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कविता

कहा गया रिश्तों से प्रेम
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कहा गया रिश्तों से प्रेम

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** कहा गया रिश्तों से प्रेम आजकल रिश्तों से प्रेम कही खो गया है। प्रेम से बिछड़े एक जमाना हो गया है। ******** आजकल बनते हैं पैसे से रिश्ते यदि आप धनवान है तो सब बनायेंगे आपसे रिश्ते। ******* सगा गरीब रिश्तेदार भी किसी को नहीं सुहाता है। अमीर हो कोई दूर का रिश्तेदार वह सबको भाता हैं। ******* आजकल प्रेम की जगह पैसे ने ले ली है। दुनियां ने अब पतन की राह ले ली है। ******* गरीब रिश्तेदारों से लोग मुंह फेर लेते है। और धनवान रिश्तेदार को चारों तरफ से घेर लेते है। ******** हर रिश्ते में प्रेम बनकर रखिए पैसों से रिश्ते को दूर रखिए। ******** आजकल हर रिश्ते मतलब से चलते है अगर काम निकल गया तो ******** बिना प्रेम के रिश्ते स्थाई नहीं होते ऐसे रिश्ते है पानी के बुलबुले जैसे होते । ******** ह...
वो एक पवित्र आत्मा है
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वो एक पवित्र आत्मा है

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** इस से अद्भुत पल और क्या हो सकते हैं, दिल की गहराइयों के साथ, अपने पालतू सहचर के साथ प्यार से घिरे रहना ! इन शांत क्षणों में कोई शर्त नहीं कोई निर्णय नहीं केवल एक पवित्रता और विश्वास का आभास! वो विश्वास जो कभी डगमगाता नहीं वो ऐसा साथी जो बदले में कुछ मांगता नहीं! वो ऐसा साथी जो हमे सब्र की परिभाषा सिखाता है, सिर्फ, प्यार बांटना जानता है ! उससे बंधी स्नेह की डोर कभी कमजोर नहीं पड़ती, वो रिश्तों में ठहराव जानता है, हमसे हमारी पहचान कराता है, वो इंसान से कहीं कई गुना अनमोल है, क्योंकि वो एक "जानवर" है, वो पवित्र आत्मा है !! परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी शिक्षा : एम. ए., एम.फिल – समाजशास्त्र, पी.जी.डिप्लोम...
अनूठा व्यक्तित्व
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अनूठा व्यक्तित्व

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** जो देखना चाहते हैं मेरी तबाही का मंजर उनको बता दूं मैं सर्वदा बहने वाला हूं पर तुम शाश्वत न रहने वाले हो। जो देखना चाहते हैं मेरी आंखों में आंसू उनको बता दूँ मैं इस आब-ए-चश्म में डूब कर ही तैरना सीखा है। जो देखना चाहते हैं गम-ए-हयात में मुझे डूबता हुआ उनको बता दूँ इसी समुद्र में विजय की नौका पर हर मंजिल फ़तह करना सीखा है। जो देखना चाहते हैं मुझे दूसरों के आगे नत हुआ उनको बता दूँ माँ काली के आगे सिर झुका कर ही सिर उठाकर जीना सीखा है। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। ...
मुझे तुम भूल जाना …
कविता

मुझे तुम भूल जाना …

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* साथ देखा था कभी जो एक तारा आज भी अपनी डगर का वो सहारा आज भी हैं देखते हम तुम उसे पर है हमारे बीच गहरी अश्रु-धारा नाव चिर जर्जर नहीं पतवार कर में किस तरह फिर हो तुम्हारे पास आना। भूल पाओ तो मुझे तुम भूल जाना! सोच लेना पंथ भूला एक राही लख तुम्हारे हाथ में लख की सुराही एक मधु की बूँद पाने के लिए बस रुक गया था भूल जीवन की दिशा ही आज फिर पथ ने पुकारा जा रहा वह कौन जाने अब कहाँ पर हो ठिकाना। भूल पाओ तो मुझे तुम भूल जाना! चाहता है कौन अपना स्वप्न टूटे? चाहता है कौन पथ का साथ छूटे? रूप की अठखेलियाँ किसको न भातीं? चाहता है कौन मन का मीत रूठे? छूटता है साथ सपने टूटते पर क्योंकि दुश्मन प्रेमियों का है ज़माना। भूल पाओ तो मुझे तुम भूल जाना! यदि कभी हम फिर मिले जीवन-डगर पर मैं लिए आँसू, लिए तुम ...
वीर अभिमन्यु
कविता

