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ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी
आलेख

ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी

डॉ. किरन अवस्थी मिनियापोलिसम (अमेरिका) ********************  सभी को ज्ञात होगा कि रामचरितमानस गोस्वामी तुलसीदास जी ने अवधी भाषा में लिखी है। नारी अवधी भाषा का शब्द है जो नाली शब्द का अपभ्रंश है। नारा जिसे हिंदी में नाला कहते हैं, का अर्थ अवधी भाषा ‌मे है जलवाहक, जिसमें दोनों ओर बांध (ताड़ना का एक अर्थ बांधना भी है) होते हैं। बांध न हो तो जल प्लावन हो जाए। उसी का स्त्रीलिंग है नारी। समुद्र ने स्वयं अपने लिए नारा ‌शब्द का प्रयोग किया। काव्य में तुकबंदी के लिए तुलसीदास जी ने नारा का नारी लिखा। इतने, परमज्ञानी, स्वयं अपनी पत्नी का इतना सम्मान करने वाले, स्त्री जातिमात्र (शबरी को माता कहकर पुकारा है भगवान राम ने रामचरितमानस में) का आदर करने वाले भक्तज्ञानी गोस्वामी तुलसीदास जी यह नहीं जानते थे कि ५०० वर्ष बाद भारतीयों के अज्ञान की पराकाष्ठा होगी, व उनके नारी शब्द के अर्थ का इतना बड़ा...
आदमी
कविता

आदमी

कु. आरती सिरसाट बुरहानपुर (मध्यप्रदेश) ******************** कभी मशहूर तो कभी बदनाम आदमी...! परेशानियों का बोझ लिए खड़ा आदमी...!! दिन के उजालों में अपने आंसू छिपाता आदमी...! रात के अंधकार में खुद को तम में भीगाता आदमी...!! मंजिल की चाह में जवानी को मरता आदमी...! सफर का आनंद लिए बिना जीता आदमी...!! कभी जागा तो कभी सोया आदमी...! खुद में ही खोया खोया आदमी... बेवफाई के बाज़ार में वफ़ा की गुहार लगता आदमी...! अपनी औकात से ज्यादा खुद को दिखाता आदमी...!! अपनी गलतियों पर पर्दा डालता आदमी...! ओरों की गलतियों को बेपर्दा करता आदमी...!! कभी मशहूर तो कभी बदनाम आदमी...! परेशानियों का बोझ लिए खड़ा आदमी...!! परिचय :- कु. आरती सुधाकर सिरसाट निवासी : ग्राम गुलई, बुरहानपुर (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना...
इसके जद में सब आयेंगे
गीत

इसके जद में सब आयेंगे

भीमराव झरबड़े 'जीवन' बैतूल (मध्य प्रदेश) ******************** तूफ़ानों-सी बढ़ी रैलियाँ, समरसता का वंश मिटाने। इसके जद में सब आयेंगे।। सघन तिमिर है आम्र वृक्ष भी, लगे खड़ा हो प्रेत वहम का। संस्कारित कुछ शृंग-श्रेणियाँ, खोज रही अस्तित्व स्वयं का। अनुबंधों की धुँधली शर्तें, बनकर मौत खड़ी सिरहाने।। इसके जद में सब आयेंगे।। सावन के घन संभाषण से, कर देते हैं जादू-टोना। अलगावों के दावानल में, सुलग उठा है कोना-कोना।। विश्वासों की मीनारों में, दिखते हैं अब रोग पुराने।। इसके जद में सब आयेंगे।। अट्टहास मौसम का सुनकर, पंछी होने लगे प्रवासी। धुआँ-धुआँ है सभी दिशाएँ, आँखों में निस्सीम उदासी।। जिह्वा पर ताले के भूषण, आजादी पर मारे ताने।। इसके जद में सब आयेंगे।। परिचय :- भीमराव झरबड़े 'जीवन' निवासी : बैतूल मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना ...
प्रकाश का महापर्व
आलेख

