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पद्य

जयदयालजी गोयन्दका
कविता

जयदयालजी गोयन्दका

शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप' तिनसुकिया (असम) ******************** देवपुरुष जीवन गाथा से, प्रेरित जग को करना है, संतों की अमृत वाणी को, अंतर्मन में भरना है। है सौभाग्य मेरा कुछ लिखकर, कार्य करूँ जन हितकारी, शत-शत नमन आपको मेरा, राह दिखायी सुखकारी।१। संत सनातन पूज्य सेठजी, जयदयालजी गोयन्दका, मानव जीवन के हितकारी, एक अलौकिक सा मनका। रूप चतुर्भुज प्रभु विष्णु का, राम आचरण अपनाये, उपदेशों को श्री माधव के, जन-जन तक वो पहुँचाये।२। संवत शत उन्नीस बयालिस, ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी पावन, चूरू राजस्थान प्रान्त में, जन्मे ये भू सरसावन।। माता जिनकी श्यो बाई थी, पिता खूबचँद गोयन्दका, संत अवतरण सुख की बेला, धरती पर दिन खुशियों का।३। दिव्य रूप बालक का सुंदर, मुखमण्डल तेजस्वी था, पाँव दिखे पलना में सुत के, लगता वो ओजस्वी था।। आध्यात्मिक भावों का बालक, दया,प्रेम,सद्भाव लिये, जयदया...
चिंता
कविता

चिंता

राजकमल चतुर्वेदी "पागल पंडित" भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** क्यूं व्यर्थ में चिंता करता है ऐ पंडित पल का भरोसा नही ओर कल की बात करता है। है मिथ्या स्वप्नों का ये जगत ऐ पंडित तू अपने को इसका स्वामी समझता है।। मत बन मूर्ख इस माया के चक्कर मे ऐ पंडित ये माया है तुझे भी छल लेगी, इसने सबको छला है।।। बस फर्क इतना है, एक बंद आँखों का सपना है, और एक खुली आँखों का सपना है। परिचय :-  राजकमल चतुर्वेदी "पागल पंडित" निवासी : भोपाल (मध्य प्रदेश प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, ...
बापूजी
गीतिका

बापूजी

भीमराव झरबड़े 'जीवन' बैतूल (मध्य प्रदेश) ******************** बदल लिया है चोला सब ने, बदल गए ढब बापूजी। दिखा रहे दल झूठे सारे, अपने करतब बापूजी।।१ बुरा न बोलो, सुनो, न देखो, बदली सबकी परिभाषा, इन राहों पर चलता कोई, दिखा नहीं अब बापूजी।।२ सत्य अहिंसा दया प्रेम के, अर्थ हुए सब बेमानी, स्वार्थ साधना में रम जाना, सबका मतलब बापूजी।।३ सम्मानों के ओढ़ दुशालें, कलमें भूली बल अपना, शर्मिंदा है नजरें उनकी, बंद पड़े लब बापूजी।।४ चाहा तुमने यहाँ रोपना, भाईचारे के उपवन, भेदभाव के उग आए पर, सारे मजहब बापूजी।।५ टाँग खींचना और गिराना, फिर चढ़ना है ऊपर को, ताड़ रही नजरें सबकी, ऊँचे मनसब बापूजी।।६ आड़ तुम्हारे तस्वीरों की, कब तक इन्हें बचाएगी। तुम्हें बनाने लगे हुए जो, अपना ही रब बापूजी।।७ परिचय :- भीमराव झरबड़े 'जीवन' निवासी : बैतूल मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणि...
दो अक्टूबर दो पुष्प
कविता

