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मैं पंछी तेरे आंगन की
कविता

मैं पंछी तेरे आंगन की

अभिषेक मिश्रा चकिया, बलिया (उत्तरप्रदेश) ******************** मैं पंछी तेरे आंगन की, तूने उड़ना सिखाया था। तेरे प्यार की छांव तले, बचपन हँसना सिखाया था। फिर आया दिन वो सांझ भरा, जब विदाई का वक्त था अश्रु धरा। कांपते पाँव, मुस्काती आँखें, दिल के भीतर सिसकती साँसें। डोली में बैठी थी ख़ामोशी सी, हर हँसी के नीचे थी एक उदासी सी। पीछे छूटा वो कंचों का खेल, सामने था अब जीवन का रेल। ससुराल की देहरी पर रखे पाँव, पीछे छूटा हँसी का गाँव। चेहरे नए, रिश्ते भी अनजान, दिल बोले- “क्या यही है पहचान?” भाई की चिढ़, माँ की डाँट, सब अब मीठी लगती है। वो रोटियों की छोटी बातें, अब आँखों से बरसती हैं। तू कहता था- उड़ जा बेटी, सपनों का कोई घर होगा। क्या जानती थी ये उड़ान, इतनी भारी सफर होगा। माँ से लड़कर मैं चली आई, सास की बातें अब क्या कहूँ? कभी बेटी थी, अब बहू हूं, कभी अप...
जिंदगी का सफर
कविता

जिंदगी का सफर

आनंद कुमार पांडेय बलिया (उत्तर प्रदेश) ******************** जिंदगी का सफर यूं बदल जाएगा, मैं न सोचा ये मौका निकल जाएगा। रंजिशें तोड़ दो छोड़ दो ख्वाहिशें, क्या पता साथ क्या तेरे कल जाएगा। जो है किस्मत में मिलकर रहेगा तुम्हें, दुख का सूरज तुम्हारा भी ढल जाएगा। कायरों की तरह जी के क्या फायदा, तेरा जीवन जहां से अटल जाएगा। डर के कांटो से पीछे न मुड़ना कभी, वक्त का ये परिंदा चपल जाएगा। ढलते रजनी हीं आता सवेरा नया, गिरने वाला भी इक दिन संभल जाएगा। चंद पल तो तु आनंद के साथ जी, तेरे संग ना जुटाया ये दल जाएगा। परिचय :- आनंद कुमार पांडेय पिता : स्व. वशिष्ठ मुनि पांडेय माता : श्रीमती राजकिशोरी देवी जन्मतिथि : ३०/१०/१९९४ निवासी : जनपद- बलिया (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। ...
क्यों लेते हों भगवान परीक्षा
भजन

क्यों लेते हों भगवान परीक्षा

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** क्यों लेते हों भगवान परीक्षा अपने भक्तों की। सहते हो स्वयं भी पीड़ा हरने अपने भक्तों की। क्यों लेते ... राम रुप में धरा पर आए सुन पुकार ऋषियों की। यज्ञ देव का मान बढ़ाया, गोद भरी कौशल्या की। असुरों का उद्धार था करना राह चुनी वन जाने की। वचन बना आधार पिता के, मति मंद करी कैकेयी की। क्यों लेते … परित्याग कर बन्धन सारे, वेश धारण कर विरक्तियों की। चौदह वर्ष भ्रमण कर वन में, निद्रा हर ली लक्ष्मण की। देना था संदेश जगत् को, भाई प्रेम के बन्धन की। चरण पादुका पूजी भरत ने, वियोग में श्री राम की। क्यों लेते ... बाली वध कर सेना बनाई, सुग्रीव संग हनुमान की। सन्तों मुनि यो से पाईं शिक्षा, दिव्यास्त्रों के संधान की। राम से बड़ा नाम राम का, ये महिमा सेतु पाषाण की। रावण वध कर लंका ढहाईं, ली अग्नि परीक्षा सीता ...
माँ ही क्यों लिखूँ?
कविता

माँ ही क्यों लिखूँ?

