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पद्य

हे कृष्ण ! पुकारे…
गीत

हे कृष्ण ! पुकारे…

प्रमोद गुप्त जहांगीराबाद (उत्तर प्रदेश) ******************** हे कृष्ण पुकारें तुमको अब तो आ जाओ अपनी सारी लीलाएं, फिर से दिखलाओ। भारत माँ को फिर से शत्रु ने घेरा है, और नागों ने अन्दर भी डाला डेरा है, तेरे सब ग्वाले भी सोये हैं चादर तान कर्म-विमुख सब, चारों ओर अंधेरा है, स्वार्थ में हम जो सदियों से खोए-सोये पाञ्चजन्य का घोष, तुम फिर से गुंजाओ। हम धर्म-कर्म सबको ही भूले-भाले हैं, हमसे बहुत दूर हो चुके सभी उजाले हैं, बुजुर्गों की ना सुनें, पढ़ें ना ग्रंथों को रातें तो रातें, सब ही दिन भी काले हैं, अर्जुन जैसा पात्र, बना करके हमको तुम गीता का सन्देश, आज फिर से गाओ। परिचय :- प्रमोद गुप्त निवासी : जहांगीराबाद, बुलन्दशहर (उत्तर प्रदेश) प्रकाशन : नवम्बर १९८७ में प्रथम बार हिन्दी साहित्य की सर्वश्रेठ मासिक पत्रिका-"कादम्बिनी" में चार कविताएं- संक्षिप्त परि...
रहनुमा
ग़ज़ल

रहनुमा

डॉ. वासिफ़ काज़ी इंदौर (मध्य प्रदेश) ********************** हर रोज़ ईद का त्यौहार होता है। जब मुझे आपका दीदार होता है।। आपके नूर की रोशनी से हरदम। रोशन ये फ़लक हर बार होता है।। मुश्क़िलें हो जाती हैं आसां मेरी। दुआओं से बेड़ा पार होता है।। पड़ते हैं जब आपके मुबारक क़दम। बियाबां भी मुनव्वर गुलज़ार होता है।। मेरे अश्कों की तड़प देखकर। अब समंदर भी रेगज़ार होता है।। वो मेरा रहनुमा है "काज़ी" । उससे ही मुझे प्यार होता है।। परिचय :- डॉ. वासिफ़ काज़ी "शायर" निवासी : इंदौर (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानिया...
मेरी सहेली
कविता

मेरी सहेली

ज्योति लूथरा लोधी रोड (नई दिल्ली) ******************** मेरी माँ मेरी सहेली है, वो एक जादुई पहेली है, मेरी हर ज़रूरत, मेरी हर इच्छा का ध्यान रखने वाली मेरी माँ है। दुःखी होने पर मेरे आँसू पोछने वाली, गिरने पर मुझे उठाने वाली मेरी माँ है, वो मुझे जन्म देने वाली देवी हैं, मेरी प्यारी दोस्त है, मेरी माँ मेरा सम्मान है, वो इंसान नहीं भगवान है। मेरी हर बात को सुनने वाली, मुझे समझने वाली मेरी माँ है, अंजानों की दुनिया में अपनी-सी, एक अप्सरा-सी मेरी माँ है। मुझे सिखाने वाली मुझे उड़ाने वाली मेरी माँ है, उनके स्पर्श में एक जादू है, सारी परेशानी एकदम गायब हो जाती है, उदास मन फूल की भाँति, खिलखिला उठता है, दिल पंछी की तरह उड़ने लगता है। माँ केवल त्याग, प्रेम, समर्पण की नहीं, ख्वाबों, उम्मीदों, हौसले, अपनेपन की भी मूरत है, वो एक अद्भुत सूरत है। वो मेरी गुरु मेरी द...
जब उनसे बात हुई
कविता