दो अक्टूबर दो पुष्प

संगीता सूर्यप्रकाश मुरसेनिया भोपाल (मध्यप्रदेश) ******************** भारत-भू पर दो अक्टूबर। दो पुष्प अवतरित हो। भारत उपवन में खिले। पहले लाल बहादुर शास्त्री। दूजे महात्मा गांधी। दोनों पावन आत्माएं। भारत-भू पर श्रेष्ठ कर्म। करने आई,दोनों महान। विभूतियां दोनों का व्यक्तित्व। अद्भुत गुणों की खान। लाल बहादुर शास्त्री। विनम्र स्वभाव धनी। गुदड़ी के लाल। जय जवान जय किसान। नारा लगा दोनों का सम्मान। सदा किया। गांधीजी चले सत्य। अहिंसा मार्ग बापू कहलाए। करो या मरो नारा अपना। मौन रह सत्याग्रह कर। भारत स्वतंत्र करावाएं। अंग्रेजों की गुलामी से। अंग्रेजों को भारत से बाहर। खदेड़ भारत बापू बन गए। परिचय :- श्रीमती संगीता सूर्यप्रकाश मुरसेनिया निवासी : भोपाल (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कव...
भाग्य विधाता
कविता

भाग्य विधाता

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** बापू मेरे भारत भाग्य विधाता। थे वे सत्य अहिंसा पथ प्रदाता। पुतलीबाई कबा गांधी के प्यारे, साबरमती के संत स्वराज दाता। बने पहचान शांति दूत सत्याग्रही, राष्ट्रपिता इन्हें जन-जन पुकारता। हमें मिला आजादी का उजियारा, चलके बापू का चरखा सूत काता। यह गाते रघुपति राघव राजा राम, जोड़े जन हित अफ्रीका से नाता। जो खेड़ा चम्पारण से शुरू किया, बन गये हर आंदोलन के प्रणेता। अंग्रेजों भारत छोड़ो उद्घोष हुआ, किये गर्जना भारत के जन नेता। घर- घर बिगुल बजा आजादी का, परदेशी का यूं छूट पसीना जाता। मचा ब्रिटिश रानी के घर हड़कंप, अंतिम गौरों ने छोड़ी भारत माता। परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्यापक राजस्थान सरकार) निवासी : बाड़ा पदम पुरा, जयपुर, राजस्थान घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिक...
कृष्ण
कविता

कृष्ण

प्रो. आर.एन. सिंह ‘साहिल’ जौनपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** कृष्ण सदा सब गुण निपुण दें सबको आशीष, राग-द्वेष से मुक्त हों उन्नत हरदम शीश कर्म पुरोधा कृष्ण का अद्भुत है व्यक्तित्व सुमिरन से संशय मिट जाते अनुकरणीय कृतित्व निज हित से ऊपर रहे सदा राष्ट्र का मान विकसित होते देश से है अपनी पहचान अहं न सिर में पालिए घटता है सम्मान कौरव कुल का हो गया खंड-खंड अभिमान। नीति-नियंता कृष्ण सा हुआ न जग में कोय करें कर्म निष्काम सब आनंदित सब सोय सत्य घिरा हो धुंध मे आता सीना फार झूठ सबल दिखता भले पर जाता है हार माधव बनकर सारथी करिए फिर उपकार हारें सभी शत्रु भारत के हों उनका संहार परिचय :- प्रोफ़ेसर आर.एन. सिंह ‘साहिल’ निवासी : जौनपुर उत्तर प्रदेश सम्प्रति : मनोविज्ञान विभाग काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी, उत्तर प्रदेश रुचि : पुस्तक लेखन, ...
श्री लालबहादुर शास्त्री
कविता

