसे हर किरदार निभाने पड़ते हैं। माँ के रूप में है ममता का अम्बार, बेटी के रूप में है वो सम्मान। ज़रूरत से ज़िम्मेदारी तक, वन्दनवार सजाने पड़ते हैं। अदाकारा नहीं है वो फिर भी, उसे हर किरदार निभाने पड़ते हैं।। बहन के रूप में है वो अभिमान, पत्नी के रूप में है वो स्वाभिमान। विश्वास से लेकर वफादारी तक, हर रिश्ते पिरोने पड़ते हैं। अदाकारा नहीं है वो फिर भी, उसे हर किरदार निभाने पड़ते हैं।। संगी, साथी और मित्र क्या नाम दे उसे, हर क़दम पर जिसने संभाला है हमें। अँधेरे बनकर रौशनी की किरण, उजालों के दिए जलाने पड़ते हैं। अदाकारा नहीं है वो फिर भी, उसे हर क़िरदार निभाने पड़ते हैं।। परिचय :-  रुखसाना बानो विद्यालय : कम्पोजिट विद्यालय अहरौरा निवासी : अहरौरा, चुनार, (मिर्ज़ापुर)। घ...
अनंत प्यास जरूरी है।
कविता

अनंत प्यास जरूरी है।

श्रीमती विभा पांडेय पुणे, (महाराष्ट्र) ******************** हर दिन के बाद रात आती है सही है, पर रात हमेशा टिकती नहीं, जाती है। फिर प्रभात के साथ गुनगुनाता हुआ सूर्य अपनी लालिमा बिखेरता जीवन के लय में मगन खुशी के गीत गाता है। रे मन अंत से निराश न हों क्योंकि हर अंत के बाद नया आरंभ होता है। टूटते है स्वप्न, चुभती है काँस। गले में अटक-सी जाती है हारने की फाँस। पर हार से हारना नहीं झुकना नहीं, रुकना भी नहीं। रे मन हार से निराश न हो क्योंकि हर हार नई जीत का संदेश लाती है। नए जीवन के प्रस्फुटन के लिए विध्वंस जरूरी है। विरह के स्वाद को चखे बिना प्रीत होती कहाँ पूरी है? तो विध्वंस से डर कैसा? रे मन प्यास से व्याकुल न हो क्योंकि संपूर्ण तृप्ति के लिए अनंत प्यास जरूरी है। परिचय :- श्रीमती विभा पांडेय शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी एवं अंग्रेजी), एम.एड...
हमें समझना है
कविता

हमें समझना है

पवन सिंह पंवार नसरूल्लागंज (मध्य प्रदेश) ******************** अब तो हमें समझना है, प्राण वायु के लिये कुछ करना है, जो कटने जा रहा है बकस्वाह जंगल, उसको हम सब को रोकना है। पर यह सब कैसे करना है, प्रश्न तो यह मन में उठना है, जैसे चला था वो चिपको आंदोलन, बस वैसा ही तो करना है। किसी एक तो बहुगुणा बनना है, फिर सब को एकजुट करना है, और इस तरह सामूहिक प्रयास से, इसे खत्म होने से रोकना है। पर प्रयास यहाँ तक ही सीमित नहीं रखना है, हमें इससे आगे भी काम करना है, क्यों कुर्बान कर दिये जाते हैं लाखों जीव जंतुओं के आश्रय स्थल, इस पर भी विचार करना है। हमें विकास का माॅडल बदलना सिर्फ मानव जाति पर ही फोकस नहीं करना है हो सके सभी का संतुलित विकास ऐसी रणनीति पर काम करना है। यह धरती है सभी जीव जंतुओं की भी, अतः सभी का ध्यान रखना है। यह धरती है सभी जीव जंतुओं की भी, अत...
नीम की मौत
कहानी

