सूर्यवंश के हंगामी
विजय गुप्ता
दुर्ग (छत्तीसगढ़)
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कला-कौशल कशीदे कढ़ना, चांद कला जैसे होते।
सुंदर कार्य संवाद बोल, घट-बढ़ कर मुखरित होते।
नेक काज पर प्रोत्साहन, स्व स्फूर्त सहज ही बढ़ना
कुछ कमियों की अनदेखी, तिरस्कार मार्ग से हटना
लगते लोग नागवार ऐसे, भाए आंख चुराकर रहना
कुछ अद्भुत उपलब्धि से, जीत की ताली ना बजना
ऐसे लोग बहुत हैं जग में, खुशहाल व्यक्ति पर रोते।
कला-कौशल कशीदे कढ़ना, चांद कला जैसे होते।
सुंदर कार्य संवाद बोल, घट-बढ़ कर मुखरित होते।
सम्मान समय पर जो होता, वही कद्र बनती मिसाल
बुद्धि घट में कई छिद्र जड़े, उन्हें पूछना सिर्फ सवाल
स्वभाव ही तो पहचान बने, कर्म योग रोशन मशाल
दूध पी सांप जहर उगले, चारा खा धेनु दूध कमाल।
गाय प्राणदायिनी सभी को, कृष्ण गौ सेवा में खोते।
कला-कौशल कशीदे कढ़ना, चांद कला जैसे होते।
सुंदर कार्य संवाद बोल, घट-बढ़ कर मुखरित होते।
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