सड़क के किनारे
डॉ. सुभाष कुमार नौहवार
मोदीपुरम, मेरठ (उत्तर प्रदेश)
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सड़क के किनारे बैठी वह
जीण-शीर्ण आधे घूंघट में,
हाथों में पके-अधपके
चावलों का कटोरा लिए।
पेट के गड्डे को भर
रही थी कुछ इस तरह
कि मानो फिर
कभी खाली न होगा।
लेकर कुदाल उन
नाजुक हाथों में,
फिर से एक नाली
को खोदना होगा।
अकेली नहीं थी वह!
दामपत्य जीवन के सुबूत
उसके दो कर्मवीर सुपुत्र,
कुदाल के हत्थे को
अधिकार स्वरूप छीनने
का प्रयत्न कर रहे थे।
क्योंकि यही तो मिलेगा
उन्हें कुछ संभलने पर!
शुक्र है कि उन्होंने
कागज कलम नहीं माँगी।
वर्ना कहाँ से लाकर देती
वो इन निरक्षरों को अक्षर?
सुघढ़ थी पर
पढ़ी-लिखी नहीं थी वह।
पेट की आग में
झुलस गया था
उस रूपवती का रूप।
वर्ना आधुनिकता के
अधनंगे लिबास में,
सड़क के किनारे
किसी रेस्तराँ में
वेटर को कुछ इठलाती
ऑर्डर लिखवाती।
पर वह तो सूँत-सूँतकर
खाए...



















