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कविता

रानी पद्मनी
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रानी पद्मनी

साक्षी लोधी नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) ******************** सजी रानियां दुल्हन सी, मृत्यु को अमर बनाने गुहिल वंश की आभा से, खिलजी के होश उड़ाने राजपूतानी तेवर ले, अंबर को आंख दिखाने बढ़ चलीं रानियां एक साथ, मिट्टी का कर्ज चुकाने मातृभूमि के जयकारे के, साथ किया उदघोष बढ़ीं गर्व से आगे को, भरकर छत्राणी जोश चलीं सिंहनी गाते गाते, जय-जय मात भवानी और धधकते अग्नि कुंड में, कूद पड़ी क्षत्राणि किया समर्पित अग्निदेव को, कंचन रूप निराला नतमस्तक धरती का कण-कण, नतमस्तक अग्नि ज्वाला इतिहास अमर कर माताएं, बलिदानी गाथा बना गईं सोलह हजार चित्तौड़ की सतियां, अग्नि कुंड में समां गईं उड़ी महकती भस्म कुंड से, चित्तौड़ी मिट्टी चमकाने बलिदानों की पावन भूमि को, राजस्थान बताने परिचय :-  साक्षी लोधी निवासी : नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती...
सज रही अवध नगरी
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सज रही अवध नगरी

मोहिनी गुप्ता राजगढ़, ब्यावरा (मध्य प्रदेश) ******************** सज रही अवध नगरी, झिलमिलाती सरयू तीर। आ रही अब शुभ घड़ी, नैना बहाये अब नीर। उत्सुकता अपार हुई, चंचल मन धरे न धीर। स्वागत को रह- रह हुआ, जाए तन-मन अधीर। घर-आँगन, हर चौखट पर, प्रज्जवलित मन के दीप। भक्ति की रंगोली संग, सजे आम्र-पत्र द्वार। चुन-चुन पुष्प इन हाथों से, बनाऊँ सुन्दर पुष्पन हार। मेरे आराध्य के स्वागत को, बिसराऊँ मैं तो तन मन। सबके राम सब में राम, राम समाये सभी के मन। परिचय :- मोहिनी गुप्ता माता : पुष्पा गुप्ता पिता : पूनम चन्द गुप्ता जन्म स्थान : कोटा (राजस्थान) निवास : राजगढ़, ब्यावरा (मध्य प्रदेश) शिक्षा : सम्पूर्ण शिक्षा महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर और कोटा विश्वविद्यालय से प्राप्त की। एम.ए. (राजनीति शास्त्र), बी.एड . कोटा विश्वविद्यालय स...
अनकहा इश्क़
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अनकहा इश्क़

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मैं जानती हूं तुम सब जानते हो फिर ये भ्रम की माया क्यों नहीं पहचानते हो ? जानते हो तुम मेरी मुस्कुराहट की वजह फिर मुस्कुरा औरो से मेरे सीने को क्यों छली करते हो। मैं जानती हूं तुम मेरी फिक्र बहुत करते हो छू न जाए हवा भी मुझे इस बात से भी डरते हो। सुना है तुम जीत लेते हो सब का हृदय फिर मेरी एक मुस्कुराहट के आगे क्यों ख़ुद को हारे हुए बैठे हो ? लिखते हो तुम अपनी गजलों में मेरे बारे में फिर मेरा नाम सरेआम लेने से क्यों डरते हो। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।...
आओ सिर्फ भारतीय बनें
कविता

आओ सिर्फ भारतीय बनें

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** हर तरफ नजर आ रही व्यवस्था चौबंद चाक, अपने ही शहीदों के बलिदान रहे हैं क्यों नाप, बताओ जरा क्या उन सबने दी थी कुर्बानी अपनी जाति, धर्म या सम्प्रदाय के उत्थान खातिर, फिर क्यों बन रहे इन सबके नाम पर शातिर, आत्मबलिदान था केवल अपने देश के लिए, संस्कार, संस्कृति, सभ्यता और परिवेश के लिए, विदेशों में जा क्या देते हो परिचय अपनी जाति का, अपने मशहूर खानदान और ख्याति का, नहीं वहां कहना पड़ता है खुद को भारतीय, समता,समानता होता है जहां न पूजा न आरती, सम होने के प्रतीक बन हाथ मिलाते हो, रंग रूप को भूलकर सबको गले लगाते हो, फिर लौटकर अपने ही वतन में, भूल वही सभ्यता क्यों आग लगाते हैं चमन में, विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र, ले विश्वबंधुत्व का मूलमंत्र, कहते हैं कि चलना है केवल शांति की राह, आंतरिक सा...
दृष्टि-दंश
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दृष्टि-दंश