नीम की मौत

नितिन राघव बुलन्दशहर (उत्तर प्रदेश) ******************** आपने बहुत से पेड़ों को घरों में, मोहल्लों में और सड़कों के किनारे खड़े अवश्य देखा होगा। प्रत्येक पेड़ का अपना कुछ न कुछ महत्व होता है। इस कहानी में मैने एक मोहल्ले में खड़े नीम के पेड़ के माध्यम से पेड़ों के महत्व को बताने का प्रयास किया है। गांव सलगवां के राघव मोहल्ले में एक विशाल नीम का पेड़ था। इसके अलावा पूरे गांव में कोई पेड़ न था। उसकी बनावट एक छाते कि तरह थी। लोग गर्मियों में उसकी छाया का आनंद लेते थे। बरसात में भी लोग उसके नीचे खड़े हो जाते थे और वह लोगों को विशाल गोवर्धन पर्वत की तरह ही बरसात से बचाता। लोग उसके नीचे रोज पत्ते भी खेला करते थे। मोहल्ले के बच्चे भी अपने दैमिक खेल उसके नीचे खेलते थे। कुछ बुजुर्ग उसकी टहनियों से दातुन करते थे। इस प्रकार बच्चे, बड़े और बुजुर्ग लोगों को वह कुछ न कुछ देता था। ये लोग पेड़ को पसंद ...
दिल की गहराइयों में
कविता

दिल की गहराइयों में

कीर्ति मेहता "कोमल" इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** दिल की गहराइयों में दर्द तेरा शामिल है मेरे अश्क़ों का समंदर ही मेरा साहिल है ऐसे पीछे से चलाया गया खंजर मुझ पर हर तरफ़ जैसे लबे-बाम मेरा क़ातिल है मन की बातों को मसोसे हुए मैं बैठ गई आरजू़ कैसे बयाँ हो जो खडा़ जाहिल है मर तो जाऊंगी पर हिम्मत नहीं हारूँगी मैं मेरी रग-रग में मेरी माँ की दुआ शामिल है कब से बैचैन हूँ तन्हाइयों में रोती हूँ दोस्त क्या मेरी जिस्त में पैवस्ता यही हासिल है सुर्ख़ कदमों में लिये फिरती हूँ गाहे-गाहे आबले कौन भला समझे कहाँ आकिल है खू़ब मालूम है तूफ़ां है ये साहिल तो नहीं तू ही कहदे इसे 'कोमल' तो यही साहिल है गाहे-गाहे (जगह/जगह) आबले (फफोले/छाले) परिचय :- कीर्ति मेहता "कोमल" निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बीए संस्कृत, एम ए हिंदी साहित्य लेखन विधा : गद्य और पद्य की सभी...
चौखट पर ससुराल की
कविता

चौखट पर ससुराल की

कीर्ति सिंह गौड़ इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** ससुराल की चौखट पर कुमकुम के पैरों से उसका पहला प्रवेश थोड़ी सहमी, थोड़ी शरमाई सी सेज पर अपने मन के भावों को समेटती वो। नए जीवन की उमंग लिए प्रीतम के इन्तज़ार में सिमटी सी बैठी हुई सोच रही है। नये रिश्तों का ताना-बाना कैसे बुनेगी वो? कोशिश रहेगी कि सब को ख़ुश रखेगी वो। उम्मीद कि जो ब्याह कर लाया है उसे समझेगा वो? ग़लतियों की गुंजाइश के डर के साथ बस यही तानाबाना बुन रही है वो। कुमकुम के पैरों से ससुराल की चौखट पर उसका पहला प्रवेश परिचय :- कीर्ति सिंह गौड़ निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित...
योग
कविता

योग

डॉ. गुलाबचंद पटेल अहमदाबाद (गुजरात) ******************** योग कृष्ण के गले में हे सुन्दर माला, विश्व के लोगों ने भी बनाई है योग माला मुलाकात होती है एक संजोग २१ जून को पूरा देश करेगा योग अंग्रेजी में ट्यूज़ड़े, वेडनसडे एंड थरसड़े फ्री स्टाईल से मनाते हैं लोग यहा बर्थ डे भारत देश हे प्यारा और लवली बाबा रामदेव कराते हैं रोज नावली यदि रोग के बारे में तुमने जाना योग से बच सकते हैं दवाई के पेसा यदि रोजाना करेंगे तुम योग नहीं रहेगा आप के शरीर में रोग मुस्लिम समुदाय को सूर्य नमस्कार में बाधा कोई बात नहीं चाँद के सामने करो तुम आधा मी. नरेंद्र मोदी ने लगाया सफाई का नारा रोग भगाने के लिए स्वच्छ रहेगा देश सारा लोग कहते हैं, जगत हे मिथ्या किन्तु योग से बन सकता है विश्व प्यारा योग करने के लिए मे विनती करू मत पीना तुम कभी बीड़ी सिगरेट दारू पोरबंदर की प्रख्यात हे ख़ाजली योग...
रूहानी बातें
संस्मरण

