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पद्य

आदिदेव महादेव
भजन

आदिदेव महादेव

महेन्द्र सिंह कटारिया 'विजेता' सीकर, (राजस्थान) ******************** श्रावण मास सोमवार को, भोले का यश गाना हैं। रख श्रद्धा आदिनाथ की, भवसागर तर जाना हैं।..... वंदन चंदन कर तिलक लगाएं, अर्पित करते पुष्पों की माला। आदिदेव महादेव का ध्यान धरें, सबके हित उत्तम करने वाला। गौरीशंकर भक्ति में चित्त लगाना हैं। रख श्रद्धा आदिनाथ की भवसागर तर जाना हैं।..... तात कार्तिकेय-गणनायक की, आभा बड़ी निराली हैं। मयूर केतु-गजानन की, छवि नैन सुखदायी हैं। माँ गिरिजा व विश्वनाथ का अलौकिक श्रृंगार करना है। रख श्रद्धा आदिनाथ की भवसागर तर जाना हैं।..... परिचय :- महेन्द्र सिंह कटारिया 'विजेता' निवासी : सीकर, (राजस्थान) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्ष...
तितली बन उड़ जाने दो
कविता

तितली बन उड़ जाने दो

मुस्कान कुमारी गोपालगंज (बिहार) ******************** मुझे मत मारो इस स्वर्ग सी कोख में मुझे इस जग में अपना अस्तित्व बनाने दो मुझे समझो ना तुम एक फूल की कली बाग से तितली बन उड़ जाने दो। मैं हूं एक पेड़ इस धूप में मुझे इस जग में अपना छाया फैलाने दो मुझे समझो ना एक फूल की कली बाग से तितली बन उड़ जाने दो। मैं हूं नही एक बोझ सी घर में मुझे दो घरों को संभालना है मैं आपकी पैसे लेने नही पापा ढेर सारी खुशियां बांटने आई हु मुझे उन खुशियों को बाटने दो मुझे समझो ना एक फूल की कली बाग से तितली बन उड़ जाने दो। मैं हूं एक छोटी सी परी इस जमाने की मुझे पापा की रानी बन जाने दो मुझे समझो ना एक कली की बाग से तितली बन उड़ जाने दो। मैं हूं एक छोटी सी चिड़िया इस दुनिया में जो दो घरों को संभालेगी मुझे जीने दो मैं कुछ करना चाहती हूं मुझे भी कुछ करने दो मुझे समझो ना एक फूल की क...
उन्हीं के हाथ में तैयारियाँ हैं
ग़ज़ल

उन्हीं के हाथ में तैयारियाँ हैं

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** उन्हीं के हाथ में तैयारियाँ हैं। कि जिनके साथ में लाचारियाँ हैं। ज़रूरत है उसे मिलता नहीं है, बड़ी मजबूर जिम्मेदारियाँ हैं। हवा को आसमानों की पड़ी है, जमीं पर जान की दुश्वारियाँ हैं। तरक्क़ी हो रही है झूठ साबित, कड़ी इस दौर की बीमारियाँ हैं। बदल लेता है, चलकर रूप अपना, ये कैसी मर्ज़ की अय्यारियाँ हैं। बचाते हैं वही दामन यहाँ पर, कि जिनके हाथ में पिचकारियाँ हैं। लगेंगे कैसे पंख इन इरादों को, पढ़ें-लिक्खों में जब बैगारियाँ हैं। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्...
सुंदर प्रतिफल
कविता

सुंदर प्रतिफल

निरुपमा मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** महा विभीषिका का संत्रास, कल इतिहास में अंकित होगा; जब मनुष्य हुआ था कैद घरों में, मुक्त विचरते थे पशु पक्षी। मानव असहाय मूक दर्शक बन, रहा देखता अजब नजारे; वृक्ष फलों से लदे हुए थे, कोई न उनकी ओर निहारे। धरा दोहन से मुक्त होकर, पुष्पों की चुनरी ओढ़ सजी थी; नदियां साफ सुथरी सी होकर, मदमाती मस्त कल कल बहती थीं। अदृश्य जीवाणु ने कुपित होकर, जग में हाहाकार मचाया था; अस्त्र शस्त्र बेकार हुए, जीवन गति पर विश्राम लगा था। दुनियां को छोटा कहने वाले, लक्ष्मण रेखा में सिमट गए थे; चांद तारों को छूने वाले, जीने को मोहताज हुए थे। मानव ने तब हिम्मत बांधी, लेकर धैर्य संयम का संबल; और अंततः विजयी हुआ वह, पाया संकल्पों का सुंदर प्रतिफल। परिचय :- निरुपमा मेहरोत्रा जन्म तिथि : २६ अगस्त १९५३ (कानपुर) निव...
गुरु की महिमा
कविता

