बस्तों का बोझ
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रचियता : डॉ. शीतल पाण्डेय
कहते बच्चों के कंधे झुककर।
न बढाओ बस्तों का बोझ हमपर।।
रट रट बेहाल हुआ बचपन।
नैतिक ज्ञान का पढ़ा ना एक अक्षर।।
छूट गया गलियों से नाता।
गिल्ली डंडा वो खेल तमाशा।।
पलटते किताबों के पन्ने।
दिन हवा बन उड़ जाता।।
मासूम मन समझ न पाए।
छीना जा रहा क्यों उनसे बचपन।।
कहते बच्चों के कंधे झुककर।
न बढाओ बस्तों का बोझ हमपर।।
सुबह उठ मचती भागम भाग।
होती परेड और वही बोझिल क्लास।।
गुम हो गया बचपन का एहसास।
मेरिट बन गई क्यों माता पिता की आस।।
मासूम आँखें करती यही सवाल।
हमारे अपने रखते नहीं हमारा खयाल।।
कहते बच्चों के कंधे झुककर।
न बढाओ बस्तों का बोझ हमपर।।
लेखक परिचय :- डॉ. शीतल पाण्डेय ... पी. एच डी - हिन्दी साहित्य
निवासी : इंदौर (म.प्र.)
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