तुम आओ चाहे चुपचाप
डॉ. निरुपमा नागर
इंदौर (मध्यप्रदेश)
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हे ऋतुराज तुम आओ चाहे चुपचाप
मैं सुनती हूं कण कण में तुम्हारी पदचाप
बीत गया पतझड़, खिलखिला रहे पलाश
बीता सबका कल ,अब क्यों हो कोई उदास
कल का यह बीतना सुनाता तुम्हारी पदचाप
हे ऋतुराज तुम आओ चाहे चुपचाप
वासंती बयार फैल रही चंहु ओर
मेरी धानी चुनरिया उड़ उड़ जाती पी की ओर
पवन सुनाती तुम्हारी पदचाप
हे ऋतुराज तुम आओ चाहे चुपचाप
खेतों की पीली सरसों ज्यों खिल रही
खिन्न उदासी की छाया भी दूर हो रही
सरसों की खुशहाली सुना रही तुम्हारी पदचाप
हे ऋतुराज तुम आओ चाहे चुपचाप
आम्र तरु यूं लदा मोरों से
नाच उठा मन मेरा जोरों से
आम्र आने की यह सुवास महका रही मेरी हर सांस
हे ऋतुराज तुम आओ चाहे चुपचाप
कोयल कूक कूक कर घोल रही मिठास
कोयल का यह अमृत रस छलक रहा आसपास
हे ऋतुराज तुम आओ चाहे चुपचाप
भंवरे की गुनगुन जगा रही मीठी आस
दिग्...

