जब उनसे बात हुई

डॉ. सर्वेश व्यास इंदौर (मध्य प्रदेश) ********************** कल जब उनसे बात हुई, ऐसा लगा मानो जिंदगी से मुलाकात हुई, तपते रेगिस्तान में बरसात हुई l उनसे बात करने की खुशियां मेरे द्वार थी, मेरे जीवन के पतझड़ में प्रकृति की बहार थी l ईश्वर करे यह बहार, यह खुशियां सदा मुझसे मिलती रहे, उनकी मधुर, सुरीली वाणी मेरे कानों में जीवन अमृत घोलती रहे l मेरा खुदा जानता है मुझे उनके तन की नहीं, पवित्र मन के चाह है, यह जानते हुए भी वह अनजान है, मेरे जीवन में इसी बात की आह है ल अब तो बस वह मेरे भावों को पढ़ ले, मेरे पवित्र मन को स्वीकार कर ले l अब तो ईश्वर कुछ ऐसे संयोग बनाए, मेरी जिंदगी, मेरी खुशियों से मुझे मिलाऐ l तमन्ना है जब उनसे मेरी मुलाकात हो, तब जुबान से नही मन से मन की बात हो l डरता हूं मेरी इन बातों से वह नाराज ना हो जाए, उनसे आसरूपी जो खुशी है, कही व...
जग के पालन हार
भजन

जग के पालन हार

रामसाय श्रीवास "राम" किरारी बाराद्वार (छत्तीसगढ़) ******************** सजल- मात्रा- २२ जग के पालन हार धरा पर आये हैं । सांवरिया सरकार धरा पर आये हैं ।। द्वापर में था दुष्टों का आतंक बड़ा । यमपुर उन्हे पठाने को वे आये हैं ।। भव के सारे बंधन को जो हरते हैं । आज वही कारागृह में खुद आये हैं ।। भक्तों के भगवान् देवकी के लाला । मानव तन धर लीला अजब दिखाये हैं ।। बाल लीला दिखलाये जाकर के ब्रज में । नंद यशोदा के कान्हा कहलाये हैं ।। ग्वाल बाल संग खेले यमुना के तट में । बैठ कदंब तरू मुरली मधुर बजाये हैं ।। माखन खूब चुराये ग्वालों के संग में । गोकुल के गलियों में उधम मचाये हैं ।। संग सखाओं के जाते गइया लेकर । वृंदावन में मोहन गऊ चराये हैं ।। चीर हरण कर दुनिया को वे सीख दिये । सखियों के संग में वे रास रचाये हैं ।। दुष्ट अनेकों का उनने संहार किया । भक्तों को ...
कृष्ण मय हो जाए जीवन
कविता

कृष्ण मय हो जाए जीवन

खुमान सिंह भाट रमतरा, बालोद, (छत्तीसगढ़) ******************** शब्दों तक न होकर सीमित कृष्ण सा साकार कर जाए निश्छल प्रेम उदगार कर समूचे परिवेश को संदेशा दे जाए अनुकरणी है उनकी वाणी वैसे ही उनका जीवन है समूचा जीवन संकट का है संघर्ष और नेक इरादों में जीवन को सफल बनाएं प्रतिकूल परिस्थितियां आए गर जीवन में कृष्ण सा मुस्कुराते हुए ही जवाब दे जाए अग्रणी रहे परोपकारी बने एक दूजे में परस्पर भाईचारे की भावना विकसित कर जाएं स्वार्थ कभी हावी न होने दें निस्वार्थ भाव के बंधन में ऐसा बंध जाएं सामर्थ नजरिए को समझकर विश्वास जमा कर जीवन पथ पर आगे बढ़ जाएं... परिचय :- खुमान सिंह भाट पिता : श्री पुनित राम भाट निवासी : ग्राम- रमतरा, जिला- बालोद, (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी...
घरौंदा सपनों का
कविता

घरौंदा सपनों का

राजेन्द्र कुमार पाण्डेय 'राज' बागबाहरा (छत्तीसगढ़) ******************** सोनू! अपनी चाहत को शब्दों में कैसे बयां करूँ मेरी हर यादें तुमसे जुदा नहीं है मेरी हर बात तुमसे जुदा नहीं है तेरी यादों से तेरी बातों से कभी जुदा नहीं हूं मेरे उन एहसासों को मेरे उन जज्बातों को शब्दों पिरो सकूँ ये क्षमता नही मुझ में अपने जज्बातों को काबू कर सकूँ अपने मोहब्बत को जुबाँ से बयाँ कर सकूँ अपने एहसासों को कलम से लिख सकूँ मेरा ऐसा कोई मकसद नहीं है बस जिंदगी को समझना चाहता हूं जो जिंदगी मुझे समझाना चाहती है कभी शिकवा नही कभी गीला नहीं ऐ जिंदगी तुम माध्यम हो मेरी मोहब्बत की ऐसा क्या तुम जतला गई मुझे हो गमों की बस्ती में भी खुशियां तलाश लेता हूँ जिंदगी के किसी मोड़ पर कभी मिलोगी ऐ मेरी जिंदगी तो पूछुंगा जरूर तुमसे अब और क्या सिखलाना चाहती हो तुम मुझे तेरे होने का एहसास क्य...
समय
कविता

