सूने मकान
सूने मकान
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रचयिता : श्रीमती पिंकी तिवारी
बड़े-बड़े घर के, रोशनदान हो गए हैं,
घर अब घर कहाँ ? "सूने मकान' हो गए हैं ।
गलीचे हैं, खिलोने हैं, करीने से सजे हुए,
घर में रहने वाले भी अब मेहमान हो गए हैं ।
घर अब घर कहाँ ? सूने मकान हो गए हैं।
न सलवटें हैं बिस्तर पर, न बिछी कोई चटाई है,
न रामायण-गीता पढ़ता कोई, न लगी कोई चारपाई है,
बाहर से बुलवाये माली ही, अब बगिया के बाग़बान हो गए हैं,
घर अब घर कहाँ ? सूने मकान हो गए हैं ।
न आती है कोई चिट्ठी अब, न बचा है दौर "बुलावों" का,
बहन-बेटियां हो गईं दूर, दर्शन भी दुर्लभ उनके पावों का,
हंसी-ठिठोली, गपशप करना, अब केवल अरमान हो गए हैं,
घर अब घर कहाँ ? सूने मकान हो गए हैं ।
बड़ी-बड़ी हैं टेबलें, आसन पर कोई नहीं बैठता,
खाने से पहले अब, भगवान् को कोई नहीं पूछता,
किसी को नमक हैं ...



