प्रकाश का महापर्व

अमिता मराठे इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** धन त्रयोदशी से पांच दिन दीपावली महापर्व आरम्भ होता है। इस पर्व का साल भर बेसब्री से इंतजार होता है। ये सनातन धर्म का महा उत्सव है। रूप चौदस, महालक्ष्मी पूजन, गोवर्धन पूजा से होते हुए पांचवें दिन भाई दूज पर पूरा होता है। लेकिन उसका आनन्द मन में तुलसी विवाह तक बना रहता है। भारतीय संस्कृति में इस त्यौहार की महत्ता बहुत अधिक है। यही जीवन का सर्वोच्च आनन्द बिंदु है। खुशी, विजय, उल्लास, सामाजिक जुड़ाव और उजास के इस पर्व में प्रेम, स्नेह से मिलन समारोह मनाये जाते हैं। अनेक वर्षों के मन मुटाव भी मीट जाते हैं। भाई-बहन का अटूट प्रेम का प्रतीक भाई दूज पर्व पांच दिन की खुशियां बटोरकर झोली में डाल देता है। बीते दो वर्षों में इस पर्व पर कोरोना रुपी दानव का साया छाया हुआ था। इस संक्रमण के रोग के कारण हम इस उजास के पर्व को उत्साह से नहीं मना पाये ...
अरे चाँद तू मत इतराना
कविता

अरे चाँद तू मत इतराना

अंजनी कुमार चतुर्वेदी निवाड़ी (मध्य प्रदेश) ******************** ओ अंबर के चाँद सलोने, वसुधा पर आ जाओ। जो सुहागिनें बाट जोहतीं, उनको मत तरसाओ। पावन पर्व, चौथ करवा का, सब सुहागिनें करतीं। पार्वती-शिव पूजन करके, खुशियाँ दामन भरतीं। बड़ा भाग्यशाली है चंदा, गोरी तुझे निहारे, जल्दी से तू सम्मुख आजा, करना नहीं किनारे। तुझे देख कर सभी सुहागिन, मंद-मंद मुस्कातीं। छलनी में दीपक रोशन कर, तुझ पर वारी जातीं। अरे चाँद तू मत इतराना, उनको नहीं सताना। वरना तुझको पड़ जाएगा, बिना बजह पछताना। एक चाँद, पहले से उनके, घर में ही रहता है। तू केवल अंबर में रहता, वह दिल में रहता है। रात अमावस जब-जब आती, तू गायब हो जाता। इतराने के कारण ही तू, नभ में ही खो जाता। उनका चाँद साथ में रहता, कभी नहीं मुख मोड़े। चाहे जैसी दशा-दिशा हो, कभी साथ ना छोड़े। सभी सुहागन तुझे पूजती...
गीत साहस का
गीत

गीत साहस का

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** साहस को यदि पंख लगाओ, तो मिट जाये उलझन। असफलता मिट जाये सारी, भरे हर्ष से जीवन।। बने हौसला गति का वाहक, प्रीति-नीति सिखलाता। कर्मठता का ज्ञान कराता, जीवन-सुमन खिलाता।। अंतर्मन जो दीप जलाते, उनका महके आँगन। व्यथा, वेदनाएँ सब मृत हों, भरे हर्ष से जीवन।। साहस की महिमा है न्यारी, चमत्कार करता है। पोषित होता जहाँ उजाला, वहाँ सुयश बहता है।। शुभ-मंगल के मेले लगते, जीवन बनता मधुवन। व्यथा, वेदनाएँ सब मृत हों, भरे हर्ष से जीवन।। नित्य हौसला रखे दिव्यता, जो तेजस मन करता। अंतर को जो आनंदित कर, खुशियों से है भरता।। कर्मों को देवत्व दिलाता, कर दे समां सुहावन। व्यथा, वेदनाएँ सब मृत हों, भरे हर्ष से तन-मन।। साहस लाता सदा दिवाली, नगर- बस्तियाँ शोभित। उजला आँगन बने देव दर, सब कुछ होता सुरभित।। अंतर्...
बेगारी एक अभिशाप
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बेगारी एक अभिशाप

