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कंचन मृग छलता है अब भी
गीत

कंचन मृग छलता है अब भी

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** कंचन मृग छलता है अब भी, जीवन है संग्राम। उथल-पुथल आती जीवन में, डसती काली रात। जाल फेंकते नित्य शिकारी, देते अपनी घात।। चहक रहे बेताल असुर सब, संकट आठों याम। बजता डंका स्वार्थ निरंतर, महँगा है हर माल। असली बन नकली है बिकता, होता निष्ठुर काल।। पीर हृदय की बढ़ती जाती, तन होता नीलाम। आदमीयत की लाश ढो रहे, अपने काँधे लाद। झूठ बिके बाजारों में अब, छल दम्भी आबाद।। खाल ओढ़ते बेशर्मी की, विद्रोही बदनाम। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सुमित्रा पाठक पिता : स्व. हरि मोहन पाठक पुत्र : सौरभ भट्ट पुत्र वधू : डॉ. प्रीति भट्ट पौत्री : निहिरा, नैनिका सम्प्रति : सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश (मध्य प्रदेश), लोकायुक्त संभागीय सत...
मेंढक कब बोलेंगे
कविता

मेंढक कब बोलेंगे

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** असीम संभावना का धनी आषाढ गर्मी से बेहाल, सूखे होंठ उदास बैठा है खेत की मुंडेर पर। मुंह मोड़े तीतर पंखी बादली, अलनीनो के प्रेम से बदहवास फिरती दूर गगन के छोर पर। किसान तीर्थ कर आया अलसुबह, खेत सी धरा पावन कही नहीं। मेहनतकश पसीने से, इस रज का कण कण सिंचित है। दंडवत कर निहार थे कुएं की गहराई को, गहरी वेदना से। पानी उतर गया था जिसका, पाताल में अश्विन की बादली सा। आते हुए गांव के पलसे में, नज़र ठिठकी तालाब पर चौतरफ किनारे की हरी भरी दूब सूख गई थी, महाजन की आत्मा सी। जो ठिठहरी सा चीक-चीक करता है दिनभर। जौंक सा तालाब के बाहर, निर्मम चूस रहा है सदियों से। पोखर में नहीं बचा था पानी जिसमें तैर सके कछुए और मछलियाँ, नहा सके छलांग लगाकर नंगदडंग बच्चे। औरतें पिला सके गुनगुनाती हुई गाय, भैंस, बकरियों को...
आजादी
कविता

आजादी

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* ख़ौफ़ से आज़ादी ही हमारी सच्ची आज़ादी है जिस पर मैं तुम्हारे लिए दावा ठोंकता हूँ मेरी मातृभूमि! पीढ़ियों के बोझ से आज़ादी अपना सिर झुका कर चलते रहना अपनी कमर की हड्डियाँ तोड़ लेना और भविष्य की पुकार पर मूंद लेना अपनी आँखों को नींद की बेड़ियों से चाहिए हमें आज़ादी. जिससे तुम रात के सन्नाटे में ख़ुद को जकड़ लेते हो और उस सितारे पर ज़ाहिर करते हो अपना अविश्वास जो सत्य की साहसिक राहों तक हमें ले जाना चाहता है आज़ादी अपनी क़िस्मत की अराजकता से. जिसकी पालें अंधी और अनिश्चित हवाओं के सामने कमजोर पड़ती जाती हैं और पतवार हमेशा चला जाता है मौत के माफ़िक कठोर और ठंडे हाथों में कठपुतलियों की इस दुनिया में रहने के अपमान से आज़ादी. जहाँ हरकतें बद-दिमाग़ तंत्रिकाओं के ज़रिए शुरू होती हैं नासमझ आ...
पतंगबाजी
कविता