समय

मंजिरी "निधि" बडौदा (गुजरात) ******************** नहीँ पता होगा क्या कल करता समय सदा ही छल रौंद रहा सारे जग को बाँध रख सबके पग को बहुत सनही मित्र बना शत्रु भाव आपूर्ण घना इससे सदा डरो तुम मन समय कहे मैं हूँ भगवन कौन कहाँ गति पहचाने समय मुदित कैसे जानें आगे ताक लगाता है बीती बात बताता है इसका पहिया चलता जाये कभी अच्छे कभी बुरे दिन लाये जो करता इसका अपमान वह भी खो देता है मान होता है ये बड़ा बलवान न देखे मानस कोइ महान हिन्दु हो या हो मुसलमान यही कराता है पहचान जीवन में है यदि कुछ पाना नहीं व्यर्थ तुम इसे गँवाना नहीं पता होगा क्या कल परिचय :- मंजिरी पुणताम्बेकर "निधि" निवासी : बडौदा (गुजरात) घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट...
बेटी हूं
कविता

बेटी हूं

संध्या नेमा बालाघाट (मध्य प्रदेश) ******************** बेटी हूं दो कुल को लेकर चलना है तो खुद के अधिकार के लिए रुक जाती हूं खुद की इच्छा को दफना देती हूं गलत ना होकर खुद को गलत पा लेती हूं खुले आसमान में तो मैं भी घूमना चाहती हूं पर चार दीवारी में ही खुद को पाती हूं खिलते फूलों और उड़ते पंछियों से मैं पूछती हूं जरा मेरा कसूर तो बता दो मैं भी तुम जैसा बनना चाहती हूं ना चाह कर भी अपनी इच्छाओं मार देती हूं मैं एक बेटी हूं यही मेरा कसूर है यही सोच कर मैं रुक जाती हूं परिचय : संध्या नेमा निवासी : बालाघाट (मध्य प्रदेश) घोषणा : मैं यह शपथ पूर्वक घोषणा करती हूँ कि उपरोक्त रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच...
यूँ  ही खुद को मिटा दिया
कविता

यूँ ही खुद को मिटा दिया

कल्पना चौधरी बुलंदशहर, (उत्तर प्रदेश) ******************** यूॅं ही सब कुछ समेटते-समेटते, खुद को जाने कब कहाॅं मिटा दिया, किसी ने पूछा अगर अपना हाल, यूॅं ही बस आहिस्ता से मुस्कुरा दिया, बचा ही क्या था जलती लकड़ियों में, हृदय तिनका मात्र था वो भी जला दिया, यूॅं ही सुलगते-सुलगते एक अग्निकण ने, देखते ही देखते मन श्मशान बना दिया, मिल भी जाएं अगर सितारे अब मुट्ठी भर, चमकेंगे किस तरह जब आसमाॅं ही भिगो दिया, वक़्त रहते सम्भल जाना ही सबसे भला है, लकीर पीटने से क्या होगा, जब सब कुछ लुटा दिया, क्या कर लोगे गर भर भी लिया चाॅंद मुट्ठी में, चाॅंदनी तो तब बिखेरेगा जब, उसको आजाद करा दिया ! परिचय :- कल्पना चौधरी निवासी : बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। ...
मेरे खुदा
स्तुति

मेरे खुदा

राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मैं फकीर हूं, तेरे दर का खुदा मेरी आजमाइश न कर। तू पीर है मेरा, मेरे खुदा मेरी जग हंसाई न कर। मैं कमजोर लाचार हूं, मेरे खुदा मेरा तू हम राही बन। मैं अनजान हूं, तेरी इस कायनात से मेरे खुदा तू मेरा हमराज बन। मैं मुरीद हूं तेरा मेरे खुदा, तू अब मेरा मुर्शिद बन। परिचय :- राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशि...
विश्व गुरु भारत
कविता