श्री लालबहादुर शास्त्री

सुरेश चन्द्र जोशी विनोद नगर (दिल्ली) ******************** शिक्षक शारदा प्रसाद गृहस्थी में, राम दुलारी के पति हुए। घर उनके दो अक्टूबर तिथि को, लालबहादुर एक सपूत दुलारी के हुए।। अति स्नेह से कुटुम्ब ने, नन्हे जो अभिधान दिया। अठारह मासावस्था में विधि ने, नन्हे के पिता को निधन दिया।। प्राथमिक शिक्षा ननिहाल हुई, प्राप्तोपाधि काशी विद्यापीठ से हुई। किया दूर स्व-पैतृक उपाधि को, जोड़ी उपाधि शास्त्री पाई हुई।। "अंग्रेजो भारत छोड़ो" को किसी ने, "करो या मरो" में बदल दिया। देशभक्त लाल बहादुर शास्त्री ने भी, "मरो नहीं मारो" में बदल दिया।। बने संसदीय सचिव पंत शासन में, पुलिस, परिवहन मंत्रालय, भार दिया। फिर शासक ने स्वार्थ के लिए, दल का महासचिव बना दिया।। स्वच्छ सुंदर व्यक्तित्व ने उनको, द्वितीय प्रधानमंत्री भारत का बना दिया। नौ जून उन्नीस सौ चौसठ को, राष्ट्र ने पदभार ग्रहण कर...
गांधीगिरी
कविता

गांधीगिरी

बिपिन कुमार चौधरी कटिहार, (बिहार) ******************** सत्य अहिंसा का देकर नारा, जीवन भर वह अटल रहे, देश परदेश में सहा सितम, कब कहां वो विकल रहे, दुर्बल तन और निर्मल मन, संघर्षपथ पर सदा अविरल रहे, यातनाएं सही, पीड़ाएं झेला, चरखा चला, मचाते हलचल रहे, फिरंगियों के नाक में करके दम, देश आजाद कराने में सफल रहे, किया नहीं कभी पद की चाह, जीवनभर वह सरल रहे, सत्ता के हवसी लेकर उनका नाम, दुर्भाग्य, हर पल जनता को छल रहे, पूछता है, यह दुःसाहसी बिपिन, सही में गांधीगिरी पर कौन चल रहे... परिचय :- बिपिन बिपिन कुमार चौधरी (शिक्षक) निवासी : कटिहार, बिहार घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय ...
कैसे लम्हा-पल निकलेगा
ग़ज़ल

कैसे लम्हा-पल निकलेगा

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** सुनकर जिससे हल निकलेगा। फ़िकरा वो ही चल निकलेगा। जब भीतर की गाँठ खुलेगी, तब बाहर का सल निकलेगा। आज बिताया हमनें जैसा, वैसा अपना कल निकलेगा। टकसालें जो सूरत देगी, सिक्का वैसा ढल निकलेगा। खून-पसीना ,काम के ज़रिए, अक़्सर मीठा फ़ल निकलेगा। रस्सी आख़िर जल जाएगी, फिर भी उसमें बल निकलेगा। भूली-बिसरी यादों के संग, कैसे लम्हा-पल निकलेगा। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहान...
गांधी जी का जन्म दिवस
कविता

गांधी जी का जन्म दिवस

गीता देवी औरैया (उत्तर प्रदेश) ************* महात्मा गांधी जी का जन्म दिवस मनाएँ। विद्यालय में सब मिलकर तिरंगा फहराएँ।। सदा सत्य बोलना सबको आज सिखाएँ। गांधी जी का हृदय से सभी मान बढ़ाएँ।। बच्चे उनको प्यार से बापू कहते थे, वाणी से सदा मीठे बोल बोलते थे। सादा जीवन उच्च विचार ही रखते थे, सदा अहिंसा की राह पर वह चलते थे।। महात्मा गांधी जी के अब कथन सुनो, सत्य अहिंसा का ही तुम मार्ग चुनो। निर्मल मन से सद्भावों को सभी गुनो, समय और धन बचा कर भविष्य बुनो।। प्यारे बापू मात पिता की सेवा थे करते, सब की आज्ञा का पालन भी थे करते। २ अक्टूबर को जन्म दिवस मनाया करते, शुभ दिवस पर राष्ट्रपिता को नमन हैं करते।। परिचय :- गीता देवी पिता : श्री धीरज सिंह निवासी : याकूबपुर औरैया (उत्तर प्रदेश) रुचि : कविता लेखन, चित्रकला करना शैक्षणिक योग्यता : एम.ए. संस्कृत बीटीसी, सम्प्रति : बे...
संदेशा
कविता