सरला मेहता इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** स्वाधीनता दिवस के बारे में सोचते सोचते अंग्रेजों द्वारा बरपाई क्रूरता याद आ गई। और वे यह सिखा गए हमारे उच्च पदों पर आसीन अधिकारियों को। वर्षों पूर्व के वाकये हैं ये... सरकारी उच्च अधिकारियों के घर पर निम्न श्रेणी कर्मचारियों को घरेलू कार्य करने हेतु तैनात किया जाता था। उनसे अमूमन लोग झाड़ू-बर्तन-कपड़े, लीपना -पोतना, खाना बनाना, बच्चों को खिलाना, प्रेस-पालिश सब कुछ करवाते। मिर्ची-मसाले भी लगे हाथ कुटवा लेते। यह तो एक तरह की प्रताड़ना ही हुई। ऐसा जब भी मैं देखती करुणा से भर जाती थी। मेरे घर भी आते थे। सबसे पहले मैं उन्हें चाय नाश्ता खाना वगैरह करवाती। फ़िर रोज़ का कार्य करवाती। उन्हें कोल्हू के बैल की तरह जोतना मुझे कभी नहीं गवारा। साथ वाली मेडम जी...सो काल्ड बाई साब लोग कहती, "आप भी न... ऐसी दया किस काम की। अरे! इन्हें सरकार पगार-भ...
क्या गलती थी?
कविता

क्या गलती थी?

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** बुद्ध ही मिल रहा जगह-जगह की खुदाई में, कैसे उजाड़ा होगा सभ्यता को दंभ और घमंड भरी लड़ाई में, क्या कसूर था महामानव बुद्ध का, जिसने हमेशा विरोध किया कत्लेआम और युद्ध का, उसने मानव मानव में भेदभाव मिटाया है, दुनिया को अहिंसा और अमन शांति की राह दिखाया है, जिसने भी किया होगा शांति उपदेश, शिलालेख और मूर्ति को नेस्तनाबूद, नहीं रहा होगा निश्चित ही जिसका ऐतिहासिक वजूद, वो झूठा होगा, दंभी होगा, झूठी शान वाला एकदम घमंडी होगा, नहीं सह पाया होगा सत्य की बड़ी ताकत को, भूल गया होगा लोगों की शराफत को, मिटाया होगा कुछ इमारतों व किताबों को, पर कैसे वो मिटा पाता भाईचारे की रवाज़ों को, देश बुद्ध का है हर जगह दिखेगा वजूद, तर्क व विज्ञान सम्मत विचार है फिर से होगा ही मजबूत, विचारों को मिटाने की जरा बताएंग...
७० घंटे देश क़ी प्रगति क़े
आलेख

७० घंटे देश क़ी प्रगति क़े

 संगीता सनत जैन इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** नारायण मूर्तिजी द्वारा भारत देश क़े युवाओं को सप्ताह मेँ ७० घंटे तक काम कर देश को विकसित देश मेँ शामिल करने क़े आव्हान पर देश ज़हिर तौर पर दो घड़ो मेँ बँटा है। प्रधानमंत्री जी क़े किसी वक्तव्य पर इतनी रायशुमारी नहीं हुई, जितनी इनफ़ोसिस क़े फाउंडर और मिलेनियर नारायण मूर्तिजी क़े इस एक व्यक्तव्य नें बुद्धिजीवी और व्यावसाईक जगत को अपनी राय रखने पर मजबूर कर दिया है। यहाँ यह बताना उचित होगा क़ी क़ानूनी रूप से भारतीय कारखाना अधिनियम १९४८ क़ी धारा ५१ क़े अनुसार एक कर्मचारी प्रति सप्ताह ४८ घंटे काम करेगा, जिसका ज़्यादा से ज़्यादा वक़्त १० घंटे ३० मिनिट हो सकता है। लगातार ५ घंटे काम करने क़े बाद ३० मिनट का ब्रेक और ओवरटाइम क़े पैसे अलग से दिये जायेगे। ८ घंटे काम क़े ८ घंटे सोने क़े और ८ घंटे स्वयं और परिवार क़े लिये। हम कह सकते है कि भारत युवाओं का ...
लहरों की आशाएं
कविता, रोला

