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कविता

जीवित रहने के मायने
कविता

जीवित रहने के मायने

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** हां देखा है मैंने लोगों को जीवित रहने के लिए करते हुए कवायद, दुआओं से लेकर अपने इष्ठों से करते खुशामद, धन, दौलत, जमीन, घर व बर्तन, सब बेच चाहते हैं रखना स्वस्थ अपना तन-मन, मंदिरों, मस्जिदों, चर्चों, गुरुद्वारों के साथ ही लगाते रहते हैं इस डॉक्टर से उस डॉक्टर के घर आंगन के निश दिन चक्कर, शारीरिक, मानसिक, आर्थिक रूप से डटकर, सिर्फ बेहतर स्वास्थ्य के लिए, इनके तन-मन की पीड़ा किया जा सकता है महसूस, नजर आते कोई प्रसन्न तो लगते दिखते कई तो नाखुश, क्या नहीं आता होगा उनके मन में अपनी इह लीला समाप्त कर लेने का ख्याल, संघर्ष कर उबरने का मौका देता कुदरत बेमिसाल, तो बताओ अरबों खरबों के इस अमूल्य तन को समाप्त कर लेने के लिए हम खुदकुशी जैसा वाहियात कदम उठाएं क्यों, अपनी आंतरिक शक्ति को ...
स्त्री
कविता

स्त्री

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** सच में अगर हम कविता रचते स्त्री पर रचे वो प्रकृति का साक्षात् रूप होती कविता और स्त्री दोनों ही सृजन करती और दोनों के बिना तो यह धरती बंजर होने में देर नहीं लगती I कविता और स्त्री जगह पर तमाम मोहक रूपों में दिखती और हम अभिभूत होते जाते जीवन चक्र की भाति। परिचय : संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता : श्री शांतीलालजी वर्मा जन्म तिथि : २ मई १९६२ (उज्जैन) शिक्षा : आय टी आय निवासी : मनावर, धार (मध्य प्रदेश) व्यवसाय : ड़ी एम (जल संसाधन विभाग) प्रकाशन : देश-विदेश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ व समाचार पत्रों में निरंतर पत्र और रचनाओं का प्रकाशन, प्रकाशित काव्य कृति "दरवाजे पर दस्तक", खट्टे मीठे रिश्ते उपन्यास कनाडा-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्व के ६५ रचनाकारों में लेखनीयता में सहभागिता सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी र...
भरोसा टूटे तो …
कविता

भरोसा टूटे तो …

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* भरोसा टूटे तो एक दफ़ा फिर उठ खड़े होना साथी को बिना कोसे बिना कुछ कहे। दुनिया बहुत बड़ी है बहुत से लोग हैं, जो शायद तुम्हें ही ढूँढ़ रहे हों आशा के मोती एक बार फिर पिरो लेना और विश्वास की एक मज़बूत माला बना लेना। यह नितांत व्यक्तिगत है कि तुम फिर कभी किसी को न चाहो या अपना मन किसी और को सौंपने का साहस न कर सको लेकिन, यदि कभी लगे कि साथ की आवश्यकता है तो अपनी इस अनुभूति से लज्जित मत होना उसे आकार देना, एक और प्रतिमा गढ़ना जिसे 'प्रेम' कहा जाए जिसे 'साथ' पुकारा जाए जिसे फिर से खड़े हो जाने का पर्याय माना जा सके। एक बार स्वयं पर यह उपकार करना अपने नए सृजन पर गर्व करना कृतज्ञ रहना उस नए आदम के प्रति जो तुम्हारे अधरों की मुस्कान का कारण बना मन धीरे-धीरे रमेगा तुम थ...
बढ़ती जनसंख्या
कविता