संदेशा

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** दिल सिकुड़ता मन में एक टीस उठती आँखों में आँसू जो टपकने की रफ़्तार बढ़ाते जाते जब दिखे चेहरा या आये संदेशा बिटियाँ का। जब वो बसी हो विदेश जब घर का कोई भी सदस्य हो बीमार या हो कोई परेशानी बाबुल का चेहरा चेहरे पर नकली मुस्कान झूठी हंसी अभिनय करवाता चेहरा बोलता सब ठीक है जिंदगी भर सदा सच बोला अब दूरियां भी अपनों से झूठ बुलवाती है। अपनत्व की यादें दूरियों से बढ़ कर बहुत याद दिलवाती सुनते जब गीत के भाव - "पापा जल्दी आ जाना सात समुन्दर ..... दूरियों यादों में भिगो जाता जब-जब बिटियाँ का संदेशा आता। परिचय :- संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता :- श्री शांतीलालजी वर्मा जन्म तिथि :- २ मई १९६२ (उज्जैन) शिक्षा :- आय टी आय व्यवसाय :- ड़ी एम (जल संसाधन विभाग) प्रकाशन :- देश-विदेश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ ...
अकेलापन
गीत

अकेलापन

संजय जैन मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** तेरे प्यार का मुझको, यदि मिले जाये आसरा। तो जिंदगी हंसकर के, गुजर जाएगी मेरी। और अंधेरे दिल में, रोशनी हो जाएगी। और मेरा अकेलापन, दूर हो जाएगा।। तुझे देख कर दिल, धड़कने लगा है। बुझे हुए चिराग, फिर से जल उठे है। कुछ तो बात है तुममें, जो दिलकी धड़कन हो। और फिरसे जीने की, तुम ही किरन हो।। दिलों का मिलना भी, एक इत्तफाक ही तो है। तुमसे प्यार होना भी, एक इत्तफाक हुआ है। तभी तुम बार बार मेरे, सपनो में आते जाते हो। और मेरे अकेलापन को, दूर कर जाते हो।। बिना तेरे अब जीना मुझे आ नहीं रहा है। बिना तुझसे मिले अब रहा नहीं जा रहा है। हर पल अब तुम ही मुझे सामने दिखती हो। ये हमारा तुम्हारा प्यार नहीं तो और क्या है।। परिचय :- बीना (मध्यप्रदेश) के निवासी संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं। करीब २५ व...
दीप प्रज्वलित करेंगे जरूर
कविता

दीप प्रज्वलित करेंगे जरूर

प्रभात कुमार "प्रभात" हापुड़ (उत्तर प्रदेश) ******************** हम दीप प्रज्वलित करेंगे जरूर। निर्धन, पीड़ित, शोषित की आशा और विश्वास के लिए, असहाय ,मजबूर, निर्बल की सहायता और सहारे के लिए, हम दीप प्रज्वलित करेंगे जरूर। कुव्यवस्था, अन्याय, बेबसी के शिकार, जिन पर न घर है न काम, जो हर हाल में हैं बेहाल, उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए, हम दीप हम दीप प्रज्वलित करेंगे जरूर। अंधकार में प्रकाश के लिए, राष्ट्रोत्थान की कामना के लिए, जन-गण-मन कल्याण के लिए, हम दीप प्रज्वलित करेंगे जरूर। साम्प्रदायिक सौहार्द के मानवता की मंगलकामना के लिए, जो चले गए उनकी आत्मशांति के लिए, हम दीप प्रज्वलित करेंगे जरूर। परिचय :-  प्रभात कुमार "प्रभात" निवासी : हापुड़, (उत्तर प्रदेश) भारत शिक्षा : एम.काम., एम.ए. राजनीति शास्त्र बी.एड. सम्प्रति : वाणिज्य प्रवक्ता टैगोर शिक्षा सदन इंटर कालेज हापुड़...
भारत के भाग्य विधाता
कविता