वीर अभिमन्यु

साक्षी लोधी नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) ******************** शकुनि ने चल दी, अनेतिक चाल आज केसे भी करके, बंदी बने गर धर्मराज हार पांडवों की, हो सुनिश्चित जाएगी सिंहासन दुरियोधन को , मिल जायेगी यहां चक्रवियू, गुरु द्रोण ने रच दिया अर्जुन को भेज, कुरुक्षेत्र से बाहर दिया पांडवो में घोर चिंता छा गई ये भयानक आज बिपदा आ गई व्यूह भेदन अर्जुन को केवल आता यहां पूछते हैं युधिष्ठिर आज अर्जुन हे कहां इतने में अभिमन्यु भी रण में आ गया पांडवों में आश बनकर छा गया मुझे दो आज्ञा में जाऊ युद्ध करने कुटिल नीति शत्रुओं की शुद्ध करने बोले युधिष्ठिर तुम अभी नादान बालक उस और भारी महारथी हैं व्यूह चालक हठ तुम्हारी व्यर्थ है ये छोड़ दो रथ को अपने पीछे तरफ को मोड़ दो अब लिखने का समय आ गया, अपनी अमर कहानी लोट गया जो समर छोड़ तो, फिर धिक्कार जबानी आज अपने रक्त से इतिहास लिखकर आऊंगा मार...
अन्नदाता
आंचलिक बोली, कविता

अन्नदाता

प्रीतम कुमार साहू लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** छत्तीसगढ़ी कविता नांगर, बईला धरे तुतारी खेत खार जेकर संग वाली ! उठथ बिहनिया जावत खेत, भूख पियास हरागे चेत !! धरती ल लागिस पियास, सुन गोहार आइस आगास ! टरर-टरर मेचका नरियाय मोर, पपिहा, कोयल गावय !! गड़-गड़-गड़-गड़ बादर गरजे झर-झर-झर पानी बरसे ! हरियर-हरियर धरती होगे, तरिया डबरी लबालब होंगे !! खेत जोत के बोइस धान, धरती दाई के राखिस मान ! रेगड़ा टूटत मेहनत करथे घाम पियास सबो ल सहिथे !! जावय खेत किसनहा बेटा, धरे चतवार निकालय लेटा ! खेत जोत के फसल उगावत हरियर धरती के गुनगावत !! बन बुटा के निदाई करथे, गाय गरु ले फसल ल बचाथे ! जम्मो झन के भूख मिटाथे अन्नदाता वो हर कहलाथे !! परिचय :- प्रीतम कुमार साहू (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित...
मूर्ख और धूर्त
कविता

मूर्ख और धूर्त

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** देखो-देखो न गौर से आंखें उनकी सुर्ख है, एक मूर्ख, मूर्ख है और दो मूर्ख भी मूर्ख है, हालात में न आये सुधार, आ जाये जब मूर्खों की बाढ़, इधर भी मूर्ख उधर भी मूर्ख, कई राजनीति के युवा तुर्क, देशद्रोही सिखाए देशप्रेम, मवाली, गुंडों की चिंता में रहते पूछते ये कुशलक्षेम, तनाव खूब बढ़ाते हैं, भोला खुद को बताते हैं, भावनाओं से खेलना खेल नहीं, दंगे फसाद के खेलों में न समझो रखते तालमेल नहीं, जनता पीछे-पीछे फिर भागेगी, न जागा कभी न जागेगी, आस्था को भड़कायेंगे, जलती जनता को ये जलाएंगे, है जमी हुई जो भाईचारा, उकसाकर उसे पिघलायेंगे, नफरतों का फिर आएगा बाढ़, गुस्से से होगा फिर ताड़मताड़, न मानो इन्हें सीधा साधा नहीं मानोगे ये तो धूर्त है, एक मूर्ख, मूर्ख है और दो मूर्ख भी मूर्ख है। परिचय :- ...
बरसते मेघों की पुकार
कविता