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** एक बड़ा सवाल मैं माँ ही क्यों लिखूँ? क्या सिर्फ इसलिए कि उसने मुझे अपने गर्भ में प्रश्रय दिया, रक्त मज्जा से मुझे आकार दिया, दिन रात मेरा बोझ नौ माह तक ढोया या फिर इसलिए कि मुझे जन्म देने के लिए खुद को दाँव पर लगा दिया। या फिर अपना दूध पिलाया, खुद गीले में सोई, मुझे सूखे में सुलाया, हर पल मेरे लिए सचेत रही या फिर इसलिए कि मेरी खातिर अपने सारे दुःख दर्द भूली रही, अपनी ख्वाहिशें होम करती रही। पाल पोस्टर बड़ा किया। या फिर इसलिए कि माँ है हमारी जो मेरे हंँसनें पर हँसती रही मेरे रोने पर रोती रही, मेरी छोटी सी खुशी के लिए अपनी बड़ी से बड़ी खुशी भी पीछे ढकेल देती अपना सब कुछ भूली रहती। या फिर इसलिए कि मैं उसका सिर्फ अंश नहीं उसका ही निर्माण हूँ, वो पहाड़, मैं उसका मात्र रजकण हूँ। या फिर इसलिए क...
आतंकवाद के विरुद्ध निर्णायक युद्ध
कविता

आतंकवाद के विरुद्ध निर्णायक युद्ध

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** पहलगाम में हुआ है भयंकर नर संहार। अब हमें करना होगा आतंकवाद पर प्रहार। ******** धर्म की आड़ में खून खराबा हुआ है। इसमें बहुत सारे लोगो का लहू बहा है। ******** अब हम आतंकियों को चुन चुन कर मारेंगे। एक एक को धरती में जिंदा गाड़ेंगे। ******* ऐसी देंगे सजा की आतंकियों की रूह कांप जायेगी। फिर किसी आतंकवादी की हिम्मत नहीं हो पायेगी। ******* आतंकियों को मुंह तोड़ जवाब देना होगा। उनको बिल से बाहर निकाल कर मारना होगा। ******** इस बार आतंकियों का ऐसा करे हम हाल, कि उनकी आत्म कांप जाय। और भविष्य में कोई नया आतंकवादी न बन पाय। ********* आतंकवाद मानवता के विरुद्ध एक भयंकर अपराध है। इसका खात्मा जरूरी है क्योंकि इसमें मरते निर अपराध है। ******** परिचय : डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" निवासी : चिनार...
क्यों कोई
कविता

क्यों कोई

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** क्यों कोई साथ आता है बीच राह मे आकर छोड़ जाता है क्यों क्यों कोई दया दिखाता है और मुंह मोड़ लेता है आखिर क्यों क्यों कोई सान्त्व्ना देता है दुख मे दो शब्द बोल कर। क्यों क्यों कोई याद करते-करते भूल जाता है अपने स्वार्थ के लिए क्यों कोई अपनी छाया से डरता है अतीत के कर्मो के कारण क्यों कोई हवा मे फरफराती एक लौ को हथेली से ढकता है क्यों प्रकाश के लिए न। ये सब बुद्धिजीवी मानव की प्रेम, घृणा, स्वार्थ, भय, वात्सल्य, आन्नद, जैसे वीर रस की पहचान देते साथी है जो क्या का उत्तर देते है। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ स...
यहाँ‌ वहाँ खेतों में
कविता

यहाँ‌ वहाँ खेतों में

बृजेश आनन्द राय जौनपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** यहाँ‌ वहाँ खेतों में कटे बिछे गेहूँ पर गिरती है चाँदनी अभ्र रहित अंबर है गोरी है, चैता है टूटा हुआ उर है मन में उतरे जो बिरहन का स्वर है बिखरे हुए बोझ जैसे बैठे हुए- 'बादल' हैं छोड़ कर आएँ जो अंबर का आँचल हैं अभी न बरसने का एक एक वादा है खलिहानी पहुंँचने का पक्का इरादा है। परिचय :-  बृजेश आनन्द राय निवासी : जौनपुर (उत्तर प्रदेश) सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर म.प्र.द्वारा शिक्षा शिरोमणि सम्मान २०२३ से सम्मानित घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहा...
ऑपरेशन सिंदूर
कविता