गुरु की महिमा

शैलेष कुमार कुचया कटनी (मध्य प्रदेश) ******************** मिट्टी को जो भगवान बना दे, मूर्ख को जो विद्धवान बना दे, ग्वार को जो इंसान बना दे, ऐसे गुरु को प्रणाम, जो मन की जाने सारी बात। गुरु वही जो मन को शांति दे, गुरु वही जो धर्म से जोड़ दे, गुरु वही जो सत्कर्म का रास्ता दिखाए, ऐसे गुरु को प्रणाम, जो मन की जाने सारी बात। जिसे माया का लोभ नही, सच जिसकी जुबान में हो, सादा जीवन उच्च विचार, ऐसे गुरु को प्रणाम, जो मन की जाने सारी बात। गुरु हो तात्या टोपे सा, जिसने साधारण कन्या को, भारत का कान्तिवीर बना दिया, ऐसे गुरु को प्रणाम, जो मन की जाने सारी बात। परिचय :-  शैलेष कुमार कुचया मूलनिवासी : कटनी (म,प्र) वर्तमान निवास : अम्बाह (मुरैना) प्रकाशन : मेरी रचनाएँ गहोई दर्पण ई पेपर ग्वालियर से प्रकाशित हो चुकी है। पद : टी, ए विधुत विभाग अम्बाह में पदस्थ शिक...
आजाद
कविता

आजाद

नन्दलाल मणि त्रिपाठी गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** धन्य धन्य हे माता जगरानी बदरका भावरा की माटी का कण कण धन्य।। कोख और माटी ने मिलकर भारत को दिया अनमोल रत्न पंडित सीताराम पिता गौरव पल।। जुलाई तेईस सन ऊँन्नीस सौ छः माँ भारती का लाल चन्द्रशेखर आजाद जन्म।। लालन पालन सत्य सनातन नित्य निरंतर संस्कृति संस्कार अन्याय अत्याचार का प्रतिकार पुरुषार्थ।। भारत के जन-जन घुट-घुट कर जीता जाता परतंत्रता की पीड़ा का घूंट पिता जाता समय काल प्रतीक्षा।। चंद्रशेखर नाम दिया मां बाप ने आज़ाद स्वय का दिया नाम राष्ट्र के अन्तर्मन की वेदना आज़ादी की चाह।। आजादी के संकल्पों प्रतिज्ञा पराक्रम का स्वयं आज़ाद जन जन के भाँवो का प्रतिबिंब प्रतीक आजाद।। युवा उमंग उत्साह ऊर्जा हुंकार नौजवानों की टोली जैसे राष्ट्र अस्मत की रक्षा के जवान।। भगत सिंह राज गुरु बिस्मिल असफा...
हर कोई रंज में डूबा जैसा
कविता

हर कोई रंज में डूबा जैसा

संगीता सूर्यप्रकाश मुरसेनिया भोपाल (मध्यप्रदेश) ******************** मुल्क का मंजर ऐसा। हर कोई रंज में डूबा जैसा। हर कोई अरज करे ऐसा, मरज दूर हो जैसा। मुल्क पर कोरोना खंजर ऐसा। हर कोई लहू में डूबा जैसा। मुल्क पर कोरोना अंगार ऐसा। हर कोई आग में जल रहा जैसा। मुल्क पर कोरोना की धुंध छाई ऐसी। हर कोई आग में जल रहा जैसा। मुल्क पर कोरोना की धुंध छायी ऐसी। हर कोई तड़प रहा चंद सांसों के लिए जैसा। मुल्क पर कोरोना विपदा बस्ती पर ऐसी। हर कोई अपनी डूबती कश्ती बचा रहा जैसा। मुल्क पर कोरोना की गंध ऐसी। हर कोई अपने घर बंदी बना जैसा। मुल्क का मंजर ऐसा कई मइयते देखी ऐसी। हर कोई कोरोना तपन में जलने लगा जैसा। मुझे मेरे मुल्क पर गुरुर ऐसा। मेरा मुल्क मेरा चमन जैसा। मेरे मुल्क पर कोरोना। इनायत कर ऐसे। मेरा मुल्क गुलशन बनेगा जैसे। मेरे मुल्क में कोरोना का इलाज होगा ऐसे। एक ...
क्या तुम लक्ष्मण बन पाओगे
कविता