बढ़ती जनसंख्या

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** (११ जुलाई विश्व जनसंख्या दिवस) जनसंख्या में देश हमारा, विश्व में अव्वल होगा ! हम दो हमारे दो से इस समस्या का हल होगा !! बेटा-बेटी दोनों को समान शिक्षा व अधिकार दो हर परिवार का हो एक ही नारा हम दो हमारे दो !! बेटा की चाहत में अपने परिवार को ना बढ़ने दो शिक्षा, और संस्कार के लिए बच्चों को खूब पढ़ने दो !! भुखमरी और बेरोजगारी से लोगों की जान बचायेंगे ! छोटा परिवार के नारे को सच कर हम दिखायेंगे !! छोटा सा परिवार हमारा, खुशियाँ का आधार हैं ! मिल जुल कर हम रहते है यही हमारा प्यार है !! शिक्षा-दीक्षा देकर बच्चों को काबिल हम बनायेंगे ! अशिक्षा को दूर भगाकर, शिक्षा की अलख जगायेंगे !! बेटा-बेटी दोनों अच्छा उसमें ना तुम भेद करो ! बेटियाँ, बेटों से कम नहीं यह सच स्वीकार करो ...
आसार
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आसार

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मुझे नफ़रत ज़रा सोच समझ कर करना मोहब्बत होने के आसार होते हैं। मेरी बात औरों से ज़रा सोच समझ कर करना इश्क होने पर सब कुर्बान होते हैं। दिल की बात सोच समझ कर करना अपनों में भी कई गद्दार होते हैं। हमराही को हमसफर सोच समझकर बनाना धोखा मिलने के भी आसार होते हैं। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाई...
सफलता की ओर
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सफलता की ओर

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** विपदाओं से लड़कर, जय को तुम पा जाओ। मंज़िल होगी पास, सफलता गह हर्षाओ।। वरना कहते रह जाओगे, हाथ न कुछ आया। जो करना चाहा था, वो कर नहीं पाया।। विपदाएँ तो नित ही मंगलगान सुनाती हैं। संघर्षों के भावों को, वे रोज़ जगाती हैं। जीवन हो खुशहाल, यही सबकी है चाहत, जो डर जाता उसको ही,वे रोज़ सताती हैं। साहस से प्रियवर तुम तो पूरे भर जाओ। मंज़िल होगी पास, सफलता गह हर्षाओ।। वरना कहते रह जाओगे, हाथ न कुछ आया। जो करना चाहा था, वो कर नहीं पाया।। आपदाएँ कहती हैं बल को लेकर बढ़ना। एक नई गाथा को लेकर खुशियाँ गढ़ना। कभी न पीछे क़दम हटाना,कर्म यही है, अंधकार में उजियारे का वंदन करना। उल्लासित होकर प्रियवर मंगल बरसाओ। मंज़िल होगी पास, सफलता गह हर्षाओ।। वरना कहते रह जाओगे, हाथ न कुछ आया। जो करना चाहा था, वो कर नहीं पाया।।...
मैं नहीं मासूम या भोला
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मैं नहीं मासूम या भोला

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** मत कह मुझे सीधासाधा, भोला या मासूम, वक्त पड़े तो दिखा सकता हूँ अपना अनदेखा रौद्र रूप। कर लो जितनी मनमानियाँ करनी हैं, जो कर रहे हो, करते रहो, औरों के हिस्से छीनकर अपने महल सजाते रहो। मैं उस दिलासे में नहीं जीता कि ऊपर बैठा कोई देख रहा है, या कहीं छिपकर तुम्हारे कर्मों पर आँखें सेंक रहा है। जिस दिन मैंने देखना शुरू कर दिया, हिसाब लगाना शुरू कर दिया, उस दिन से उठ सकता है ऐसा सैलाब जो बड़े-बड़ों को बहा सकता है, सच, हकीकत और व्यवहार का आईना दिखा सकता है। मैं प्रारंभ से ही खोता आया हूँ जिसे तुमने सहेज रखा है डर, धमकी और दंभ के सहारे। मेरी चुप्पी मेरी कमजोरी नहीं, सहन करना कोई सीनाजोरी नहीं। जिस दिन अपने नुकसान की कीमत ठीक-ठीक आँक लूँगा, उखाड़ दूँगा तुम्हारी किस्मत और भाग्य की जड़ें। ...
ज्ञात नहीं
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ज्ञात नहीं