ऑपरेशन सिंदूर

किरण पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** ऑपरेशन सिंदूर का हो गया श्री गणेश, पाक हिंदुस्तान का शुरू हो गया है खेल, छेड़ा है तो छोड़ेंगे नहीं भारत का है मंत्र, चुन-चुन कर हम बदला लेंगे मोदी का है मंत्र, आतंक और राजनीति चक्की के दो पाट पिसा रही है जनता सारी कसूरवार सब भाग, खूब सहा इन आतताईयो को आये नही ये बाज, अपने सामने बुला रहे है मौत को यजमान, सुता साँप जगाया इसने (पाक) अब फुँकार संभाल, चुन-चुनकर मारेगे इनको हर कोना है छान। ताकत नही है कुछ करने की बडी़ बडी़ है बात, पर्वत (भारत) से टकराओगे चूर-चूर हो माथ। परिचय : किरण पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मंडल जबलपुर से सम्मानित २. अंतर्राष्ट...
निरुपमा त्रिवेदी की कृति ‘पथ उजियारा’ का लोकार्पण समारोह
साहित्य समाचार

निरुपमा त्रिवेदी की कृति ‘पथ उजियारा’ का लोकार्पण समारोह

संवेदनाओं के मोती भावनाओं की सुगंधि है: ‘पथ उजियारा’ इंदौर। प्रेस क्लब के सभागार में लेखिका निरुपमा त्रिवेदी के काव्य संग्रह ‘पथ उजियारा’ का लोकार्पण व चर्चा हुई । लेखिका ने बताया कि इस काव्य संग्रह में मेरी निन्यानवे कविताएं वास्तव में मेरी अंतर्मन की अनुभूतियों और भावों के पुष्प हैं। जिस प्रकार दीपक अंधियारे को दूर करके उजियारा प्रदान करता है, उसी प्रकार हृदय के उद्गार काव्य के रूप में अभिव्यक्त होकर मेरे जीवन पथ में उजियारा भरते रहे हैं। चर्चाकार डॉ. गरिमा दुबे ने कहा कि इस काव्य संग्रह में कविताएं सहज, सरल भाषा के साथ हैं और पाठकों तक अपने भावों को पहुंचने में पूर्ण सफल है पुस्तक अपने नाम के अनुरूप है तथा लेखिका स्वयं जागरुक है और उसका चिंतन राष्ट्र समाज और प्रकृति सभी के प्रति मुखरित हुआ है। जहां एक ओर ब्रज अवधि के शब्दों का सुंदर प्रयोग किया गया है तथा वहीं दूसरी और दार्शनिक चिंतन भ...
फिर वही बात
कविता

फिर वही बात

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** बहुत भुलाना चाहा, पर इनकी पीड़ा से मुक्ति की कल्पना, मुझे फिर उन्हीं अंधेरी गलियों में ले जाती है, जहाँ फिर से वही बातें दोहराई जाती हैं, फिर से वही क्रूरता का ताना बाना बुना जाता है, फिर वही निर्दयता पूर्ण व्यवहार की बातों का सिलसिला चलता है ! इनकी मासूमियत वहां एक बार फिर फ़ना हो जाती है ! फिर इनके लिए वही बेबसी, वही लाचारी, जिनमे ये मासूम रात-दिन दम तोड़ते हैं ! उस अंधकार में कोई रोशनी की किरन नहीं दिखती, कोई ऐसी ध्वनि कानो में नहीं पड़ती, जिसमें इनकी मासूमियत की बातें हों, जिनमे इनके लिए करुणा और ममता हो ! यहां बार बार वही गलतियाँ दोहराई जाती हैं, इन मासूमों के जीवन को संरक्षित करने की आशा क्षीण होती जाती है,! इंसानो की नगरी में मानो इंसान विवेकहीन हो गया है, स्वयं के लिए...
बिखर रहे माला के मोती
गीत

बिखर रहे माला के मोती

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** देख-देख कर पीड़ा होती। बिखर रहे, माला के मोती।। तंत्र बना अब लूट तंत्र है, है बस्ती का मुखिया बहरा। गली-गली में दिखी गरीबी, कितने ही दर, तम है गहरा।। झूठ ठहाके लगा रहा है, सच्चाई छुप-छुपकर रोती। बहुतायत झूठे नारों की, मिलते हैं वादों के प्याले। कहते थे सुख घर आयेंगे, मिले पाँव को लेकिन छाले।। रोज बयानों के खेतों में, बस नफ़रत ही फसलें बोती। जाने कितनी ही दीवारें, मन से मन के बीच बना दी। बात किसी की कब सुनता है, मौसम हठी, ढीठ, उन्मादी।। उसकी बातें, उसकी घातें, लगता जैसे सुई चुभोती। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सुमित्रा पाठक पिता : स्व. हरि मोहन पाठक पुत्र : सौरभ भट्ट पुत्र वधू : डॉ. प्रीति भट्ट पौत्री : नि...
बौना हुआ ईमान
कविता

