Thursday, May 14राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर आपका स्वागत है... अभी सम्पर्क करें ९८२७३६०३६०

कविता

बाहर फागुन बौराया है
कविता

बाहर फागुन बौराया है

विशाल त्रिवेदी "अल्पज्ञ" सेंधवा (मध्य प्रदेश) ******************** बाहर फागुन बौराया है, मलय-पवन लहराती है पर भीतर की अगन अनकही, पल-पल मुझे जलाती है रंगों की इस भीड़-भाड़ में, मैं तनहा खड़ा रहूँ निगाहों में जलती इस होली का, बोलो अब क्या करुँ? यादों की समिधा सुलगी है, नयनों के इस कुंड में धुआँ-धुआँ सा हुआ जा रहा, मैं सपनों के झुंड में भीग रही है दुनिया सारी, केसरिया बौछार से मैं अपनी रुलाई को अब, हँस कर कैसे सहूँ? निगाहों में जलती इस होली का, बोलो अब क्या करुँ? अबीर गुलाल उड़ाते चेहरे, लगते हैं सब बेगाने मौन खड़ा हूँ अधरों पर मैं, लिए हज़ारों अफ़साने कोरे रह गए मन के पन्ने, बिन तेरे अनुराग के राख हुए इन अहसासों को, कब तक चुनता रहूँ? निगाहों में जलती इस होली का, बोलो अब क्या करुँ? परिचय :- . विशाल त्रिवेदी "अल्पज्ञ" निवासी : सेंधवा (मध्य प्रदेश) सम्प्र...
प्यारी माँ
कविता

प्यारी माँ

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** माँ मेरी ममता की मूरत, मिले हमेशा तेरी गोद। शान्ति शकुन है तेरी गोद मै, प्यार ममता की छाँव भी। सुख चैन आँचल मै तेरे, मीठी लोरी भाव है। हर जनम तेरी गोद मिले माँ, प्रेम स्नेह अपार है। मधुर बोल शांति स्वरूप माँ, सुख दुख सहती अपार है। माँ का आँचल इतना विशाल, समा जाये सब घर संसार। निर्मल मन निर्मल विचार, देती माँ तू शुभ आशिर्वाद। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मंडल जबलपुर से सम्मानित २. अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना उज्जैन से सम्मानित ३. राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "साहित्य शिरोमणि अंतर्राष्ट्रीय समान २०२४" से सम...
देदो अलसाई संध्या
कविता

देदो अलसाई संध्या

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मनमन्दिर कर दो मेरा तृप्त शबनम हो अगर पत्तो पर की देदो कमनीयता मुझे तुम जैसा क्षणिक जीवन जीने के लिए। रजत राशि हो अगर आफताब की दो बिछा चांदनी आंगन मे मेरे अगर हो मेहताब की रश्मि तो देदो कुछ क्षण शाम अलसाई सी। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "हिंदी रक्षक राष्ट्रीय सम्मान २०२३" से सम्मानित हैं। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित ...
अंतर्मन का द्वंद्व
कविता

अंतर्मन का द्वंद्व

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* सबसे भयंकर युद्ध सीमाओं पर नहीं लड़े जाते वे मन के भीतर होते हैं जहाँ कोई तालियाँ नहीं बजाता। यहाँ दुश्मन यादें बनकर आता है, कभी डर बनकर वार करता है कभी उम्मीद बनकर उठाता है और कभी तोड़कर छोड़ जाता है। इस लड़ाई में खून नहीं बहता, पर सपने रोज़ मरते हैं चेहरा हँसता रहता है पर अंदर हजारों चीखें होती हैं। कभी मन हार मान लेता है कभी आत्मा उठ खड़ी होती है हर रात गिरती है हर सुबह फिर लड़ती है। यह युद्ध सब लड़ते हैं पर कोई दिखाता नहीं क्योंकि कमजोरी बताना इस दुनिया में अपराध समझा जाता है। भीतर की लड़ाई इंसान को थका देती है पर खत्म नहीं करती जो सह जाता है वही मजबूत बनता है बाकी टूटकर खामोश हो जाते हैं! परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी ...
होली तेरे रंग
कविता

