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कविता

सिर्फ सोलह लाइन में
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सिर्फ सोलह लाइन में

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** उसने सुझाव दिया कि अपने दिल का अरमान लिखो, अपनी चाहत, शत्रु, दिलोजान लिखो, मैंने कहा यार सिर्फ सोलह लाइन में आप ही बताओ क्या-क्या लिखूं, अपनी मर्ज लिखूं या दवा लिखूं, अपने दोस्त लिखूं या दुश्मन लिखूं, या दोस्त के खोल में छुपे स्वजन लिखूं, मेरी उन्नति के लिए उनका ढिंढोरा लिखूं, या सच में उनका बहलाता मन छिछोरा लिखूं, अपनी आन बान या शान लिखूं, या मुझे बर्बाद करने का उनका अरमां लिखूं, समाज के लिए जां लुटाना लिखूं, या उनका स्वार्थ और बरगलाना लिखूं, अब दिल चीर कर और कितना बताऊं, सोलह लाइन में क्या दिखाऊं क्या छुपाऊं। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। ...
अवनी… अम्बर…
कविता

अवनी… अम्बर…

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** तुंग श्रृंग शिखर वृक्ष का सन्देश सुनाता अम्बर को कहता अवनि आश्वस्त है तप्त रवि जब किरणे फैलाता। पसरे वृक्ष छाया करते अवनी पर गोला ई, चौडा ई, चतुर्भुज, लम्बाई मे गणित बैठाती है शाखा ऐ। झुम कर दे ठण्डी पवन तपती दुपहरी मे पर्णो पर संगीत सुनाती आडी, तिरछी शाखा ऐ वृक्षो की आलिंगन करती अवनी का। मानो वृक्षशाखा ऐ कह रही है हे अवनी हन तुम्हे संभाल लेगी क्योकि नीचे की जडो का तुमही तो आधार हो वृक्षो के क ई आकार छोटे, बडे, लम्बाकार देते सदैव अम्बर को अवनि का अस्तित्वभास। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ स...
जड़कला
आंचलिक बोली, कविता

जड़कला

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) किसान मन के सोनहा धान लुआँ मिंजा के घर आगे मेहिनत के फल मिलगे कोठी डोली म धान धरा गे।। अग्घन, पूस के महीना म संगी लद-लद जाड़ जनाए कथरी, कमरा, अउ साल ओढ़े गोरसी म आगी सुलगाए।। कतको कपड़ा पुर नई आवय जड़कला हर जब आथे ताते कपड़ा अउ ताते जिनिस सबों के मन ल भाथे।। नोनी, बाबू अउ, लइका सियान जाड़ म ठिठुरत काँपय संझा बिहनिया जम्मो जुरमिल भुर्री बार के तापय।। कुहरा निकलय मुहुँ डहर ले, नहाय बर मन ढेरियाय उठत बिहनियाँ सुरुज के अगोरा घाम ह बने सुहाय।। तिवरा भाजी, राहेर के बटकर सबो के मन ल भाय चिरपोटी पताल के चटनी संग अंगाकर गजब मिठाय।। परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित क...
बदलते युग का शोर
कविता

बदलते युग का शोर

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** आधुनिक युग नया दौर चहुँऔर मचा खूब शोर, कहीं तारीफ का बजता ढोल बिगुल कहीं नजरअंदाज करने में है गुल, तकरार आमने आमने पुरजोर घमासान जंग में दुर्बल को मिटाने में प्रतियोगिता में मचा शोर, भारी भरकम मची दौड़ मेहनत पर फेरकर पानी करने को लगाते जोर मजबूत साख मिटाने में लगाए जोर करते कमजोर, बदलते आधुनिक युग में बस मचाते बस, यही शोर बदलते समय यही सोच में, बदले बोलने के व्यवहार संग इंसान अब इंसान से प्रश्न पूछने और सोचने को कहाँ है संस्कार संस्कृति उच्च विचार, सोचता इंसान क्या करूँ, कैसे करूँ नम नेत्र से एकांत बैठे बदलते आधुनिक युग में भीतरघात की वेदनाओं में, सच्चाई बताने में कमजोर सौहार्द समन्वय भाईचारे में पतन की डोर जाने कितनी हो रही बदलते युग मे कमजोर परिचय :- ललित शर्मा निवासी : खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (अस...
जानकारी जरूरी है
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जानकारी जरूरी है