भारत के भाग्य विधाता

रामसाय श्रीवास "राम" किरारी बाराद्वार (छत्तीसगढ़) ******************** भारत के भाग्य विधाता, हे बापू तुम्हे नमन। दिला गये आजादी हमको, करके खूब जतन ।। भारत के भाग्य विधाता हे बापू तुम्हे नमन दो अक्टूबर का वह शुभ दिन, गांधी जी ने जन्म लिया। पोरबंदर गुजरात प्रांत में, मातृभूमि को मान दिया।। खुशियाँ छाई भारत भू पर, हर्षित धरा गगन भारत के भाग्य विधाता हे बापू तुम्हे नमन देश गुलामी की जंजीरों, में जकड़ा था सदियों से। क्रंदन करती भारत माता, नीर बहाती अंखियों से।। देख दशा भारत की तेरा, ब्यथित हुआ तन मन भारत के भाग्य विधाता हे बापू तुम्हे नमन सत्य अहिंसा को तुमने, अपना हथियार बनाकर। किये संगठित जन जन को, भारत की ब्यथा सुनाकर।। चिंगारी जल उठी क्रांति की, बनकर खूब अगन भारत के भाग्य विधाता हे बापू तुम्हे नमन सत्याग्रह की राह में चलना, हम सबको सिखलाया। एक लकड़ी की लाठी...
नाविक
कविता

नाविक

आकाश सेमवाल ऋषिकेश (उत्तराखंड) ******************** हर और निहारे नाविक तट को, हर और भरा जल ही जल है। कौन दिशा ले चलूं मैं अविरल, कहां दिखेगा भूतल ये। देखे,परखे रवि किरणों को, किस ओर बढ रहा दिनकर है। जांख रहा, हिल्लोर कहां है? कहां सुपथ, सलर है? कहां स्वच्छन्द, हवा का झौंका, किस ओर, सब का हल है? हर और निहारे नाविक तट को, हर और भरा जल ही जल है। अशांत, व्यथित,संतप्त हृयद ये, रोम रोम में हलचल है। दूर दूर तक तनहा दिखता, हर भाव-भंगिमा दूभर है। किस ओर बढूं, किस ओर मुडू? उर में ही उथल पुथल है। हर और निहारे नाविक तट को, हर और भरा जल ही जल है। परिचय :- आकाश सेमवाल पिता : नत्थीलाल सेमवाल माता : हर्षपति देवी निवास : ऋषिकेश (उत्तराखंड) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। ...
काश ऐसा फिर हो जाए
कविता

काश ऐसा फिर हो जाए

दीप्ता नीमा इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** खेल के मैदान में धरती माँ को चूम जाएं और हम बच्चे बन फिर बहुत धूम मचाएं उम्र के इस पड़ाव से कच्ची उम्र में लौट जाएं समय की चकरी फिर उल्टी घूम जाए काश ऐसा फिर हो जाए ।।१।। नीला आकाश देखकर मैं खो जाऊँ टिमटिम करते तारों की गिनती लगाऊं चाँद में सूत कातती अम्मा को निहारूं समय की चकरी को फिर उल्टा घूमाऊं काश ऐसा मैं कुछ कर जाऊँ ।।२।। वो बाग में तितलियों के पीछे दौड़ना वो चोरी से पड़ोसियों के फल तोड़ना वो मिटटी की गुल्लक में पैसे जोड़ना समय की चकरी का मेरा उस ओर मोड़ना काश ऐसा फिर हो जाए ।।३।। माँ के आँचल को पकड़कर के चलना गिरना संभलना फिर उठकर के चलना माँ की थपकियाँ संग माँ का वो पलना समय की चकरी का काश फिर यूँ ढलना काश ऐसा फिर हो जाए।।४।। काश मैं फिर वैसे पलकें झपकांऊ बचपन के जैसे झूमूं और गाऊं जरा सी रूठूं औ...
बेटी की भावना
कविता