पतंगबाजी

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** हाथ में चरखी, चरखी में लिपटा धागा, चौकोर कागज की रंगीन पतंग हवा की मस्ती की लहरों में उड़ाता उड़ाने की ख़ुशी में सबसे हर्ष आनंद बढ़ाता सेहत बढ़ती, मिलती ताजी धूप प्रफ़ुल्लित मनमस्त हो चला जाता खुले वातावरण में चरखी औऱ डोर घुमाता कागज की सुंदर रंगीन पतंग आकाश में देख, ह्रदय खूब हर्षाता फेफड़ों में लाभकारी पतंग से खुशियाँ भारी पाता अच्छा ब्रीडिंग व्यायाम करता भारी ऑक्सीजन पर्याप्त मिलता ताकत भारी पतंगबाजी में करता प्रकृति से शरीर की प्रक्रिया नजरें प्रकृति से लड़ती लड़ता मन खुशियां मिलती न्यारी आसमान में उड़ाकर रंगीन पतंगों को रोगमुक्त का उपाय पतंग उड़ाकर मन को बढे चाव शरीर की पीड़ा जटिल रोग दूर होती पतंगबाजी से अनेक बीमारी एकाग्रता बनाए रख उड़ाए पतंग उड़ाए पतंग भगाओ परेशानी पतंग उड़ाने...
बाबा साहब का कुर्ता
लघुकथा

बाबा साहब का कुर्ता

अमिता मराठे इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** बाबा ने फूल का गट्ठर रखते हुए कहा, "बाईजी, जरा एक गिलास पानी दे दो। पानी लेकर, रेखा भी पुराने कपड़े गिनाने लगी।" बाबा साहब का कुर्ता नजर नहीं आ रहा है। बाईजी, "बहू से पूछकर बताती हूं।" देखिये, उसकी हेराफेरी इतनी बड़ी कीमती है, जो होनी नहीं चाहिए। साहब का पसंदीदा पहरावा है। हां बाईजी, "ध्यान रखने को कहा हूं। मेरा तो बस इतना ही काम है आस-पास के लोगों के कपड़े पहनना। भला अब मेरी उम्र भी क्या हो गई है, एक पैर कब्र में ले जाया जा रहा हूं, कभी भी बुलावा आ जाए।" बाबा ऐसे तैयार रहो रहने वालों की उम्र और बड़ी होती है बाबा बाबा ने रेखा को ऊपर से नीचे तक देखकर बोला, "जिंदगी भर ठाट से रह रही है, बाईजी, बड़े से बड़े लोगों के काम में। कभी-कभी झटकाकर नहीं चलता। जमाना पलट गया है, बेटों का राज आया, फ़टे हाल से भी फ़टा सामान बना है। फटी धोती दिखाते...
हड्डियों की चीख़…
व्यंग्य

हड्डियों की चीख़…

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** “कृपया कमजोर दिल वाले इस रचना को नहीं पढ़ें“ अपने प्रतिष्ठान में, अपनी कुर्सी में गहराई से धँसा, कुछ मरीज़ों की हड्डियों और पसलियों को एक साथ मिला रहा था, तभी पास के प्लास्टर कक्ष से, जहाँ एक अधेड़ उम्र की महिला थी, उसके चिल्लाने की आवाज़ आई। साथ ही, प्लास्टर काटने के लिए इस्तेमाल की जा रही कटर मशीन की गड़गड़ाहट सुनाई दी, मानो कोई मशीनगन चल रही हो। यह प्लास्टर काटने का खौफनाक मंज़र किसी रामसे ब्रदर्स की हॉरर फ़िल्म से भी ज़्यादा डरावना। यूँ तो प्लास्टर काटने का समय मैं ओ.पी.डी. के बाद का रखता हूँ, इसका एक विशेष प्रयोजन है... मुझे आवाज़ के शोरगुल में बच्चों को पेरेंट्स की गोद में दुबकते सिसकते देखना अच्छा नहीं लगता। कई मरीज़, जिनका प्लास्टर लगना होता है, अपना इरादा बदल देते हैं। बोलते हैं- ...
दहेज
कविता