होली तेरे रंग

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** फीके-फीके अब लगे, होली तेरे रंग। क्यूं बेसुरे से हो गये, फागुन वाले चंग। बहुरंगी दुनिया में, शेष ना असली रंग, ढ़ोल नगाड़े प्रेम के, बजते नहीं मृदंग। खास वर्जित है, आकर दबे पाँव लगाना, गुलाल गजबन गालों पे, नहीं सुहाती अंग। फागुन में धूमिल पड़ी, रसिया वाली रात, गुलमोहर की डाल पर, बसंत नंग-धड़ंग। बदले बदले मौसम में, दुखी खड़ा पलाश, फागुन अब नहीं खेलता, रंग रंगीला फाग। रिश्तों में से गायब है, चंदन की सी महक, चौपालों पर बस्ती में, बजती नहीं भपंग। लाती नहीं कुमारियां, अब गेहूँ चने की बाल, कच्चे पक्के मासूमों को, देख बिड़कुल्ले दंग। पीलिया ग्रसित ठिठोली, मन में मीठी आग, प्रीत प्रेत सी देखकर, भौचक धुरखेल के रंग। परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्यापक राजस्थान सरकार) निवासी : बाड़ा पदम पुरा,...
बिन पते का पत्ता
कविता

बिन पते का पत्ता

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** हरा-भरा, नीला-पीला पेड़ की डाली का मैं बस पत्ता कहलाता हूँ, तना, डालियों, शाखाओं का मामूली सा रंगबिरंगी पत्ता, पेड़ की स्वाभिमान बढ़ाता हूँ पेड़ का जीवनसाथी बनकर मैं तो मामूली पत्ता कहलाता हूँ, पेड़ की रौनक क्या है प्रकृति की रौनक क्या है, चार चांद लगाने आता हूँ, मैं मामूली सा पत्ता कहलाता हूँ, हरियाली को हरदम हरा भरा खिलाता हूँ, मैं प्रकृति की आज्ञा से पहले पेड़ की डाली में आ नहीं पाता हूँ हरा-भरा खिलाखिला मुर्झाता छोड़ चला जाता हूँ, हवा आंधी तूफान का भरोसा नहीं कर पाता हूँ अस्तव्यस्त प्रकृति में हरा भरा सा खुशहाल बेहाल बनकर तमाशा सा जमीन पर उतर आता हूँ अस्तित्वहीन, मूकदर्शक निर्जीव मुर्झाया मृत सा न जाने कहाँ कौन सी दिशा में दूर दर-दर की ठोकरों में जमीन के कण-कण में समय चक्र की भांति कालचक...
लो बसंत के दिन अब आए
कविता

लो बसंत के दिन अब आए

डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' मंडला (मध्य प्रदेश) ******************** सरसों फूले टेसू महके, आम्र तरु मंजरी बौराए, लो बसंत के दिन अब आए। कोयल कूके मयूर है नाचे, भ्रमर कलि संग गुनगुनाए, लो बसंत के दिन अब आए। बासंती बयार सखि को, प्रिय का संदेश पहुंचाए, लो बसंत के दिन अब आए। हरियाली और पुष्पों से, प्रकृति का दामन भर जाए, लो बसंत के दिन अब आए। मदमस्त बसंत के मौसम में, सजनी साजन संग सुहाए। लो बसंत के दिन अब आए। चहुं दिशाएं सुरभित हो जाए, प्रकृति संग मानव हर्षाए, लो बसंत के दिन अब आए। परिचय :- डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' निवासी : मंडला (मध्य प्रदेश) सम्प्रति : प्रदेशाध्यक्ष- अखिल भारतीय हिंदी सेवा समिति म प्र., जिला संयोजक- मध्यप्रदेश राष्ट्र भाषा प्रचार समिति मंडला। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौल...
जीव जगत के लिये
कविता

