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पद्य

गुरु के ओ ज्ञान लिखूंँ
कविता

गुरु के ओ ज्ञान लिखूंँ

राम रतन श्रीवास बिलासपुर (छत्तीसगढ़) ******************** शिक्षक या गुरु के ओ ज्ञान लिखूंँ, गागर में सागर के ओ बात लिखूँ। जीवन में हर सोपान बहुत , ज्ञान के अजस्त्र प्रकाश लिखूँ ।। गुरु के ओ ज्ञान लिखूंँ.... हर शब्द में ताप के विवेक लिखूँ, सामान्य विषय के संवाद लिखूँ। जीवन में गणित के विभाग रहे, या जीव उत्पत्ति के सार लिखूँ।। गुरु के ओ ज्ञान लिखूंँ.... प्रिज्म के ओ सब रश्मि लिखूँ , पदार्थ तत्व में गुरु के ज्ञान लिखूँ। इस जहांँ में भूगोल के भाग रहे, इतिहास के ओ विशेषज्ञ लिखूँ।। गुरु के ओ ज्ञान लिखूंँ.... नागरिकता में उनके प्रतिभा लिखूँ, राजनीति के ओ आख्यान लिखूँ । अंतस के हर बसंत शाख में, गुरु बिन ज्ञान कैसे सौभाग्य लिखूँ।। गुरु के ओ ज्ञान लिखूंँ.... ललित कलित हर बात लिखूँ, हर खेल के हर दांव लिखूँ। नयन के बदले हर भाव बहुत, गुरु के नेह भरे स्वभाव लिखूँ।। ग...
सैनिक
कविता

सैनिक

आशीष कुमार मीणा जोधपुर (राजस्थान) ******************** आओ उनका यश गान करें। हारी बाज़ी मौत से लेकिन अमर कहानी लिखी गई। रक्षा को भारत माँ की इक कुर्बानी लिखी गई। हर सैनिक का मान करें। आओ उनका यश गान करें। सरहद की पहरेदारी में आतंक की इस बीमारी में तिरंगे की लाज बचाने को माटी का कर्ज चुकाने को। जब तक थी जान लड़े तब तक। कुछ उन पर भी अभिमान करें। आओ उनका यश गान करें। सरहद से युद्ध निकलकर जब रिश्तों तक आ फैला है। बेटे की अर्थी ढोकर बूढा बाप अकेला है। राखी वाले हाथ नहीं अब किससे जिद, अरमान करें। आओ उनका यश गान करें। मां की आंखों में सूनापन बिखर गए हैं कितने बचपन सिंदूर मिटा है माथों से मेहंदी छूटी है हाथों से। उनका भी कुछ ध्यान करें। आओ उनका यश गान करें। परिचय :- आशीष कुमार मीणा निवासी : जोधपुर (राजस्थान) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रच...
अभिमान के कारण
कविता

अभिमान के कारण

संजय जैन मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** मान अभिमान के कारण में, उजड़ गए न जाने कितने घर। हँसते खिल खिलाते परिवार, चढ़ गये इसकी भेंट। फिर न मान मिला, न ही सम्मान मिला। पर आ गया अभिमान, जिसके कारण रूठ गये परिवार।। हमें न मान चाहिए, न सम्मान चाहिए। बस आपस का, प्रेम भाव चाहिए। मतभेद हो सकते है, फिर भी साथ चाहिए। क्योंकि अकेला इंसान, कुछ नहीं कर सकता। इसलिए आप सभी का, हमें साथ चाहिए।। यदि आप सभी आओगें, एक साथ एक मंच पर। तो मंच पर चार चाँद, निश्चित ही लग जायेंगे। भिन्न भाषाओं और क्षैत्र जाती, होने के बाद भी। जब एक साथ मिलेंगे, तभी हम हिंदुस्तानी कहलायेंगे।। छोड़ दे जो तू अभिमान तो तेरी ये काया बदल जायेगी। मन प्रसन्न और दिल खिला हुआ होने से नया स्वरूप दिखेगा। तब तेरी जीवन शैली सच में तुझसे कुछ नया करवाएगी। जिसके कारण ही तुझे समाज में मान सम्मान...
कृष्णा
भजन, स्तुति