बौना हुआ ईमान

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* सारी दुनिया वह कहे जो सम्मत विज्ञान धरती -चपटी मानते अभी बहुत इंसान। अड़े हुए हैं झूठ पर जान -बूझ अंजान अंध-श्रद्धा के सामने बौना हुआ ईमान। इंसाँ -इंंसाँ फर्क कर मज़हब लीने मान कुछ लोगों को छोड़कर सब काफिर शैतान। काफ़िर का जायज़ क़तल क्या यही कहता ज्ञान काफ़िर का कर खात्मा हासिल करो जहान। जो धरती पैदा हुआ वो सब एक समान यहाँ सभी हकदार हैं जीव -जंतु -इंसान। प्रेम -मुहब्बत -मुरब्बत इंसानी पहचान जिस मज़हब ये न रहें वो मज़हब मुर्दा जान। कुछ लोगों को वहम का होने लगा गुमान जो जितना जाहिल दिखे वो मज़हब की शान। परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी निवासी : पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्व...
पहलगाम में आतंकी हमला
कविता

पहलगाम में आतंकी हमला

डॉ. किरन अवस्थी मिनियापोलिसम (अमेरिका) ******************** बस पर आतंकी ‌हमला घर पर आतंकी ‌हमला कभी गोली औ बम बरसाकर सड़कों पर पत्थर बरसाकर रेल की पटरी उखाड़ उनपर भारी पत्थर रखकर भारी चीजें अटका कर, आग लगाकर पर्व, जलूसों, सेना पर पत्थर बरसाकर मासूम, निहत्थे टूरिस्टों पर गोली चलवाकर सारे जग‌को कर‌आतंकित खुद लुके छुपे फिरते हैं यह कायर बड़े हुआ करते हैं आतंकी यही हुआ करते हैं। कबतक भारत आतंक सहेगा कबतक भारतपुत्र शहीद बनेगा अब और नहीं हम सह सकते उनका आतंकी मकसद होकर चकनाचूर रहेगा। भारत ने न कभी पहला वार किया कई बार तुम्हें छोडा माफ़ तुम्हें कई बार किया। तुमने अति कर दी आतंकी दल बहुत सहा है हमने उत्तर मुंहतोड मिलेगा इनकी कायरता को सारा जग देखेगा। घर में घुसकर मारेंगे सब तहस नहस कर देंगे भारत की मर्यादा को लांघा आतंकिस्तान न बचने देंगे। जय भारत क...
बदलाव
कविता

बदलाव

नील मणि मवाना रोड, (मेरठ) ******************** किसी को बदलने की कोशिश कभी नहीं करनी चाहिए हां अगर चाहें तो कोशिश करें स्वयं में कुछ परिवर्तन जरूर ला सकते हैं दूसरों के अनुकूल स्वयं को बना सकते हैं स्थिति में संतुलन बैठ सकते हैं दो विपरीत दिशाओं को मिला सकते हैं कोशिश जरूर करनी चाहिए बंधने में ही सार्थकता है टूटना अंतहीन है, दुखद है अपने लिए तो सभी जीते हैं किसी और के लिए भी जी कर देखना चाहिए। परिचय :- नील मणि निवासी : राधा गार्डन, मवाना रोड, (मेरठ) घोषणा : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि ...
सुधास्तवनम्
कविता

सुधास्तवनम्

भारमल गर्ग "विलक्षण" जालोर (राजस्थान) ******************** हे अंबिके! तुम्हीं वह प्राणप्रतिष्ठा हो सनातनी, शब्दब्रह्म का नाद जिसमें, वही स्वर हो। सहस्र के कमल में विराजित चित्र की ज्योति, महाकाल के उत्सवों से टपकी अमृत-बूंद रानी हो॥ युग-युग अनुवाद के पवित्र शिलालेख पर, त्रिगुणातीत गगन की व्योमस्थ महिमा-निधानी हो। प्रलय के मौन में भी जो गूंजे ॐ का मधुर-स्वर, वह निर्वाण की वीणा के अधिष्ठान की हो॥ मृत्युंजय के हस्त से रची पंचभूत की रंगभूमि, अखण्ड मण्डलाकार में ब्रह्माण्ड का क्षणिक खिलौना हो। विराट का सम्पुटित रहस्य, अनाहत नाद सा अनंत, पर मूक अभिनव कल्पित हो॥ कालचक्र के दन्तों में राक्षसी नश्वरता को चिर, अक्षय पात्र के लिए स्टेक ध्रुवतारा-सी अडिग धुरिणी हो। अम्बर में हड्डी वाली कृषिका, सृष्टि के हर कण में सनातन का स्पंदन तुम्हीं हो॥ शून्य के सागर में डूबे अत्या...
बलिदान पर्व
कविता