बरसते मेघों की पुकार

चेतना सिंह प्रकाश "चितेरी" प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) ******************** बरस रहे हैं मेघ, तड़प रही हूँ मैं, भीगनें को दिल चाहता है, रोक न पाऊँगी ख़ुद को, तुमसे मिलने जी करता है। आकर देखो अपने द्वार पर, बागों में मोर नाच रहा, पक्षियों का कलरव हो रहा, रोक न पाओगे ख़ुद को, मुझसे मिलने को मन करेगा। आनेवाला है सावन, अभी से धानी चुनरिया ओढ़कर, पलकें बिछा के रखी हूँ, आना होगा तुम्हें, न कोई अब बहाना चलेगा। मेरा हाल सुनकर, मेरे प्रियतम! रोक न पाओगे ख़ूद को, बरस रहे हैं मेघ गरज रहा है बादल। परिचय :- चेतना सिंह प्रकाश "चितेरी" निवासी : प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्...
शिक्षा हर कहां जात हे
आंचलिक बोली, कविता

शिक्षा हर कहां जात हे

खुमान सिंह भाट रमतरा, बालोद, (छत्तीसगढ़) ******************** छत्तीसगढ़ी कविता जेती जाथव तेती बस ऐके ठन गोठ गोठियावत पाठशाला ह तो खुल गे संगवारी हो फेर लईका मन के पढ़े लिखे बर कापी-पुस्तक हर नई आवत हे ये सब ल देख कवि ल ईही जनावत हे लागथे अईसे की देस ह शिक्षा के दम नई चलय, ये बात ह थोरकिन सही होय कस लागत हे निशा दारू अऊ भांग म सबे झन बोहावत हे जेला देख के लईका मन ल अपन भविष्य के चिंता हर सतावत हे धीरे - धीरे शिक्षा के डोरी हर अब सरहा पेरा डोरी होय कस लागत हे तेकरे सेती लईका मन के भविष्य हर नदियां के धारे-धार कस बोहावत हे फेर हमर राज पाठ के सियान म ल ईही म अडबर मजा आवत हे तेखरे सेती पाठशाला म ताला अऊ मधुशाला ल किसम-किसम के जिनिस ले सजावत हे जेखर आंखी म करिया पटृटी बंधाएं ओहा शिक्षा के महिमा ल का जान ही थोरकुन ज्ञान ल पाय रतीस त भविष्य बर सोचतीस घलो ईहे तो अधुरा ...
पसंद हैं मुझे भी कुछ खास
कविता

पसंद हैं मुझे भी कुछ खास

सौ. निशा बुधे झा "निशामन" जयपुर (राजस्थान) ******************** किसी क्या 'फर्क' पड़ता है। क्या! पसंद हैं मुझे खास। बोलना पसंद है। पर चुप रहती आजकल। सोचती हूँ सह जाऊँ दर्द वो जमाने के, पर क्या? करू वो भी तो अपने हैं खास पसंद में शामिल है। आज नदी, पर्वत, मंद-मंद हवा ये सब बेचेन है। शोर बस मेरा 'मौन' हैं! लिख देती हूँ। कलम में भी तो आवाज़ हैं। हलचल! अब कुछ कम है। अब यहीं 'मुझे पसंद है। चारों ओर से आ रहीं कुछ अनकही बातें, जो न मैने कहीं और न उसने सुनी वो बातें। फिर फिर! क्यों गरज रहें अपवादों के सायें ये भी क्या? सही बात है। पसंद हैं अपनी फिर क्यों! होती इसी बात पर रोज तकरार हैं। परिचय :- सौ. निशा बुधे झा "निशामन" पति : श्री अमन झा पिता : श्री मधुकर दी बुधे जन्म स्थान : इंदौर जन्म तिथि : १३ मार्च १९७७ निवासी : जयपुर (राजस्थान) ...
बीते पल
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बीते पल

निकिता तिवारी हलद्वानी (उत्तराखंड) ******************** बीते पल याद करने में बेचेन हो उठती हूँ सुख और दुख दोनों से गुजरती हूँ सुख ये कि भाग्यवान होंगी जो उस खुशी के पलों में शामिल थी पर उस खुशी से भी ज़्यादा दुखी तब जब खुशी की बात पर सोचती की मैंने यह क्यों नहीं किया? ठोड़ा समय और क्यों नहीं बीताया? अन्त अफशोश करती क्योंकि पता है मुझें वह समय मेरे लिए दुबारा लौटकर नहीं आएगा परिचय :-  निकिता तिवारी निवासी : जयपुर बीसा, मोटाहल्दू, हलद्वानी (उत्तराखंड) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्र...
सपने में स्वप्न देखती हूँ
कविता