क्या तुम लक्ष्मण बन पाओगे

विकास शुक्ला दिल्ली ******************** राम सा भाई सब चाहें, क्या तुम लक्ष्मण बन पाओगे, जो चौदह वर्ष भार्या से दुर रहा, क्या तुम एक वर्ष रह पाओगे... निज राम चरण की धूल बना, वह धुप छाँव बन साथ चला, अरण्य में अपने भाई के, जो बिन स्वार्थ खिदमत को चला गया... उस भरत के ह्रदय को तो देखो, जो अनुराग का सागर बन आया, राज पाठ सब छोड़-छाड़ कर, तात चरण में खुद आया... चरण पादुका को सर लेकर, सिंहासन पर शोभित कर आया, निज भ्रात के कारण योगी बन, खुद भी अरण्य में पड़ा रहा... बोलो ऐसे भरत बनोगे, क्या वही लक्ष्मण बन पाओगे, राम सा भाई सब चाहें, क्या भरत या लक्ष्मण तुम बन पाओगे... क्या भरत या लक्ष्मण तुम बन पाओगे...।। परिचय :- विकास शुक्ला निवासी : दिल्ली घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि...
अच्छा लगा
कविता

अच्छा लगा

आशीष तिवारी "निर्मल" रीवा मध्यप्रदेश ******************** तेरा ज़िंदगी में आना, अच्छा लगा हँसना, रुठना, मनाना, अच्छा लगा। जरा जरा सी बातों पर तुनक कर तेरा मुँह को फुलाना, अच्छा लगा। महफ़िल में या यूँ ही अकेले कहीं तेरा गले से लगाना, अच्छा लगा। सौंपकर मुझको खुशियाँ अनमोल तेरा यूँ नखरे दिखाना अच्छा लगा। तुझ पे लिखा हूँ जितनी भी नज़्में तेरा उनको गुनगुनाना अच्छा लगा। वहशी तरीके तुम टूटती हो मुझ पर मुझे सितमगर बताना अच्छा लगा। परिचय :- आशीष तिवारी निर्मल का जन्म मध्य प्रदेश के रीवा जिले के लालगांव कस्बे में सितंबर १९९० में हुआ। बचपन से ही ठहाके लगवा देने की सरल शैली व हिंदी और लोकभाषा बघेली पर लेखन करने की प्रबल इच्छाशक्ति ने आपको अल्प समय में ही कवि सम्मेलन मंच, आकाशवाणी, पत्र-पत्रिका व दूरदर्शन तक पहुँचा दीया। कई साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित युवा कवि आशीष त...
अनहदें…
कविता

अनहदें…

सन्तोषी किमोठी वशिष्ठ रूद्रप्रयाग (उत्तराखंड) ******************** अनहदों से होकर तुम्हें महसूस किया है, मैंने सरहदों के दायरों में रहकर ये जीवन जिया है, मैंने शिखरों की चाह नहीं थी, सरहदों की परवाह थी हमें, गुजर गयी वो हदें जिनकी परवाह थी हमें, वो अनहदों के दायरे आज भी गूँज रहे हैं। वो नयनों की रोशनी कहीं खो गयी है, पर तुम्हारी खुशबू चंदन की तरह महसूस हो रही है वो शिरोमणि चमक रही है कानों में तुम्हारी आवाजें गूँज रही हैं।। मैं शान्त और शालीनता से तुम्हें महसूस कर रही हूँ, अभी भी अनहदों से गुजर रही हूँ, वो हल्की सी मुस्कराती हुई सुबह, वो शीतल होती हुई शाम, बन्द नयनों से महसूस किये जा रही हूँ,। बन्द कानों से तुम्हारी आहटों का अहसास जम़ी पे तुम्हारे कदमों को इस मखमली दूब के सहारे महसूस किये जा रही हूँ,।। अनहदों से होकर तुम्हें महसूस किया है मैंने, सरह...
जरा देख के चलो
कविता