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** किसी और शहर जाने के लिए एक खास नाम का बस विनय था, जिसके आने जाने का समय तय था, मुझे इंतजार में कुछ वक्त बिताना था, मैं सामने बैठे बुजुर्ग के पास आया, नमस्ते करते हुए बतियाया, अंकल जी अपना हालचाल बताइए, कुछ अच्छी बात सुनाइए, तब वह अनवरत बोलता रहा, बीच बीच कभी गुस्सा और प्यार से डोलता रहा, उन्होंने बुद्ध के बारे में विस्तार से सु ताया, ज्ञान विज्ञान के उनके मार्ग को बताया, कभी कबीर जी के बारे में, कभी रैदास जी के बारे में, कभी गुरू नानक देव जी के बारे में, कभी ज्योतिबा, सावित्रीबाई फुले के बारे में, कभी झलकारी बाईं के बारे में, कभी नारायणा गुरू के बारे में, कभी तिलका मांझी के बारे में, कभी बिरसा मुंडा जी के बारे में, कभी बाबा साहेब के बारे में, तो कभी कांशीराम जी के बारे में बताया, ये स...
शांत चेहरा
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शांत चेहरा

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** शांत चेहरा कभी कमजोर नहीं होता स्थिर चेहरे के पीछे अनकहे तूफान छिपे होते है उनके चेहरों पर कल के संजोए स्वप्न नहीं होते समाज के थपेड़ों से चेहरे की लकीरें गहरी हो जाती हैं ! अश्रु उनके कभी दिखाई नहीं देते सबकी खुशी में वो बस मुस्करा देते हैं उनके खामोश झूले की पेंग बहुत ऊंची होती है दर्द का गीत उनकी धड़कनों में पिरोया होता है! उनकी जिंदगी की किताब का हर एक पन्ना किस्सा होता है किसी पन्ने पर चैन तो किसी पर कठिनाइयों का बसेरा होता है! शांत चेहरा उनकी कमजोरी नहीं होती उनकी ताकत, उनके संयम और दृढ़ता की परिभाषा होती है ऐसे व्यक्तित्व में कोई दिखावा नहीं होता इसीलिये उम्र भार ये चेहरा भीड़ में तन्हा होता है! उनके दिलों के टूटने की आवाज नहीं होती आग का एक दरिया बहता है जिसमें बहुत कु...
हिंदी आत्मा में बस्ती
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हिंदी आत्मा में बस्ती

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** हिंदी आत्मा में बस्ती है, संस्कारों की उजली हस्ती है। माँ की लोरी, पिता का विश्वास, मिट्टी की सोंधी खुशबू-सी पास हर धड़कन में इसकी मस्ती है। यह भाषा केवल शब्द नहीं, यह भावों की निर्मल सरिता है। आँसू बनकर भी चुपके बहती, मुस्कान बन ओठों पर ठहरती हिंदी जीवन की स्वर गीत है। तुलसी की चौपाइयों में धर्म, मीरा के पदों में प्रेम पुकारे। रसखान की भक्ति में डूबी हुई, कबीर की वाणी में सत्य जली हिंदी युग-युग तक पथ रहे भली। यह खेतों की हरियाली बोले, यह श्रमिक के पसीने की गंध। यह पर्वों की थाली सजाए, यह त्याग, तपस्या का संदेश जन-जन की आशा की है कंध। जब तक आत्मा में प्राण बसे, हिंदी का दीप जलता रहेगा। समय बदले, दुनिया बदले, पर संस्कृति का यह अमिट स्वर हृदय-हृदय में पलता रहेगा। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म ...
रात्रि का दृश्य
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रात्रि का दृश्य