विश्व गुरु भारत

डॉ. सत्यनारायण चौधरी "सत्या" जयपुर, (राजस्थान) ******************** जहाँ वेद उपनिषद का अद्वितीय ज्ञान। और मिलते हैं पुराण, आरण्यक और आख्यान। तुलसी का रामचरित व वाल्मीकि जी की रामायण। समझाया है सबको, नर में ही बसते हैं नारायण। सांख्य-योग, न्याय-वैशेषिक आदि से, जीवन का मर्म है जिसने समझाया। चार्वाक ने भौतिकवाद है पनपाया। गीता ने निष्काम कर्म है सिखलाया। जो भगवान श्रीराम जैसा आदर्श जग को देता है। सीता माँ जैसी पतिव्रता पर गर्व सभी को होता है। जहाँ रामायण, गीता और है महाभारत। ये है हमारा भारत विश्वगुरु भारत। आर्यों की इस पावन धरा से, ज्ञान का शाश्वत प्रकाश हुआ। शून्य के आविष्कार को, सम्पूर्ण जगत ने मान लिया। गुरुकुल प्रणाली द्वारा शिक्षा का प्रसार किया। व्यवहारिक शिक्षा का भी यहीं से सूत्रपात हुआ। विश्व ने माना लोहा भारत का, विश्व गुरु तब कहलाया। ...
कहीं दूर…
कविता

कहीं दूर…

उदयसिंह बरी ग्वालियर (मध्य प्रदेश) ******************** दूर कहीं र्पवतों के क्षितिज पर ठिठका है चाँद चाँदनी के लिए। घोर अंधकार में, छिटक रही चाँदनी नव कोंपलों पर शनैःशनैः। पथ की पगडंडियों पर अंकित हैं, पथिक के पदों के निशान ढूँढ रही है चाँदनी चाँद के पद निशान कहीं अंकित मिलें, प्रीतम के पांव चिन्ह तारे विस्मित, देख मुस्कुरा रहे शनैःशनैः। जीव जंतर मधुर गुंजनगान अलाप रहे शनैःशनैः। एक पैर पर उकडूं वैठा उल्लू देख रहा चाँदनी को देखते चकोर को एक टक। रात पर्वतों के क्षितिज से उतर दरख्तों के क्षितिज पर अलसायी सी भोर के सौर में पैरो में अरुणोदय का महावर लगाये, चली जा रही है उस पार.... शनैःशनैः। परिचय :- उदयसिंह बरी (साहित्यक नाम) पिता : श्री वी.एल.कुशवाह पत्नी : आ. अंजली जी निवासी : ग्वालियर, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : डवल एम.ए.(अर्थशास्त्र, दर्शनशास्त्...
वो लम्हे
कविता

वो लम्हे

कीर्ति सिंह गौड़ इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** जमा कर लूँ मैं उन लम्हातों को जो तेरे आने का पैग़ाम लाते थे। तुझसे पहले किसी से कोई वास्ता न था तेरे बाद भी किसी से कोई वास्ता नहीं। बस वो लम्हे ही हैं जो मेरी आँखों में आज भी चमक रहे हैं। बस वो लम्हे ही तो हैं जो तेरे इंतज़ार में अब भी दिल में धड़क रहे हैं। तेरे आने की आहट आज भी कानों को सुकून देती है तेरे आने की आहट जैसे फ़िज़ा में ख़ुशबुओं को घोल देती है। मरकज़ मेरे इश्क़ का तू ही तो है मुक़द्दर मेरे इश्क़ का तू ही तो है। बेपनाह तेरी मोहब्बत और शोख़ी तेरी और बेइंतिहा वो बातें तेरी। जमा कर लूँ मैं उन तमाम लम्हातों को जो तेरे आने का पैग़ाम लाते थे। परिचय :- कीर्ति सिंह गौड़ निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक...
नीरज पर नाज
कविता

नीरज पर नाज

गीता देवी औरैया (उत्तर प्रदेश) ************* है मान बढ़ाया तिरंगे का, लाल देश के नीरज ने। खूब दिखाया बाजुए जोर, होनहार वीर के धीरज ने।। देश की माताओं को सदा, रहेगा गर्व इस सुपुत्र पर। दुलार करती भारत की बहनें, स्वर्ण पदक लाए भाई पर।। देख नीरज के पौरुष को, युवाओं में साहस है भरा। दिखा दी बाजुए ताकत, भारत का रक्त देख जरा।। भारत का मान हमारा तिरंगा, गगन में ऊंचा कर दिखाया। हे हिंदुस्तान की शान नीरज, देश के भाल तिलक सजाया।। पग पग पर उड़ी रज ने, घर-घर में संदेश सुनाया। चमकता सोने का तमगा, सोने की चिड़िया के घर आया।। दे रही आशीर्वाद मेरी लेखनी, मिली प्रगति पल-पल आपको। तत्पर सदा है तैयार कलम, शौर्यता की कहानी लिखने को।। परिचय :- गीता देवी पिता : श्री धीरज सिंह निवासी : याकूबपुर औरैया (उत्तर प्रदेश) रुचि : कविता लेखन, चित्रकला करना शैक्षणिक योग्यता : ए...
बहिन ने मांगा तोहफा
कविता