लहरों की आशाएं

हितेश्वर बर्मन डंगनिया, सारंगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** बहती नदिया अपनी रास्ता खुद से बना लेती है राह के चट्टानों को लहरों से बहा ले जाती है। दृढ़ संकल्प लिये बढ़ती सदा अपने लक्ष्य को मुड़कर कभी देखती नहीं है पीछे के दृश्य को। जोश, जुनून के साथ बहती लहरों में है उफान मंजिल की ओर बढ़ती है मन में लिए तूफान। राह बनाती बह रही है, पथरीली रास्ते को काटकर अंजाम छोड़कर हर बाधाओं से लड़ रही है डटकर। थमती नहीं है कभी एकाग्र होकर नित्य करती अपना काम वो जानती है एक दिन सागर के तट पर लिखा है अंजाम। निडर होकर हरदम बहती है चाहे मार्ग में आये कितनी बाधाएं लहरों से शंखनाद करती चल रही है मन में लिये कितनी आशाएं। परिचय :-  हितेश्वर बर्मन निवासी : डंगनिया, जिला : सारंगढ़ - बिलाईगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। ...
दीयों की दीपावली पर महत्ता
आलेख

दीयों की दीपावली पर महत्ता

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** कुम्हारों के वंशागत पेशे से जगमगाती आ रही है दीपावली। आधुनिक युग में आधुनिक साज सज्जा की रोशनी में ध्यान केंद्रित है। दीपावली की रौशनी में भी आधुनिकता परोसने की घुड़दौड़ मची है। देशी विदेशी कम्पनी अपनी नई छाप छोड़कर नई रौशनी को परोसकर दीपावली की रौशनी के रंग बिखेरना चाहती है। यह उत्सव संस्कृति, परम्परा के निर्वाह से गहरा जुड़ा है। इसमें दीयों का होना आवश्यक है। कहा जाता है बिन दूल्हे के बारात का कोई महत्व नहीं ठीक दीयों के बिन दीपावली सुनी समझी जाती है। घर की मांगलिक महालक्ष्मी की पूजा पद्धति, सजावट, घर की रौशनी में दीयों की खरीददारी अनिवार्य होती है। आधुनिक सामग्रियों को कितना ही क्यों न व्यवहृत किया जाए, दीये के स्थान को छीन पाना असम्भव है। पूजन पद्धति संस्कृति परम्परा के निर्वाह में दूसरी सामग्री मूल्यहीन होती है सिर्फ मिट्ट...
उठते ही रहना
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उठते ही रहना

शांता पारेख इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** ये एक सौ चालीस करोड़ लोगों का देश है। कुछ लोग चांदी का चम्मच लेकर जन्म लेते होंगे, पर कितने रोज जन्म ले रहे, कई घिसट रहे, कोई तड़प रहे, किसी ने कुछ पा लिया तो वह उसके स्वाद की चुस्कियां ले रहे, कोई पाने के लिए जद्दोजहद कर रहा, कुछ उसी में पिस रहे, कुछ गिर के खड़े हो रहे, तो कुछ बार बार गिर रहे, कुछ एक दम गायब हो रहे जिनका अतापता ही नही। दुनिया रेलम पैला है। स्टेशन जैसी हड़बड़ी में सब है। कोई चढ़ गया कोई उतर गया कोई लटक के लहलुहाँ हुआ। कितने नज़ारों से भरी दुनिया है, किसी की कहानी दूसरे की कहानी से मिलती ही नही। सबके किरदार सबके मंच व अदायगी है। पर एक चीज जो सबमे सामान्य है शाश्वत है, विश्वव्यापी है, वह है गिर गिर के उठना, हर उठने की प्रक्रिया में कुछ सीखना, सीखे हुए में कुछ दूसरा मिला कर पहले की गलती को न दोहराते हुए कुछ अच्छा बड़ा करने...
घनघोर घटाएँ
गीत

