द्वयक्षरीय रचना
गिरेन्द्रसिंह भदौरिया "प्राण"
इन्दौर (मध्य प्रदेश)
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हे हरिहरी ! राहु रारी है, रह-रह हरा रहा है राह।
हीरे राही हार रहे हैं , हेरो हार हरो हुर्राह।।
हाहा हीही हूहू हेहे, होहो हूँह हो रही रार।
रो - रो रहा हरे हर राही, राहें हेर - हेर हर हार।।
अर्थात - हे विष्णु भगवान ! राहु बड़ा ही झगड़ालू है, वह रह - रह कर हर रास्ते में सबको सता रहा है। इसलिए इस रार में होने वाली हार को देखो और उसको हरो अर्थात हार से बचाओ, क्योंकि जीवन पथ पर चलने वाले हीरे जैसे हर राहगीर को यह हार बहुत ही कष्ट कारी हो गई है। चारों ओर हा-हा ही-ही हू-हू हे-हे हो-हो हूँ-हूँ की त्राहि-त्राहि मची हुई है। हे हरि ! हर राह का हर राहगीर अपनी हार देख - देख कर बुरी तरह रो रहा है।
परिचय :- गिरेन्द्रसिंह भदौरिया "प्राण"
निवासी : इन्दौर (मध्य प्रदेश)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि म...

