दहेज

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** जब तुम मेरे घर आना, अपने साथ थोड़ा दहेज जरूर ले आना !! कुछ अटैची, कुछ बक्से जिनमे भरे हो तुम्हारे बचपन के खिलौने, तुम्हारे बचपन के कपड़े, छुटपन की अठखेलियाँ और सहजता साथ ले आना !! तुम्हारी पवित्र मुस्कराहट को शृंगार की डिब्बे में भर लाना, अपने चेहरे की आभा और स्वयं की दृढ़ता भी साथ ले आना !! कुछ बक्सों मे अपने संस्कार अपनी संस्कृति साथ भर लेना! थोड़ा प्रेम और करुणा का आभूषण भी जरूर ले आना !! कुछ अटैची में अम्माँ-बाबुजी का आशीर्वाद और परिवार की खूबसूरत बातेँ उनकी यादें साथ में सहेज लाना !! अपना दुःख और अपनी तकलीफें, साथ ले कर आना, तुम्हारा हम कदम बन तुम्हारी पीड़ा आत्मसात कर लूंगा ऐसा भरपूर विश्वास मन मे ले कर आना !! सखी-सहेलियों की यादें, कुछ स्मृतियों के पन्ने भी रखना मत...
एक रिटायरी की कहानी- “पिया घर आया”
व्यंग्य

एक रिटायरी की कहानी- “पिया घर आया”

सुधा गोयल बुलंद शहर (उत्तर प्रदेश) ********************  हां जी यह सही है कि पिया यानि मेरे पतिदेव पैंतालीस साल आफिस में एक कुर्सी पर बैठ कर थक चुके और बिना कुर्सी के घर आए हैं बलैयां लूं या पूजा का थाल लेकर आरती उतारुं,गल हार पहनाऊं और कहूं -"पधारो सा"।उम्र के इस पड़ाव को चूम लूं। अब हम दोनों गलबहियां डालकर रहेंगे। तुम रिटायर हो ही गये हो में भी बहू पर घर परिवार छोड़ कर रिटायर हो जाती हूं। अभी इतना सोच ही पाई थी कि बहू रानी की भृकुटी देखकर चौंक पड़ी- "सासू मां, अब आप रिटायर होने की मत सोचना। दो-दो रिटायरियों को कैसे झेल पाऊंगी?" मैंने घूम कर देखा-सुना बहू के चेहरे पर चिंता की लकीरें थीं। पर क्यों- ? यह मैं समझ नहीं पा रही थी। अगले दिन से घर में रिटायरमेंट का कार्यक्रम शुरू होने वाला था। अथ कथा रिटायरमेंट सुनाकर अपना जी कुछ हल्का कर लेती हूं। दस बज गए हैं पर पतिदेव के पांव बिस्तर से न...
पिता का मौन तप
कहानी

पिता का मौन तप

भारमल गर्ग "विलक्षण" जालोर (राजस्थान) ******************** राजस्थान के मारवाड़ प्रदेश में बसा छोटा-सा गाँव था सुंदरसर। यहाँ की बलुई धरती सूर्य की तपिश सहती थी, रेतीले टीलों के बीच हरे-भरे खेत बाजरे की फसल से लहलहाते थे, और लोगों के चेहरों पर राजपूतानी सहनशीलता की छाप थी। इसी गाँव के एक छोर पर, खेजड़ी के पेड़ की छाया में, नारायण गर्ग का मिट्टी से लिपा-पुता कच्चा घर था। नारायण गर्ग- नाम में ही एक गरिमा और दायित्वबोध था। पचपन वर्ष के इस किसान के चेहरे पर धूप और लू ने गहरी झुर्रियाँ खोद दी थीं, लेकिन आँखों में अपने परिवार के प्रति अटूट प्रेम और जिजीविषा चमकती थी। उनकी धर्मपत्नी, संतोष देवी, गृहणी थीं- घर की छोटी-सी दुनिया को संचालित करने वाली अविचल स्तंभ। उनका सारा जीवन चूल्हा-चौका, बच्चों की देखभाल और पति के साथ खेत के कामों में बीता था। चेहरे पर सदा एक शांत संतोष, किन्तु आँखों के को...
कुछ छूटा क्या
कविता