रूहानी बातें

अनुराधा बक्शी "अनु" दुर्ग, (छत्तीसगढ़) ******************** "मैंने घोसले तोड़ दिए हैं अपनी मन्नत के। तुम्हें जाते देख रोई है आत्मा बहुत। आंखों में दर्द की रेखाएं वक्त बेवक्त उभर आती हैं, लालिमा के साथ। दर्द की ये इंतेहा ही मेरे प्यार की इम्तिहा है। हम तुम पर इस तरह फना हुए जैसे तुम हवा में धुलकर सांसों में समा गए जाते हो। ये हमारी बातें हैं। ये हमारा प्रेम है। मैं घंटों अपने आप में तुमसे बातें करती हूं। तुमको सोचती हूं। तुमको जीती हूं। ये सूनापन ये बेचैनी हर बार मुझे तुम्हारी ही तरफ मोड़ देती है। तुम मुझ में खत्म ही नहीं होते हो। सभी की नजरों से परे मैं एक दूसरे में खोए हम खिलखिलाते हैं, रोते हैं, एक दूसरे के साथ होते हैं" आज फिर तेज़ बबंडर आया और अपने साथ सब कुछ उजाड़ कर मुझे दूर किसी बियावन में छोड़ गया। जहां दूर दूर तक मुझमें तुम्हारा इंतजार करती मैं और तुम मुझमें मुझसे अंजान मेरे अ...
पिता
कविता

पिता

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** पिता का दाहसंस्कार कर घर के सामने खड़े होकर अपने पिता को पुकारने की प्रथा जो दाहसंस्कार में सम्मिलित होकर बोल रहे थे कि राम नाम सत्य है उन्हें हाथ जोड़कर विदा करने की विनती भर जाती आँखों में पानी वो पानी बढ जाता गला रुँध जाता, तब जब तस्वीर पर चढ़ी हो माला और सामने जल रहा हो दीपक बचपन की स्मृतियाँ संग पिता आ जाती है मस्तिष्क पटल पर जो काम पिता कर लेते थे वो लोगो से पूछकर करना पड़ता होंसला अफजाई और परीक्षा में पास होने पर पीठ थपथपाई भी गुम सी गई अब में पास हुआ किंतु शाबासी की पीठ सूनी सी है और त्यौहार भी मुँह मोड़ चुके और रौशनी रास्ता भूल गई पकवान और नए कपडे कैद हो गए पेटियों में इंतजार है श्राद पक्ष का पिता आएंगे पूर्वजो के संग धरती पर अपने लोगो से मिलने जब श्राद में पूजन तर्पण और उन्हें याद कर...
ओ माँ मुझे बतलादे
कविता

ओ माँ मुझे बतलादे

योगेश पंथी भोपाल (भोजपाल) मध्यप्रदेश ******************** तुझको कैसे बतलाउँ तुझे कितना में चाहूँ ओ माँ मुझे बतलादे तुझे कैसे मनाऊँ तुझे कैसे मनाऊँ अपने मन मंदिर में तेरी मूरत बसाऊँ ओ माँ मुझे बतलादे तुझे कैसे मनाऊँ तुझे कैसे मनाऊँ तूने जनम् दिया है मुझको तूने मुझको पाला हे हर मुश्किल में हर विपदा में तूने मुझे संभाला हे तू मुझसे रूठी हे सबको कैसे बताऊँँ ओ माँ मुझे बतलादे तुझे कैसे मनाऊँ नो महीने मुझे रखा पेट में खुद में मझको ढाला हे दुःख सह सह कर आँसू पीकर तूने मुझको पाला हे इतना प्यार दिया हे उसको कैसे भुलाऊँ ओ माँ मुझे बतलादे तुझे कैसे मनाऊँ जब भी घिरा अंधेरों में माँ तू ही तो उजियारा थी तेरी करुणा की छाती में प्रेम सुधा की धारा थी तेरी हर इक साँस का ऋण मैं कैसे चुकाऊँ ओ माँ मुझे बतलादे तुझे कैसे मनाऊँ मेरे गम में मेरे दुःख में ...
कोरोना काल से निर्भयता की ओर…
कविता