जरा देख के चलो

रामकेश यादव काजूपाड़ा, मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** फूल हैं कम, कांटे हैं ज्यादा, जरा देख के चलो। भरोसा कम है, धोखा ज्यादा, जरा देख के चलो। मुस्कान कम, तनाव है ज्यादा, जरा देख के चलो। आधी हक़ीक़त, आधा फ़साना, जरा देख के चलो। आसमां कम, औ ऊँचे मकां ज्यादा, जरा देख के चलो। फायर ब्रिगेड कम, शार्टसर्किट ज्यादा, जरा देख के चलो। परिन्दे हैं कम, बहेलिए ज्यादा, जरा देख के चलो। खरे इंसान कम, खोटे ज्यादा, जरा देख के चलो। सूरज है क़ैद, सितारे सोये, जरा देख के चलो। ये रंग-रलियां औ वो कहकहे, जरा देख के चलो। जिस्म का बाज़ार, उड़ते पैसे, जरा देख के चलो। रेशमी आँचल, अश्क़ से भींगा, जरा देख के चलो। रेंग रही मौत, उड़ते वायरस, जरा देख के चलो। ये तूफ़ान, वो बाढ़ का पानी, जरा देख के चलो। पलभर की जवानी, लंबी जुदाई, जरा देख के चलो। अम्न, तहज़ीब की बिगड़े न खुशबू, जरा देख के चलो। ...
देशप्रेम
कविता

देशप्रेम

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** आज हम सब को एक साथ आना होगा मिलकर ये सौगंध सभी को लेना होगा, देशप्रेम का चढ़ रहा जो छद्म आवरण उससे हम सबको बचना बचाना होगा। ओढ़ रहे जो देश प्रेम का छद्म आवरण नोंच कर वो आवरण नंगा करना होगा, देशप्रेम के नाम पर भेड़िए जो शेर हैं ऐसे नकली शेरों को बेनकाब करना होगा। देशभक्तों पर उठ रही जो आज उँगलियाँ उन उँगलियों को नहीं वो हाथ काटना होगा, देश में गद्दार जो कुत्तों जैसे भौंकते है, ऐसे कुत्तों का देश से नाम मिटाना होगा। जी रहे आजादी से फिर भी कितने हैं डर डर का मतलब अब उन्हें समझाना होगा, देश को नीचा दिखाते आये दिन जो गधे हैं रेंकते, ऐसे गधों को अब उनकी औकात बताना होगा। उड़ा रहे संविधान का जब तब जो भी मजाक भारत के संविधान का मतलब समझाना होगा, समझ जायं तो अच्छा है देशप्रेम की बात वरना समुद्र...
दर्द की सज़ा
कविता

दर्द की सज़ा

राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** हुआ न दर्द मुझे भी हुआ करता था, जब तुम बेमतलब मुझे तकलीफ देते थे। आए न आंखों में आंसू मेरी आंखों में भी आते थे, जब तुम बिना मेरे कुछ बोले मुझे दर्द दिया करते थे। टूटा न दिल मेरा भी टूट जाता था, जब तुम पास होकर भी अनजान बन निकल जाते थे। हुई न तकलीफ मुझे भी हुआ करती थी, जब तुम औरों के लिए मुझे छोड़ चले जाते थे। परिचय :- राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्...
पिता
कविता

पिता

ज्योति लूथरा लोधी रोड (नई दिल्ली) ******************** जो अपने पूरे परिवार के लिए है हर समय जीता, जो अपने सपनों को छोड़ बच्चो के ख्वाब है सिता, जो कभी न बताए की उस पर क्या-क्या है बिता, वो दुनिया का अनमोल रत्न है पिता। मेरा स्वाभिमान, मेरा सम्मान, मेरा अभिमान, है मेरे पिता। अपने बारे में कभी न सोचते, बस हमारे ही सपने संजोते, मेरा मान मेरी उड़ान, है मेरे पिता। गलती होने पर तुरंत कर देते माफ, उनका दिल है कितना साफ़, बाहर से सख्त अंदर से नरम, उनकी डाट भी है कितनी अनुपम। मेरी जान है मेरे पिता, दुनिया का अनमोल रत्न है पिता, जो हमेशा सब को देता, पर खुद के लिए कभी कुछ न लेता। वो महान इंसान है पिता, वो भगवान है पिता। परिचय :- ज्योति लूथरा संस्थान : दिल्ली विश्वविद्यालय निवासी : लोधी रोड, (नई दिल्ली) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ...
सावन का आगमन
कविता