कुछ छूटा क्या

प्रमेशदीप मानिकपुरी भोथीडीह, धमतरी (छतीसगढ़) ******************** ज़िन्दगी की कैसी भागम भाग तपती धुप और जलती है आग देखें दिल किसी का टूटा क्या पलट कर देखें कुछ छूटा क्या वकत के बदलते नित करवट कपड़ो मे पड़ते नित सिलवट अहसास का डोर है टुटा क्या पलट कर देखें कुछ छूटा क्या हालत की मार से बेखबर कैसे ज़िन्दगी कट रही है जैसे-तैसे अपनों से संगत भी जुटा क्या पलट कर देखें कुछ छूटा क्या होनी अनहोनी के बीच सदा उठती रहेगी एक टिश सदा टिशों से अपनापन छूटा क्या पलट कर देखें कुछ छूटा क्या जीवन सफर जारी सदा रहेगा अपनी बातें किससे तू कहेगा देखे अपना भी कोई रूठा क्या पलट कर देखें कुछ छूटा क्या परिचय :- प्रमेशदीप मानिकपुरी पिता : श्री लीलूदास मानिकपुरी जन्म : २५/११/१९७८ निवासी : आमाचानी पोस्ट- भोथीडीह जिला- धमतरी (छतीसगढ़) संप्रति : शिक्षक शिक्षा : बी.एस.सी.(बायो),एम ए अंग्रेजी, ड...
आत्म भीति
कविता

आत्म भीति

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** कुछ लोग संतुष्ट हैं बस अपने ही अहम से न कि दूसरों की विनम्रता से। कुछ लोग डरते बस सुनी-अनसुनी बातों से न कि दूसरों की हुकूमत से। कुछ लोग खोखले हैं बस अपने दर्प से न कि दूसरों की प्रभुता से। कुछ लोग खौफ में है बस अपनी आशंकाओ से न कि दूसरों की आधिपत्य से। कुछ लोग आशंकित है बस अपनी ही अवधारणाएँ से न कि दूसरों की संकल्पनाएँ से। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के स...
सदाचार के पथ पर
चौपाई

सदाचार के पथ पर

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** सदाचार के पथ पर चलना, कभी न फिर तुम आँखें मलना। जीवन में अच्छाई वरना, हर दुर्गुण को नित ही हरना।। कभी काम खोटा नहिं करना, नेह-नीर होकर तुम झरना। हरदम ही बनना उजियारा, करना दूर सकल अँधियारा।। नैतिकता के होकर रहना, मानवता का पथ ही वरना। सबकी सेवा में जुट जाना, जीवन अपना धन्य बनाना।। सच्चाई से जीवन बनता, दुर्गुण तो खुशियों को हनता। चाल-चलन मर्यादित रखना, कभी नहीं कड़वे फल चखना।। सदाचार से प्रभु खुश होते, ऐसे जन बिलकुल नहिं रोते। गिरे हुए तुम कर्म न करना, बस अच्छाई को ही वरना।। मन को शोधित करते रहना, गंगाजल बनकर के बहना।। पापों को बिलकुल तज देना, सद्कर्मों को तुम गह लेना।। नैतिकता से खुशहाली हो, उपवन महकें,खुश माली हो। सद्चरित्र से सद्गति होती, मानवता किंचित नहिं रोती।। नैतिकता से सं...
कविता