बेटी की भावना

संध्या नेमा बालाघाट (मध्य प्रदेश) ******************** थोड़ा सा सच कह दूं क्या? ना लगे बुरा तो सच्ची बात कह दूं क्या? बेटा पाने का अरमान जगाए दिल मे आपने बेटा पाने की आश में बेटी पाए आपने क्यों दुनिया के सामने झूठी मुस्कान अपनाया दिल में बेटे की जगह बनाया बेटी आपने जब पाया ऐसा क्या है खुश हो जाते हो बेटा पाकर बेटी होने पर भी बेटा की आश लगाते हो क्यों दुनिया को बताते हो बेटी से हम खुश हैं बेटी आने के बाद भी जब बेटे की चाह रखते है सोच ही लेते हो जब पराई है पराए घर जाना है फिर क्यों अपनेपन के झूठे सपने दिखाते हो जब अपने घर के लिए बहू लाना चाहते हो। फिर क्यों बेटी को घर खिलाने में कतराते हो क्यो ऐसी रीत बनाई है जब समता का पाठ पढ़ाना है घर में ही बेटी पराई होती है, जग को तो यही बताना है फिर भी न जाने क्यों ये बेटी दिल की यू नाजुक होती है रह...
अकेले गुजरे पल
कविता

अकेले गुजरे पल

राजीव रावत भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** मैं आज भी अकेले नदी के किनारे पर तुम्हारे इंतजार में रोज रेत के महल बनाती हूं अपने उंगलियों से सहला कर आहिस्ता आहिस्ता तुम्हारे कमरे का बिस्तर बिछाती हूं मोटे मोटे कंकड़ो परे कर नर्म रेत का तकिया बनाती हूं और हवा के झोकों या नदी की तेज लहर आने से पहले उसमें स्वप्नों के नये नये दरख्त उगाती हूं मैं जानती हूं कि पल भर में यह सब बिखर जायेगा लेकिन मेरी जिन्दगी का वह एक पल तो कम से कम तुम्हारे अहसासों से भर कर छलक जायेगा तुम्हारी धड़कनों की आवाजें सुकून से सोने कहां देती हैं शरीर की वह गंध और तुम्हारे स्पर्श का स्पंदन और तुम्हारी परिछायी तुम्हारी गुजरी राह में आज भी दिखाई देती है सच कहूं यह अकेलेपन की वेदना हर जगह उदास निगाहों से तुम्हें देखना बालों में तुम्हारी उंगलियों की संवेदना अधरों का अधरों पर प्य...
रब होती हैं बेटियाँ
कविता

रब होती हैं बेटियाँ

राजेन्द्र कुमार पाण्डेय 'राज' बागबाहरा (छत्तीसगढ़) ******************** लक्ष्मी, सरस्वती, सीता और दुर्गा हैं बेटियाँ रोको मत लोगों संसार में आने दो बेटियाँ माता-पिता परिवार की गर्व होती हैं बेटियाँ घर आंगन ही नही रब की रौनक होती हैं बेटियाँ नाजुक दिल, बड़ी मासूम होती हैं बेटियाँ खुशी से खुशियों में भी रो पड़ती हैं बेटियाँ पतझड़ में भी बसन्त जैसी होती हैं बेटियाँ रोम रोम रो पड़ती हैं जब दूर जाती हैं बेटियाँ तितली की तरह आकाश में उड़ती हैं बेटियाँ सुने मकान को भी मंदिर बनाती हैं बेटियाँ जीवन के हर कष्ट में सम्बल देती हैं बेटियाँ साहस की प्रचण्ड प्रतिरूप होती हैं बेटियाँ सरस्वती बन खूब पढ़ती लिखती हैं बेटियाँ दुर्गा बनकर साहस शक्ति देती है बेटियाँ लक्ष्मी बनकर वैभव प्रदान करती हैं बेटियाँ माता जैसी अंतरिक्ष में ध्वज लहराती बेटियाँ अठखेलियाँ करती मल्हार गाती हैं बेटियाँ ...
हाल ए दिल
कविता