साक्षी लोधी नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) ******************** ओढ़ निशा को चपल चांदनी मन को आकर विचलित करती नीरवता की ध्वनि विकट है दृश्य गगन का अतुल मनोरम तारों की झिलमिल सेना के बीच खड़ा है ये मेरा मन शीतलता सी लिए हवाएं आएं जाएं जुगनू आकर आस-पास राहें चमकाएं तमस ने रंग के नील गगन को श्याम रंग कर डाला और गले में डाल सितारों की उज्जवल सी माला दुग्धमेखला बेणि बनकर नागिन सी लहराए चंद्रकिरण अपनी किरणों से और अधिक चमकाएं जगह जगह पे उमड़े घुमड़े बनकर मानो प्रहरी ये घन तारों की झिलमिल सेना के बीच खड़ा है ये मेरा मन परिचय :-  साक्षी लोधी निवासी : नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। प्रिय मित्र, शुभचिंतक एवं परिवारजन आपको प्रेषित मेरी नई स्वरचित रचना, कृपया ल...
स्त्री की आवाज
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स्त्री की आवाज

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* तुम पुकारे जा रहे हो और मुझसे पूछते हो कि अजनबी सी ख्वाहिशें क्यों पाल बैठी हूँ? मैं उसी आदमी से चाहत कर बैठी हूँ जो अपने ही शोर में खुद को खो चुका है। न तुम इत्मिनान से बैठ पाते हो, न नींद तुम्हें पूरा अपना मानती है और फिर भी पूछते हो मुझसे कि इस मुख़्तसर सी ज़िंदगी से मैं क्या चाहती हूँ? मैं तो बस इतना चाहती थी कि तुम थक कर किसी शाम मेरे पास बैठ सको, बिना कुछ साबित किए, बिना खुद से लड़े। पर तुम तो अपनी तन्हाई की शाम का भी चराग़ नहीं जला पाए… और अब मुझसे पूछते हो कि मैं हवा जैसी चाहत क्यों लेकर आई हूँ? शायद मेरी गलती यही थी कि मैंने उस आदमी से दिल लगा लिया जो खुद से ही दोस्ती निभा नहीं पाया. परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे ज...
कभी कभी सोचती हूँ मैं
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कभी कभी सोचती हूँ मैं

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** कभी कभी सोचती हूँ मैं कौन हैं हम, खुद को साबित करने के लिए क्यों बनना चाहते हैं कुछ हम। बाहर से रंगों से भरे हुए तन की सजावट को प्राथमिकता देते हैं हम भले ही भीतर से खोखले हों मगर रंगीन आवरण से ढके हैं हम। शांत चेहरे की मुस्कान काफी नहीं लगती खुद को ओहदे की चमक से संवारना चाहते हैं हम सूकून हमारा क्यों पर्याप्त नहीं सब कुछ पाने की होड़ में लगे हैं हम। मन की शांति कोई धन नहीं प्रकृति ने जो दिया उसका का कोई मोल नहीं अर्थिक धन से तौल रहे रिश्ते क्यों राजगद्दी की दौड़ में शामिल हैं हम। परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी शिक्षा : एम. ए., एम.फिल – समाजशास्त्र, पी.जी.डिप्लोमा (मानवाधिकार) निवासी : लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ...
राणा सांगा
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राणा सांगा

साक्षी लोधी नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) ******************** वीरता की सीढ़ियों पर जन्म से जो चढ़ गए खेलने की उम्र में जो शत्रुओं से भिड़ गए मातृभूमि को जो अपनी लहू से ही सींचते आंख से ही सत्रुओं के प्राण आधे खींचते रक्तरंजित भाल जिसके, कंठ सबके सोखते नख प्रखर वीर महाराणा सांगा वीरता की सीढ़ियों पर जन्म से जो चढ़ गए खेलने की उम्र में जो शत्रुओं से भिड़ गए मातृभूमि को जो अपनी लहू से ही सींचते आंख से ही सत्रुओं के प्राण आधे खींचते रक्तरंजित भाल जिसके, कंठ सबके सोखते प्रखर नख से दुश्मनों कि छातियों को नोंचते जिनके वंशज शोर्य गाथा रक्त से ही गढ़ गए जो झुके नहीं सर भला कटे, धर ही जिनके लड गए बो वीर मेवाडी की जिसने युद्ध सो सो जय किए जिनका हर कण कण धरा का, शोर्य का गायन करे जिनकी गर्जना सुन भागते, दुश्मन भी उल्टे पाव लिए वो राणा सांगा चलते थे, छाती पर अ...
बिखर सा गया हूं मैं…
कविता