भ्रास

हितेश्वर बर्मन 'चैतन्य' डंगनिया, सारंगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जरुरी नहीं है कि सिर्फ काँटा ही तकलीफ दे काँटे का क्या है ? वो तो कभी न कभी निकल ही जाएगा। पर मैं मन में छुपे हुए, भ्रास को कैसे बाहर निकालूं ? जो यदि बाहर निकल गया, तो दूसरों को तीर की भांति चुभेगा। और यदि बाहर न निकला, तो मुझे भीतर ही भीतर सीना भेदकर गहरी ज़ख्म पहुँचायेगा। न किसी से कुछ कह सकूंगा न तो ज्यादा दिन गले अंदर रख सकूंगा ! ये भ्रास मुझे दीमक की तरह खायेगा। मैं मन ही मन जलकर खाक हो जाऊंगा ज़ुबान होते हुए भी बोल न पाऊंगा क्रोधाग्नि मे मेरा कलेजा जल जाएगा फिर भी बाहर से कुछ नज़र नहीं आयेगा। ये भ्रास मुझ पर ही वार करेगा गले से उतरकर सीने में, तीर की भांति जा चुभेगा मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा ये मेरे ही जिस्म को ढाल बनायेगा। सोचता हूँ मन की भ्रास निकाल दूँ गले में अटके हुए को...
घायल बलिया कि हुंकार
कविता

घायल बलिया कि हुंकार

अभिषेक मिश्रा चकिया, बलिया (उत्तरप्रदेश) ******************** घायल बलिया चीख रहा है चीख सुनाने मैं आया हूं, घायल बलिया के फटे हाल का रूप दिखाने आया हूं। मैं बलिया का शिक्षित समाज शिक्षा कि हाल बताने आया हूं, न बना है इंजीनियरिंग कॉलेज, न मेडिकल कॉलेज दिखता हैं, तब क्यों इस बलिया में टेक्नोलॉजी और एमबीबीएस डॉ. ढूंढता है। मैं बागी बलिया में मेडिकल व्यवस्था का स्थिति जानने आया हूं, सुनलों ए बलिया के वासी एक मरीज़ का दर्द बताने मै आया हूं। जब किसी का तबियत खराब हो कैसे पहुंचे हॉस्पिटल को, अस्पताल में व्यवस्था नहीं हैं रेफर करदे मऊ, बनारस को। पता चलता कि जान चली जाती मरीजों कि बीच रास्ते में, कहां से पहुंचे मरीज बेचारा इलाज कराने अपना बीएचयू में। यहां से आगे बढ़ जब निकला मैं बलिया शहर के सड़कों पे, तब जाकर मैं पहुंच गया बलिया के टाऊन हाल कि गलियों में। मैं बलिया के...
चूहों का आतंक
व्यंग्य

चूहों का आतंक

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** सरकारी दफ़्तर-सा था... नहीं-नहीं, सरकारी दफ़्तर ही था... अब आप कहेंगे, कौन-सा दफ़्तर? भई, मुझे तो सब दफ़्तर एक जैसे ही नज़र आते हैं। दफ़्तरों की शक्ल एक जैसी, वहाँ कुर्सी पर बैठे अधिकारियों की शक्ल बिल्कुल एक जैसी... जैसे माँ-जाए भाई या बहन हों। सरकारी नाम आते ही एक चिर-परिचित छवि आपके मन में बन ही गई होगी... बननी ही चाहिए... क्योंकि मेरी तरह आप सभी का भी नित-प्रतिदिन इन सरकारी दफ़्तरों से पाला पड़ता ही है। बस ऐसे ही किसी दफ़्तर के बरामदे में पड़ी टूटी बेंच पर मैं पड़ा हुआ हूँ। क्योंकि मुझे बुलाया नहीं गया था, अपनी मनमर्ज़ी से मुँह उठाए यहाँ चला आता हूँ, इसलिए घर के बाहर गली के कुत्ते की तरह मालिक की रहमो-करम की नज़रों की इनायत हो जाए, बस यही इंतज़ार कर रहा हूँ। एक लफ़ड़ा हो गया... न ज...
सर्वविद
कविता