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** प्रश्न कौन करे..? प्रश्नवाचक तो होती हैं इंसानी दृष्टियां किसमें साहस है सत्य सुनने का और... कौन धुरंधर है जो मिथ्या भाषण कर न सके मित्रों..., कुछ तो होते हैं जन्म से दृष्टिहीन संभव है न देख पाते हों वे बाहरी दुनिया मगर... सजग होता है अंतर्मन पूरी समझ होती है अपने निजी स्वार्थ की जैसे थी ऐतिहासिक किरदार धृतराष्ट्र को ... कुछ होते हैं दृष्टिहीन आँखों के होते हुये भी जैस होते हैं वर्तमान में नेता ... पर... प्रलयंकारी होती है वेदनापूर्ण और मर्मांतक आम आदमी के लिए जिसके पास होती है कहने को दृष्टि मगर मूकदृष्टि केवल क्योंकि मुखर होता है अन्याय को सहना हनन होता है नीतियों का चयन होता है अयोग्य का चाहे बहाना कुछ भी हो आरक्षण या फिर सिफारिश ... संस्कार, परंपरा, अनुशासन पथ-प्रदर्...
बसंत पंचमी
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बसंत पंचमी

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** पीताम्बर ओढ़े धरा आज मुस्काई है, आँगन-आँगन में बसंत की छवि छाई है। कोपलों की हँसी, पत्तों की हरियाली, ऋतुओं की रानी बन आई खुशहाली। वीणा की झंकार में सरस्वती आईं, ज्ञान, कला, वाणी को संग लाईं। अक्षर-अक्षर में दीपक सा उजियारा, अज्ञान तमस से जग को उबारा। सरसों के खेतों में सोना लहराए, भौंरे, तितलियाँ राग नए गुनगुनाएँ। मंद पवन की चंचल-सी तान, जीवन में भर दे नव आशा, नव प्राण। मन के आकाश में रंग घुले पीले, स्वप्न नए हों, संकल्प हों नुकीले। सृजन की धारा बहे अविराम, हर हृदय गाए बसंत का गान। बसंत पंचमी, नव आरंभ की बेला, श्रद्धा, सौंदर्य का मधुर मेला। ज्ञान-पथ पर बढ़ें, लेकर उजास, जीवन बने सुरभित, सार्थक, उल्लास। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : 25 अप्रैल निवास : आबिदजान (अफ्रीका) मूल निवासी : इंदौर (मध्य...
जय हिन्द जय भारत
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जय हिन्द जय भारत

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** उमंग की बौछार हो, उत्साह की बयार हो, आनन्द की बरसात हो, और प्यार की बहार हो, जीवन अब खुशहाल हो, मन मे अनुराग हो, बस दिल मे एक भाव हो, स्वस्थता की बात हो, रोग मुक्त जहान हो, निर्मल आकाश हो, स्वस्थता का वास हो, प्रकृति मै बहार हो, विपदा सब दूर हो, जीवन मे रंग हो, मन मे उमंग हो, एकता का गान हो, देश भक्ति का भाव हो, प्रार्थना और वंदना हो, देश खुशहाल हो, सूर्य मे प्रकाश है, अन्धकार का नाश है, देश खुशहाल हो परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मंडल जबलपुर से सम्मानित २. अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना उज्जैन से सम्मानित ३. राष्ट्रीय हिं...
मुझे मेरा गाँव याद आता है
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मुझे मेरा गाँव याद आता है

पुष्पा खंगारोत जयपुर (राजस्थान) ******************** मुझे मेरा गाँव याद आता है वह बचपन याद आता है, जब तितलियों से उड़ते फिरते थे, वह मौसम याद आता है।। ना कोई रोक थी ना कोई टोक थी, हर लम्हा हम खुद मे जिया करते थे, याद आता है वो बचपन जब हम गाँव मे रहते थे।। ना किसी कदम पर कोई खतरा था ना माँ की आँखों का पहरा था, ना बाबा परछाई से घुमा करते थे ना कलाई पर भाई की पकड़ थी याद आता है वह बचपन...।। याद आती हैं वो गलियां जिनमे बचपन फूलों सा खिलता था हर नजर मे हमारा एक अपना सा रिश्ता हुआ करता था, कोई हमे बहन तो कोई बिटिया कहा करता था।। याद आता है वो...।। बदल गया मेरा गाँव अब तो लोग भी बेगाने लगते है, कोई दो कदम साथ भी चले तो हम घबराने से लगते है।। कोई अगर पूकार भी ले हमे तो हम घबराने लगते है।। याद आता है मेरा गाँव...।। परिचय : पुष्पा खंगारोत निवासी : ...
प्रेम की आधुनिकता
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प्रेम की आधुनिकता

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** 'लव', 'रोमांस', मस्ती और ताजा ताजा "लिव-इन-रिलेशनशिप" अंग बन चुके हैं इन्सानी जीवन के... सदियों से पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आ रही संस्कारों और परंपराओं से तकरार जीवन में... भारतीय संस्कृति में सदा महत्व रहा है सामाजिक बंधंनों और मर्यादाओं का ताना बाना मगर कहाँ मानती है आज की पीढ़ी राग अलापती है स्वेचछाचारिता और स्वच्छंदता निजी जीवन में... जुनूनी फितरत है प्यार में पागल होना पर क्या अच्छा है अँधा होना भूल जाता है सारे संबंध अपनत्व और रस्मोरिवाज जीवन में... कहाँ कुछ सोचता है उन्माद... आवेग... घुल जाता रक्त संग आवेश रम जाता है सिर्फ प्यार में बदल जाता है व्यवहार वासना कहाँ रह जाती वासना लगता सच्चा प्यार जीवन में... बदलते परिवेश में गलत हो जाते हैं सभी शुभचिंतक, यहाँ तक कि ...
जाड़े की धूप
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जाड़े की धूप

सुरभि शुक्ला इन्दौर (मध्य प्रदेश) ******************** जाड़े की गुनगुनी धूप में छत पर बैठना एक सुकून भरा वो एहसास देता है जैसे कोई माथे पर प्यार भरा हाथ फेर देता है कुछ देर के लिए सारे गम भुला देता है। ना किसी से कुछ कहना ना किसी से कुछ सुनना, अपने मन के भीतर एकांत में महसूस करना। और चाय की चुस्कियां लेते हुए साथ में एक किताब को लेकर पढ़ना उसके भावों और शब्दों में खो जाना देर तक धूप को निहारते-निहारते उसकी गोदी में लेटकर और उसकी पीले नारंगी साड़ी के पल्लू से अपना चेहरा ढककर सारे काम छोड़कर एक बहुत गहरी नींद में सो जाना। परिचय :-   सुरभि शुक्ला शिक्षा : एम.ए चित्रकला बी.लाइ. (पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान) निवासी : इन्दौर (मध्य प्रदेश) जन्म स्थान : कानपुर (उत्तर प्रदेश) रूचि : लेखन, गायन, चित्रकला सम्प्रति : निजी विद्यालय में पुस्तकालयाध्यक्ष घोषणा पत्र : म...
बेरहम वक़्त
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बेरहम वक़्त

प्रभजोत कौर मोहाली (पंजाब) ******************** बेरहम वक़्त, मंज़िल अभी दूर थी नन्ही सी जान मेरी कितनी मजबूर थी अपनों ने जो सितम ढाया था वही तो मुझे कंटीले राहों पें लाया था इन राहों पे चलते मैं मगरूर हो गई खुदगर्जी में सबसे में फिर दूर हो गई वक्त को अपना मीत बना लिया उस ने एक नया राह भी दिखा दिया हमने सुलझा के हर उलझन को राहों में दीप जला लिए जो बोये थे लोगों ने कांटे राहों में हमने मेहनत से वहीं पर फूल भी सजा लिए माना हर राह बड़ी कठिन थी हर पहर नयी एक उलझन थी मैं और वक्त दोनों साथ-साथ हो लिए ज़ुल्म करने वाले आखिर में रो दिए परिचय :- प्रभजोत कौर निवासी : मोहाली (पंजाब) अध्यक्ष : समता विचार मंच प्रयागराज इकाई चंडीगढ़ ट्राई सिटी सम्प्रति : लेखिका, जीवनीकार, अनुवादक घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित म...
करें नमन
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करें नमन

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** आओ मिलकर उन्हें करें नमन ! जिनके लिए सब कुछ है वतन..!! देश की रक्षा के लिए जिन्होंने.! निछावर कर दी तन और मन…!! घर से दूर वतन के लिए लड़ते.! मुश्किलों से लड़कर आगे बढ़ते..!! देकर दुश्मनों को जंग में मात.! भारत माँ की हिफाजत करते..!! आओ मिलकर उन्हें करें नमन.! जिनके लिए सब कुछ है वतन..!! सरहद में दुश्मन से टक्कर लेते.! तिरंगे को कभी झुकने न देते..!! ठंडी,गर्मी और बरसात को सहते.! ईट का ज़वाब, पत्थर से देते ..!! दुश्मनों की गोली सीने में खाकर.! अपने वतन को महफूज रखते.है.!! आओ मिलकर उन्हें करें नमन.! जो देश के लिए कुछ करते है..!! परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है ...
यादों का ज़हर
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यादों का ज़हर

बाल कृष्ण मिश्रा रोहिणी (दिल्ली) ******************** वफ़ा की दुनिया में… मिला बस यही इनाम, आँखों में आँसू… और होठों पर तेरा नाम। मौत आएगी मुझे इक सुकून बनकर, मिट जाएँगे सब शिकवे खाक में मिलकर। पर तुम्हें तो कतरा-कतरा, पल-पल मरना होगा, जिंदा रहकर ही यादों का ज़हर पीना होगा। वफ़ा की दुनिया में… मिला बस यही इनाम, आँखों में आँसू… और होठों पर तेरा नाम। न कोई मज़ार होगी मेरी, न कोई निशान होगा, मिटा दूँगा खुद को ऐसा, कि बस धुआँ-धुआँ होगा। जहाँ कभी हम मिले थे, वो हरसूँ वीरान होगा, बस मेरी तन्हाइयों का ही एक जहान होगा। वफ़ा की दुनिया में… मिला बस यही इनाम, आँखों में आँसू… और होठों पर तेरा नाम। हम तो आज़ाद हो जाएँगे राख होकर हवाओं में, खो जाएँगे खामोशी में, टूटे से ख़्वाबों में। पर तुम उम्र भर कैद रहोगे यादों के खौफ में, हर सांस सज़ा बनेगी, टूटे हर एक ख्वाब...
शाश्वत प्रेम
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शाश्वत प्रेम

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** तुम वो फूल हो जिसको मैं बिना स्पर्श के खिलता हुआ और महकता हुआ देखना चाहता हूं। तुम मेरी वो अधूरी ख्वाहिश हो जिसके पूरे होने का इंतजार मैंने कई युगों तक किया है। तुम मेरे जीवन का वो अंतिम अध्याय हो जिसके पूरा होने पर शाश्वत आनंद मुझे स्पर्श कर जाएगा। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।...
मंजिलों तक का सफर
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मंजिलों तक का सफर

साक्षी लोधी नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) ******************** लम्हे गमों के अकेले बिताने पड़ते हैं कदम एक एक कर जमाने पडते हैं सीधे सीधे कुछ नहीं मिलता जमाने मैं काटों में भी रास्ते बनाने पडते हैं मिलते मिलते रह जाती हैं मंजिले मौके कई ऐसे भी गवाने पड़ते हैं रात दिन एक हुए किसने देखे सबूत कामयाबी के दिखाने पडते हैं मिली हैं मंजिलें जिनको पूछो जरा उनसे कितने जोखिम डर डर के उठाने पड़ते हैं ऐसे ही नहीं मिलता मुठ्ठी भर आसमां जमीं के ऐसे कई हिस्से गबाने पड़ते हैं हारने वाले तन्हा लड़ते रहते हैं खुद से जीतने बालों के साथ जमाने लड़ते हैं किनारों पे मोती मिलते नहीं अक्सर गहराइयों में गोते लगाने पड़ते हैं एक खुआब मुकम्मल करने के वास्ते शोक अपने सारे दफनानें पड़ते हैं परिचय :-  साक्षी लोधी निवासी : नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती ...
है दम तो करो दावा
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है दम तो करो दावा

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जमीन के चंद टुकड़ों पर कब्जा करके समझ रहे हो खुद को मालिक इस जहां का, लटके पड़े हैं बड़े बड़े गोले आसमानों में क्या बन सकते हो मालिक वहां का, अपनी सोच से आगे भी सोचने की कोशिश करो, सिमट के बैठे हो पुरानी तुच्छ मान्यता ले चांद से चंद चांदनी अमावस में एक बार दो बार बार-बार नोचने की कोशिश करो, अपने ग्रंथों पर ही अटके हो जाते क्यों नहीं आगे, इंसान इंसान क्यों नहीं लगता या लपेटने की क्षमता नहीं रखते तुम्हारे कच्चे धागे, यूं ही कहते फिरते हो कि सभी बंध जाते हैं बांधे गए बंधन में, या सिर्फ लाभ देख लिपटने की हुनर है जैसे लिपटा हुआ भुजंग है चंदन में, प्रकृति को भी मजबूर कर चुके हो रोने के लिए, क्या चार गज जमीं काफी नहीं तुझे सोने के लिए, प्राणदायी वायु खो रहे हो बचा नहीं पा रहे पानी मुंह धोने...
सीता-लव-कुश- वार्ता
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सीता-लव-कुश- वार्ता

विजय वर्धन भागलपुर (बिहार) ******************** एक दिवस लवकुश ने माता सीता से यह प्रश्न किया, कौन हैं मेरे पिता हे माता किस कुल मैंने जन्म लिया, मैया बोली यथा समय मैं ये सब तुझे बताउंगी, तेरी जिज्ञासा को एक दिन तुझको मैं समझाऊंगी, कुछ ही दिनों के बाद विपिन में लक्ष्मण का आगमन हुआ, सेना भी थी साथ अस्त्र से दिशा-दिशा झंझनन हुआ, जब आश्रम के पास वे पहुंचे लव कुश से सामना हुआ, चचा भतीजे में जमकरके बाणों से आघात हुआ, घायल होकर जब लक्ष्मण पहुंचे निज कौशल धाम में, व्यथित हो गए राम देखकर अनुज लड़े संग्राम में, बोले अनुज कहो किसने तुम्हें ऐसा रक्त रंजित है किया, जिसने मेघनाद को मारा कैसे वह अब विजित हुआ, लक्ष्मण बोले भैया वन में दो बालक हैं ऐसे वीर, जिनने मुझको घायल करके बना दिया अत्यंत गंभीर, क्रोध से प्रभु के आंख हो गए लाल भुजायें फड़क उठीं, रथ पर चढ़ कर चले विपिन को ...
विराम कायरता नहीं
कविता

विराम कायरता नहीं

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* कुछ लोग संवाद नहीं करते वे रणनीति खेलते हैं। वे जानबूझकर ऐसे शब्द चुनते हैं जो आपके तर्क पर नहीं, आपकी नसों पर वार करें। उनका उद्देश्य समाधान नहीं होता, बल्कि आपको भावनात्मक रूप से असंतुलित करना होता है। ताकि आप मुद्दे से हटें, और वे आपकी प्रतिक्रिया को आपकी हार बना सकें। ऐसे लोग बहस के बीच अचानक से आपके चरित्र पर प्रश्न उठाएंगे, आपकी किसी पुरानी भूल को उछालेंगे, या आपकी आवाज़, भाषा, लहजे पर टिप्पणी करेंगे। असल विषय वहीं पड़ा रह जाता है और संवाद एक निजी युद्ध में बदल दिया जाता है। क्रोध की अवस्था में तर्क धुंधला पड़ जाता है। शब्द तेज़ हो जाते हैं, पर अर्थ कमजोर हो जाता है। और ठीक यही वह क्षण होता है जहां चालाक व्यक्ति जीत का भ्रम रच लेता है। इसलिए जब भी ऐसे किस...
राष्ट्र की धरोहर
कविता

राष्ट्र की धरोहर

अमित कुमार शर्मा "आनंद" प्रयागराज (उत्तरप्रदेश) ******************** विश्व हिंदी दिवस १० जनवरी २०२६ पर आयोजित कविता लिखो प्रतियोगिता में सम्मिलित रचना राष्ट्र की धरोहर संस्कृति की पहचान है कविता आसमान में लहराते तिरंगे की शान है कविता आज़ाद के बंदूक से निकली जो आखिरी गोली भगत सिंह के देश भक्ति की सम्मान है कविता। कश्मीर घाटी,हल्दी घाटी की आवाज है कविता झेलम के जल में चलते नाव की साज है कविता राणा प्रताप ने जब खाई थी घास की बनी रोटियां दुश्मनों पर टूट पड़े ऐसे चेतक की ताज है कविता। हिमालय से निकली गंगा की कल कल है कविता पवित्र करती तन मन जो शीलत जल है कविता शंकर की जटाओं में भी बंधकर जो बहती निरंतर भागीरथी के निरंतर तप का पुण्य फल है कविता। वर्षा ऋतु में किसान के चेहरे की चमक है कविता बसंत ऋतु में गाते हुए पंछियों की चहक है कविता चद्दर ओढ़कर ठंडी रातों से कांपती हुई ...
भारतीयों की शान हैं हिंदी
कविता

भारतीयों की शान हैं हिंदी

प्रिया पाण्डेय हूघली (पश्चिम बंगाल) ******************** विश्व हिंदी दिवस १० जनवरी २०२६ पर आयोजित कविता लिखो प्रतियोगिता में सम्मिलित रचना भारत का सार हैं हिंदी, हिमालय की मस्तक पर विराजमान हैं हिंदी, कण-कण में बसते हैं जिसके, हम भारतीयों की शान हैं हिंदी, लड़ी, खड़ी और जग में नाम किया, उस भाषा का नाम हैं हिंदी, मीरा के पद में, कबीर के दोहे में, प्रेमचंद की कहानियों में छुपी हैं हिंदी, जशंकर प्रसाद के "आंसू"बन बही हिंदी, तो नागार्जुन की "अकाल और उसके बाद की व्यथा सुनाती हिंदी," शोषित हुई पर खड़ी रही, अंग्रेजी ने कितना दबाया, पर उड़ती रही आसमानों में, तुलसीदास का रामचरित मानस हैं हिंदी। परिचय :- प्रिया पाण्डेय जन्मतिथि- २२/१०/१९९९ शिक्षा- बी.ए तृतीय वर्ष (राजनीती शास्त्र ) स्थान- ९२, चरकतल्ला, पोस्ट -माखला, जिला- हूघली (पश्चिम बंगाल ) कार्य- शिक्षिका साहित्य...
सादगी
कविता

सादगी

नील मणि मवाना रोड (मेरठ) ******************** विश्व हिंदी दिवस १० जनवरी २०२६ पर आयोजित कविता लिखो प्रतियोगिता में सम्मिलित रचना कबीर सा साधारण कौन निपट गंवार अनपढ़ जात-पात से परे गृहस्थी में रहे बुनते रहे कपड़े छोड़ा कुछ नहीं पाया सब कुछ नहीं विशिष्टता कोई जान लिया आत्मिक सौंदर्य सादगी को साधते रहे राम चदरिया कातते रहे। परिचय :- नील मणि निवासी : राधा गार्डन, मवाना रोड, (मेरठ) घोषणा : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। प्रिय मित्र, शुभचिंतक एवं परिवारजन आप सभी को नववर्ष पर हार्दिक शुभकामनाएँ। आशा है इस अवसर पर आप को प्रेषित मेरी नई स्वरचित रचना लिंक को टच कर पढ़ने का कष्ट कर प्रोत्साहित करेंगे एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करेंगे ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवा...
हिंदी में संस्कृति मुस्काती है
कविता

हिंदी में संस्कृति मुस्काती है

याशिका दुबे इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** विश्व हिंदी दिवस १० जनवरी २०२६ पर आयोजित कविता लिखो प्रतियोगिता में सम्मिलित रचना हिंदी केवल शब्दों की रचना नहीं, यह सभ्यता की साँसों का प्रमाण है। ऋषियों की वाणी से जन-जन के मन तक पहुँचा संवाद है। यह वेदों की गंभीरता भी है, और लोकगीतों की मधुर तान। यह तुलसी की मर्यादा, और कबीर का निर्भीक ज्ञान। हिंदी में संस्कार पलते हैं, हिंदी में संस्कृति मुस्काती है सरल होकर भी कालजयी, हिंदी विश्व में भारत की पहचान बन जाती है। परिचय : याशिका दुबे निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। प्रिय मित्र, शुभचिंतक एवं परिवारजन आपको प्रेषित मेरी नई स्वरचित रचना, कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें...
मैं कुम्हारी हूँ
कविता

मैं कुम्हारी हूँ

बृज गोयल मवाना रोड, (मेरठ) ******************** विश्व हिंदी दिवस १० जनवरी २०२६ पर आयोजित कविता लिखो प्रतियोगिता में सम्मिलित रचना मैं कुम्हारी हूँ कुम्हारी हूँ निर्माण करती हूँ मिट्टी लाई सुखाया कूटा एक रस किया गूंथा फिर चार दीये बनाये आकर्षक आकृति दी सुखाये तपाये सुंदर रंगों से सजाया प्रज्ज्वलित किया महकाया आज वे चारों दिशाओं में प्रकाश फैला रहे हैं जासमीन से महका रहे हैं गर्व महसूस करती हूं मेरी मेहनत रंग लाई है। परिचय :- बृज गोयल निवासी : राधा गार्डन, मवाना रोड, (मेरठ) घोषणा : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानिय...
संस्कृति की मुस्कान है हिंदी
कविता

संस्कृति की मुस्कान है हिंदी

पूजा महाजन पठानकोट (पंजाब) ******************** विश्व हिंदी दिवस १० जनवरी २०२६ पर आयोजित कविता लिखो प्रतियोगिता में सम्मिलित रचना ना यह सीमाओं में बंधी है, ना दूरी इसे कमज़ोर बना पाई है हिंदी ने हर दिल में उतरकर अपनी अलग पहचान बनाई है कबीर के दोहे में, युवाओं की आवाज़ में, माँ की ममता की लोरी में, दोस्तों की मीठी तकरार में, हर भावना की सच्ची आवाज़ बसती है इसके हर उच्चार में संस्कृति की मुस्कान है हिंदी, हम सब की पहचान है हिंदी हमारी राजभाषा है हिंदी, हम सब भारतीयों का ताज है हिंदी जय हिंद, जय भारत का नारा है दुनिया में गूंज रहा भारत की पहचान बनकर है आगे बढ़ता जा रहा विश्व हिंदी दिवस पर यह प्रण है, इसकी गरिमा को बढ़ाना और कायम रखना हमारा कर्म है परिचय :- पूजा महाजन निवासी : पठानकोट (पंजाब) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाध...
आन बान यह हिन्दी है
कविता

आन बान यह हिन्दी है

डॉ. भावना सावलिया हरमडिया, राजकोट (गुजरात) ******************** विश्व हिंदी दिवस १० जनवरी २०२६ पर आयोजित कविता लिखो प्रतियोगिता में सम्मिलित रचना प्यारे भारत के जन-मन का, स्वाभिमान यह हिन्दी है। अमर तिरंगे की गरिमा की, आन-बान यह हिन्दी है।। जन-मन के भावों, विचार के विनिमय का जो साधन है। विश्व पटल पर शिष्ट सलीकेदार ध्वनित अभिवादन है । भारत माँ के माथे पर की, अरुणोदय-सी बिन्दी है। अमर तिरंगे की गरिमा की, आन-बान यह हिन्दी है।। अँग्रेजों ने भी जिसके प्रसरण का भर-सक यत्न किया। संविधान ने संघ राजभाषा धिकार का रत्न दिया।। दयानन्द, गाँधी, सुभाष ने, अपनाई यह हिन्दी है। अमर तिरंगे की गरिमा की, आन-बान यह हिन्दी है।। भारतेन्दु दिनकर माखन के, राष्ट्र-प्रेम की परिभाषा। सूरदास मीरां तुलसी की, भक्ति भाव की अभिलाषा।। भावात्मक बन्धुत्व प्रेम का, मधुर गान यह हिन्दी है। अमर तिरंगे...