कृष्णा

आशीष कुमार मीणा जोधपुर (राजस्थान) ******************** शब्दों मे तुझे बाँध न पाऊँ बुद्धि से तुझे माप न पाऊँ कैसे तेरी थाह लगाऊं मैं क्या लिखुँ तुझको प्रभु। कृष्ण लिखुँ, गोविंद लिखुँ केशव, माधव, कुँज लिखुँ बृजनन्दन, घनश्याम लिखुँ तुमको राधे श्याम लिखुँ मैं क्या लिखुँ तुझको प्रभु। यशोदा का लाल लिखुँ नाग कालिया काल लिखुँ सुदामा सखा बाल लिखुँ कंस का अंतकाल लिखुँ मैं क्या लिखुँ तुझको प्रभु। अर्जुन का गीता ज्ञान लिखुँ द्रोपदी का ध्यान लिखुँ मीरा का गिरधर गोपाला विष बना अमृत का प्याला मैं क्या लिखुँ तुझको प्रभु। तुमको नन्द किशोर लिखुँ या फिर माखन चोर लिखुँ मुख में ब्रह्मांड दर्शन लिखुँ या फिर चक्र सुदर्शन लिखुँ मैं क्या लिखूँ तुझको प्रभु। परिचय :- आशीष कुमार मीणा निवासी : जोधपुर (राजस्थान) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौल...
मन में खटके बात
कविता, छंद

मन में खटके बात

गाज़ी आचार्य 'गाज़ी' मेरठ (उत्तर प्रदेश) ******************** रीत यहाँ की देख के, मन में खटके बात | मनुज विवेकी कौन थे, जिसने बाँटी जात || [१] पीड़ा जग की देख के, मन में खटके बात | कौन कर्म है आपके, व्यथा भोग दिन-रात || [२] गुड से मीठे बोल है , थाम चले है हाथ | पग - पग मेरे साथ है, देत गैर का साथ || [३] बेमतलब है ये हँसी, मन में खटके बात | पर्तें मुख पर लाख है, दिखते है जज़्बात || [४] ऊँचे उसके बोल है, वार्ता करे अकाथ | आन शीश विपदा खड़ी, जोड़ फिरे जग हाथ || [५] माथे पर है सिलवटें, मन में खटके बात | डोल रहे करते भ्रमण, साँझ न देख प्रभात || [६] परिचय :- गाज़ी आचार्य 'गाज़ी' निवासी : मेरठ (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय ए...
प्रायश्चित्त
कविता

प्रायश्चित्त

सुरेश चन्द्र जोशी विनोद नगर (दिल्ली) ******************** हो सुधार असत्य इतिहास का, राष्ट्रीय, प्रायश्चित हो अब तो | जो अधिकारी सम्मान के, वे सम्मानित राष्ट्र में हों अब तो || तिरंगा पहला सुभाष ने, लहराया जाने सब अब तो | हो इतिहास में नेहरू से पहले, सम्मान सुभाष बोस का अब तो || झूले सहर्ष मृत्यु के झूले पर, जानें उनकी सत्यता राष्ट्र अब तो | भगत सिंह-राजगुरु-सहदेव का, हो सम्मान प्रतीक राष्ट्र का अब तो || योगदान सभी क्रांतिकारियों का, करें राष्ट्र अवश्य स्वीकार अब तो | नहीं हुए हम स्वतंत्र बिना अहिंसा से, करे आभास राष्ट्र अवश्य अब तो || टैगोर-तिलक-सावरकर आदि, क्यों सीमित पंक्तियों में अब तो | जागो मनीषियो-शिक्षाविदो, प्रसारित ग्रंथों में करो अब तो || था न विशेष योगदान जिनका, लिखवाया इतिहास उन्हीं पर तो | करें सुधार अब-भूलों का | लिखाओ इतिहास सही अब तो || हो इतिहा...
तेरी बांसुरी
कविता