बहिन ने मांगा तोहफा

संजय जैन मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** इस राखी पर भैया मुझे, बस यही तोहफा देना तुम। रखोगे ख्याल माँ-बाप का, बस यही एक वचन देना तुम , बेटी हूँ मैं शायद ससुराल से रोज़ न आ पाऊंगी। जब भी पीहर आऊंगी, इक मेहमान बनकर आऊंगी। पर वादा है ससुराल में संस्कारों से, पीहर की शोभा बढाऊंगी। तुम तो बेटे हो इस बात को न भुला देना तुम। रखोगे ख्याल माँ बाप का बस यही वचन देना तुम। मुझे नहीं चाहिये सोना-चांदी, न चाहिये हीरे-मोती। मैं इन सब चीजों से कहां सुःख पाऊंगी। देखूंगी जब माँ बाप को पीहर में खुश। तो ससुराल में चैन से मैं भी जी पाऊंगी। अनमोल हैं ये रिश्ते, इन्हें यूं ही न गंवा देना तुम। रखोगे ख्याल माँ बाप का, बस यही वचन देना तुम। वो कभी तुम पर या भाभी पर गुस्सा हो जायेंगे। कभी चिड़चिड़ाहट में कुछ कह भी जायेंगे। न गुस्सा करना न पलट के कुछ कहना तुम। उम्र का तकाजा...
हनुमान जी की महिमा…
स्तुति

हनुमान जी की महिमा…

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** भक्त हनुमान जी हैं दयालु बहुत, राम भक्तों की रक्षा वे करते सदा। दैत्य माने नहीं राम महिमा को जो, उनपे हनुमान जी ने चलाई गदा। भक्त हनुमान जी...... राम का नाम लेता विभीषण मिला, मित्र माना उसे,अपना परिचय दिया। हो गया धन्य वो,राम सेवक से मिल, माता सीता का उसने,पता था दिया। गये वो वाटिका माँ के दर्शन किये, उनकी सांसों में बस "राम" चलता सदा। भक्त हनुमान जी...... दम्भी रावण को सद्ज्ञान देने के मित, माँ से अनुमति ले विध्वंस की वाटिका। छोड़ा ब्रम्हास्त्र तो नमन कर बंध गए, छोड़ने की नहीं की कोई याचिका। दिया सद्ज्ञान रावण को दरबार में, वो अहंम में था डूबा न उसको जँचा। भक्त हनुमान जी........ दिया रावण ने आदेश मारो इसे, आ विभीषण ने नीति बताई उसे। शत्रु का दूत है,अन्य कुछ दंड दो, नीति सम्मत नहीं है न मारो इसे। पूँछ ...
योगेश्वर श्रीकृष्ण
स्तुति

योगेश्वर श्रीकृष्ण

निरुपमा मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** हे परम ब्रह्म श्री कृष्ण! गोलोक त्याग धरा पर आए; जगत कल्याण हेतु, असुर विनाश हेतु, ज्ञान भक्ति कर्म का मार्ग दिखाने, एवम् धर्म संस्थापना हेतु। अवतरित हुए तुम, कारागार के बंधन में; फिर अशेष संघर्ष यात्रा, कंटकपूर्ण रहा हर पग; और आसुरी शक्तियों का आतंक, जिससे आर्तनाद कर उठा जग। बाधाओं का अतिक्रमण कर, हे कृष्ण! सफल योद्धा बन तुम, जीत गए हर युद्ध, जाना विश्व ने तुम्हें अपराजेय, प्रबुद्ध। प्रेम की कोमलता तथा उसकी शक्ति को, कण-कण में फैलाकर, प्रेम भाव से सराबोर संसार किया; प्रेम के शाश्वत तत्व को, मानव मन का आधार दिया। ब्रह्म और जीव की एकात्मता को, राधा संग रास रचाकर, कण-कण में विस्तार दिया। सोलह कला संपूर्ण तुम, योगेश्वर, पुरुष पूर्ण तुम। दीन सुदामा के परम सखा, भक्त के भगवान हो; गीता ज्ञान सुनान...
जीना सीख लो
कविता