सर्वविद

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मैं वो भी सुनता हूं जो तुम कहते हो मेरी पीठ के पीछे चुपके से फिर भी एक चुपी है, लबों पर क्योंकि आवरण है मेरे विशुद्धि पर अनाहत के मधुर स्वर का। मैं वह भी देखता हूं जो तुम औरों को दिखाना नहीं चाहते और खुद से कभी छिपाना नहीं चाहते, फिर भी एक निशब्दता है होठों पर क्योंकि आच्छादन है मेरे दशम द्वार पर सहस्त्रार की अखंड ज्योति का। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी : कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति : भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के सा...
जीभर जीकर जाना
कविता

जीभर जीकर जाना

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* खाना-पीना सो जाना बात-बात पर रो जाना. क्या ये है कोई ज़िंदगी यूँ ही मायूस हो जाना. चार दिनों की पूँजी साँसें बेजा इन्हें मत कर जाना. अवसर यह मिला हुआ है इसको जीभर जीकर जाना. विधाता ने बड़े प्यार से धरती घूमन को भेजा है. कुँदन काया सुँदर माया देकर के तुम्हें सहेजा है. अंदर-बाहर भरा उजाला हम सबको राह सुझाते हैं. न जाने किस भरम बावले कोई राह तक न वे पाते हैं. जग जैसा है, वैसा ही है किसलिए है इससे डरना. अकारण न घटती घटना केवल कारण से है बचना. बस इतना है हाथ तुम्हारे खुद की सुधबुध है रखना. है ईश्वर तेरे ही भीतर बैठा जब जी चाहे कर मिलना. बिना विचारे अंधा हो कर काहे कदम उठावे तू प्यारे. खुली आँख से चलने वाला कभी न ठोकर खावे प्यारे. तन- जीवन- जान अभी है फिर क्यों तू घबराए जग...
अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस
कविता

अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस

नील मणि मवाना रोड (मेरठ) ******************** संयुक्त परिवार सबका, सबके लिए वैश्विक आवाहन परिवार गौरव, सुरक्षा, एकता का पवित्र आलिंगन जीवन की पहली श्वास को गर्माहट भरा चुंबन हर आंसू का आश्रय गृह, विश्वास और रंजन सपनों को संस्कारों के पंखों की उड़ान का सृजन रिश्तों के स्नेहिल धागों में लिपटा प्यारा आचरण परिवार, समाज, संस्कृति, राष्ट्र प्रगति का जागरण समय, संवाद, समर्पण के महत्व का अनोखा मंच व सिंचन। परिचय :- नील मणि निवासी : राधा गार्डन, मवाना रोड, (मेरठ) घोषणा : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्र...
स्त्री तुम बुद्ध नहीं बन पाई
कविता

स्त्री तुम बुद्ध नहीं बन पाई

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** बुद्ध बनना कितना सरल, कितना कठिन, किन्तु स्त्री तुम कभी बुद्ध नहीं बन पाई ! अनेक दायित्व निभाती, तिल तिल मरती, फिर भी सब क्यों त्याग नहीं पाई स्त्री बुद्ध नहीं बन पाई !! सारे रिश्तों को छोड़कर, सारे बंधन तोड़कर, कर्तव्य अपना भूलकर, क्यूँ नही जा पाई, स्त्री तुम बुद्ध नहीं बन पाई !! करोडों बार अपमानित हुई, बार बार प्रताडित हुई, उजली तुम्हरी चादर फिर भी भी दागदार हुई, स्त्री तुम क्यों बुद्ध नहीं बन पाई !! संसार को तुमने जन्म दिया, फिर भी मूढ़ कहलाई , ज्ञान-ध्यान-तप की खातिर, घर-आंगन क्यों छोड़ नहीं पाई, स्त्री तुम बुद्ध नहीं बन पाई !! यशोधरा बनी, सीता बनी द्रौपदी और अहिल्या भी सच-शांत की पूजनीय प्रतिमा होकर भी स्त्री तुम बुद्ध नहीं बन सकीं!! परिचय :- श्रीमती क...
सूरज बेचें सूप
गीतिका

