होली का हुड़दंग
प्रियंका पाराशर
भीलवाडा (राजस्थान)
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फागुन का मास
लाया गीतो और रंगों भरा उल्लास
होलिका के संग
दहन हो आलोचना, ईर्ष्या, अंतर्द्वंद
आज न माने दिल कोई प्रतिबंध
मन मे हिलोरे लेती तरंग
पिया लगाये गौरी को प्रीत का पक्का रंग
अनुबंध मे बहके, जैसे चढ़ी प्रेम की भांग
परंपरागत व्यंजनों की सजी रंगोली
फागुन के गीतों ने, कानों मे है मिश्री घोली
जात्त-पात, ऊँच-नीच के भिन्न-भिन्न गुब्बारे
एकता का रंग बरसाते हुए जैसे भाईचारे के चले फव्वारे
बोल रहा हर एक इंसान, बस मस्ती की बोली
हास्य रंग से भरी पिचकारी, छोड़े हँसी ठिठोली
इन्द्रधनुष-सा मनमोहक समाँ, उड़ा जो महकता अबीर
तन भीगा, अंग रंगीन, जो बरसा रंगोंं से सरोबार नीर
गूँज रहे ढोल, मँजीरे और संग में बज रहा मृदंग
हर दिल बचपने में रंगा, मचा रहा होली का हुडदंग
परिचय :- प्रियंका पाराशर
शिक्षा : एम.एस.सी (सूचना प्रौद्योगिकी)
पिता : राजेन्...