बिखर सा गया हूं मैं…

शोभा रानी खूंटी, रांची (झारखंड) ******************** ऐ वक्त तेरी अदाओं को देख... बिखर सा गया हूं मैं.... बहुत याद आती है मुझे.... खुद की.... मुनासिब होगा अगर तू मुझे पहले जैसा कर दे..!! बहुत याद आती है मुझे... वो बचपन के ख्याली पुलाव... वो लड़कपन के हजारों खिलौने... वो अल्हड़ आजादी... वो निश्चल हृदय... वो बेख्याल सा मन... वो सुकून भरी नींद... वो सुनहरी खुशनुमा सुबह... भरी दोपहरी में दोस्तों संग... कच्ची अंबिया चुराना... यारों संग बर्फ के गोलो को... मां से छुपा कर खाना.. वो बारिश के पानी मे... कागज की कश्ती चलाना... वो पूस की ठिठरन में .... अपनो संग आग सेकना... वो सावन के झूले मे... गूंजती हंसी और ठिठोलियां.... वो ख्वाबो का जहँ।... और मुट्ठी भर आसमा... वो बचपन के दिन.... वो इंद्रधनुषी सा सतरंगी समा.... बदलते वक्त के साथ .... खोता हुआ झिलमिलाता सा.... व...
दोष किसे दूँ
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दोष किसे दूँ

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** वही ब्रह्मांड, वही दुनिया, वही मुल्क, वही प्रकृति, वही पर्यावरण, वही आबो-हवा, वही नैतिकता, वही संस्कार, वही जीव-जगत… फिर भी गिरते स्तर के लिए दोष किसे दूँ? मानव, अब मानव नहीं रहा दानव हो चुका है। संस्कार, अब संस्कार नहीं रहे सिर्फ़ दिखावे का आवरण बन चुके हैं। नैतिकता, अब आत्मबोध नहीं दूसरों से की जाने वाली उम्मीद बन गई है। इंसान ढीठ हो चला है, ढिठाई ऐसी कि हर जगह दिखता है “मैं… और सिर्फ़ मैं!” किसी के पास अब हृदय शेष नहीं, जिसे त्यागना चाहिए उसे कसकर पकड़ा जाता है। होड़ मची है- अपने स्तर को सबसे नीचे ले जाने की, और गर्व से दिखाने की। तो कहो… इस पतन के लिए दोष किसे दूँ? परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प...
इंतजार
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इंतजार

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** कोयल को इंतजार है सावन की हो फुहार, प्रेमी को इंतजार है प्रियतमा की चाह, एक भक्त को इंतजार है ईश्वर का सानिध्य, शिष्य को इंतजार है गुरु का मिले आशीष, धरती को इंतजार है कब बरसेंगे मेघ, सागर को इंतजार है नदियों का समावेश, एक मोरनी को इंतजार है स्वाति नक्षत्र की एक बूँद। निषाद को इंतजार है श्री राम सा मित्र, शबरी को इंतजार है गुरू का है उपदेश बैर खाये श्री राम प्रभु कई जन्मो का मेल। अहिल्या बैचैन है पाषाण का मिला अभिश्राप प्रभु राम की रज मिले होवे आज उद्वार। केवट को इंतजार है कब नाव चढ़े श्री राम, रावण को इंतजार है योद्धा कौशल राम। जटायू के पर कटे इंतजार हे राम बेटे का सा प्रेम मिला उद्वारक श्री राम, कोसल्या को इंतजार है कब आयेगे मेरे राम। सूनी अयोध्या मै खुशियाँ फिर लौट आयेगी आ...
निस्तब्धता
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निस्तब्धता