सूरज बेचें सूप

भीमराव झरबड़े 'जीवन' बैतूल (मध्य प्रदेश) ******************** तोड़ रहा रोटी का साहस, चटक हटीला धूप। महँगाई की छतरी ताने, सूरज बेचें सूप।। अमराई की छाँव ढूँढते, छाले पहने पाँव। दूर बहुत है थकी हवा का, निर्झर वाला गाँव।। मुख पर डाल नकाब व्यथित है, कोमल तन का रूप।। तान दिया दिनकर ने नभ तक, लू का शिविर अभेद। व्याकुल साँसें पंखा झल अब, ज्ञापित करती खेद।। तरस गया है बूँद-बूँद को, ढो प्यासे घट कूप।। आसमान को ताक रहा है, जंगल का वैराग्य। प्यासे अधरों के जागेंगे, कब तक रूठे भाग्य।। दे फुहार कब मेघ नयन को, देंगे दृश्य अनूप।। एसी कूलर के हंसों ने, भेज दिया फरमान। ठीक दोपहर में जाँचेंगे, रोटी की मुस्कान।। ऊँघ रहा पर ठंडा पीकर, इस मौसम का भूप।। परिचय :- भीमराव झरबड़े 'जीवन' निवासी : बैतूल मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित ...
खुशी-खुशी कह दो
कविता

खुशी-खुशी कह दो

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** हां सोच समझकर होशो हवास में रह कर रहा हूं गलती, मैं नहीं कहूंगा कि नादान हूं, मुंह बांये खड़ी परिस्थितियों से हद दर्जे तक परेशान हूं, ये मेरा नाकारापन ही है जो कुछ भी नहीं दे पाया खुशियों के नाम पर, सोचने का समय नहीं मिला हो सकने वाले अंजाम पर, मगर खुशकिस्मत हूं सबका भरपूर साथ मिला, मानता हूं सबके त्याग को जो चाहकर भी नहीं किये गिला, मगर क्या करूं मजबूर हूं, परिवार को दे सकने वाले खुशियों से महरूम हूं, शायद मैं अभागा नहीं हूं, कसम से जिम्मेदारियों से भागा नहीं हूं, लेकिन वक्त को व्यवस्थित कर नहीं पा रहा हूं, कब कौन निकल जाए इस जहां से बात दिमाग में धर नहीं पा रहा हूं, मैं करता नहीं अत्यधिक आत्मविश्वास, मुझे भी नहीं है लंबे जीवन की आस, गलतियां सुधारने के लिए, नाकामी स्वीकारने के लिए, हू...
आतंक और विनाश
दोहा

आतंक और विनाश

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** आतंक मिटाता ज़िन्दगी, करता सदा विनाश, यह समझें हैवान यदि, तो बदलेगा मौसम। ख़ूनखराबा कब तक होगा, बतलाओ तुम मुझको, पहलगाम जैसी जगहों पर होगा कब तक मातम।। जिसने तुमको भड़काया है, समझो उनकी करनी, मूर्ख बनाकर वे यूँ सबको, करें मौत का खेला। नहीं जान लेने में हिचकें, चिंतन है शैतानी, बरबादी भाती है जिनको, करते रोज़ झमेला।। लानत है आतंक कर्म पर, मौत का जो उत्सव है, कब तक लाशें और गिरेगीं, कब तक सब रोएंगे। असुर मनुज की बस्ती में हों, तो कैसे सुख-चैना, कैसे हम सब शांत चित्त हो, फिर तो सो पाएंगे।। यही चेतना, संदेशा है, अविलम्ब जागना होगा, अब तो इस आतंक को हमको, अभी रोकना होगा। यही जागरण, वक़्त कह रहा, आतंक की अब इतिश्री हो, नगर-गांव में हर्ष पले अब, शौर्य रोपना होगा।। आतंक मानसिकता हैवानी, म...
मैं क्या हूँ ….?
आलेख

मैं क्या हूँ ….?