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हमें लगता है शायद घाटी से घहराते नीचे आते पाषाण का अवसान हो गया परन्तु नहीं पाषाण के जीवन का आरम्भ है, यह उपर घाटी पर निश्तेज, निरीह, निश्चल, निर्विकल्प सा पडा वह बदलते मौसम के झंझावातों से झुकता हुआं पडा था अपनी जगह बनाएं हुएं एक कूप मणडुक की भांति परन्तु अब उसका भविष्य उज्जवल है सोचता है वह, हां वह सोचता है शायद देवो में पूजा जाऊं या किसी राजा की पहचान का प्रहरी बन जाऊं पर, पर उसे यह ज्ञात नहीं वर्तमान में मानव कितना कठोर है। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं...
घूंघट की आड़
कविता

घूंघट की आड़

सुषमा शुक्ला इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** (श्रृंगार रस) घूंघट की आड़ में झुकीं वे मृगनयनी आँखें, लज्जा की चाँदनी में सजे अनगिनत मधुर सपने। पलकों की ओट में प्रेम का सागर लहराता, हर चितवन प्रियतम के मन में मधुर राग जगाता। सिंदूरी भोर-सा मुख, मुस्कानों का मधुमास, घूंघट की हर सिलवट में बसता जीवन का उल्लास। नयनों में नवजीवन के रंगीन चित्र सँवरे, हर धड़कन कहती- साथ रहें हम जन्मों-जन्म भरे। लाज से झुकी पलकें, अधरों पर मौन कहानी, मन में प्रीत के दीप जले, महकी जीवन-रानी। सपनों की डोली लेकर आई नव अनुरागिनी, स्नेह, समर्पण, विश्वास बनी घर-आँगन की रागिनी। घूंघट की आड़ नहीं, मन का अनुपम श्रृंगार, जहाँ प्रेम की भाषा बोले हर कोमल व्यवहार। जब उठे घूंघट की कोमल डोरी, मुस्काए सारा संसार, लज्जा, प्रेम और सौंदर्य मिल रच दें जीवन का मधुर त्योहार। परिचय :...
संविधान के आंसू
कविता

संविधान के आंसू

डॉ. किरन अवस्थी मिनियापोलिसम (अमेरिका) ******************** संविधान की परिभाषा ही जब नेता न अपना पाया संविधान की आत्मा को लहर लहर संसद में लहराया। अपहरण हुआ तब संविधान का जब मूलमंत्र 'समता' को दबा डाला दस वर्षों के आरक्षण, अल्पसंख्यक को वोटों का हथियार बना डाला। एक देश एक विधान से बना संविधान देश को तोड़ा जातिगत जनगणना ने कैसे 'समता' लागू हो कितना रक्षित है 'संविधान'? सत्तर वर्षों का आरक्षण भी गृहविहीन, भूखे प्यासे अधवसनों को भोजन पानी छत की छाया न दे पाया , न दे पाया नब्बे रखें जेब में अपने दस में निर्बल को बहलाया। लागू हो सब पर समान विधान इस धारणा से बना संविधान पर रिश्वत की लूट मची कहां आत्मा शपथ और निष्ठा की कहां बचा है संविधान??? भ्रष्टाचार विरोधी कानून कड़ा नही‌ कोई बनकर आया आतंकी, अधिवक्ताओं की सांठगांठ से गद्दार वकीलों के बल पर छो...
नित्य मन को मार कर के
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नित्य मन को मार कर के