तेरी बांसुरी

पूजा त्रिवेदी रावल 'स्मित' अहमदाबाद (गुजरात) ******************** कान्हा तेरी बांसुरी की धुन सुनी पड़ रही है, आकर देख, राधा और द्रौपदी दोनों पीस रही है। कोई नहीं अब सुलझाने वाला यहां कोई, उलझनें सब और बढ़ रही है। भगवद्गीता के भी मतलब नीकलते इन्सानी मर्ज़ी से, हम सब की अर्जियां तेरे पास कबसे पड़ी है। जेहाद चल रही है पर कारण पता नहीं है, यहां सबकी खुद की अक्कल बिक रही है। ना उतरने दिया था सम्मान द्रौपदी का तुमने भरे दरबार में पर, हर मोड़ हर चौराहे पर द्रौपदी बिक रही है। भूल चुकी है वह ताकत अपनी और शस्त्र की, तुझे बुलाते हुए चूपचाप बैठी है। भरोसा नहीं इस पूरी दुनिया में किसी पर फिर भी, सिर्फ़ तुझपर भरोसा टिकाये बैठी है। एक बार आकर याद दिला दे मुरलीधर, 'स्मित' अपनी मुठ्ठी में बांधकर बैठी है। खोलना मुठ्ठी उसकी ताकत की सिखा जा बंसीधर, अपने सीने में हिम्मत बे...
मर्यादा
कविता

मर्यादा

कीर्ति सिंह गौड़ इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** तुम सीता हो, इस समाज में स्थापित हर मर्यादित राम की देती रहोगी परीक्षा यहाँ हर निर्धारित काम की। प्रिय हो तुम भी अपनी सीता के बिल्कुल राम की तरह पर राम की तरह सहना भी पड़ेगा अपनी सीता से विरह। बैर उन दोनों के बीच था ही कहाँ बस किया दोनों ने वही जो समाज ने कहा। रघुकुल के स्थापित मूल्य भला समाज ने भी कहाँ माने हैं पर तुम्हें वो सारे नियम व संस्कार निभाने हैं। अछूते तो वो भी नहीं रहे जो ख़ुद मर्यादा की सूरत थे सहना पड़ा अपमान उन्हें भी जो ख़ुद ईश्वर की मूरत थे। संस्कारों की बलिबेदी पर तुम्हें ख़ुद की आहुति देना है लोगों के मन की ज़ंग लगी ज़ंजीरों में जकड़े रहना है। परिचय :- कीर्ति सिंह गौड़ निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वर...
कान्हा से उलाहना
भजन

कान्हा से उलाहना

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** कान्हा गोकुल में माखन खिलाया नही, कैसे मानूँ की माखन खिलाते हो तुम। किसी छीके पे माखन टंगा ही नहीं, कैसे मानूँ की माखन चुराते हो तुम। कान्हा गोकुल.... तेरी किरपा से आया हूँ ब्रजधाम में, वो ही आता है जिसको बुलाते हो तुम, आस्था तेरे चरणों मे जिसकी घटी, उससे तत्काल ही रुठ जाते हो तुम। कैसे मानूँ कि.... सब हैं राधा को तेरी नमन कर रहे, इसलिए सबमें ही नज़र आते हो तुम, जो भी तेरे लिए है तड़पता यहां, उसके अंतर में फौरन समाते हो तुम। कैसे मानूँ.... गायें गोकुल की तो कहीं जाती नहीं, दूध माखन कहाँ चला जाता है फिर। तुमको सब ज्ञात है, दृष्टि व्यापक तेरी, देखना है कि कब रोक पाते हो तुम। कैसे मानूँ की .... तेरे गोकुल का प्रसाद माखन नहीं, इसलिए तुमसे शिकवा किया "प्रेम" ने, तुमने ग्वालों को माखन खिलाया बहुत, दे...
अखंड भारत
कविता