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** निस्तब्धता जब बोल न पाए, मन भीतर से टूट जाता है, शब्दों के अभाव में पीड़ा का शोर और गूंज जाता है। खामोशी की चादर ओढ़े, दर्द अकेला सोता है, भीड़ में रहकर भी इंसान खुद से ही रोता है। निस्तब्ध क्षणों में स्मृतियाँ तीखे तीर चलाती हैं, अनकहे सवाल बनकर रातों की नींद चुराती हैं। जहाँ संवाद थम जाए, वहाँ संबंध दम तोड़ते हैं, निस्तब्धता में ही कई अपने पराए हो जाते हैं। खामोशी का बोझ कभी-कभी शब्दों से भारी है, यह भीतर-भीतर जलाती है, पीड़ा इसकी न्यारी है। निस्तब्धता में मन खुद से ही लड़ जाता है, हर मौन क्षण एक नया घाव दे जाता है। बिना आवाज़ की पीड़ा भी गहरी चोट लगाती है, निस्तब्धता अक्सर आत्मा को चुपचाप रुलाती है। जब भावों को मार्ग न मिले, वे आँसू बन बहते हैं, निस्तब्धता में ही कई सपने दम तोड़ते रहते हैं। खा...
अरमानों की पतंगे
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अरमानों की पतंगे

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** अरमानों की डोर से सपनों की पतंग उड़ा लेता हूं। मेरे सपनों की कई आकार, प्रकार की पतंगे। इनमें से अपनी हसरतों को हवा में लहरा लेता हूं। कभी-कभी अपनी मेहनत के कन्ने बांधकर सपनों की पतंग, उड़ा लेता हूं। कभी अरमानों की पतंग ऊपर उड़ती, कभी गोते लगती, कभी ढील पाकर, नीचे आ जाती। हार जीत खुशियों के आलम से, आसमां में उड़ती पतंगो से, एक ही संदेश पाता हूं। हर पतंग उलझी है, एक दूसरे की डोर से। फिर भी कुछ रिश्ते उलझे से, उड़कर भी खुशी से झूम रहे हैं। एक डोरी से इन पतंगों से दिल और नजरे, एक दूसरे पर लगाये बैठे है। आसमां में उड़ती पतंगों से, हर दिल भी पतंग सा बंधा, टक टकी लगाए बैठा है। परिचय :- संजय कुमार नेमा निवासी : भोपाल (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्व...
पिता-पुत्र
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पिता-पुत्र

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** एक पिता अपने नन्हें से पुत्र का पालन पोषण करते उसे स्नान कराते, खाना खिलाते कितना खुश हो रहा है खिलखिलाहट से गूंज रहा है उसका घर-आंगन-आशियाना! नन्हें-नन्हें पांव शैतानियां करते कभी इधर तो कभी उधर इठलाते अद्भुत है प्रेम पिता का अपने पुत्र के प्रति समेटना चाहता है पिता इन अनमोल लम्हों को अपने सीने में ! समय मानो पंख पर लगा कर उड़ता जा रहा है, पिता के बाजुओं में ताकत है, नन्हा बच्चा अपने को सुरक्षित महसूस करता है। समय अपनी गति से चलायमान हो रहा है। वहीं आशियाना, वहीं घर-आंगन है, किन्तु आज पिता के कंधे झुके हुए से है हाथों में कंपकंपाहट है, आज वो पिता चलने से लाचार है, पिता की नजरे झुकी है मानो उनसे कोई गुनाह हुआ हो ! वही पुत्र आज पिता को खिला रहा है किन्तु कोई खिलखिलाहट नहीं, कोई खु...
औचित्य क्या?
कविता

औचित्य क्या?

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** यथार्थ को त्याग, सच्चाई को कुचल, कल्पनाओं को सच बता इतराऊं मचल-मचल, सारे संसार का ज्ञान ठूंस लूं अपने अंदर, पर यकीन करूं हो जाए कोई अलौकिक चमत्कार, तो फिर औचित्य क्या उस ठूंसे हुए ज्ञान का, लदे रहूं हीरे मोतियों से, ढका रहूं नवीन वसनाें से, और रखूं अस्वच्छ तन को, तो औचित्य क्या अथाह धन का, सबको पढ़ाता फिरूं विज्ञान, बटोरूं नित सम्मान, जा जा व्याख्यान दूं विद्यालयों में, महाविद्यालयों में, और अंधा यकीन करूं पाखंडों और अन्धविश्वास पर, तो औचित्य क्या अथाह ज्ञान का, प्रकृति से प्रेम करूं, हर जीव की उपयोगिता समझूं, सिर्फ अपनी सनक खातिर कैद में रखूं तोता, मैना, बुलबुल, तो औचित्य क्या खुले आसमान का, कामना है न बंधूं किसी ऐसे नियम से जो मुझे इंसान न रहने दे, और हां जिसे जो कहना है कहने ...
कलम का शहीद
कविता

