संसार का बदलता स्वरूप
काकोली बिश्वास
सिमुलतला (बिहार)
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संसार का बदलता स्वरूप
हो रहा कुत्सित, बड़ा कुरूप
मर्यादा रहती ताखों पर, और
बड़े-बुजुर्ग हैं, खामोश और चुप!
युवाओं का मन डोल रहा
संस्कारों की कमी बोल रहा
बोले इनका असंयमित मन
धैर्य का हुआ अब वक्त खतम!
बनना था इन्हें हमारा कल
ये हैं अटूट-अडिग-अचल
ये कहते चाहे जो हो जाए
न बनेंगे हम भारत का बल
न बनेंगे हम भारत का कल!
हम अपनी धुन पर चलते चले
हमें दुनिया की परवाह कहाँ,
हमारा अपना जहाँ वहां....
सुख-समृद्धि-कुकृत्य जहाँ!
नशा जुर्म हमसे हैं फलते
अपने पास है वक्त कहां!!
ईश्वर के हम अद्भुत सृष्टि
मानव का ऊर्जामय रूप
पर इस ऊर्जा की बर्बादी पर
देश की जनता क्यूँ है चुप???
क्यों नहीं ये आवाज उठाती
इन्हें सही राह पर लाती...
'बिगड़ा युवा, बिगड़ेगा देश'
क्यों आखिर ये समझ न आती?
शेष है अब भी वक्त है थोड़ा
लोहा है गर्म मारो हथौड़ा...
न जाने किस करवट बदले
द...
























