श्याम सांवरे
डॉ. चंद्रा सायता
इंदौर (मध्य प्रदेश)
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श्याम सांवरे कभी आना गांव रे।
माखन दधि रखेंगी तेरे नाम रे।
माखन तुम खाना गौवें चराना।
बंसी बजाना पीपल छांव रे।
मोर मुकुट सिर कानों में कुंडल
छब प्यारी-प्यारी दर्शा जाव रे।
जिस श्रतु भी आना रास रचाना।
अपने ही रंग में रंग जाव रे।
काहे की गोपी काहे का ग्वाला।
जित देखे़ उत रहे श्याम श्याम रे
उद्धव ने चाहा ज्ञान सिखाना।
मूरख को ज्ञान से क्या काम रे।
अत्याचार से त्रस्त है जन जन
असुरों पर आके करना घात रे।
परिचय :- डॉ. चंद्रा सायता
शिक्षा : एम.ए.(समाजशात्र, हिंदी सा. तथा अंग्रेजी सा.), एल-एल. बी. तथा पीएच. डी. (अनुवाद)।
निवासी : इंदौर मध्य प्रदेश
लेखन : १९७८ से लघुकथा सतत लेखन
प्रकाशित पुस्तकें : १- गिरहें २- गिरहें का सिंधी अनुवाद ३- माटी कहे कुम्हार से
सम्मान : गिरहें पर म.प्र. लेखिका संघ भोपाल से गिरहें के अनुवाद पर तथा गि...

