जीना सीख लो

श्वेतल नितिन बेथारिया अमरावती (महाराष्ट्र) ******************** जिंदगी बहुत छोटी है उसे हर हाल में जीना सीख लो, आयें कितने भी आंधी तूफान जिंदगी जीने का तरीका सीख लो। यदि कोई पास में हो तो उसकी आवाज में जीना सीख लो, रूठ गया हो यदि कोई उसके इस अंदाज में रहना सीख लो। जो कभी लौट के ना आने वाले हैं उसकी यादों में जीना सीख लो, हर वक्त नहीं रहता कोई साथ अपने आप में खुश रहना सीख लो। खुशी की लहरें कभी गम के साए सुख-दुख की कश्ती में तैरना सीख लो, जिंदगी बहुत छोटी है उसे हर हाल में जीना सीख लो। परिचय - श्वेतल नितिन बेथारिया निवासी - अमरावती (महाराष्ट्र) घोषणा पत्र - मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्द...
भारत प्यारा देश हमारा
गीत

भारत प्यारा देश हमारा

नितिन राघव बुलन्दशहर (उत्तर प्रदेश) ******************** जहां भगत सिंह उद्धव और आजाद हुए है जहां महाभारत जैसे धर्म युद्ध हुए हैं बहती जहां गंगा यमुना की पावन धारा है सबसे अच्छा भारत प्यारा देश हमारा जो विश्व शांति का है प्रतीक अनेक धर्मों को जिसने है अपनाया दीन दुखियों को दिया है जिसने सहारा है सबसे अच्छा भारत प्यारा देश हमारा जो सत्य की हमेशा जय बोले है जिसने सदैव धर्म को अपनाया जो लगता हमें प्राणो से भी प्यारा है सबसे अच्छा भारत प्यारा देश हमारा सनातन और इसकी संस्कृति का रखवाला जो नाम कमाता है विश्व में फेंककर भाला है जहां हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई का भाईचारा है सबसे अच्छा भारत प्यारा देश हमारा परिचय :- नितिन राघव जन्म तिथि : ०१/०४/२००१ जन्म स्थान : गाँव-सलगवां, जिला- बुलन्दशहर पिता : श्री कैलाश राघव माता : श्रीमती मीना देवी शिक्षा : बी एस सी (बायो), आई०पी०पीजी...
बिटियाँ नहीं जान पाती
कविता

बिटियाँ नहीं जान पाती

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** माँ अब मेरे लिए काजल नहीं बनाती ये सब बचपन की बातें थी कि मुझको नजर ना लगे | लेकिन मै तो अभी छोटी हूँ माँ की नज़रों मे भाग दौड़ की जिन्दगी मे मेरा लाड-दुलार भी खो सा गया है | मै सुनना चाहती हूँ मेरे बचपन के नाम की मुझे बुलाने के लिए माँ की मीठी पुकार और गरमा गरम रोटी रात दूध पिया की नहीं माँ की फिक्र को। किंतु अब दीवार पर माला डली है मेरे टपकते आंसुओं को देख कर मेरी माँ मुझसे जैसे कह रही हो छुप हो जा मेरी बिटियाँ | वही फिक्र के साथ मै ख्याल रखने वाला बचपन वापस पाना चाहती हूँ इसलिए माँ की तस्वीर से मन ही मन बातें किया करती हूँ आज भी | मै सोचती हूँ कि क्रूर इन्सान अब क्यों करने लगा है भ्रूण-हत्याए अचरज होता है की मै जाने कैसे बच गई माँ की ममता क्या होती ये मै कभी भी नहीं जान पाती यदि मेरी भ...
जुल्फों का साया
हास्य