कोरोना काल से निर्भयता की ओर…

जितेन्द्र पटैल (कुशवाहा) गाडरवारा नरसिंहपुर (मध्य प्रदेश) ******************** फिर मिलेगी दरख़्तों की छांव, फिर वही माहौल होगा गाँव-गाँव, देखना फिर से चौपालें लगेंगीं, और चबूतरे श्रृंगारित होगें गली-गाँव। हर एक, हर एक से मिल पाएगा, यह निबिड़ अंधेरा, समाप्त हो जाएगा, और फिर से मिलेंगे मेरे आपके हँसी के दाँव, खुशी आएगी हर जगह, हर गाँव। यह माहौल भी अस्थाई है, चिरंतन तो खुशी और निर्भयता होगी, हमें मिलती रहेगीं बड़े बुजुर्गों की आशीष छाँव, खुशियां फैलेगीं, गाँव-गाँव। अंधकार कभी नहीं रोक पाया है सबेरे को, शोर को शांति कभी जीतने नहीं देगी, फिर हम मिलेंगे, फिर वही माहौल होगा, आध्यात्मिक वातावरण होगा गांव-गांव। जगह-जगह मिलेगे प्राकृतिक पडाव, खत्म होगें इस आशंका के भाव, अब देर नही है यारों देखिएगा, जब मधुवन होगा हर गली, हर गाँव परिचय :- जितेन्द्र पटैल (कुशवाहा) निवासी...
मानव मन
कविता

मानव मन

राजीव रंजन पांडेय राजधनवार गिरिडीह (झारखंड) ******************** सच में तारुण्य एक अंधी होती है जिसकी अपनी एक गति होती है संकल्प विकल्प क्रिया मन से ही जीवन जीने हेतु सुबुद्धि होती है हर तरफ गहरा अंधेरा दिखता है हर हृदय सूखे सरोवर सा लगता है पूरब में लालिमा अब आने लगी है अब मानव शक्ति प्रगट होने लगी है बहुत कुछ मिला हमें यहां औघड़ दानी उस ईश से जिसने प्रेम किया यहां के हर प्राणी प्राणी से परिचय :-  झारखण्ड प्रदेश के गिरिडीह मंडलान्तर्गत राजधनवार क्षेत्र में रहने वाले राजीव रंजन पाण्डेय पिता संजय कुमार पाण्डेय की शैक्षिक योग्यता संस्कृत से स्नातकोत्तर और बी.एड है जो कि बिनोवा भावे विश्वविद्यालय हजारीबाग से पूर्ण हुई है। आप लगभग दो साल तक राज्य सरकार द्वारा अनुदानित एक विद्यालय में संस्कृत शिक्षक के रूप में सेवायें दे चुके हैं, वर्तमान समय में आप आज अपने पिता और...
खुद को जानो
कविता

खुद को जानो

जयप्रकाश शर्मा जोधपुर (राजस्थान) ******************** खुद को जानो और खुद की अहमियत पहचानों क्योंकि ये स्वर्णिम वक्त निकल जाने के बाद कोई भी नहीं लौटा पायेगा आपके माता पिता भी नहीं छोटे थे हर बात भूल जाया करते थे दुनियाँ कहती थी याद करना सीखो बडे़ हुए तो हर बात याद रहती है दुनियाँ कहती है भूलना सीखो सभी समय-समय की बातें है बैठे-बैठे कैसा दिल घबरा जाता है जाने वालों का जाना याद आ जाता है ज़िंदगी से बड़ी सजा ही नहीं और क्या जुर्म है पता ही नहीं खुद को जानो और खुद की अहमियत पहचानों परिचय :- जयप्रकाश शर्मा निवासी : जोधपुर (राजस्थान) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय...
जहाँ के तहाँ रह गये
कविता

जहाँ के तहाँ रह गये

डॉ. कामता नाथ सिंह बेवल, रायबरेली ******************** वक़्त पर बेजुबां रह गये वे जहाँ के तहाँ रह गये नानुकुर कुछ भी आया नहीं बस निवाले जहां रह गये जुल्म सहते रहे उम्र भर सोचते खामखां रह गये फर्श से अर्श तक ले गये ऐसे काँधे कहाँ रह गये आँख के खून बादल हुये और बन के धुआंँ रह गए पीर बस कसमसाती रही तीर तो बदगुमां रह गये परिचय :- डॉ. कामता नाथ सिंह पिता : स्व. दुर्गा बख़्श सिंह निवासी : बेवल, रायबरेली घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com ...
कर्म-मार्ग की स्थिरता
संस्मरण