अखंड भारत

धैर्यशील येवले इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** नही चलेगा यहा पाखंड भारत था, है, रहे अखंड पावन भूमि है ये राम की नंदलाल के कर्मधाम की करते ऋषि मुनि यहाँ तपस्या हो क्षण में दूर हर समस्या अधम को नही है स्थान यहाँ चूर-चूर हो उसका घमंड नही चलेगा यहाँ पाखंड भारत था, है, रहे अखंड।। भूमि है ये कर्मवीरों की शिवा प्रताप जैसे विरो की अधर्म पर उठाए जो शस्त्र दूजे हाथ रखते वो शास्त्र समर्थ है ज्ञान विज्ञान में कला संस्कृति का है ये खंड नही चलेगा यहाँ पाखंड भारत था, है, रहे अखंड।। गुरु महावीर बुद्ध वाणी है त्याग अहिंसा निर्वाणी कर्मयोग में रमने वाले जिओ और जीने दो वाले चले साथ है धर्म पताका जो रखे हाथ मे न्याय दंड नही चलेगा यहाँ पाखंड भारत था, है, रहे अखंड।। परिचय :- धैर्यशील येवले जन्म : ३१ अगस्त १९६३ शिक्षा : एम कॉम सेवासदन महाविद्याल बुरहानपुर म...
मन के स्वप्न
कविता

मन के स्वप्न

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** एक धुंध भरी शाम उदास थी किसी ने पूछा क्यों उदास हो मुरझाए फूल ने कहा मन मरुस्थल हो चुका है वह देखो मेरी इच्छाओं की चिता जल रही है क्या मैं जिवित हूं कहा मन प्राण आधार ने आओ मैं तुम्हें समेट लूं अपनी बाहों में तुम्हारे उजड़े मन को महका दूं स्नेह से अनगिनत फूल खिला दूं एक बार अधिकार दे दो ले लो मेरा दूलार रखूंगी तुम्हें प्राण समझ कर मन कैसा भीग गया देखा मैंने उसे अ विश्वास से किंतु वहां था गहरा सागर मन डूब गया मधु जल में एक का एक किसी ने मधुर स्वर घोल दियेे कानों में मैंने जाना सुबह हो चुकी स्पनभंग हो गए मन के परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित ...
स्नेह के बंधन
कविता

स्नेह के बंधन

दुर्गादत्त पाण्डेय वाराणसी ******************** सावन की रिमझिम फुहारें हरियाली मौसम में, खिल उठे पुष्प सारे.. भाई-बहन के अटूट प्रेम पवित्रता का बंधन है भैया की कलाई पर बहना का रक्षाबन्धन है बड़े स्नेह से बहन ने भाई को मंगल-तिलक लगाए अटूट-प्रेम, व स्नेह की रखी भाई के हाथों में भाए बहना की ख्वाहिश है, ये ज़ब कभी रोऊँ मैं, तो भैया मेरे मुझे मनाएं नहीं मोल इस प्रीति का इस प्रीति को नमन व वंदन है भैया की कलाई पर बहना का रक्षाबन्धन है बहना इस राखी के संग बहोत से आस लगाए हुए है भाई की ख़ुशी की खातिर गमों को हमेशा छुपाए हुए है अगर भैया हो परदेश उनकी वापसी में पलकें बिछाए हुए है, इस पावन प्रेम के धागों का सादर, आभार व नमन है भैया की कलाई पर बहना का रक्षाबंधन है इस प्यार-स्नेह के बदले भैया का जवाब है बहना हर मुश्किल समय में तेरा भाई तेरे साथ है सागर सा उमड़ते अट...
हरसिंगार
कविता

हरसिंगार

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** हरसिंगार की खुश्बू रातों को महकाती निगाहे ढूंढती फूलों को जो रात भर खुश्बू बाटते रहे बन दानकर्ता गिरे फूल बिछ जाते कालीन की तरह छाले ना पड़ जाए मेरे चाहने वालों के पावों में मौसम के संग कुछ समय रहेंगे दिन में हो जाएंगे बेघर मासूम हरसिंगार खुश्बू का उपहार देते रातों को मोहब्बत करने वालों के लिए जिन्हें है सिर्फ मोहब्बत खुश्बूओं से अनजान भोरे भी सो गए दिन के उजालो में वे खुश्बुओं का पता पूछ रहे डाली -डाली पत्तों से बेचारे भ्रम में पड़े,भ्रमर सोचते हरसिंगार की खुश्बू क्या रातों से ही प्यार करती। परिचय :- संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता :- श्री शांतीलालजी वर्मा जन्म तिथि :- २ मई १९६२ (उज्जैन) शिक्षा :- आय टी आय व्यवसाय :- ड़ी एम (जल संसाधन विभाग) प्रकाशन :- देश-विदेश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ व ...
कान्हा को जन्मदिन आयौ
भजन