बलिदान पर्व

सरला मेहता इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** भारत लेता रहेगा बलिदान का बदला सरफरोशी-तमन्ना दिल में लिए कफ़न सर पे बाँध वे चल पड़े थे आज़ाद, भगत, सुखदेव, बिस्मिल फाँसी से ब्याह रचाने वाले दूल्हे आसमाँ के अब सितारे बन गए सौरभ, विभूति, विक्रम, नचिकेता उरी, पुलवामा, पहलगाम हमलें आतंकी जवाला में झुलस गए मेहँदी, मंगलसूत्र व चूड़ियाँ भी सुहागिनों की, साथ ही वे ले गए जिंदगी अभी जी नहीं थी लालों ने हजारों ख्वाइशें भी करनी थी पूरी बूढे माँ पिता की सेवाएँ थी अधूरी तमगे विभूषण सारे सौपकर अपने अपने अंतिम सफ़र पर चल दिए हैं उम्र कच्ची थी, हौंसलें थे बुलंद सीनों पर खाते रहे थे गोलियाँ वे होम अपनी जिंदगियाँ करके गए सिंदूर सजनियों का ले चल दिए आसमाँ के ये फ़रिश्ता बन गए हैं परिचय : सरला मेहता निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि...
जय हिंद
कविता

जय हिंद

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** जय हिंद, जय हिंद के नारे अब लगाते जाओ। भारत माता के नाम का डंका अब बजाते जाओ। लेकर हाथ में तलवार दुश्मन का सिर कलम अब करते जाओ। जय हिंद....... जो डालते हैं गंदी नजरें हमारी भारत माता पर उनकी आंखों को ले शूल अब फोड़ते जाओ। जय हिंद........ जो मचाते हैं नित आंतक बन सिंह उनकी आतड़ियों को पंजे से फाड़ते जाओ। जय हिंद..... जो सोचते हैं हिंद के सैनिक कुछ कर नहीं सकते तोपों से उनके मुंह अब बंद करते जाओ। जय हिंद..... परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी ...
बलिदान वीर जवानों का
कविता

बलिदान वीर जवानों का

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** बलिदान वीर जवानों का, बेकार नहीं जाने देंगे। हम भारत माँ की आँखों में अश्रु नहीं आने देंगे।। हैं वीर सिपाही मतवाले, उनके यश को नित गाएंगे। हम अपनी माता मातृभूमि को किंचित नहीं लजाएँगे।। हम अब अपनी पुण्य धरा पर, आतंकी ना आने देंगे। बलिदान वीर जवानों का, बेकार नहीं जाने देंगे।। हरकत जो नापाक हुई है, उसका बदला ले डाला। हमने घर में घुसकर मारा, पल उनका आज किया काला।। अब हम आतंकी दुश्मन को, मल्हार नहीं गाने देंगे। बलिदान वीर जवानों का, बेकार नहीं जाने देंगे।। हम शूरवीर,हम महाबली, हम दुश्मन पर भारी पड़ते। आ जाता है भूचाल तभी, हम ज़िद पर जब भी हैं अड़ते।। हम कायर, पापी, अधम, नीच को, अब घर में ना आने देंगे। बलिदान वीर जवानों का, बेकार नहीं जाने देंगे। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-...
आक्रोश की भट्टी
गीतिका

आक्रोश की भट्टी

भीमराव झरबड़े 'जीवन' बैतूल (मध्य प्रदेश) ******************** चल रहा मंथन विचारों में, जल उठी आक्रोश की भट्टी।। सलवटों ने डाल कर डेरा। मौन का ऊँचा किया घेरा।। भृकुटियों ने तन कटारी-सा, सुप्त हर दायित्व को टेरा।। वादियों का देखकर तेवर, शांति का संदेश है कट्टी।। धमनियों में बह रहा लावा। कर रहा विस्तार का दावा।। छोड़ दो बारूद के गोले, सूरमा करते न पछतावा।। वंचना के वार क्या सहना, खोल दो हर जख्म से पट्टी।। नैन में है क्रोध की ज्वाला। शत्रु लगता काल से काला।। चीख कर सिंदूर कहता है, ठोंक दो आतंक पर ताला।। सिर उठाएगा नहीं आगे, तोड़ दो दुर्दांत की नट्टी।। परिचय :- भीमराव झरबड़े 'जीवन' निवासी : बैतूल मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्...
राम केवट संवाद- भक्ति और समर्पण
कविता