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** नित्य मन को मार कर के, और विष पी हम जिये हैं, शूल राहों में बिछे पर, घाव अपनों ने दिये हैं।। टूटती आशा कड़ी सब साँस भी बंधक बनी है। घुट रहा है दम धुँए से, मौत से अपनी ठनी है।। लीलता अजगर दुखों का, वेदना हिय में घनी है। टाट का बिस्तर जला सब, वारुणी जी भर पिये हैं।। उड़ गया है प्रीति-पंछी, छटपटाता है शिकारी। वासना का जाल जकड़ा, कर्म गीता देख हारी।। दाँव पर पत्नी लगाते, बैठ कर पागल जुआरी। है छलावा हर कदम पर, ओंठ दुष्टों ने सिये हैं।। दे रहा है जग चुनौती, रूठती भी है प्रभाती। है अँधेरा भी घनेरा, ये अमावश भी सताती।। तामसी हैं नृत्य करते, रोशनी आँखें चुराती। जूगनू भी करते शरारत, आस के बुझते दिये हैं। दोष किसका है कहें क्या, मौन बैठे हैं सितारे। आसुरी माया बढ़ी है, घात करते हैं सहारे।...
कब आओगे नरसिंह
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कब आओगे नरसिंह

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** कब आओगे असुर मारने ऐ प्रभुवर नरसिंह। तुम तो हो इंसाँ के रक्षक नित्य प्रखर नरसिंह। पाप आज बढ़ता ही जाता, झूठ विहँसता है, कब दिखलाओके इन सबको तुम हनकर नरसिंह। अंधकार अब हरसाता है, गंदापन फैला, नहीं बैठना तुम रस्ते में ऐ थककर नरसिंह। आज नारियाँ सिसक रही हैं, पीड़ा बहुत बड़ी, कब दुष्टों को मारोगे तुम अब बढ़कर नरसिंह। दुराचार फैला है बेहद, रोक नहीं कोई, हन जाओ दुष्टों को अब तुम ऐ आकर नरसिंह। धर्म रो रहा, सत्य बिलखता, खंडित नीति यहाँ, बतला दो तुम कब आओगे ऐ प्रभुवर नरसिंह। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मेरिट होल्डर), एल.एल.बी, पी-एच.डी. (इतिहास) सम्प्रति : प्राध्यापक व विभागाध्यक्ष इतिहास/प्रभारी प्राचार्य शासकीय जे...
बरखा का उपहार
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बरखा का उपहार

डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' मंडला (मध्य प्रदेश) ******************** मेघों से फिर अंबार भरा, रिमझिम हो रही फुहार। सकल धारा को है मिला, बरखा का यह उपहार। सोंधी माटी की खुशबू, फैल रही है चहुं ओर। जंगल में मंगल हुआ, थिरक रहे अब मोर। सारे बंधन को तोड़कर, नदिया बह रही स्वतंत्र। जल का विराट स्वरूप, दिखता यत्र तत्र सर्वत्र। रीते रीते सब भर गए, खेत और खलिहान। धान बुआई का फिर, शुरू हुआ अभियान। वर्षा की नन्ही बूंदों से, चहुंओर छाई हरियाली, कृषकों के घर आंगन में, फिरसे आई खुशियाली। प्यासी धरती की देखो, अब बुझ गई है प्यास। कुम्हलाए हुए वृक्षों में, फिर आई अब श्वास। दादुर औ पपीहा ने किया, फिर बरखा का आगाज धानी चुनरिया ओढ़कर, निखरी है वसुंधरा आज। परिचय :- डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' निवासी : मंडला (मध्य प्रदेश) सम्प्रति : प्रदेशाध्यक्ष- अखिल भारतीय हि...
सांझ
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सांझ

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** इतनी न फूलो सन्ध्या रानी कि तम तुम्हारा ॴचल छीन ले इतना सुनहरापन न बिखेरो कि रात की काली चुनरी में किनारी लगो। इतना न मचलो की मनचलो के दिल मचले इतना न फूलो की अन्धकार घेर ले वो, देखो निलाभ गगन तुम्हे देख रहा है तुम्हारे सुनहरे रुप को पाखियो को लगा जैसे रवि गगन से उतरे हैं धरा पर। * मनचलो से अर्थ है पृकृति प्रेमी। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप राष...
नकहा इज़हार
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नकहा इज़हार