घनघोर घटाएँ

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** छाईं हैं घनघोर घटाएँ, तन-मन को आनंदित कर दे। अंतस् का तम दूर सभी हो, जीवन को अनुरंजित कर दे।। नेह-किरण तेरी मिल जाए, दुविधा में जीवन है सारा। मधुरस नैनों से छलका दो, रातें काली, राही हारा।। दम घुटता है अँधियारो में, जीवन पथ को दीपित कर दे। निठुर काल की छाया जग पे, मौत सँदेशा पल-पल लाती। रोते नैना विकल सभी हैं, क्षणभंगुर काया घबराती।। विहग-वृंद सब घायल होते, आस-दीप आलोकित कर दे। पीर बड़ी है पर्वत से भी, टूटी सारी है आशाएँ। क्रंदन करती है ये धरती, पग-पग पर देखो बाधाएँ।। डूबी निष्ठाओं की नौका, प्रेम-बीज को रोपित कर दे। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सुमित्रा पाठक पिता : स्व. हरि मोहन पाठक पुत्र : सौरभ भट्ट पुत...
नवा सोच अऊ नवा उमंग
गीत

नवा सोच अऊ नवा उमंग

खुमान सिंह भाट रमतरा, बालोद, (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी गीत) नवा सोच अऊ नवा उमंग युवा शक्ति के जब होथे गठन सुवा गीत के तर्ज म समर्पित रचना... तरी हरी नाना मोर नाना रे नाना हो चलो युवा शक्ति ल जागाबो.. महिमा बढ़ भारी हे युवा शक्ति के ग भईया युवा होय के फरज ल निभाबो...।। मारबो गुलाटी भेदभाव ल भईया भाईचारा के गठरी म बंधा जाबो आवत हमर नवा पीढ़ी खातिर बर रद्दा सुघ्घर गढ़ जाबो.. चलो जुर - मिल सुंता के बीड़ा उठाबो हमर संस्कृति अऊ परंपरा उजियार करे बर कंधा से कंधा मिलाबो ... युवा शक्ति मिशाल बनके ग भईया सभ्य समाज गढ़ जाबो... तरी हरी नाना मोर नाना रे नाना युवा शक्ति ल जागाबो.. परिचय :- खुमान सिंह भाट पिता : श्री पुनित राम भाट निवासी : ग्राम- रमतरा, जिला- बालोद, (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्...
भारतीय मतदाताओं का दृष्टिकोण
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भारतीय मतदाताओं का दृष्टिकोण

विश्वनाथ शिरढोणकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ****************** स्वत्नत्रता के ७५ वर्षों में हमारे देश का लोकतंत्र जितना सुदृढ़ और परिपक्व हुआ है, हमारा मतदाता उतना ही संकुचित होता जा रहा है। इसे एक विडम्बना भी कह सकते है। परन्तु यह वास्तविकता है। इसका एक महत्वपूर्ण कारण, पहले भी और आज भी भारत में राजनीतिक दलों का वैचारिक दृष्टि से परिपक्व न होना है। उनकी सोच राष्ट्र के लिए न होकर अपने दल के लिए और इससे बढ़कर भी नेताओं के व्यक्तिगत स्वार्थ हेतु होती है। लोकतंत्र यह लोगों द्वारा, लोगों के लिए ,लोगों की व्यवस्था होती है, यह मूल मंत्र राजनीतिक दलों द्वारा भुला दिया गया है। राजनीतिक दलों द्वारा भारतीय राजनीति का हित शुरू से ही मतदाताओं को अशिक्षित रखने में ही समझा गया। आजादी के बाद से ही हमारे देश में शिक्षा एवं स्वास्थ्य पर बहुत कम खर्च किया गया है। परिवार और समाज में अगली पीढ़ी को शिक्षित, स्वस्थ ...
भक्ति रस है राधा
कविता