सावन का आगमन

आरती यादव "यदुवंशी" पटियाला, पंजाब ******************** आगमन सावन का देख है हर्षचित्त सारा वन हुआ, खिल उठी हैं पुष्प कलियां है प्रमुदित हमारा मन हुआ। भवरों की गुंजा शोर करती चढ़ा पत्तियों पर नव-यौवन है, तितलियां नित्य नृत्य हैं करतीं आया झरता देख सावन है। मयूरी की नुपुरें छम हैं करती देखो झूमें ये सारा उपवन है, पंछियों के मीठे स्वरों से देखो हुई सुगंधित ये शीतल पवन है। सरिता की धारा बहती वेग से उल्लासित हुआ ये गगन है, आकाश से देखो धरा मिल गई कैसे इक होकर लागे मगन है। मेढ़कों की गुंजा है सुनती कोयल की कू-कू को नमन है, बगियों में झूले पड़ गए हैं देखो झूमता ये सावन है। परिचय :- आरती यादव "यदुवंशी" निवासी : पटियाला, पंजाब घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आ...
धरा पर सूर्य
गीत

धरा पर सूर्य

प्रमोद गुप्त जहांगीराबाद (उत्तर प्रदेश) ******************** एक दिन, अपने जीवन का- अंधेरा भी मिटाना है, धरा पर सूर्य लाकर उजालों को चुराना है । इन केशों के जंगल की है, छाया बहुत काली, नहीं सच देखने देतीं हैं मेरी आँख मतवाली । हुई है आन्दोलित जीभ कि हमको और खाना है । ये मन, अब तो गगन को माँगते थकता नहीं देखो, कि उड़ जाता है, बाँधे से भी ये बंधता नहीं देखो । अधरों पर लगा ताला हृदय में डूब जाना है । परिचय :- प्रमोद गुप्त निवासी : जहांगीराबाद, बुलन्दशहर (उत्तर प्रदेश) प्रकाशन : नवम्बर १९८७ में प्रथम बार हिन्दी साहित्य की सर्वश्रेठ मासिक पत्रिका-"कादम्बिनी" में चार कविताएं- संक्षिप्त परिचय सहित प्रकाशित हुईं, उसके बाद -वीर अर्जुन, राष्ट्रीय सहारा, दैनिक जागरण, युग धर्म, विश्व मानव, स्पूतनिक, मनस्वी वाणी, राष्ट्रीय पहल, राष्ट्रीय नवाचार, कुबेर टाइम्स, मो...
मेरी यह अभिलाषा है…
कविता

मेरी यह अभिलाषा है…

आचार्य राहुल शर्मा फिरोजाबाद (उत्तर प्रदेश) ********************                लावणी छंद में कविता मेरे मन की यह अभिलाषा, प्रेम बढे जग खिल जाये । राग द्वेष से हटकर प्राणी, प्रेम गले से मिल जाये ।। प्रेम से बढकर कौन जहां मे, मुझको प्यारे बतलाओ । नम्र निवेदन यही करूँगा, पाठ प्रेम का सिखलाओ ।। १ बिना प्रेम के जग की रचना, मन कैसे हो पायेगी । प्रेम रूप ही ईश्वर का है, देख अक्ल आ जायेगी ।। सच्चा ज्ञान प्रेम है मानो, काली रातें कहतीं हैं । ये कटतीं हैं प्रेम मग्न हो, अंधकार को सहतीं हैं ।। २ तुलसी सूर कबीर कहें सब, प्रेम ड़गर चलते जाना । ईश्वर तुम से दूर नहीं हैं, जाओ तो मिलते जाना ।। मीरा गाये प्रेम मग्न हो, मैं तो हरि की हो गई रे । हरि की चादर ऐसी ओढ़ी, प्रेम गली में सो गई रे ।। ३ नारद वींणा वादन करते, भज नारायण कहते हैं । जगत सार बस हैं नारायण, प्रेम गली में रहते हैं ।।...
समर्पण रिश्तो का
कविता