रूपेश कुमार चैनपुर (बिहार) ******************** मनुष्य के जीवन में एक ऐसा समय आता है जब वह स्वयं से यह प्रश्न करता है - "मैं क्या हूँ ?" यह प्रश्न केवल शरीर, नाम, या पहचान तक सीमित नहीं होता, बल्कि आत्मा, उद्देश्य, और अस्तित्व की खोज की ओर संकेत करता है। जब हम कहते हैं "मैं", तो हम क्या दर्शाते हैं ? क्या यह शरीर "मैं" है ? क्या यह विचार, भावनाएँ, या यादें "मैं" हैं ? या फिर कुछ और है जो इन सबसे परे है ? हमारा शरीर समय के साथ बदलता है - बाल सफ़ेद हो जाते हैं, चेहरा झुर्रियों से भर जाता है, लेकिन फिर भी भीतर एक एहसास बना रहता है कि "मैं वही हूँ।" इसका अर्थ यह हुआ कि "मैं" केवल शरीर नहीं हो सकता। यह तो केवल एक वाहन है, जिससे आत्मा इस संसार में कार्य करती है। मन हमें सोचने, समझने, और महसूस करने की शक्ति देता है। बुद्धि निर्णय लेने में सहायता करती है और अहंकार यह भावना देत...
रणबाँकुरे आल्हा और ऊदल
कविता

रणबाँकुरे आल्हा और ऊदल

अशोक कुमार यादव मुंगेली (छत्तीसगढ़) ******************** यदुवंशियों की सुनो कहानी, योद्धा यादव की वाणी में। युद्ध मैदान में शेर समान दहाड़े, आग लगा दे पानी में।। क्षत्रिय कुलभूषण रणबाँकुरे, न्याय प्रिय वीर पराक्रमी। शास्त्रज्ञानी और युद्ध कौशल में निपुण परम प्रतापी।। दक्षराज के महान सच्चा सपूत, आल्हा-ऊदल दो भाई। परमाल के वीर सेनापति, मैदान में बावन लड़ी लड़ाई।। महोबा के बनाफर अहीर, वीरता के लिए थे विख्यात। पूजा करते मैहर देवी की, अमरता का दिया आशीर्वाद।। बैरागढ़ के महायुद्ध में, वीर ऊदल वीरगति को प्राप्त हुई। आल्हा क्रोध में व्याकुल, प्रतिशोध लेने की कसम खाई।। उड़न पखेरु घोड़ा में बैठा, चतुरंगिणी सेना दलबल साजे। चमक उठी आल्हा की तलवार, युद्ध के लिए दुंदुभी बाजे।। गरजे आल्हा युद्ध मैदान में, शत्रु सैनिक डर कर भागे। एक को मारे दस मर जाय, मारते-मारते ...
जिसको लोग आम कहते हैं
कविता

जिसको लोग आम कहते हैं

अंजनी कुमार चतुर्वेदी "श्रीकांत" निवाड़ी (मध्य प्रदेश) ******************** जिसको लोग आम कहते हैं, वही खास होता है। जिसको नहीं मिले खाने को, वो आपा खोता है। पके रसीले आम देखकर, मुँह में पानी आता। बच्चे युवा वयस्क आम को, हर कोई है खाता। कोई इसे चूसता मुँह से, मन प्रसन्न हो जाता। इसको बिना दाँत का बुड्ढा, बड़े प्यार से खाता। आता आम हाथ बच्चों के, पहले झगड़ा होता। पाने वाला खुश हो जाता, नहीं मिले वो रोता। बच्चे इसे प्यार से खाते, खाते और गिराते। जिसको नहीं मिला उसको वे, लंबी जीभ चिढ़ाते। सभी आम के दीवाने हैं, बड़े स्वाद से खाते। कलमी लँगड़ा और दशहरी, बदामी घर लाते। पका रसीला आम हाथ से, जब बच्चे खाते हैं। आधा रस हाथों में लगता, वस्त्र भीग जाते हैं। जैसा मजा मिला बचपन में, वैसा कभी न पाया। खा लो आम सभी जी भर कर, आम रसीला आया। परिचय :- अंजनी ...