भक्ति रस है राधा

डॉ. किरन अवस्थी मिनियापोलिसम (अमेरिका) ******************** श्री कृष्ण हैं परमेश्वर तो भक्ति भाव हैं राधा बिन राधा कृष्ण अधूरे, और कृष्ण का ज्ञान है आधा। दस वर्ष के बालक बन गोपियों को रहस्य बतलाना ईश्वर से न कुछ भी छिपा है तो उससे क्या छुपाना। हर गोपी संग रास रचाकर ईश्वर का रुप दिखाया सांसारिक जीवन से उठकर उनमें आध्यात्मिक भाव जगाया। राधा तो पराकाष्ठा भक्ति की वो नहीं कोई संसारी उनके जैसा भाव न‌ कोई न ही कोई कृष्ण आचारी। कृष्ण को पाना‌ चाहा तो राधा सी भक्ति में डूबेंगे भक्ति रस में सराबोर हो योगेश्वर कृष्ण को पा लेंगे।। परिचय :- डॉ. किरन अवस्थी सम्प्रति : सेवा निवृत्त लेक्चरर निवासी : सिलिकॉन सिटी इंदौर (मध्य प्रदेश) वर्तमान निवासी : मिनियापोलिस, (अमेरिका) शिक्षा : एम.ए. अंग्रेजी, एम.ए. भाषाविज्ञान, पी.एच.डी. भाषाविज्ञान सर्टिफिकेट कोर्स : फ़्रेंच ...
साजन और चांद
कविता

साजन और चांद

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** मेरा चंदा मम् सजन, जीवन का उजियार। देखूँ उसको रोज़ पर, नित्य बढ़ रहा प्यार।। मेरा चंदा संग है, केवल मेरा चाँद। मिलना हुआ नसीब है, बाधाओं को फाँद।।। मेरा चंदा रूपमय, मेरे सिर पर ताज। मुझको उस पर है सदा, बेहद ही तो नाज़।। मेरा चंदा बस मिरा, मुझ तक उसका नूर। हर पल मेरे पास है, रहे कभी नहिं दूर।। मेरा साजन पूर्णिमा, लगे सुधा की धार। चंदा-सा है शीतला, है हर सुख का सार।। बदली ढँक सकती नहीं, दमक रहा मम् चाँद। मधुर मिलन का कर रहा, जो नेहिल अनुवाद।। चाँद जगत के वास्ते, साजन मेरा प्यार। यही प्यार चंदा लगे, करे हृदय झंकार।। सखी पूज निज साजना, अपना चंदा जान। जो देता उजियार है, हो बस उसका मान।। साजन में ही चांद है, साजन तो हैं ईश। नहीं झुके उनका कभी, हे! प्रभु किंचित शीश।। व्रत में शामिल नेह है, यु...
प्रीति गगरिया
गीत

प्रीति गगरिया

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** प्रीति गगरिया छलक रही है, भटक रहा उर बंजारा। चातक मन निष्प्राण हुआ है, मरुथल है जीवन सारा।। प्रीत घरौंदा टूट गया है, करें चूड़ियाँ हैं क्रंदन। मौन पायलों की रुनझुन है, भूल गया है उर स्पंदन ।। कैद पड़ी पिंजरे में मैना, दूर करो अब अँधियारा। अवसादों में प्रीत घिरी अब, सहमी तो शहनाई है। कुंठित हुई रागिनी सरगम, प्रेम-वलय मुरझाई है।। अवगुंठन में छिपा चाँद है, पट खोलो हो उजियारा। जर्जर ये जीवन की नैया, हिचकोले पल-पल खाती। बहती हैं विपरीत हवाएं, भूले प्रिय लिखना पाती।। गूँगी बहरी दसों दिशाएँ, बहे आँसुओं की धारा। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सुमित्रा पाठक पिता : स्व. हरि मोहन पाठक पुत्र : सौरभ भट्ट पुत्र वधू : डॉ. ...
इच्छारोधन तप
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इच्छारोधन तप