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** हां मैं लिखता हूं सिर्फ लिखने के लिए नहीं अपने जज्बातों के इज़हार के लिए भी हां मैं लिखता हूं हर अल्फ़ाज़ में तुमको मगर कहता नहीं कभी अपने लफ्जों में तुमको हां मैं लिखता हूं अपने हृदय की गहरी अनुभूति के साथ मगर जाता नहीं कभी अपने जज्बातों के आर पार। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें...
कलम न उठाने के कारण
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कलम न उठाने के कारण

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** तुम्हारे सहे हुए उत्पीड़न का दर्द, जो तुमने कभी नहीं लिखा, उसकी सज़ा तुम्हारी औलादें क्यों और कब तक भुगतें? काश! तुमने उसे शब्दों में ढाला होता, दुनिया को उसका चेहरा दिखाया होता, तो शायद अत्याचारी सबक ले चुके होते, फिर बहती गंगा में हाथ न धोते। या तुम्हारी पीड़ा पढ़कर कोई अपना हाथ इतना मजबूत कर चुका होता, कि किसी की हिम्मत न पड़ती वही अत्याचार दोहराने की, जिन्हें न संविधान का भय है, न परवाह जमाने की। हाँ, यह भी संभव था कि तुम्हारे ही रक्त के लोग बदले की राह पर निकल पड़ते, पर तुमने संतोष कर लिया उन्हीं के दिए हुए नामों के आगे गिड़गिड़ाती प्रार्थनाओं से। यह कैसी नज़ीर गढ़ रहे हो इतने विशाल समाज के सामने, कि लोग डर-डरकर जीते रहें, कायर बनकर सब सहते रहें, और पुरखों की तरह अपन...
बेटा
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बेटा

आशा शर्मा धरमपुरी, इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** बहुत ही अद्भुत और अलौकिक शक्ति है, मन के‌ अनकहे भावों की। बेटा हो या बेटी स्वर की महिमा है, माता -पिता की पुकार बेटा ही कहती। फिर क्यूं बेटी पराई कहलाई, जिसने दोनों परिवारों की शान बढ़ाई। बेटा सदैव ही घर का उजाला रहा है, परवरिश में भी उसका प्रथम अधिकार रहा है। बड़े बुजुर्ग भी बेटे को वंश की बेल कहते हैं, हर जगह पर आगे रखते हैं। धूम-धाम से विवाह किया, गृह लक्ष्मी के रूप में, बहू का गृहप्रवेश किया चार बर्तन घर में हो तो बजते ही है। कुछ बात हो भी जाए, तो सहन करते भी हैं। बेटा जब सक्षम होकर रोब दिखाता है, आंखों में जल भर जाता है। चुपके-चुपके आंखों को पोंछ लेते हैं, पर सभी के सामने, हंसकर रहते हैं। एक दिन बेटा भी चुपके-चुपके ले जाता है, वृद्ध आश्रम में छोड़कर आ जाता है। आपको यहां अप...
सहयात्री
कविता