हाल ए दिल

डॉ. वासिफ़ काज़ी इंदौर (मध्य प्रदेश) ********************** मुझे मोहब्बत तुम्हीं से है बस। ये दिल धड़कता तेरे लिए है।। तू ही है बस एक सुकून दिल का। ये ज़िस्म सिसकता तेरे लिए है।। तुम्हीं से ख़ुशबू ग़ुलों में है बस। ये दिन निकलता तेरे लिए है।। तुम्हीं से रोशन बहार मुझमें। ये दिल धड़कता तेरे लिए है।। हुस्न से तेरे शफ़्फाफ़ है शब। ये चांद ढलता तेरे लिए है।। तुम्हीं जुनूं हो बस मेरे रहबर। ये मन महक़ता तेरे लिए है।। परिचय :- डॉ. वासिफ़ काज़ी "शायर" निवासी : इंदौर (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कवि...
जीवन के महासागर में
कविता

जीवन के महासागर में

दिनेश कुमार किनकर पांढुर्ना, छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश) ******************** जीवन के महासागर में, संघर्षों की नित लहरे, जो डरे महज थपेड़ो से, वे न कभी उतरे गहरे.... जिन्हे अपने भुजबल पर सदा अटूट रहा विस्वास, सुख मोतियों की आस में, करते गए जो नित प्रयास, जीवन के परमानंद को, सदा उन्होंने ही चखा, कंटको के भय से जो न कभी पथ पर ठहरे.... जो डरे महज थपेड़ो से, वे न कभी उतरे गहरे.... दुखो में ही होती निहित, सुखों की सच्ची आशा, मोती भी मिले उन्हें ही, रही जिन्हें सच्ची प्रत्याशा, जिन्होंने सदा ही भार सहा, वे ही हीरक बनकर दमके, मिली मंज़िल उन्हें ही सदा, तोड़े जिन्होंने हर पहरे, जो डरे महज थपेड़ो से, वे न कभी उतरे गहरे.... परिचय -  दिनेश कुमार किनकर निवासी : पांढुर्ना, जिला-छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र :  मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्...
क्या ठीक है …?
गीतिका

क्या ठीक है …?

प्रमोद गुप्त जहांगीराबाद (उत्तर प्रदेश) ******************** इन दानवों को पढ़ाना, क्या ठीक है ? लालची रुंठे, तो मनाना क्या ठीक है ? जिसमें सदभावनाएं सब मर ही चुकीं- बताओ ऐसा, ये जमाना, क्या ठीक है ? सच की परिभाषा, हम जानते ही नहीं किसी के सच को बताना क्या ठीक है ? नहाओ चाहो जिस भी नदिया में तुम किन्तु इनमें ही समाना क्या ठीक है ? हो सके तो सबके हृदय की अग्नि मिटा ये घर का चूल्हा बुझाना क्या ठीक है ? स्वाभिमान बिना, हर जीवन व्यर्थ है- बिना बुलाये कहीं जाना क्या ठीक है ? आदमी से भयानक, नहीं प्राणी कोई उनका जीवों को सताना क्या ठीक है ? कभी तो अन्तर में भी सिमट कर देखिए- हरदम स्वयम को दिखाना क्या ठीक है ? परिचय :- प्रमोद गुप्त निवासी : जहांगीराबाद, बुलन्दशहर (उत्तर प्रदेश) प्रकाशन : नवम्बर १९८७ में प्रथम बार हिन्दी साहित्य की सर्वश्रेठ मासिक पत...
बस एक बात कहनी थी तुमसे
कविता