शांता पारेख इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** गाय को चरते देखा है, वह चरागाह में घांस जब खाती है ऊपर से घांस को खाते हुए आगे बढ़ती है। धीरे-धीरे मैदान की घांस कम हो जाती तब वह पूर्व स्थान पर आती तब तक फिर से घांस उग जाती। याब आप गधे को देखिए दोनो शाकाहारी जानवर है व घांस ही खाते हैं, गधा घांस को उखाड़ कर खाता व जड़ समाप्त हो जाती है। मनुष्य जाति गधे की तरह आचरण कर रही है, जो भी चीज मिलती है, उसको जरूरत है तो उसका भरपूर दोहन कर लेती है। पहले कोयले से बिजली बनाई वह भंडार जब खत्म होने को आया तो वैकल्पिक ऊर्जा के रूप में पानी, पवन चक्की सोलर ढूंढ लिया। नदी की रेत निकाल कर उसको कंगाल कर दिया। पहाड़ो से कितनी चट्टाने आएगी व रेत बनेगी। बनने व उपभोग में बड़ा अंतर है याब रो रहे छलनी हो गई नदिया। ग्रामीण अंचल में लकड़ी ,बांस, बल्ली व बड़े पत्तो से झोपडी बनती, पुरानी होती तो जलावन बनती, नई क...
हां जारी है सफर
कविता

हां जारी है सफर

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** हां जारी है सफर, पैदल, बस की या फिर ट्रेन की, मुझे यकीन है कोई तो कर रहा होगा जिंदगी का सफर साथ प्लेन की, सफर होता जरूर है अनवरत जब तक आ न जाएं मंजिल, संतुष्ट न होइए क्योंकि कब कहां हो जाये जीवन बोझिल, सफर ही कर सकता है जीवन की मंजिल का अंत, निर्माण उतना मुश्किल भी नहीं है यदि छुपा न हो विध्वंस, सृजन और निर्माण जीवन के है दो पहलू, पर कोई क्या कह सकता है? कोई नहीं बता सकता कि आगे क्या हो सकता है, कोई हंस सकता है कोई रो सकता है, गाड़ी जहां थमी रुक सकता है जीवन कोई बता सकता है क्या ग्यारंटी है, अंत कुछ भी हो सकता है भले ही वो कोई संतरी या मंत्री है, समय किसी के लिए रुक नहीं सकता, वो ताकतवर के सामने झुक नहीं सकता, सफर सतत चलने का नाम है, कर्मों में ही छुपा अंजाम है, तो कोशिश ...
चीर
कविता

चीर

किरण पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** इस चीर की महिमा भारी इस चीर की शोभा न्यारी। चीर देखो ग्रंथ हे रचता, ब्रह्मा विष्णु महेश हे पलता। "चीर से तो लाज है अपनी, इस चीर से सम्मान है चीर से तो आन जगत में, यह चीर ही तो शान है" चीर में खुशियां झलकती, सब व्यथा इसमे है छुपी। चीर ही इतिहास बनता, द्रोपदी सीता सती। चीर मै गोपियों के आंसू, यमुना का सा नीर था। इतिहास साक्षी है यहां पर, विदुरानी का अंग ढका। चीर में श्री कृष्ण बसते, चीर ही तो कृष्ण था। नानी बाई का भात हे भरने, श्रीकृष्ण ही तो चीर था। परिचय : किरण पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मंडल जबलपुर से सम्मानित २. अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना उज्ज...
सामाजिक सरोकार
कविता

सामाजिक सरोकार

सीमा रंगा "इन्द्रा" जींद (हरियाणा) ******************** आया बनकर हितैषी हमारा सामाजिक सरोकार परिवार हमारा अलख जगा दी जन-जन में दवाई, पढ़ाई और कमाई की नहीं मांगते हीरे-जवाहरात बस चाहिए रोजगार इन्हें कर रहे शुरुआत नई ये भारत शक्ति सम्मान की दे रहे मान गुरुओं को रख संग मात-पिता को सत्य पथ पर चलकर जग में लहरा देंगे तिरंगा मिलकर युवाओं ने हौसला बढ़ाया बुड्ढा खेड़ा को बनाया आदर्श गांव सबको दे रहे सम्मान सरीखा चलकर एकता की राह पर सीमा भी डाल रही आहुति यज्ञ में आओ बहनों ! आओ साथियों ! बनो भागीदारी महायज्ञ के हरियाणा की शान बढ़ा दो गांव का संदेशा ये निराला पहुंचा दो जन-जन तक परिचय :-  सीमा रंगा "इन्द्रा" निवासी :  जींद (हरियाणा) विशेष : लेखिका कवयित्री व समाजसेविका, कोरोना काल में कविताओं के माध्यम से लोगों टीकाकरण के लिए, बेटी पढ़ाओ बेटी...
चांँद लगती हो तुम
कविता