समर्पण रिश्तो का

श्वेता अरोड़ा शाहदरा (दिल्ली) ******************** किसी भी रिश्ते को निभाने के लिए पूर्ण समर्पण जरूरी है, कमियो को करके नजर अंदाज, खूबियो को अपनाना जरूरी है! कटु वाणी को नियंत्रण मे रखकर, मृदु भाषी होना जरूरी है! गैर भी हो जाते है अपने, बस वाणी मे मिठास जरूरी है, सिर्फ लेने का भाव ना होके, देने का भाव जरूरी है! झूठ से ना जीती गई कोई लडाई, साथ सच का होना जरूरी है! गलत की भीड मे ना होकर शामिल, साथ सच्चाई के चलना जरूरी है! आईना दूसरो को दिखाने से पहले, अंतर्मन मे झांकना जरूरी है! षड्यंत्रो से रची जाती है महाभारत, मधुर संबंधो के लिए निष्पक्षता जरूरी है! भूल जाएंगे सब तेरी जिन्दगी भर की अच्छाई, बस तेरी एक गलती होना जरूरी है! किसी भी रिश्ते को निभाने के लिए पूर्ण समर्पण जरूरी है! परिचय :-  श्‍वेता अरोड़ा निवासी : शाहदरा दिल्ली घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित क...
साहित्य और समाज
कविता

साहित्य और समाज

सुनील कुमार बहराइच (उत्तर-प्रदेश) ******************** साहित्य और समाज का आपस में गहरा नाता है साहित्य समाज का दर्पण कहलाता है। मनोभावों को शब्द रूप दे साहित्य रचा जाता है सत्य झलक समाज की साहित्य ही दिखलाता है साहित्य समाज का दर्पण कहलाता है। नई दिशा समाज को साहित्य ही दिखलाता है सजक कर समाज को अपना कर्तव्य निभाता है साहित्य समाज का दर्पण कहलाता है। निराशा में भी आशा की किरण दिखलाता है सोच-समझकर कर चलना सिखलाता है साहित्य समाज का दर्पण कहलाता है। कालजयी सृजन समाज ही करवाता है साहित्य संरक्षण भी समाज करवाता है समाज साहित्य का आधार कहलाता है। कालजयी सृजन कर साहित्यकार सम्मान पाता है मर कर भी अमर हो जाता है साहित्य समाज का दर्पण कहलाता है। परिचय :- सुनील कुमार निवासी : ग्राम फुटहा कुआं, बहराइच,उत्तर-प्रदेश घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है...
आशा की किरण
कविता

आशा की किरण

महेन्द्र सिंह कटारिया 'विजेता' सीकर, (राजस्थान) ******************** आशा की किरण, दिखाती कविता। मुझको मुझ तक, लाती कविता। अन्तर्भावों की, अभिव्यक्ति कविता। हमें भावाभिभूत, बनाती कविता। परोपकार और परहित कर, खुशियां लेना सिखाती कविता। निस्वार्थ सेवा भाव से, हर्षित सदा करती कविता। हृदय व्यथित जब होता है, भाव अंकुरित करती कविता। मन भावोन्मत्त जब होता है, नवकाव्य सृजन करती कविता। परिचय :- महेन्द्र सिंह कटारिया 'विजेता' निवासी : सीकर, (राजस्थान) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी क...
वार
छंद

वार

अशोक शर्मा कुशीनगर, (उत्तर प्रदेश) ******************** धार छन्द (चार वर्ण-सात मात्रा-२२२१) सीमा पार। बैरी चार। अत्याचार। हाहाकार। चारो ओर। मानो खोर। नाता तोड़। माथा फोड़। भागे लोग। बिना जोग। ऐसी होड़। खाना छोड़। ना है आस। कोई पास। काया खास। सत्यानाश । छूटे कूछ। नाही पूछ। काटे पेट। देवी भेंट। पानी आज। खोयी लाज। धोती ढाल। खोती लाल। खोटे लोग। का है योग। ना है रोध। कोई बोध। नाही नेह। कोई गेह। तेरा क्षेम। कैसा प्रेम। मानो खार। सीमा पार। रोको यार। ऐसी धार। परिचय :- अशोक शर्मा निवासी : लक्ष्मीगंज, कुशीनगर, (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प...
कर्म में शर्म कैसी ?
कविता

कर्म में शर्म कैसी ?