जीव जगत के लिये

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** दृग चन्चल, मन चन्चल बिटिया चन्चल, गौरी चन्चल मृग चन्चल, मृग दृग चन्चल आखेट के लिए आते हिन्सक के पग चन्चल। चन्चल सरिता झरना चन्चल जल की बून्दे, फुहारे चन्चल भागती चन्चल रश्मि छाया के संग। चन्चल पवन, चन्चल अग्नी पतझड चन्चल करता पथ को पथ पर पडे पर्ण चन्चल। पर, स्थिर, धैर्यवान धरा इन सब को संवारती आश्रय देती है मानव जीवन के लिए जीवजगत के लिए ... जीव जगत के लिए ...। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इं...
माँ … ज्ञान का सागर
कविता

माँ … ज्ञान का सागर

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** ज्ञान का सागर है माँ, तू भक्ति की आराधना, सरस्वती सा विवेक तुझमे, तप-बल की तू शक्ति माँ। इस सागर मै नहार कर के माँ ज्ञान की ज्योति तुम्ह से पाई। भक्ति मै सरोबार होकर माँ प्रेम की रित तुझसे पाई। तेरी गोदी पाकर के माँ काव्य गीत मैने गाया, शक्ति बल पाकर के तुझसे यह कलम दवाद चलाई माँ। शान्त चित्त बुद्धि पाकर के यश तेरा फैलाया माँ, कठिन घड़ी और कठिन परीक्षा बस तेरा आशीर्वाद है माँ, प्रेम की धारा माँ है मेरी पिता किनारा नदियो का, कैसे हम बहकर के जाये, जो हाथ हे थामा गुरूवार का। अहंकार मान ना आये गुरूवार, हाथ झडी़ थामै रखना, प्रेम बोल से फटकार तुम गुरुवार। मुझ दिनन पर मडँते रहना परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर...
कोई पूछे तो धन्यवाद ना पूछे तो प्रसाद
कविता

कोई पूछे तो धन्यवाद ना पूछे तो प्रसाद

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** कोई पूछे तो धन्यवाद, ना पूछे तो समझो प्रसाद, सेवा का सच्चा सुख मिले, बस इतना ही है इराद। मनुष्य जिए अपने लिए, स्वस्थ रहे, सुखी रहे, दिखावे की चादर ओढ़े क्यों, सच मन में ही रुके रहे। सेवा यदि की निस्वार्थ भाव से, फल उसका तुम पाओगे, तालियाँ चाहे कम मिलें, भीतर दीप जलाओगे। प्रशंसा की प्यास छोड़ दो, कर्म को ही साथी मान, जो बोओगे वही उगेगा, यही है जीवन का विधान। जो करते हो स्वयं के सुख को, वही सच्चा उत्सव है, बिना दिखावे का जीवन ही, सबसे बड़ा अनुभव है। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : 25 अप्रैल निवास : आबिदजान (अफ्रीका) मूल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एमए राजनीति शास्त्र बरकतुल्लाह भोपाल विश्वविद्यालय लेखन विधा : कविता, हायकु, पिरामिड, लघु कथा लेखन : लेखन के क्षेत्र में कोविद में जीवनसाथी की प्रेर...
इस वक्त मैं …
कविता

इस वक्त मैं …

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** बड़े-बड़े अधिकारियों के रहमोकरम पर डोल रहा हूं, साथियों मैं इस वक्त सूरजपुर से बोल रहा हूं, हर पहुंच कार्यालय में मेरा हरदम नाम होता है, इधर से उधर हिस्सा निकाल पहुंचाना मेरा काम होता है, अब घर में रहूं या कार्यालय में मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है, अरे आपका भाई बिंदास है कभी किसी से नहीं डरता है, मुझसे डरते मेरे सारे साथी हैं, दूल्हा कोई और रहे पर आपका भाई होता सबसे पहला बाराती है, पैसे की बात आ जाए तो मेरा जिगरी भी एतबार नहीं करता है, आपका भाई कुछ जन्मजात जलवे धरता है, मगर सोच रहा हूं कि सेवानिवृत्त पश्चात क्या कोई मुझे पहचानेगा, निस्वार्थ वाला सहकर्मी मानेगा, अरे जाने भी दो यारों अभी अपने पत्ते नहीं खोल रहा हूं, साथियों मैं इस वक्त सूरजपुर से बोल रहा हूं। परिचय :-  रा...
बेरूखी क्यों
कविता