सहयात्री

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** बस, रेल, टेक्सी और हवाई जहाज गूंजती चहुंओर, यात्रियों की आवाज, हर तरफ खचाखच भीड़-भाड़, बेशुमार करते जल्दबाजी यात्री, हो जाते सवार स्टेशन, बस अड्डे, हल्ला-गुल्ला और शोर निर्धारित स्थान में पहुंचने की लगती होड़, हाथ में, तो कंधे में ले कीमती सामान दौड़-भाग में घिर, यात्रा बनाते आसान अकेले में, समूह में, सपरिवार संग, कोई बेसहारा, कोई असहाय निर्धन, यात्रा करते करते, जीत लेते यात्री मन मेल-मिलाप कर लेते यात्री खूब व्यापक दुःख-दर्द छँटकर खुशी बढ़ती व्यापक बातों ही बातों में दूर हो जाता, संकोच मनोबल बढ़ता शर्म खुलती निसंकोच बढ़ती यात्रियों में दुगनी नई उमंग सोच यात्री बन जाता घुलमिलकर सहयात्री लम्बी यात्रा का आनंद उठाते सहयात्री खुशनुमा आंनद भरा गहरा आनन्द पाते एक दूसरे बनते पूरक, घनिष्ठता बढ़ाते सहयात्री का सुहा...
मनखे हो के मनखे बर
आंचलिक बोली, कविता

मनखे हो के मनखे बर

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) मनखे हो के मनखे बर, तँय काबर मरत हस बिन तेल अउ बाती के, तँय काबर जरत हस हाँसत गावत बिता ले, तँय अपन जिंनगी ला पर के जिनगी मा, झोझा काबर परत हस !! कुछु खाय चाहे कुछु पहिरे, तोला का करना हे झूठ लबारी चारी चुगली, तोला दूरिहा रहना हे सुवारथ के चक्कर मा, तँय काबर फाँसत हस काकरो दुख दरद ल देख, काबर हाँसत हस !! मनखे जनम पाय हस, सुग्घर करम करना हे चार दिन के जिनगी, तहन सबो ला मरना हे दूसर के महल अटारी देख, काबर मरत हस मेहिनत बिना, फर के आस, काबर करत हस !! परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर र...
दोस्ती
कविता

दोस्ती

कामता साहू भिलाई, दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** एक दोस्त है मेरा शांत, धीर, सिंधु सा व्यवहार में प्रखरता जैसे चमक हो किरणे पड़ती नीर की कर्तव्य, प्रेम, और परिश्रम के रस से भरा एक दोस्त है मेरा ।। प्यार से खुशियों की एक् कली खिलाता अपनी भरपुर मेहनत से भूमि को लहलहाता, हर्षाता एक दोस्त है मेरा ।। मीठी लगी जिसकी प्यारी दोस्ती चख के देखी अभी है वो मिसरी सी डली एक दोस्त है मेरा ।। परिचय :- कामता साहू (शिक्षक) निवासी : भिलाई, दुर्ग (छत्तीसगढ़) सम्प्रति : शिक्षक घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी म...
दिव्या अनुराग
कविता

दिव्या अनुराग

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** जन्म जमांतर की मेरी अतृप्त इच्छाएं मुझे छूने लगी है। देख कर तुमको मुझ में प्रेम जिज्ञासा फिर उत्पन्न होने लगी है। तुम्हारे अस्पर्श अहसास मेरे सहस्रार को जागृत करने लगे है। न चाहते हुए भी मेरे अनाहत में तुम्हारे स्वर को गूंजने लगे हैं। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak1...
जवाब एक विकृत मानसिकता को
कविता

जवाब एक विकृत मानसिकता को

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** मत भूल, नारी केवल घर की नहीं, समाज और सभ्यता के सम्मान की पहचान होती है, संस्कारों की धड़कन, परिवार की मुस्कान होती है। पर तू तो जाति के मद में डूबा हुआ, अपने ही बनाए दायरों में कैद खड़ा है, मानवता से कोसों दूर, अहंकार के शिखर पर चढ़ा है। सोचता हूं, तू अपनी माँ, बहन, बेटियों को किस दृष्टि से देखता होगा, क्या अब भी उन्हें पुरानी जंजीरों में ही बांधता होगा? तेरी पीड़ा का कारण यही है कि जिन्हें तुमने सदियों तक पायदान से अधिक नहीं समझा, उन्हीं में से एक बेटी ने जन-जन के विश्वास का मुकाम रचा। संविधान की राह पर चलकर न्याय और प्रशासन का मान बढ़ाया, समाज के हर वर्ग को साथ लेकर समानता का दीप जलाया। लेकिन जाति के संकरे नालों में पलने वाले खुले आकाश का अर्थ कहाँ जानेंगे, स्वयं को विश्लेषक क...
एक भूखा प्यासा मजदूर
कविता