बस एक बात कहनी थी तुमसे

पूजा त्रिवेदी रावल 'स्मित' अहमदाबाद (गुजरात) ******************** बस एक बात कहनी थी तुमसे कहती हूं। तेरे सारे लेक्चर बेमन मैं बस सहती हूं। कितनी शिक्षा दोगे अब कबसे गिनती हूं। कैसे समझाऊं किस तरह मैं झेलती हूं। तुझसे तो अच्छी है वह गणित की टीचर, पहाड़ा याद कर उनसे चोकलेट तो पाती हूं! और अंग्रेज़ बने बगैर ही अंग्रेजी सिख पटर पटर बोल अंग्रेजी अब इतराती हूं। और क्या हाल था मेरी भूगोल का सोच, अब अमेरिका लंदन से अलग भांप पाती हूं। इतिहास के पन्नों पर मैं भी चमकूगी कभी, सोचकर आज भी मैं खूब मुस्कुराती हूं। गुजराती और हिन्दी की सारी कहानियां सुन अब मैं भी कहानी लिख जाती हूं। बस एक तू ही है जो एक्जाम पहले लेती है, वरना तैयारी करके अच्छा प्रदर्शन कर जाती हूं। लाड़ली बनती थी हर टीचर की मैं और टीचर अब मैं रोज़ खुद की ही बन जाती हूं। पर नहीं बनना लाड़ली तेरी सुन...
भादव की अंधियारी रात
कविता

भादव की अंधियारी रात

केदार प्रसाद चौहान "आरजू" गुरान (सांवेर) इंदौर ****************** भादव की अंधियारी रात चल रहे थे थाम कर हाथ कुछ दिखाई नहीं दे रहा था बस करते जा रहे थे बात एक अजनबी की तरह चलते जा रहे थे साथ कहीं बिछड़ ना जाएं हम इसलिए थामैं रखा था हाथ बरसों पुरानी पहचान थी मगर लग रही थी पहली मुलाकात जरा संभल कर चलना के.पी. यह है दिल की"आरजू"की बात और हम भूल ही गए की यह है भादव की अंधियारी रात परिचय :-  "आशु कवि" केदार प्रसाद चौहान के.पी. चौहान  "आरजू"  निवासी : गुरान (सांवेर) इंदौर आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें ...
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डॉ. बी.के. दीक्षित इंदौर (म.प्र.) ******************** सरल सहज अभिव्यक्ति, दिल को सदा लुभाती। बहुत कठिन शब्दोंकी, भाषा नहीं मन को भाती। साहित्य जगत की, हमको समझ न आती भाषा। माँ हिंदी दुनिया में छाए, जन-जन की है ये आशा। भूषण** दिनकर, महादेवी, अज्ञेय, पंत या निराला। मानस की चौपाई दोहे, हरि बच्चन की मधुशाला। चक्रधर की अद्भुत शैली, नीरज जी की थी हस्ती। गुरु सत्तन की कविताएं, कुमार विश्वास की मस्ती। है सम्रद्धि हमारी भाषा** नित नूतन भाव जगाती। वो बहुत अभागे होते, जो कहते हिंदी नहीं आती। बिजू यदि ज्ञान नहीं हो, व्याकरण निष्ठ भाषा का। ह्रदय खोल कर रखिये, प्यार प्रीति परिभाषा का। परिचय :- डॉ. बी.के. दीक्षित (बिजू) आपका मूल निवास फ़र्रुख़ाबाद उ.प्र. है आपकी शिक्षा कानपुर में ग्रहण की व् आप गत ३६ वर्ष से इंदौर में निवास कर रहे हैं आप मंचीय कवि, लेखक, अधिमान्य पत्रकार और संभा...