राम केवट संवाद- भक्ति और समर्पण

प्रो. डॉ. विनीता सिंह न्यू हैदराबाद लखनऊ (उत्तरप्रदेश) ******************** आज्ञा पाए निषाद ने केवट दिए बुलाय पर केवट ने राम को, दी यह मांग सुनाय स्वामी करूं ना गंगा पार, बिना पद पंकज धोए पग रज की महिमा भारी पत्थर भी बन जाय नारी मेरी काठ की गाढ़ी नाव, दूजी मै कहां गढ़इयों । सिया राम जय सिया राम, सिया राम जय सिया राम मैं दीन हीन केवटिया, तुम महाराज रघुरैया जीने का कौन उपाय, नारी जो बने मेरी नैया, बोले रघुबर मुसकाई मेटो शंका केवट भाई कर दो मोहे गंगा पर, पग धूली जल से धोए । सिया राम जय सिया राम, सिया राम जय सिया राम पग धोए चरणामृत पाए, केवट निज भाग सराहे सिया राम लखन बैठारे, मन मगन हो नाव चलाए केवट न लेत उतराई और चरण गहे अकुलाई मैं काह ना पायो आज, मोहे दरस दियो रघुराई । सिया राम जय सिया राम, सिया राम जय सिया राम मैं नदी नाव केवटिया तुम भव से पार लगइया स्वामी ...
विश्वासघात का मकड़जाल
कविता

विश्वासघात का मकड़जाल

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** सोचता हूँ विश्वास की लहरों में विश्वास के जोश में उड़ जांऊ विश्वास का लगा पंख पखेरू सोचता हूँ मिलेगी की लहरें विश्वास से ऊंचीउड़ान भर पाऊं।। विवेक से मै अलमस्त उड़ता जांऊ आंधी तूफान से भी लड़ता जांऊ मनमस्तिष्क में रख शीतल गहराई शीतलता की छाँव में ठाँव में पाँउ विश्वास से उड़ान मैं भर पाँउ।। निस्वार्थ से उड़ान जब भरूँ निस्वार्थ की मंजिल बस मैं पाँउ जख्म विश्वासघात का किसे बताऊँ विश्वास में विश्वासघात का निशाना विश्वासघात मैं अब पिसता पाँउ।।3 घातक तीर लगा कि पंख बचा न पाँउ विश्वास करुं जितना, घात उतना पाँउ विश्वास की उड़ान भरूँ विश्वासघात पाँउ भरता हूँ उड़ान, षड्यंत्र का तीर मैं पाँउ विश्वास की उड़ान भरने में समझ न पाँउ विश्वासघात के मकड़जाल में, उड़ न पाँउ।। परिचय :- ललित शर्मा निवासी : खलिहामारी, डिब्रू...
किसी न किसी का आदमी
व्यंग्य

किसी न किसी का आदमी

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आजकल किसी का आदमी होना कितना जरूरी हो गया है! अगर आप किसी के आदमी नहीं हैं, तो आप आदमी कहलाने लायक ही नहीं हैं। यह पक्का मान लीजिए- आप दो पाये जानवर हो सकते हैं, पर आदमी नहीं। जहाँ देखो, वहाँ कोई न कोई किसी न किसी का आदमी ही नजर आ रहा है । नौकरी, प्रमोशन, जॉब, डिग्री, राशन, वजीफा, पुरस्कार- सब उसी को मिल रहे हैं जो किसी न किसी का आदमी है। मेरी ओपीडी में भी हर दूसरा मरीज किसी न किसी का आदमी होता है। मरीज आते भी यह देखने के लिए हैं कि डॉक्टर साहब भाव देते हैं या नहीं। सलाह तो डॉक्टर साहब देंगे ही, लेकिन भाव भी देंगे या नहीं, मसलन चाय भी तो पिलाएँगे, नहीं तो तो जिनके आदमी हैं, उनका फोन आ जाएगा- 'अरे, हमने अपना आदमी भेजा था! बताओ, आपने ध्यान ही नहीं रखा। मरीज मरा जा रहा था, और आपने उसे बाहर ...
बदलते मूल्य
कहानी