बेरूखी क्यों

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** रह तो रहे हैं, इसे घर कह तो रहे हैं, पर घर में मकड़ियों का जाला है, अव्यवस्थाओं का बोलबाला है, कोई किसी को अपने आगे कुछ समझ नहीं रहा है, क्या तुम्हे नहीं लगता कि अंदर ही अंदर कुछ सुलग नहीं रहा है, सोच अलग हो सकता है, विचार अलग हो सकता है, पर अपनों के प्रति प्यार क्या दिल में नहीं रहा या गए हो भूल, इतने बड़े या इतने जिम्मेदार बन गए कि अपने आप में हो चुके हो मशगूल, परिवार के बीच रह रहे हो तो अपनों के प्यार को चख, सबको अपने स्वार्थ के हिसाब से न परख, अब लग ही नहीं रहा कि खून खून को पुकारता है, मगर कैसा खून है जिसका स्वार्थ चिंघाड़ता है, जब अपनों के प्रति इतनी बेरूखी है तो क्या खाक देश से प्यार दिखा पाओगे। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्...
शबनम की बून्दो पर
कविता

शबनम की बून्दो पर

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** शबनम की बून्दो पर वक्त ठहर गया सा लगता है गुम-सुम आशियाने मे कोई सिमट गया सा लगता है सर्द मौसम मे धूप फुलझडी सी लगती है। शब के अंधेरे मे निर्धन देह अलाव तक सिमटती है कुछ जीने के लिए हँसते है कुछ हँसने के लिए जीते है जटिल जिन्दगी की राहो मे मुनासिब नही आम आदमी के लिए। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "हिंदी रक्षक राष्ट्र...
एक सिक्के के दो पहलू समस्या और समाधान
कविता

एक सिक्के के दो पहलू समस्या और समाधान

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** जीवन एक सिक्का है, दो पहलू संग लाता है, एक तरफ़ समस्या खड़ी, दूजा राह दिखाता है। छाया संग धूप चले, यह जग का है विधान, दुख की काली रात में ही, जागे सुख की पहचान। काँटों से घबराए जो, फूलों तक ना पहुँच पाए, जो ठोकर को समझे पाठ, वही मंज़िल को अपनाए। हर उलझन एक पहेली है, जो हल माँगती जाती, धैर्य अगर साथी बन जाए, राह स्वयं बन जाती। समस्या जब सिर उठाए, मन थोड़ा घबराता है, समाधान वहीं छुपा होता, जहाँ डर सताता है। आंधी से जो टकराएगा, वही दीप बन पाएगा, हिम्मत की लौ जलाकर ही, अंधियारा हट पाएगा। शिकायत से कुछ न मिले, बस मन बोझिल होता है, प्रयासों की चाबी से ही, हर ताला फिर खुलता है। ठहराव नहीं जीवन में, संघर्ष ही पहचान, गिरकर फिर से उठ जाना, यही असली सम्मान। सिक्का जब तक चलता है, कीमत वही बताता, रुक जाए जो ...
आहट
कविता

आहट

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मेरे कदमों की आहट से वर्तमान ठहर जाएगा और भविष्य का चुपके से आगमन होगा। मेरे कदमों की आहट से देवी शक्तियां मोहित होगी और दुष्ट शक्तियों स्थानांतरण करेंगी। मेरे कदमों की आहट से जीवन में प्रकाश का उदय होगा और अंधकार का विनाश होगा। मेरे कदमों की आहट से हृदय में ज्ञान का उजाला होगा और अज्ञान का ध्वंस होगा। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। प्रिय मित्र, शुभचिंतक एवं परिवारजन आपको प्रेषित मेरी नई स्वरचित रचना, कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...
एक हाथ से ताली
कविता