कलम का शहीद

सूर्यपाल नामदेव "चंचल" जयपुर (राजस्थान) ******************** वो शख्स शब्द बहुत सुंदर लिखता था तन नंगा था ढूंढने कपड़े सड़को पर निकला था लेखनी उसकी चलती तो ज्वाला उगला करती थी आग भूख से पेट में उसकी सदा जला करती थी शब्दों में उसके भावनाएं बारिश की बूंदों सी बहती थी आंखों से अश्रु की धारा कहानी जुदा जुदा कहती थी दुनिया की चकाचौंध के अद्भुत सुख सदा लिखता था बिन छत की कुटिया से उन्मुख मुख लदा दिखता था शहरों की सड़कों सी सर्पिल कलम नहीं रुकती थी घिसती हाथों की लकीरें होनी में उसके भी चुभती थी भूमिहर भी बरसातों में बो बीज फसल उगाया करता था कागज के खेतों में बो शब्दों को अलख जगाया करता था देश की खातिर सीमाओं पर सैनिक जान दिया करता था वो फकीर समाज में अपनी स्याही से ज्ञान दिया भरता था भूमि न बंदूक रही हाथों में उसके शब्द प्रहार करता था पाखंड आडम्बर से लड़कर रिवाज ...
इस चांदनी रात की चादर में
कविता

इस चांदनी रात की चादर में

शोभा रानी खूंटी, रांची (झारखंड) ******************** कुछ बर्फ सी बिखरने लगती है... इस चांदनी रात की चादर में.... एक ख्वाब सा लगने लगता है.. यह लाल रंग सा इश्क लिए... मन शोर शराबा करता है ... फिर एक खामोशी सी छा जाती है... कैसे बताऊं ए ग़ालिब तुझे मैं... तन्हाइयो मैं खामोशी जान ले जाती है.... कुछ बर्फ सी बिखरने लगती है... इस चांदनी रात की चादर में... वह मेरा ख्वाब उलझता जाता है.. फिर यह इश्क बिखर सा जाता है... ओस की इन बूंदों के तले ....... वह पत्थर सा जम जाता है .... फिर से पिघल के बहने को..... उस भोर की सुनहरी रोशनी में... कुछ बर्फ सी बिखरने लगती है... इस चांदनी रात की चादर में... फिर खामोशी से निंदिया में ... तेरा अक्स कुछ कह जाता है... चुरा के फिर मेरी नींदों को... पलकों को सहलाता है... दर्द भी यही मेरा मर्ज भी यह... कुछ बर्फ सी बिखरने लगती है... इस चांद...
भारत मां से पंचतत्व ले
कविता

भारत मां से पंचतत्व ले

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** भारत मां से पंचतत्व ले, ईश्वर ने है हमें बनाया। इसीलिए भारत मां है, सब संतों ने है यही बताया। भारत मां से... मां की सेवा, रक्षा करना, सर्वोत्तम कर्तव्य हमारा। भारत भूमि ने ही अबतक, सात्विक पोषण किया हमारा। जो दायित्व दिया ईश्वर ने, उसने ही है पूर्ण कराया। भारत मां से... जो अर्पित सीमा रक्षा को, उनको प्रति पल नमन हमारा। उनको भी है नमन, जिन्होंने, राष्ट्र पे अपना सब कुछ वारा। जो विकास का लक्ष्य ले चले, अखिल विश्व में मान बढ़ाया। भारत मां से ... जो भी जहां दे रहा सेवा, सर्वोत्तम का लक्ष्य बना ले। सब कुछ दिया देश ने हमको, निष्ठा से वो कर्ज चुका ले। जो निष्काम लगा सेवा में, उसने सबका प्यार है पाया। भारत मां से... परिचय :- प्रेम नारायण मेहरोत्रा निवास : जानकीपुरम (लखनऊ) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमा...
गणतंत्र का नया व्याकरण
कविता