कान्हा को जन्मदिन आयौ

संगीता सूर्यप्रकाश मुरसेनिया भोपाल (मध्यप्रदेश) ******************** कान्हा को जन्मदिन आयौ कान्हा को जन्मदिन हम। सबकौ लगे प्यारो अरू अति न्यारो। हम सबके उर उमंग। उल्लास भी। संग में लायौ। कान्हा को जन्मदिन आयौ। मैं तो बहु नाचूंगी गाऊगी। बहु खुशियां मनाऊंगी। कान्हा कौ जन्मदिन आयौ। मौरो कान्हा आएगो। बांसुरी बजाएगौ, हम सब। बासुरी धुन सुन कान्हा प्रेम। मगन हो सुध-बुध खो जावेगै। कान्हा आवैगो हम सबकी पीरा। हरेगो, हम सबकी इच्छा पूरी करेगो। कान्हा को जन्मदिन आयौ। कान्हा हम सबन कौ दर्शन देवेगो। कान्ह आवेगो हम सबको करोना। मुक्त करेगो वो हम सबको सादो। जीवन वापस करेगो। कान्हा को जन्मदिन आयौ। अति प्यारौ अरू। अति न्यारो हम सब के उर। उमंग उल्लास लायौ, मै तो बहु नाचूँगी। गाऊँगी, कान्हा को जन्मदिन मनाऊँगी। कान्हा के दरस पा सुध-बुध। खो वाए। एकटक अपलक न...
पधारे हैं नंदलाला
कविता, भजन

पधारे हैं नंदलाला

नंदिता माजी शर्मा मुंबई, (महाराष्ट्र) ******************** मुक्त करने जननी को, पावन करने अष्टमी को, जोड़ने कर्ता से करनी को, देखो ! पधारे हैं नंदलाला... यशोदा के चंचल लला, बांधे मोर, मुकुट, छल्ला, गोकुल में मचाने हो-हल्ला, देखो ! पधारे हैं नंदलाला... हाथ में बिराजे हैं बंसी, हर्षित हो झूमे पशु पंछी, अधरो में मुस्कान यदुवंशी, देखो ! पधारे हैं नंदलाला... धेनूओं के निशदिन रखवाले‌, गोपियों के नटखट ग्वाले, नित नव लीला धरने निराले, देखो ! पधारे हैं नंदलाला... राधिका के सखा मुरलीधर, रुक्मिणी के पति परमेश्वर, मीरा के इष्ट देव गिरिधर, देखो ! पधारे हैं नंदलाला... सिखाने जग को प्रेम का रास, भरने जन-जन में उल्लास, सबको रंगने प्रेम, दया,विश्वास, देखो ! पधारे हैं नंदलाला... परिचय :- नंदिता माजी शर्मा सम्प्रति : प्रोपराइटर- कर्मा लाजिस्टिक्स निवासी :...
तुम हो अपरिभाषित
कविता, भजन

तुम हो अपरिभाषित

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** कारागार में जन्म लिया, गोकुल का ललना बनकर, देवकी मां की गोद मिली, यशोदा मां का मिला दुलार, वासुदेव के तनय बने तुम, नंद के गोपाल कैसे लिखूं!! क्या लिखूं!! तुम तो हो अपरिभाषित, चाहे मैं जितना लिखूं ।। हे नंद के लाल ।। गोपियों के प्रिय बने, राधा के प्रियतम , रुक्मिणी के श्री हो, सत्यभामा के श्रीतम, राक्षसों का वध किया, संसार को निर्मल किया, हर जन जन को मोहित किया, अपना सबकुछ त्याग दिया, कैसे लिखूं !! कितना लिखूं!! तुम रहोगे अपरिभाषित चाहे मैं जितना लिखूं ।। हे नंद के लाल ।। आत्म तत्व के चिंतन तुम, परमेश्वर परमात्मा तुम स्थिर चित्त योगी तुम्हीं, परमार्थ का अर्थ तुम्हीं। नभ जल अग्नि वायु, बनकर प्राण तुम्हीं बन जाते हो, पंचतत्व में विलीन हो, अजर अमर कहलाते हो, क्या लिखूं, कितना लिखूं त...
कृष्ण अवतार
गीत, भजन