एक हाथ से ताली

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** एक हाथ से ताली बजाने वालों, ध्यान से मेरी बात सुनो तुम्हें कभी न कभी ज़रूरत पड़ेगी दूसरे हाथ की… साथियों के साथ की… जब खुद पर बीतेगी, तब खोजोगे दूसरा हाथ, और अपनी ही ताली पर दोगे सफ़ाई की सौ-सौ बातें, पर याद रखना जिस दिन अति आवश्यकता होगी, उस दिन पीछे कोई खड़ा नहीं होगा। कुछ चुनिंदा सरपरस्त जब खुद फँसने लगेंगे, तो सबसे पहले तुम्हीं पर उँगली उठाएँगे, अपना दामन पाक-साफ, और तुम्हें दाग़दार बताएँगे। औरों का नुकसान करने की हनक में तुम अपना ही पैर तुड़वाओगे, रह-रह कर छटपटाओगे कि जो साथ खड़े थे वे कहाँ गए? कीमती हीरे-मोती कैसे गंवा गए? नहीं है तुम्हारे भीतर कोई कस्तूरी जिसे तुम बाहर खोजोगे, अपने ही किरदार की सुगंध तुम सदा के लिए खो दोगे। एक हाथ से ताली बजाना तुम्हें मुबारक़ हो, ...
कैसे-कैसे लोग जहाँ में आये हैं
कविता

कैसे-कैसे लोग जहाँ में आये हैं

विजय वर्धन भागलपुर (बिहार) ******************** कैसे-कैसे लोग जहाँ में आये हैं अपने फन से दुनिया को हर्षाये हैं तुलसी ने मानस का वो उपहार दिया जिससे भक्ति की वर्षा हम पाए हैं नन्द विवेका ने दुनिया झकझोर दिया। जिनके आगे मस्तक सब झुक जाये हैं राणा, वीर शिवा ने घुटने नहीं टेकी दुश्मन के छक्के हरदम छुड़वाये हैं लता ने ऐसे-ऐसे गीतों को गया कौन है जो उनको सुन झूम न पाए हैं नन्दलाल के चित्र सदा ही बोल उठे लगतें नहीं हैं चित्र, जिवंत हो आये हैं मैथिली, दिनकर की कवितायेँ ऐसी हैं अंतस्तल तक को झंकृत कर जाये हैं स्वतंत्रता को लेने की खातिर कितने लालों ने फाँसी पर प्राण गाँवाये हैं किन-किन की चर्चा हम करें भंडार बहुत उनके आगे सर हरदम झुक जाये हैं परिचय :-  विजय वर्धन पिता जी : स्व. हरिनंदन प्रसाद माता जी : स्व. सरोजिनी देवी निवासी : लहेरी टोला भागलपुर (बिहार) शिक्षा : एम.एससी.ब...
पुण्य भूमि भारत
कविता

पुण्य भूमि भारत

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** भारत भूमि को दुनियां मे सब से बड़ा तीर्थ मान। इस भूमि को भारतवासी देते माता का सम्मान। भारत भूमि…. देवत्व भूमि यह अनेकों देवताओं का है धाम। जन मानस मे रचे बसे है राधा कृष्ण और राम। देव वाणी हमारे जन मानस के मन मे गुंजायमान। देव वाणी से परिपूर्ण है हमारा गीता ग्रंथ महान। भारत भूमि…. इस भूमि पर पले बढ़े हुए अनेकों धर्म महान। धर्म रक्षा के ख़ातिर अवतरित हुए है यहाँ स्वयं भगवान। सनातन की भावना देखती सब को एक समान। युग युग से यह पावन भूमि कहलाती धर्म प्रधान। भारत भूमि…. वेद पुराणों अनेकों ग्रंथों मे है इसकी गाथा। आया जो भी इस धराती पर शरण इसकी पाता। अहिंसा परम् धर्म है मूल मन्त्र इसकी पहचान। पूरे भारत मे होता है इसकी महिमा का गुणगान। भारत भूमि….. पर्वत राज हिमालय पर है इस धरती को अभिमान। मानसरोवर है पावन गंग...
नउकरी के बंधना
आंचलिक बोली, कविता