कर्म-मार्ग की स्थिरता

सुरेश चन्द्र जोशी विनोद नगर दिल्ली ******************** सामान्य जीवन यापन करना मूल सिद्धांतों, को बनाए रखते हुए अपने लक्ष्य पर स्थिर रहना, कर्म मार्ग में कभी प्रमाद न करना, पारंपरिक शिक्षा को महत्व देना, वेद, आयुर्वेद व ज्योतिष, कर्मकांड, पर अपनी प्रबल ज्ञान शक्ति से आस्था बनाए रखते हुए, पुत्रों को सुशिक्षित करना, इन सभी जीवन जीवन चर्या को जीने वाले व्यक्ति थे पंडित जीवानंद जोशी वैद्य। उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र के जनपद चंपावत के दुर्गम क्षेत्र में "दुन्या" गांव में अठारह सितंबर उन्नीस सौ इकत्तीस प्रातः नौ बजकर सत्तावन मिनट पर जन्मे पंडित श्री जीवानंद जोशी "वैद्य" जी का जीवन संघर्ष की एक ज्ञानवर्धक पुस्तक के रूप में है। चार भाई-बहनों में सबसे वरिष्ठ पंडित वैद्य जी की आयु जब बारह वर्ष की थी, तो उनकी माता श्री की मृत्यु हो गई थी जब मां की मृत्यु हुई थी उस समय सबसे छोटा बालक मात्र ढाई वर...
अमर सपूत महाराणा प्रताप
कविता, संस्मरण

अमर सपूत महाराणा प्रताप

डॉ. पंकजवासिनी पटना (बिहार) ******************** राजपूती शान हैं राणा! देश का अभिमान हैं राणा!! मुगलों के समक्ष नग सम अटल! चित्तौड़-आन रक्षक थे राणा!! राणा भरे जब-जब हुंकार! समर में गूंँज उठे टंकार!! भयभीत मुगल कांँप उठे थे! राणा के शौर्य कि जयकार!! हल्दीघाटी विकट संग्राम! टकराया असि सँ असि का जाम!! अरिदल शीघ्र हुए भू-लुंठित! पर चेतक पहुंँचा परमधाम!! गिरि-सा साहस था राणा का! चेतक भी अद्भुत राणा का!! इतिहास- अमर जिसका उत्सर्ग! स्वामी -भक्त अश्व राणा का!! जंगलों की खाक थी छानी! घास की रोटी पड़ी खानी!! पर गुलामी नहीं स्वीकार! यशोगाथा जग की जुबानी!! मरुभूमि हो गई रे निहाल! पाकर राणा-सा वीर लाल!! स्वाभिमानी औ पराक्रमी! गौरव तिलक भारत के भाल!! आज स्वार्थ का ऐसा चलन! राष्ट्र हित नित हो रहा दहन!! दिव्य चरित स्मरण कर भारत! राणा का देश-हित-स्व-हवन!! परिचय...
बचपन के वो दिन
कविता

बचपन के वो दिन

संध्या नेमा बालाघाट (मध्य प्रदेश) ******************** वो दिन भी बचपन के थे कब चले गए पता ही नहीं चला बचपन भी कैसा था हर तरफ खुशी ही खुशी घर में कितना भी गम हो चेहरे पर मुस्कान ही होती थी बचपन में किसी चीज के लिए जिद्द करना और रोना। उस पर मां का मारना उसके बाद भी फिर मां की गोद में चले जाना दादा-दादी के पास जाना और मां पापा की बात सुनाना दादी को पूरी बात सुनाना फिर मां के पास आकर मार खाना दोस्तों के साथ दिनभर खेलना फिर घर आना फिर मां से सुनना जा घर क्यों आया उन्हीं के साथ रहना किसी दुकान में कपड़े और खिलौने के लिए मचलना और जिद करके रोना फिर वही मां का डराना घर चल फिर बताती हूं तेरे पापा को तेरी यह हरकतें वह दिन भी बचपन के थे कहां चले गए पता ही नहीं चला परिचय : संध्या नेमा निवासी : बालाघाट (मध्य प्रदेश) घोषणा : मैं यह शपथ पूर्वक घोषणा करती ह...