जुल्फों का साया

राम प्यारा गौड़ वडा, नण्ड सोलन (हिमाचल प्रदेश) ******************** आशिक बोला हे प्रिये! मुझे अपनी काली, घुंघराली नागिन सी जुल्फों के साये में क्षण भर रहने दीजिए। थोड़ा विश्राम... तनिक बतियाने दीजिए। दिल बहलाने को मन करता है प्यार भरी दो बातें कीजिए, मधुर आवाज सुनने को मन करता है। तुम्हारी जुल्फों के साये में बैठ सब कुछ भूलने को मन करता है ऊब, खीज, घुटन निराशा छोड़ हर्षित मन हो जाने को दिल करता है। बिखरे सपनों का ताना-बाना बुन, हसीन दुनिया बसाने को मन करता है। सुनकर महबूबा बोली... माफ कीजिये मुझ पर करें एहसान...। फेसबुक हूं चला रही, नेटवर्क की कमी से, पहले से हूं मैं परेशान। जुल्फें बिखेरने का मेरे पास नहीं वक्त, देखते नहीं, ऊपर से जमाना है सख्त। मेरी मानो... किसी वृक्ष तले चले जाओ घनी छाया में बैठ हवा संग खूब बतियाओ। बुझे मन आशिक उठा......
भागदौड़ की दुनिया
कविता

भागदौड़ की दुनिया

ओमप्रकाश श्रीवास्तव 'ओम' तिलसहरी (कानपुर नगर) ******************** आकर इस धरती पर मानव कब सुख का पल तूने पाया। भागदौड़ की इस दुनिया में, ढूंढ रहे सब शीतल छाया। रोटी-रोटी करता मानव दिन-दिन भर फिरता रहता है। पाने को वह सुख की रोटी, भरपूर मेहनत करता है। भूख और माया चश्मे ने, मानव को है खूब थकाया। भागदौड़ की इस दुनिया में, ढूंढ रहे सब शीतल छाया। सूरज की किरणों संग सदा चिंता का पहाड़ है आता। क्या करना किसको पूरे दिन सब विधान वही तो बताता । अर्थ-अर्थ की दुनिया सारी, भूख अर्थ की है इक माया। भागदौड़ की इस दुनिया में, ढूंढ रहे सब शीतल छाया।। परिचय :- ओमप्रकाश श्रीवास्तव 'ओम' जन्मतिथि : ०६/०२/१९८१ शिक्षा : परास्नातक पिता : श्री अश्वनी कुमार श्रीवास्तव माता : श्रीमती वेदवती श्रीवास्तव निवासी : तिलसहरी कानपुर नगर संप्रति : शिक्षक विशेष : अध्यक्ष राष्ट्रीय...
उनकी रहती आँख तनी
ग़ज़ल

उनकी रहती आँख तनी

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** उनकी रहती आँख तनी। जिनकी हमसे है बिगड़ी। होती अक़्सर आपस में, बातों की रस्सा-कस्सी। सुनकर झूठी लगती है, बातें सब चिकनी-चुपड़ी। सम्बन्धों पर भारी है, जीवन की अफ़रा-तफ़री। चेहरा जतला देता है, अय्यारी सब भीतर की। आगे - पीछे चलती है, परछाई सबकी, अपनी। चाहे थोड़ी लिखता हूँ, लिखता हूँ सोची-समझी। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच...
रक्षाबंधन कैसे मनाऊँ मैं
कविता

रक्षाबंधन कैसे मनाऊँ मैं

सुरेश चन्द्र जोशी विनोद नगर (दिल्ली) ******************** ग्यारह मास बिताये मातु बिना तो पर्व रक्षाबंधन कैसे मनाऊँ मैं | वर्ष-वर्षी तक मातृ शोक का तो, पर्व रक्षाबंधन कैसे मनाऊँ मैं || नहीं नियम पर्व कुछ भी मनाने का, सात्विकता अब्द यह बिताता मैं | आहार को आशीष से चला रहा, तो पर्व रक्षाबंधन कैसे मनाऊँ मैं || रहे दिन छियालीस अब वर्षी के, स्मृति पटल से नहीं बिसराऊं मैं | सिर पर सदैव ही जननी आशीष, तो पर्व रक्षाबंधन कैसे मनाऊँ मैं || रक्षित जीवन तेरे आशीष से, रक्षाबंधन को कैसे मनाऊँगा मैं | तेरी अनुकम्पा होगी जननी तो, पर्व रक्षाबंधन को आगे मनाऊँगा मैं || दिया लेखनी को आशीष तूने, इसे आजीवन अब चलाऊंगा मैं | तेरे आशीष से ही तेरे आदर्श हे जननी, लेखनी से आगे अब बढाऊँगा मैं || वर्ष वर्षी तक मातृ-शोक का तो, पर्व रक्षाबंधन कैसे मनाऊँ मैं | ग्यारह मास बीते मातु बिना तो, पर्व रक्...