नउकरी के बंधना

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) घुम-घुम, किन्दर-किन्दर अपन रचना ल सुनावव जी, कभु रइपुर, कभु कोरबा अउ कभु रइगढ़ म अंजोर बगरावव जी, बंधाय हे हमर अंग-अंग बंधना म, रचना पढ़े के फुरसत नइ हे अपन दुवारी अउ घर अंगना म, राती-राती भर गोष्ठी करव दिन म ऊंघे के बेरा हावय, गेरवा ले गर बंधाय हे हमर आउ चारो कोती घेरा हावय, तुंहर घुमइ फिरइ देख के लालच हमरो बाढ़त हावय, दंउरी कस बइला फंदाय हवन छाती म पथरा माढ़त हावय, दु पइसा कमाए के चक्कर म हाल डोल नइ पावत हावन, फाग, ददरिया चाहे भजन दय मालिक ह नाच-नाच के सब गावत हावन, पुरुस्कार ल तुंहर देख के संगी हिरदे हमर गदगद झुमत हावय, तुमन ल रचना सुनावत देखके मन हमरो छत्तीसगढ़ भर घुमत हावय। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमा...
ख्बाव सा तुम्हारी आंख में
कविता

ख्बाव सा तुम्हारी आंख में

सुधा गोयल बुलंद शहर (उत्तर प्रदेश) ******************** ख्बाव सा तुम्हारी आंख में बसने लगा हूं फूल के सौंदर्य सा मुस्कराने लगा हूं तुम सुबह की पहली किरण सी उतरी हो जब से मेरे आंगन में मैं धूप में भी मुस्कराने लगा हूं। देखता हूं खाली आकाश को जब भी मैं बादल सा उमड़ने लगा हूं चाहता हूं कि बरसूं तुम्हारे गेसुओं पर मैं नटखट थोड़ा मुस्कराने लगा हूं तुम देखती हो मुझे छिपकर यह मैं जानता हूं तुम्हारी चाहते पा मन ही मन मुस्कराने लगा हूं। मेरे चेहरे पर खिली रहती है ताजगी अब मैं सबसे हंस हंस कर मिलने लगा हूं। दूर से ही देखकर तुम्हें एक नजर जैसे मैं जन्नत में रहने लगा हूं नहीं कोई कामना कि गलबहियां करुं बस तुझे मुस्कराता देखना चाहता हूं रहो हर वक्त सामने यह भी नहीं चाहता बस एक बार देख लूं चाहने लगा हूं ऐसा ही खूबसूरत सपना देखने लगा हूं। परिचय :- सुधा गोयल निवासी : ...
याराना
कविता

याराना

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** हर लम्हा सुहाना होगा तेरा हंँसना और फिर देखकर तुम्हें मेरा मुस्कुराना होगा। माना कि हम कुछ भी नहीं मगर तुम्हारे सिर के ताज़ पर हर पल हमारा पहरा होगा। मैं हार भी जाऊं तुम्हें जीतने के लिए तो भी तेरे सपनों में एक अफसाना होगा। एक तलब है तुम्हें हर पल मुस्कुराते देखने की अगर मैं मिट भी जाऊं तो भी ये मेरा याराना होगा। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।...
इंडिया नहीं “भारत” कहें
कविता

इंडिया नहीं “भारत” कहें

मंजुला भूतड़ा इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** इंडिया नहीं "भारत" कहें, गर्व से कहें, हम भारतीय हैं। शपथ हमें इस मिट्टी की, इसे चंदन-सा महकाएंगे। धूल नहीं है यह केवल, इसका माथे तिलक लगाएंगे। नए भारत के निर्माण में, फिर से अब जुट जाएंगे। विश्व के नये मानचित्र में, अब "पूरा भारत" दिखलाएंगे। राष्ट्रीय पक्षी इसका मोर, राष्ट्रीय पशु यहां बाघ है। पुष्प कमल है राष्ट्र गौरव, अशोक चक्र महान है। हिन्दी इसकी भाषा मीठी, अपनेपन की खुशबू है। राष्ट्र भाषा इसे बनाएं, यह दिल में अरमान है। इंडिया नहीं "भारत" कहें, गर्व से कहें, हम भारतीय हैं। परिचय :-  मंजुला भूतड़ा जन्म : २२ जुलाई निवास : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : कला स्नातक कार्यक्षेत्र : लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता रचना कर्म : साहित्यिक लेखन विधाएं : कविता, आलेख, ललित निबंध, लघुकथा, संस्मर...
मेरे जाने के बाद
कविता