कृष्ण अवतार

संजय जैन मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** हम तेरे दर्शन को आये है बहुत दूर से कृष्ण। सिर्फ एक बार मुझे चरण को छू लेने दो। हम तेरे दर्शन को आये है बहुत दूर से कृष्ण।। रोज सपने में दिखते हो मुझे प्यारे कृष्ण। कहाँ है पर है नहीं तेरा ठिकाना मेरे कृष्ण। किस जगह की छवि मुझे रोज दिखते हो। उस जगह पर मुझे तुम बुला लो कृष्ण।। हम तेरे दर्शन को आये है बहुत दूर से कृष्ण।। अपनी आँखों से तुम देखते हो जग से। हर किसी पर तेरे दृष्टि रहती है कृष्ण। मेरे आँखों में भी दिव ज्योति दे दो। ताकि मैं सुबह शाम तेरे दर्शन कर सकूँ।। हम तेरे दर्शन को आये है बहुत दूर से कृष्ण।। अपनी लीलाएं दिखाकर सबको लूभाते हैं। खेल-खेल में अंत राक्षको का कर दिया। और कंस मामा को भी संदेश देते गए। फिर एक दिन क्रीड़ा के द्वारा ही कृष्ण ने। कंस का वध करके मथुरा को मुक्त किया।। हम तेरे दर्शन को आये है बहु...
कृष्ण जन्माष्टमी
कविता

कृष्ण जन्माष्टमी

महेन्द्र सिंह कटारिया 'विजेता' सीकर, (राजस्थान) ******************** भाद्रपद कृष्ण अष्टमी जन्में कृष्ण कन्हाई। नन्द घर आनन्द भयों घर - घर बजे बधाई।..... आततायी कंस ने ऐसा मचाया अत्याचार। द्वापरयुग मथुरा नगरी में छायी चहुंदिशा हाहाकार। पिता उग्रसेन को राजगद्दी से दिया उतार। बहन देवकी-वसुदेव को बंदी किया कारागार। हो व्यथित नर-नार ने प्रभु को पुकार लगाई। भाद्रपद कृष्ण अष्टमी.....। श्रीविष्णु के अष्टम रूप में अवतरित हुए मदन मुरार। दुश्वार घड़ी में रक्षा खातिर था श्यामसुंदर का इन्तजार। घनघोर घटाटोप मध्यरात्रि सर्वपालक ने अवतार लिया। नवजात शिशु रूप में अथाह यमुना को पार किया। वृंदावन में यशोदा आँगन बजे ढ़ोल शहनाई। भाद्रपद कृष्ण अष्टमी......। नटखट नटवर नागर ने बालपन में लीला रचाई। बालसुलभ स्तनपान मस्ती में पूतना राक्षसी मार गिराई। बाल सखाओं के संग माखन मिश्री...
निर्धनता
कविता

निर्धनता

शैलेष कुमार कुचया कटनी (मध्य प्रदेश) ******************** गरीबी में गरीब बेहाल कोरोना ने किया लाचार, कमाने कहाँ जाए बाजार यही है, गरीब का हाल !!.. कमाते थे जो हाथ हजारो अब घर बैठ गए है, राशन पानी सारा खत्म सरकार की तरफ मुँह देख रहे !!.. सब्जी भाजी बेचकर पेट पाला बच्चो को किताब कॉपी दिलाया, बेटी का ब्याह भी एक साड़ी में किया हर गरीब की यही है, आत्मकथा !!.. आओ हम सब शपथ खाये कोई भी खाली पेट न सोएं, नही मारेंगे उसका हक गरीब भी है, समाज का अंग !!.. परिचय :-  शैलेष कुमार कुचया मूलनिवासी : कटनी (म,प्र) वर्तमान निवास : अम्बाह (मुरैना) प्रकाशन : मेरी रचनाएँ गहोई दर्पण ई पेपर ग्वालियर से प्रकाशित हो चुकी है। पद : टी, ए विधुत विभाग अम्बाह में पदस्थ शिक्षा : स्नातक भाषा : हिंदी, बुंदेली विशेष : स्वरचित रचना, विचारो हेतु विभाग उत्तरदायी नही है, इनका संबंध स...
दीवाना हो गया
कविता