सपने में स्वप्न देखती हूँ

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** सपने में स्वप्न देखती हूँ, एक दृश्य जिसमें पीड़ा, घुटन और विरक्ति, कहीं कहीं उन्माद है, गहरी खामोशी है ! मैं मेरे विचारों से टकरा रही हूँ ! सपने में जो भी साथ दे, मैं खुद को उसका आभारी समझूँगी, सपनों का विचारों का द्वंद बढ़ता जा रहा है, फिर भी मैं भयभीत नहीं हूँ, हारी नहीं हूँ ! किसी प्रकाश की चाहत है, मुझे खोने का, टूटने डर नहीं है ! अचानक सपने में उम्मीद की किरन से भर उठती हूँ, एक प्रार्थना के शब्द कानो में फुसफुसा रहे है, क्यूँ स्वयं के अस्तित्व को गले लगाना मोह में उलझना, अचानक जाग जाती हूँ, पुनः विचारों में उलझ जाती हूँ, स्वयं से प्रश्न पूछती हूँ, ये स्वप्न था या कोई दुःस्वप्न क्या है ये स्वयं का अस्तित्व, क्या है मोह?? स्वप्न अधूरा है, या अर्थ? सोच को दृढ़ ...
चंपा का फूल
कविता

चंपा का फूल

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** चंपा के फूल जैसी काया तुम्हारी मन को आकर्षित कर देती जब खिल जाती हो चंपा की तरह भोरे .तितलियों के संग जब भेजा हो सुगंध का सन्देश वातावरण हो जाता है सुगंधित और मन हो जाता मंत्र मुग्ध। जब सँवारती हो चंपा के फूलो से अपना तन जुड़े में, माला में और आभूषण में लगता है स्वर्ग से कोई अप्सरा उतरी हो धरा पर। उपवन की सुंदरता बढ़ती जब खिले हो चंपा के फूल लगते हो जैसे धवल वस्त्र पर लगे हो चन्दन की टीके सुंदरता इसी को कहते बोल उठता हूँ - प्रिये तुम चंपा का फूल हो। परिचय : संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता : श्री शांतीलालजी वर्मा जन्म तिथि : २ मई १९६२ (उज्जैन) शिक्षा : आय टी आय निवासी : मनावर, धार (मध्य प्रदेश) व्यवसाय : ड़ी एम (जल संसाधन विभाग) प्रकाशन : देश-विदेश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ व समाचार ...
प्रेयसी की पाती
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प्रेयसी की पाती

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* पता है कुछ वक़्त बाद हम साथ नहीं होंगे वक़्त करवट लेगा तो सब बदल जाएगा तुम मेरे न रहोगे और मै शायद रहूंगी ही नहीं. हां मगर मै तुमको तनहा नहीं छोडूंगी तुझ संग सदैव रहेंगी मेरी यादें मेरा वो अटूट प्रेम जो मैंने आजीवन तुमसे किया मेरी श्रद्धा. श्रद्धा जो तुम्हारे प्रेम के लिए थी वो भी सदैव रहेगी मेरी मुस्कुराहट गूंजेगी तुम्हारे अंतर्मन में हमेशा यूं ही मेरी आंखो में तुम्हारा अक्स जो तुम्हे हमेशा दिखाई पड़ता था वो भी तुम्हे आंखे बन्द करके समक्ष दिखाई देगा. जब भी कोई हवा का झौंका तुम्हे छूकर गुजरेगा तुम महसूस करोगे मुझे अपने आस पास हमेशा ही तुम्हारे मन में मेरे गीत हमेशा गुंजायमान रहेंगे माना कि मेरी कोई जायदाद नहीं जो तुमको सौंप जाऊं मै मेरे पास तो बस तुम्हारा प्रेम है ...
आजाद परिंदे
कविता

आजाद परिंदे

सूर्यपाल नामदेव "चंचल" जयपुर (राजस्थान) ******************** ख्वाबों के जब आजाद परिंदे हकीकत के आसमानों में उड़ते है। बेखौफ कल्पनाओं को सच करने कदम बड़ा चलो कुछ नया करते हैं। वृक्ष लगा सब हरियाली करते सुबह शाम जल सींचा करते हैं। अनाथ बचपन सींचे खुशियां भरते हैं कदम बड़ा चलो कुछ नया करते हैं। रिश्ते ही चहुंओर खुदगर्ज यहां पर अपने ही खुद अपनों से जलते है। द्वेष भूल अपनो के हम गले मिलते हैं कदम बड़ा चलो कुछ नया करते हैं। वृद्धों की अभिलाषाएं मरती एकाकी जीवन में घड़ियां गिनते हैं। कुछ वक्त गुजार अनुभव सुनते हैं कदम बड़ा चलो कुछ नया करते हैं। परिचय :- सूर्यपाल नामदेव "चंचल" शिक्षा : एम ए अर्थशास्त्र , एम बी ए ( रिटेल मैनेजमेंट) व्यवसाय : उद्यमी, प्रबंधन सलाहकार, कवि, लेखक, वक्ता निवासी : जयपुर (राजस्थान) । घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित...
योग की महिमा
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योग की महिमा

डॉ. कोशी सिन्हा अलीगंज (लखनऊ) ******************** उषा की लालिमा छायी किरण की कृपा है आई मनोरम, मनोरम अनुपम, अनुपम सुन्दरम्, सुन्दरम् दिव्यता है भाई ब्रह्म मुहूर्त की सुंदरता है मन में आई ऊर्जा मन -प्राण में हमारी सुगंधता योग की अंतरा में उतराई अधो अंग से ऊर्ध्वाग तक शुचि संस्कार शोभा सरसाई अंग अंग हुआ दुकानदार रग रग हुआ सु उन्नत सुयोग में योग की महिमा सरसायी। परिचय :- डॉ. कोशी सिन्हा पूरा नाम : डॉ. कौशलेश कुमारी सिन्हा निवासी : अलीगंज लखनऊ शिक्षा : एम.ए.,पी एच डी, बी.एड., स्नातक कक्षा और उच्चतर माध्यमिक कक्षाओं में अध्यापन साहित्य सेवा : दूरदर्शन एवं आकाशवाणी में काव्य पाठ, विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में गद्य, पद्य विधा में लेखन, प्रकाशित पुस्तक : "अस्माकं संस्कृति," (संस्कृत भाषा में) सम्मान : नव सृजन संस्था द्वारा "हिन्दी रत्न" सम्मान से सम्मानित, मुक्त...
हमें रोजगार चाहिए
कविता

हमें रोजगार चाहिए

अशोक कुमार यादव मुंगेली (छत्तीसगढ़) ******************** किताबी कीड़ा और रट्टू तोता बनकर की पढ़ाई। दिन, महीने, साल बीते लेकिन नौकरी नहीं आई।। जाग उठा जमीर, बदनसीबी भी हुंकारने लगी है। दु:ख के बादल छा गए, खुशी पुकारने लगी है।। पिता के ताने, पड़ोसियों की हँसी लगे हैं चुभने। छोटी-छोटी बातों से हमारा दिल लगे हैं दुखने।। जनता के बेटे और बेटियाँ भटक रहे हैं दर-बदर। शक्ति की कुर्सी में बैठी सरकार हो गई है बेखबर।। बेगारों का ना आँसू दिखा, ना दिखा दर्द कभी। आस लगाए देख रहे हैं तेरी ओर गरीब सभी।। तुझे राजनीति मुबारक, हमें पद का सौगात चाहिए। खोलो नौकरी का पिटारा, जल्द ही आगाज चाहिए।। अब ना घोषणा, ना वादा, ना बेरोजगार चाहिए। जीवन जीने के लिए हमें सिर्फ रोजगार चाहिए।। परिचय : अशोक कुमार यादव निवासी : मुंगेली, (छत्तीसगढ़) संप्राप्ति : शिक्षक एल. बी., संस्थापक एवं अध्यक्ष य...
फुर्सत और वादा
कविता

फुर्सत और वादा

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** वादा था सात जन्मों तक साथ निभाने का, बिना बताए साथ छोड़ नहीं जाने का सोती पत्नी को देख बूढ़ा डर गया, सांस चेक करने से पहले सिहर गया, मगर बुढ़िया जीवित व सजान थी, पति के लिए मंत्र व अजान थी, बूढ़ा बोला तेरे सिवा दुनिया में मेरा कौन है, हमें भुला सारा रिश्ता मौन है, बेटे-बहू को कमाने से फुर्सत नहीं, मोबाईल वाले पोते पोतियों को अपने दादा दादी की जरूरत नहीं, बुढ़िया बोली बुढ़ऊ तुझे छोडूंगी नहीं, तुझसे कभी मुंह मोडूंगी नहीं, मगर अगले दिन बुढ़ऊ जगाता रह गया, बुढ़िया को आवाज लगाता रह गया, मगर बुढ़िया जा चुकी थी बहुत दूर, साथ लेती गयी साथ न छोड़ने का फितूर, वादा भी टूटा,फुरसतियों का साथ भी टूटा, अपनों के साथ छाया भी रूठा, उस बूढ़े का शक्ल मुझे याद आ रहा है, शायद मेरी कहानी को समय आज पहले दिखा रहा है। ...
छत्तीसगढ़ी भाखा
आंचलिक बोली, कविता