चांँद लगती हो तुम

रामेश्वर दास भांन करनाल (हरियाणा) ******************** मेरी परवाह करती हो तुम हर रोज़, रखती हो व्रत करती हो तुम दुआ, मैं जीता रहूंँ उम्र भर स्वस्थ रहूंँ, प्यार करूंँ तुझ से तेरे साथ रहूंँ, मैं भी रखता हूंँ हर-पल ख़्याल तेरा, तूं कुछ पल ना दिखे हो जाता है बेहाल मेरा, सजना-संवरना और करना नखरे तेरा, और खूबसूरत बनाता है ये हुस्न तेरा, मुझे तो हर रोज़ ही चांँद लगती हो तुम, साथ रहकर रोशन जीवन कर देती हो तुम परिचय :-  रामेश्वर दास भांन निवासी : करनाल (हरियाणा) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, ...
रहे सलामत मेरा सजना
कविता

रहे सलामत मेरा सजना

अंजनी कुमार चतुर्वेदी निवाड़ी (मध्य प्रदेश) ******************** सारे भारत के नर नारी, करवा चौथ मनाते। अपने ही अपनों से मिलकर, अपना उन्हें बनाते। पार्वती शिव और गजानन, की पूजा होती है। चौथ तिथि को पूज्य सुहागिन, सारे दुख खोती है। उत्तम पति की आस ह्रदय रख, कन्यायें व्रत करतीं। सारे सुख सौभाग्य प्राप्ति की, मन में आशा भरतीं। निराहार निर्जल व्रत रखकर, सुंदर रूप सजातीं। दीर्घायु हों सजन हमारे, प्रभु से खैर मनातीं। सारे दिन पकवान बनातीं, गृह कारज करतीं हैं। कर सोलह श्रृंगार सँवरतीं, मन उमंग भरतीं हैं। नए वस्त्र आभूषण पाकर, मन ही मन मुस्कातीं। रहे सलामत मेरा सजना, गीत प्यार के गातीं। अंबर में जब चाँद दीखता, तब पूजा विस्तारें। चलनी और दीप ज्योति से, उसकी छटा निहारें। मधुमय जीवन हो हम सबका, इसी भाव से जीतीं। चाँद देखकर खुश हो जातीं, साजन से जल पीतीं।...
सड़क के किनारे
कविता

सड़क के किनारे

डॉ. सुभाष कुमार नौहवार मोदीपुरम, मेरठ (उत्तर प्रदेश) ******************** सड़क के किनारे बैठी वह जीण-शीर्ण आधे घूंघट में, हाथों में पके-अधपके चावलों का कटोरा लिए। पेट के गड्डे को भर रही थी कुछ इस तरह कि मानो फिर कभी खाली न होगा। लेकर कुदाल उन नाजुक हाथों में, फिर से एक नाली को खोदना होगा। अकेली नहीं थी वह! दामपत्य जीवन के सुबूत उसके दो कर्मवीर सुपु‍त्र, कुदाल के हत्थे को अधिकार स्वरूप छीनने का प्रयत्न कर रहे थे। क्योंकि यही तो मिलेगा उन्हें कुछ संभलने पर! शुक्र है कि उन्होंने कागज कलम नहीं माँगी। वर्ना कहाँ से लाकर देती वो इन निरक्षरों को अक्षर? सुघढ़ थी पर पढ़ी-लिखी नहीं थी वह। पेट की आग में झुलस गया था उस रूपवती का रूप। वर्ना आधुनिकता के अधनंगे लिबास में, सड़क के किनारे किसी रेस्तराँ में वेटर को कुछ इठलाती ऑर्डर लिखवाती। पर वह तो सूँत-सूँतकर खाए...