बदलते मूल्य

बृज गोयल मवाना रोड, (मेरठ) ******************** १३ जनवरी की कड़कती सर्दी में रजाई पर कंबल डाल लिया, फिर भी पैर गर्म होने का नाम नहीं ले रहे हैं। ‘सारा दिन मौजे में बंद रहने पर भी न जाने कैसे इतने ठंडे हो जाते हैं !’ अपनी गर्माहट समेटते-समेटते अचानक गुमटी की छत पर गोबर के उपले बनाती चमेली का ख्याल आ गया। दोपहर धूप की तलाश में मैं ऊपर छत पर गई तो सामने बैठी शांता उपले बना बनाकर यत्न से रख रही थी। उसकी साड़ी हवा में बुरी तरह उड़ रही थी। वह सिर ढकने का असफल प्रयास बार-बार कर रही थी। लेकिन ठंडी हवा उससे जिद्दी बच्चों जैसी ठिठौली कर उसकी साड़ी को पतंग बना लेना चाहती थी। बेचारी बेबस सी शांता ठंडी हवा के सामने खिसियानी सी बैठी, उपले बनाने में व्यस्त थी। मैंने उसे टोका- ‘कहो शांता ठंडी हवा का आनंद ले रही हो…?’ वह हल्के से हंसी, फिर उड़ती साड़ी का कौना मुंह में दबाकर उपले बनाने लगी। पिछले ...
ज्यादा शरीफ बनने का नइ
कविता

ज्यादा शरीफ बनने का नइ

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** अपने रस्ते पे आने का, अपने रस्ते पे जाने का, मन किया तो कभी कभी शान पट्टी भी दिखाने का, इस दुनिया में शरीफों का जीना अक्सर होता रहता है मुहाल, आजू बाजू खड़ी रहती है बिना बुलाया हुआ जंजाल, अक्खा दुनिया में पड़े हुए हैं कई लुक्खे उनसे भी यारी दोस्ती निभाने का, मन किया तो कभी कभी शान पट्टी भी दिखाने का, अफसर भी अब खुद को समझने लगा है खुदा, काम नहीं है नेताओं के कामों से ज्यादा जुदा, ये होते ही नहीं कभी अपने बाप के, गुनाहगार साबित कर देते हैं औरों को खुद के किये हुए बड़े से बड़े पाप के, रिश्वत लेंगे भी अपने ओहदे की नाप के, कभी नहीं गिरेंगे इनके आंखों से आंसू दो बूंद भी सच्चे पश्चाताप के, तो क्या सोच रहा है भई, अपुन की बात मान ज्यादा शरीफ बनने का नइ। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिर...
भारत का लक्ष्य युद्ध नहीं २०४७ तक विकसित भारत बनना
समाचार

भारत का लक्ष्य युद्ध नहीं २०४७ तक विकसित भारत बनना

नारद जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में आपरेशन "सिन्दूर: भारत का सामर्थ्य" विषय पर बोले पूर्व भारतीय सैन्य सचिव सिंघू * भारत का लक्ष्य युद्ध नहीं २०४७ तक विकसित भारत बनना * भारतीय सैन्य शक्ति दुनिया की तीसरी बड़ी सैन्य शक्ति इंदौर। विश्व को भारत के सामर्थ्य का अनुमान था, लेकिन आपरेशन सिंदुर में उसे सभी देशों ने देख भी लिया। विश्व के देश भारत की नीतियों को प्रभावित करने का प्रयास करते है, लेकिन भारत की शक्ति को, भारत के सामर्थ्य को कम नहीं कर सकते है। आज भारत की सैन्य शक्ति देखकर दुनिया अचंभित है। भारतीय सैन्य शक्ति दुनिया की तीसरी बड़ी सैन्य शक्ति है, जिसकी शक्ति आपरेशन सिंदुर में विश्व ने देखी। पहलगाम हमला वास्तव में भारत को चुनौती थी, जिसका भारत ने करारा जवाब दिया। आपरेशन सिंदुर में भारत सौ प्रतिशत सफल रहा। युद्ध विराम भारत की कुटनीतिक विजय है। भारत कभी भी युद्ध नहीं चाहता है। भारत का लक्...