चांदनी
अर्चना लवानिया
इंदौर (मध्य प्रदेश)
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आसमान में
बादलों का डेरा
और चांद का सफर
गोरे काले छितरे से
बादलों में
चांद कभी छुपता
कभी निकलता
बच बच के
भागा जा रहा है
ना जाने कहां?
मध्यम सी रात
नीरवता छाई है
चांदनी फिसल रही है
छतों से
मकानों से आकर
पेड़ों पर अटक गई
आहिस्ता-आहिस्ता
पत्तियों से
टपकने लगी चांदनी ...
अब धीरे से
गली में बिखरने लगी
असीम शांति की अनुभूति ...
मैं आंखों से बटोरने लगी
अस्तित्व में समोने लगी
चांदनी की शुभ्रता
चांद फिर बादलों से उलझा
अठखेलियां करने लगा
चांदनी सिमटी फिर
बरसने लगी
पेड़ों के साए बढ़ने लगे
अजब खुमारी छाने लगी
लगा समय थम जाए बस
ये चांद चलता रहे
मैं चांदनी पीती रहूं
इस निशब्दता को जीती रहूं
ये हठी चांद चलता ही जा रहा है
अब खिड़की पर ठिठक गया
श्वेत धवल चंचल चंचल
चांदनी कमरे में बरस पड़ी
उनिदी आंखों से मैं फि...