दीवाना हो गया

मनीष कुमार सिहारे बालोद, (छत्तीसगढ़) ******************** पंछी देखा सोंचा मन में कुछ तो ख्याल करुं इसे ही पुरी कविताओं में सोलह श्रृंगार करूं मन की कई सवालों के पिछे मैं खुद गुंथता चला जो था मन में बातें वो सारी मैं भुलता चला देख दिवाना हो गया मानो की मैं कान्हा बना पहली दफा जो देखी राधा बांवरा कान्हा हुआ नीले नीले चमक थी उसकी मानो गगन तर आयी हो गिरने को खुब बारिश घनघोर बिजली छायी हो कल तलक जो ख्वाब थे हकिकत में वैसा आ गया देख दिवाना हो गया देख दिवाना हो गया करूं क्या तारिफ उसकी शब्द भी फीकी लगे इस कारवां में फना़ हो जाने को मन मेरा मचलने लगे ढलती सुरज की रक्त किरण उसके वस्त्र पर पड़ने लगे नील वस्त्र धारण वो कन्या मोती सा चमकन लगे लगे आईने कपड़ों पे उसके तर-बदर अर्चि चलने लगे अचानक वो अर्चि आंखों के मेरे सामने कहीं खो गया जैसा सोंचा ना था वैसा संग म...
सांवरे की सूरत आज भी
कविता

सांवरे की सूरत आज भी

होशियार सिंह यादव महेंद्रगढ़ हरियाणा ******************** सांवरे की सूरत आज भी, भक्तों को बड़ी सुहाती है, गोपाल के खेल देख लो, गोपिका बहुत लुभाती है। सांवरे की सूरत आज भी, हर जन मन बस जाती है, कान्हा की मुरली देख लो, ग्वालों को बहुत सुहाती है। सांवरे की सूरत आज भी, सुंदर सा पैगाम दे जाती है, लाख प्रयास बेशक कर ले, ये मौत अटल बन जाती है। सांवरे की सूरत आज भी, गोकुल में तुम्हें बुलाती है, सूनी हो चुकी जो गलियां, वो कहानी स्पष्ट सुनाती हैं। कहीं धाम राधा कृष्ण के, कहीं द्वापर नगरी प्यारी है, कहीं बृज की होली खेलों, कहीं मटकी तोड़ तैयारी है। सांवरे की सूरत आज भी, गोवर्धन पर्वत में मिलती, अंगुली पर उठा लिया था, मानव की खुशियां खिलती। गोपियों संग में रास रसाते, ऋषि मुनियों को वो बचाते, सत्य का वो साथ देते सदा, सोये हुये को वो ही जगाते। विष्णु के...
हम ही आज है, कल भी हम ही है
कविता

हम ही आज है, कल भी हम ही है

कु. आरती सिरसाट बुरहानपुर (मध्यप्रदेश) ******************** हम ही आज है, कल भी हम ही है......! हम ही रीत है, रिवाज भी हम ही है......!! हम ही आजादी है, बेडियां भी हम ही है......! हम ही पंछी है, पिजरा भी हम ही है.....!! हम ही अभिमन्यु है, चक्रव्यूह भी हम ही है.....! हम ही मोहन है, बाँसुरी भी हम ही है.....!! हम ही पेड़ है, कुल्हाड़ी भी हम ही है......! हम ही नफ़रत है, प्रेम का प्रतीक भी हम ही है......!! हम ही तो आशा है, निराशा भी हम ही है......! हम ही तो पाप है, पून्य भी हम ही है......!! हम ही नदियों की कलकल है, अशुध्दियाँ भी हम ही है......! हम ही आस्तिक है, नास्तिक भी हम ही है......!! हम ही छल है, निच्छल भी हम ही है......! हम ही विध्या है, अनपढ़ भी हम ही है......!! हम ही धूप है, छाँव भी हम ही है......! हम ही शहर है, गाँव भी हम ही है......!! हम ही गीता है, कुरान ...
कान्हा की सीख
कविता