एक भूखा प्यासा मजदूर

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** कामकाज में चतुर दक्ष एक भूखा प्यासा मजदूर निकला उपार्जन की तलाश में, सुबह से शाम तक घूमता फिरता रोजगार और काम की तलाश में, बस खड़ा चौराहे पर अपने औजार हथियार संग निरखकर कह रहा अंर्तमन में भूख से कराहता, बोला खुद से, भूखे पेट निकला हूँ मजदूरी करूं, उपार्जन करूँ बैचैन भूख से हूँ, सिर में चक्कर फिर भी काम के चक्कर में विश्राम कैसे करूँ, काम के तलाश में अडिग खड़ा हूँ, मिल जाये मेहनत की मजदूरी बस निकला हूँ भुख मिटा दूं,सबकी निकला हूँ काम से,घर घर काम करूं उपार्जन करूँ परिवार का पेट भरूँ खून पसीना बहाकर, दिनभर की थकावट में काम करूँ, भूखे बिलखते पीड़ित बच्चों का दुःख दर्द बस, दूर करूँ अचानक मजदूर की, दुर्दशा को देख स्वार्थी पूछकर, कहने लगा आधे पैसे ले लो, मजदूरी आधी ले लो निबटा दो समूचा काम, भूख त...
चलने को चलता हूँ
कविता

चलने को चलता हूँ

इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" गोरखाना, नोहर (राजस्थान) ******************** चलने को चलता हूँ, मगर धीरे-धीरे चलता हूँ। मंजिल की जल्दी नहीं मुझे, रास्तों को पढ़ता चलता हूँ। हर मोड़ पर रुक कर मैं, खुशबू को महसूस करता हूँ। पत्थरों की खुरदरी सतह को, छूकर मैं मुस्कुराता हूँ। दुनिया की इस दौड़-धूप में, मैं अपनी लय में जीता हूँ। थकान के गहरे साये में भी, सुख की बूँदें पीता हूँ। तेज़ चलने वाले निकल गए आगे, मैं पीछे रहकर ही सही, हर पल की सुंदरता को, अपनी आँखों में भरता हूँ। चलने को चलता हूँ, मगर धीरे-धीरे चलता हूँ। परिचय :-  इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" उपनाम : "नोहरी" पिताजी का नाम : श्री भानीराम सिहाग माताजी का नाम : कांता देवी अर्धांगिनी का नाम : माया देवी जन्म दिनांक : १३/०७/१९९१ सम्प्रति : शिक्षक शिक्षा : दो बार स्नातकोत्तर, बीएड निवासी : गोरखाना तहस...
एक सैनिक का प्रेम
कविता

एक सैनिक का प्रेम

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* हाथों में यह कलम ना होती, निकलते न ये भाव, आंखें कभी ना रोती तन्हाई हमें यूं न चुभती यदि तुम मेरे पास होती आने वाला पल याद तुम्हारी लाता है जाने वाला पर टीस पीछे छोड़ जाता है जितना चाहा तुम्हें भूलना उतना ही तुम याद आती हो तुम्हें याद करने की जरूरत ना होती यदि तुम मेरे पास होती तुम्हें कुछ लिखना चाहा, जब भी मैंने भावों को शब्दों में ना बांध पाया दिल की आवाज सुन लेती आंखों की जुबान समझ लेती यदि तुम मेरे पास होती बाहों में तुझे ले लूँ, चाह ये बार-बार होती दामन में तेरे, सर रख रोता सिंदूर मांग में तेरी भर देता सोचते-सोचते दिन कितने गुजर गए हालत हमारी यूं ना होती यदि तुम मेरे पास होती।। परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी निवासी ...