छत्तीसगढ़ी भाखा

प्रीतम कुमार साहू लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** छत्तीसगढ़ी भाखा छत्तीसगढ़ के तँय रहवईया, छत्तीसगढ़ी नइ गोठियावस अड़बड़ पढ़े लिखें हँव कहिके काबर तँय अटियाथस।। अपन बोली, अउ भाखा बर, काबर मरथस् लाज सरम छत्तीसगढ़िया तँय संगवारी कर ले सुग्घर बने करम।। अपन भाखा ल छोड़ के पर के भाखा गोठियावत हस छत्तीसगढ़ी बोली भाखा के तनिक गुन नइ गावत हस।। अपन राज, अपन भाखा के जम्मों झन राखव मान जी छत्तीसगढ़ी बोली भाखा इहि भाखा हमर पहिचान जी।। हमर भाखा छत्तीसगढ़ी संगी, सबों भाखा ले बढ़िया जी तभे तो कहे जाथे संगी, छत्तीसगड़िया सबले बढ़िया जी।। परिचय :- प्रीतम कुमार साहू (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, ...
रास्तों से अपनी यारियां
कविता

रास्तों से अपनी यारियां

साक्षी लोधी नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) ******************** झूमते हवा से मनचले हम कहीं पे क्यों बसर करें ... रास्तों से अपनी यारियां मंजिलों की क्या फिकर करें ... क्या हे जिंदगी के फैसले.. चाहे गम हो साथ में चले मुस्कुराहटों को ओढ के हम तो अपनी धुन में लो चले ... रास्तों से अपनी यारियां मंजिलों की क्या फिकर करें निकले जब सफर के लिए मुडके आशियाना क्यों तकें हस्ते हस्ते काटना सफर फिर क्यों उदाशियां चुने रास्तों से अपनी यारियां मंजिलों की क्या फिकर करें मस्त हो हवाओं संग बहें बादलों को सरफिरा कहें ऊंची चोटियों पे एक दिन जाके आसमां को चूम लें ... रास्तों से अपनी यारियां मंजिलों की क्या फिकर करें परिचय :-  साक्षी लोधी निवासी : नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।...
पुनःस्मृति
कविता

पुनःस्मृति

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मेरी हर बात में तुमको मेरी हर मुलाकात याद आएगी। मेरी हर मुलाकात में तुमको मेरी हर मुस्कुराहट याद आएगी। मेरी हर मुस्कुराहट में तुमको मेरी हर पुकार याद आएगी। मेरी हर पुकार में तुमको मेरी हर आह याद आएगी। मेरी हर आह में तुमको मेरी हर चाह याद आएगी। मेरी हर चाह में तुमको प्रेम की नई राह याद आएगी। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्री...
आषाड़ी बरखा
कविता

आषाड़ी बरखा

गिरेन्द्रसिंह भदौरिया "प्राण" इन्दौर (मध्य प्रदेश)  ******************** आज बगीचे में बरखा की, बूँदों ने जब नृत्य किया। है संवेदनशील प्रकृति इस, मूल तथ्य को सत्य किया।। सौंधी-सौंधी गन्ध धरा की, घर-घर तक ले उड़ी हवा। पंख फड़फड़ा कर खुशियों को, आमन्त्रण दे उठी लवा।। काले-काले मेघ गगन में, सघन और गतिमान हुए। चारों ओर धुन्ध सी छाई, घर-घर के मेहमान हुए।। मन मयूर मतवाले होकर, नाच उठे फिरकी जैसे। चित्त भंग हो गए संयमी बदली कुछ थिरकी ऐसे।। कहीं खनन खन खन्न कहीं पर, गमक छमाछम के स्वर हैं। कहीं छनन-छनन-छन्न टपाटप, तमक झमाझम के स्वर हैं।। एक-एक पाँखुरी पुष्प की, नस-नस में मकरन्द लिए। सुरभित करने लगी मेदिनी , मधुरिम-मन्द सुगन्ध लिए।। गदराई डाली पर मद से सराबोर हर खिली-कली। पर फैला पसरी मादकता, झूम उठी तर गली-गली।। तब रति-पति रसराज झूम कर, तरकश बाण टटोल उठा। बरखा...
छोटू
कविता