मेरे जाने के बाद

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** मेरे चले जाने के बाद, मेरा अस्तित्व भी मिट जाएगा, मेरा सबकुछ मेरे साथ चला जाएगा!! ये सफ़र यूँ ही चलता रहेगा, इस भीड़ में कोई हमारा नहीं रह जाएगा!! जीवन भर अपना व्यक्तित्व शून्य रखा था, वो शून्य भी शून्य में विलीन हो जाएगा! ना किसी के पास फैलेगा मेरी हंसी का धुंआ, ना मेरी याद में कोई एक दीपक जलायेगा!! वो आंगन, वो किवाड़, वो चूल्हा चौका जिनमे हम प्यार परोसा करते थे, उनकी सिसकियाँ घर मे सुनाई देंगी!! वो चूडी वो बिंदी, कतार में सजी साडियाँ उनके आँसू मेरी अलमारी में दिखाई देंगे!! प्रकृति को संजोया था हमने जीवों की मुस्कराहट में, वो अपने आसपास हमें ढूंढा करेंगे!! इनकी आवाज मुझ तक भी पहुंच जाएगी, जब हम इस दुनिया से बहुत दूर निकल जाएगें!! परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा...
बारूदी बस्ती
कविता

बारूदी बस्ती

भीमराव 'जीवन' बैतूल (मध्य प्रदेश) ******************** अरमानों की मौन अर्थियाँ, रोज निकलती हैं। इस बारूदी बस्ती में अब, श्वासें डरती हैं।। हिंसा ने खुशियों को खाई, जब त्योहारों की। अलगू जुम्मन पूजा करते, बस हथियारों की।। समरसता से डरी पुस्तकें, आहें भरती हैं।। इस बारूदी बस्ती में अब, श्वासें डरती हैं।। क्षुद्र स्वार्थ में इस माली ने, पूँजी कुछ जोड़ी। हरे-भरे सम्पन्न बाग की, मेड़ें सब तोड़ी।। कलियाँ बासंती मौसम को, देख सिहरती हैं।। इस बारूदी बस्ती में अब, श्वासें डरती हैं।। डरी अल्पनाएँ आँगन से, अब मुँह मोड़ रही। हँसिया लेकर बगिया विष की, फसलें गोड़ रही।। गर्वित-गढ़ में न्याय-कुर्सियाँ, पल-पल मरती हैं।। इस बारूदी बस्ती में अब, श्वासें डरती हैं।। परिचय :- भीमराव 'जीवन' निवासी : बैतूल मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक ...
चाहतों का क्या है
कविता

चाहतों का क्या है

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* चाहतों का क्या है!1030 चाहतें तो पागल होती हैं। जैसे अक्सर मैं चाहती हूँ कि नंगे धूसर पहाड़ों को बसंत के हरेपन से ढँक दूँ, नदियों को प्रदूषणमुक्त पानी से लबालब भर दूँ, घाटी के सूख चुके सोतों को फिर से जीवित कर दूँ। चाहती हूँ कि उत्पादन, राजकाज और समाज के पूरे तंत्र पर उत्पादन करने वाले क़ाबिज़ हों और फ़ैसले की पूरी ताक़त उनके हाथों में हो। चाहती हूँ बराबरी और आपसी सम्मान से भरा ऐसा प्यार जो मुक्ति का पर्याय हो और जिसकी मौन उपस्थिति में आत्माएँ संवाद करें कविता की भाषा में। जो नहीं है और जिसे होना ही चाहिए उसकी कामना में खरचती हूँ जीवन और सोचती हूँ कि दुनिया में अगर नहीं हुआ करतीं कुछ पागलपन भरी चाहतें तो मनुष्यता का भविष्य क्या होता! लेकिन सिर्फ़ चाहने से क्या होता है! इसलिए...