गणतंत्र का नया व्याकरण

अभिषेक मिश्रा चकिया, बलिया (उत्तरप्रदेश) ******************** न मैं शब्दों का सौदागर, न मैं कोई नेता हूँ, मैं सदियों की ख़ामोशी का, गहरा सन्नाटा हूँ। मैं वो पन्ना हूँ संविधान का, जो अब तक अधूरा है, मैं वो सपना हूँ आज़ादी का, जो न आधा न पूरा है। तुम जश्न मनाते ऊँचाई पर, मैं नींव की ईंटें ढोता हूँ, तुम फहराते हो झंडा, मैं उम्मीदें लेकर बोता हूँ। गणतंत्र तभी गरजेगा जब, कोई द्वार अंधेरे में न हो, इन्साफ़ की पावन राहों में, कोई रुकावट घेरे में न हो। अब इतिहास के बासी पन्नों पर, मैं स्याही नहीं बहाऊँगा, मैं वर्तमान की मुट्ठी में, अपना भविष्य सजाऊँगा। यही भविष्य अब भारत की, नई परिभाषा लिखेगा, नभ की हर एक ऊँचाई पर, अब मेरा तिरंगा दिखेगा! मेरा तिरंगा अब सिर्फ़ अम्बर का, शृंगार नहीं कहलाता, ये महाशक्ति बन चुके भारत का, 'विजय-पत्र' है कहलाता। केसरिया अब शौर्य की सीमा, तोड़ आगे बढ़ ...
रवि किरण
कविता

रवि किरण

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** कोहरे की धुंध मे अलसाई रवि किरण खोज रही धरा पर टिकने के लिए ठौर तभी, हां, तभी उसकी चमक से ओस बून्द दुर्वाकुंर पर चमक उठी ओस बून्द बोली आओ सखी हम साथ, साथ खेले। दुर्वाकुर कुछ कहता उसके पूर्व ओस बून्द लुढक गई धरा पर और, हा, रविकिरण ने अपना ठौर पा लिया घना कोहरा, और घना हो रवि को ढंक रहा था। तभी, मकर राशि मे रवि के प्रवेश पर कोहरे ने करवट ली वह रवि का ताप सहन करने का साहस नही कर पाया जगत मे जीवन अस्त-व्यस्त था रवि के प्रकाश ने सर्वस्व को जीवन दान देकर अपना कर्तव्य जन कल्याण के लिए पूर्ण किया परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आ...
रिश्तों की अहमियत क्या है
कविता

रिश्तों की अहमियत क्या है

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** रिश्ते क्या है...? और, इनकी अहमियत क्या है..? रिश्तों में अहसास होता है यथार्थ का अनुभूति होती है अनुभव की प्रतीति होती है प्रेम की संवेदन होते हैं सेवा के.... रिश्तों में आवेग होता है प्रीत का उन्माद होता है सुश्रुषा का आशा होती है कर्म की अभिलाषा होती है अपनत्व की.. मगर.... रिश्ते खड़े हैं निजी महत्वाकांक्षा के सहारे आधार होता है अर्थ का सोच मिली होती है स्वार्थ की आवरण अवश्य है अपनेपन का... रिश्तों में तपिश है ईर्ष्या की ज्वालामुखी है प्रतिशोध का प्रकंपन है अविश्वास का संवाद है वर्चस्व का..... रिश्तों में रिसता है छद्म अपनेपन का विरोध खड़ा अपनों से अपनों का अजीब सा अंत होता है सपनों का अनुबंध है मिथ्या कथनों का.. ऐसे में.. अतीत भूल रहे हैं वर्तमान भटक रहा है भविष्य अ...
तुम जरूर आओगी
कविता

तुम जरूर आओगी

आनन्द कुमार "आनन्दम्" कुशहर, शिवहर, (बिहार) ******************** तुम आओगी जरूर आओगी थोड़ी देर ही सही मगर आओगी आकर मेरे पास बैठोगी बैठ कर वेवज़ह की बातें करोगी जो होना था हो गया यह सब ईश्वर की ईच्छा हैं मानकर जल्दी से लौटकर अपने कार्यों में व्यस्त हो जाओगी तुम आओगी जरूर आओगी थोड़ी देर ही सही मगर आओगी मेरे गुज़र जाने के बाद! परिचय :- आनन्द कुमार "आनन्दम्" निवासी : कुशहर, शिवहर, (बिहार) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।...