कान्हा की सीख

डॉ. पंकजवासिनी पटना (बिहार) ******************** छूटने का दर्द जानते हो??? कितना पीड़ा दायक! कितनी टीस भरी !! कितना टभकता हुआ!!! क्या जीवन में कुछ छूटने के बाद भी मुस्कुरा सकते हो??? एक बार देखो कान्हा को! सबसे पहले गर्भ छूटा माँ का! (जन्म से पहले ही) फिर माँ बाप!! फिर छूटे पालक माता-पिता! बचपन का आंगन छूटा!! संगी साथी छूटे!!! छूट गए सब ग्वाल-बाल ! छूटा पास-पड़ोस सारा !! छूटी यमुना अति प्यारी !!! और छूटे सरस सघन लता-कुंज सारे ! भरी जिनमें जीवन की प्याली!! छूट गईं... गोकुल की भोरी गोपियां! गोकुल का मिश्री-माखन!! और छूटी.... आत्मा की संगी! प्रिय राधा रानी!! आह! "चिर बिछोह"!!! क्रीड़ा भूमि गोकुल छूटा! कर्म भूमि मथुरा छूटी!! सबको आह्लाद की सरिता में अंतरात्मा तक डुबोती! जीवनदायी मुरली!! भी छूट गई हाय!!! कान्हा! जाने कितनी पीड़ा तुमने झेली...
नारी का बदलता स्वरूप
कविता

नारी का बदलता स्वरूप

हेमी सिंह पुणे, (महाराष्ट्र) ******************** टूटने लगे जब सदियों के बन्धन, दिल उड़ान भरने लगा, नारी तेरे अरमानों को तब, नया आसमां मिलने लगा। कभी ख़्वाब देखे और भुला दिये, लबों पे न कोई ज़िक्र आया, आज हर ज़िक्र ख़्वाब से शुरू ख़्वाबों पे ख़त्म होने लगा। अब चेहरा न कोई चांद सा, न हिरनी जैसी चाल है, अब चांद मुठ्ठी में लिये, सितारों पे दिल आने लगा। कल हर क़दम था दायरे में, दहलीज़ का पाबन्द बना, आज लांघकर सीमा वो, सीने दुश्मन के दलने लगा। पहले भीड़ में दूर तक कहीं, तेरी न कोई शुमार थी, आज सिर पर सजा हर ताज तेरा, पहचान एक बनने लगा। परिचय :- हेमी सिंह निवासी : पुणे, (महाराष्ट्र) विशेष : चालीस‌ वर्षों का गद्य एवं पद्य लेखन अनुभव । शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी) बी.एड घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी ...
सावन के घर
गीत

सावन के घर

भीमराव झरबड़े 'जीवन' बैतूल (मध्य प्रदेश) ******************** धरना देने सावन के घर, पहुँचा रिक्त घड़ा। बोझ कर्ज का लिए शीश पर, सोयाबीन खड़ा।। खेत धान के माँगे पानी, मक्का मुरझायी। उड़द मूँग मौजेक ग्रस्त हैं,अरहर अलसायी।। गिलकी लौकी कद्दू के तन, विष का शूल गड़ा।। बोझ कर्ज का लिए शीश पर, सोयाबीन खड़ा।।१ ज्वार बाजरा आरक्षण की, देख रहे राहें। मतदाता गन्ना भी चाहे, पकड़ो अब बाहें।। धमकी देता मूँगफली का, घायल हुआ धड़ा।। बोझ कर्ज का लिए शीश पर, सोयाबीन खड़ा।।२ कुल्थी सन जगनी ने पायी, राहत दो चुटकी। हुई अल्पसंख्यक श्रेणी में, जब कोदो-कुटकी।। मेघराज ने जल वितरण में, पहरा किया कड़ा।। बोझ कर्ज का लिए शीश पर, सोयाबीन खड़ा।।३ परिचय :- भीमराव झरबड़े 'जीवन' निवासी : बैतूल मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी ...