होली का गुलाल
श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
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होली का एक रत्ती भर
गुलाल का रंग
जो घरों में रहने वाले
वृद्ध के माथे पर नहीं सजा
वो गुलाल, रंगहीन हो जाता है!
वृद्ध होते-जन के
लटकते चेहरे देखकर
लगता है मानो वो जप कर रहे,
रंगोत्सव में लीन नहीं होते,
क्योंकि उनके परिजन उनसे
कोसों दूर चले गए होते हैं !
आंगन में बँधी गाय
और बकरियों की
खुली खूंटी ये बताती है कि,
इस आंगन की बेटियाँ
खूंटी से बहुत दूर चली गई हैं,
यदा कदा ही दिखती हैं !
किसी जानवर के
रंगों में डूबे चेहरे
और उसकी दर्दनाक बेचैनी,
सारी खुशियों को
मलिन कर जाते हैं ,
ये सोच कर की क्या
इनके लिए खुशी नहीं बनी ??
दूर किसी मंदिर में
कीर्तन बजता है
लगता है कोई
सोहर गीत गा रहा हो,
साँझ ढले किसी
पँछी की आवाज
लगता है मानो कोई
अपना दर्द बयान कर रहा है !
घर के आंगन में कहीं...