छोटू

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** छोटू चाय लाना..!! यह कितनी सामान्य सी पुकार है। थडी, ढाबा, कैफे, रेस्टोरेंट, बस, ट्रेन आदि, सब जगह मौजूद है छोटू। गंदी मैली सी धारीदार कमीज, मोटे धागे से सिली हुई फटी पेंट काली हवाई चप्पल पहने हुए। सिर के रुखे उलझे बिखरे बाल, मुख मलिन आंखों में चमक लिए। सूरज की पहली किरण के साथ दौड पडता है छोटू दूर तक, चाय गर्म, समोसे गर्म लिए। सरकार, मैं और आप नहीं जानते उसका छोटू बनने का कारण ? बनी होगी चक्र व्यूह सी कठोर विपरीत परिस्थितियाँ। मजबूरी ही बनाती हर बालक को अभिमन्यु और छोटू। जहां लडता है वह योद्धा बन, घर परिवार जीवन बचाने के लिए। वो अपना अजीज खोकर आया होगा यहां छोटू बनने। मां, बाबूजी या दोनों को ही, जिंदगी की अनाथ पगडंडियों पर। आती होगी याद उसे अपनों की, सिसकियाँ भरता होगा अकेले में। थक हारकर जब दे...
आएंगे जरूर अच्छे लोग
कविता

आएंगे जरूर अच्छे लोग

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** संभावित निश्चित हार को जानते हुए भी हर हालात मुश्किलात में भी सीना तानकर खड़े हो जाना रही है मेरी फितरत, न लालच, न झोल, न कोई गंदी हरकत, सालों साल से लड़ता आया हूं, न समझना कि फितूर बन छाया हूं, जातिय अन्याय और अत्याचार बर्दाश्त नहीं, दिन अभी चढ़ रहा है हो रहा सूर्यास्त नहीं, मंगल अमंगल की बातें मैं नहीं सोचता, समझता हूं मानव को मानव नहीं उसे नोचता, है ताकत जिनके पास शांति उन्हें स्वीकार नहीं, दूध जब गरम न हो कैसे बन पाएगा दही, प्यार व मोहब्बत उन्हें यदि अंगीकार नहीं, खोखले वादे क्यों सुनें हमें भी स्वीकार नहीं, पीठ पर चलाते गोली सीना क्यों न दागते, संविधान के अनुच्छेदों से दूर क्यों हो भागते, सामने खड़ा मिलूंगा हर युग हर काल, उड़ा देंगे धज्जियां सब लेंगे हम संभाल, लोकतांत्रिक देश मे...
अंतर्मन की पुकार उठी है
कविता

अंतर्मन की पुकार उठी है

हितेश्वर बर्मन 'चैतन्य' डंगनिया, सारंगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** अंतर्मन की पुकार उठी है आज मन में कई सवाल उठी है मन से मन की पुकार उठी है सवालों के जवाब से ही सवाल उठी है। जनता ने सरकार से पूछी है पाँच वर्षों की हिसाब मांगी है जवाब सुनकर जनता उलझी हुई है खुद की बनायी सरकार से ही रुठी हुई है। आज अंतर्मन की पुकार उठी है सरकार भ्रष्टाचार करके मस्त बैठी है इधर जनता अत्याचार से त्रस्त बैठी है राजतंत्र के आला-अधिकारी भी, उसी भ्रष्टता वाली बीमारी से ग्रस्त बैठी है। जनता दिन-रात मेहनत कर रही है सरकार उसका हिसाब ले रही है किस पर कितना टैक्स लगाना है सरकार मन ही मन सोच रही है। जनता को चूसने का मस्त बहाना है टैक्स लगाकर शाही खजाना बढ़ाना है कागज़ में ही सभी काम को निपटाना है अधूरे काम की पूरी जानकारी चिपकाना है। आज अंतर्मन की पुकार उठी है सोयी जनता अब जाग चुकी है ख...