रश्मि श्रीवास्तव “सुकून” पदमनाभपुर दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** एक छोटी सी चीटी भी, करती रहती कर्म यहाँ हाथी को भी मेहनत करने में, आती नहीं है शर्म यहाँ याचक भी जी लेता है, करते-करते कर्म यहाँ राजा को भी कभी न आई, राजपाट में शर्म यहाँ नन्ही चिडिया दानों के लिए, करती रहती कर्म यहाँ जंगल का राजा शिकार में, नहीं किया कभी शर्म यहाँ इस दुनिया मे भगवान ने, आकर किया कर्म यहाँ फिर इन्सान को आती है, क्यो करने में शर्म यहाँ सासें भी तब तक चलती है, हृदय करे जब कर्म यहां निर्जीव हो जायेगी काया, धडकनें करे जो शर्म यहाँ जीवन का है सार यही कि, करते रहो कर्म यहाँ मानवता से बढ़ कर दूजा, "सुकून" नहीं है कोई धर्म यहाँ स्वर्ग नरक का खेला कह कर, छलते रहते कर्म यहाँ यहीं किया है यहीं मिलेगा, जीवन का है यही मर्म यहाँ परिचय : रश्मि श्रीवास्तव “सुकून” निवासी : मुक्तनगर, पद...
दुर्योधन नही सुयोधन
कविता

दुर्योधन नही सुयोधन

दशरथ रांकावत "शक्ति" पाली (राजस्थान) ******************** मैं समय ठहर सा गया युद्ध जब भीम सुयोधन बीच हुआ, उस रणभूमि का कण-कण साक्षी क्या उसका परिणाम हुआ। अंत समय तक वीर लडा़ सौ बार गिरा फिर खड़ा हुआ, हो धर्म विजेता या पाप पराजित पर वीर सुयोधन अमर हुआ। क्षण मृत्यु का निकट हुआ माधव को निकट बुलाकर बोला, संतप्त हृदय से पीड़ा निकली तत्काल संभलकर यु बोला। हे गिरिधर एक बात सुनो मैं नीच नराधम दुर्योधन हूं, मैं पाप मूर्ति में कली रूप मैं अधर्म का संचित धन हूं। मैं विषघट हूं कुलनाशक मैं अनीति का वृहद वृक्ष हूँ। भातृशत्रु मैं कुटिल कामी मैं क्रोध लोभ का प्रबल पक्ष हूं। है कितने ही अवगुण अपार मैं महाभारत का हूँ आधार, मेरे कारण गीता कही मैं पाप स्वयं सत का आधार। तुम धर्म स्वयं को कहते हो सत्य सनातन बनते हो, पापों का दमन ध्येय तेरा इस हेतु देह नर धरते हो। क्या पाप कहो ...
भौतिकतावादी संसार
कविता

भौतिकतावादी संसार

रशीद अहमद शेख 'रशीद' इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** भौतिकता का प्रेमी यह जग रंग-रूप आकार सराहे करे सदा भौतिक सत्यापन दृश्य, गंध, स्पर्श, नाद से करता है पहचान सभी की चमक-दमक का सतत प्रशंसक कृत्रिम गंध से भ्रम का पोषक कोमल सतहों को शुभ माने स्वर की सरगम में डूबा है ठाट-बाट के पीछे पड़ता महलों के शिखरों को देखे कुटिया उसके लिए उपेक्षित धन से तोले मान-प्रतिष्ठा बाहर-बाहर परखे सबकुछ देख नहीं पाए अंतर्मन भौतिकतावादी संसार परिचय -  रशीद अहमद शेख 'रशीद' साहित्यिक उपनाम ~ ‘रशीद’ जन्मतिथि~ ०१/०४/१९५१ जन्म स्थान ~ महू ज़िला इन्दौर (म•प्र•) भाषा ज्ञान ~ हिन्दी, अंग्रेज़ी, उर्दू, संस्कृत शिक्षा ~ एम• ए• (हिन्दी और अंग्रेज़ी साहित्य), बी• एससी•, बी• एड•, एलएल•बी•, साहित्य रत्न, कोविद कार्यक्षेत्र ~ सेवानिवृत प्राचार्य सामाजिक गतिविधि ~ मार्गदर्शन और प्रेरणा लेखन विध...
मिलन यामिनी
कविता

मिलन यामिनी

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** कहीं बादल गरज रहे कहीं दमक रही दामिनी तुम कहीं हम कहीं यह कैसी मिलन यामिनी तरु पल्लव भी मुखरिततो हो गए पागल लताओं का संबल दूर कहीं भाग रहे मेघों के संगम तुम तुम आए नहीं मैं बांट रही जोहती तुम कहीं हम कहीं यह कैसे मिलन यामिनी तराजू में पंकज भी सिर झुकाए बैठ गए खग वृंद भी अपने घरों को लौट गए मैं खड़ी द्वार पर प्रतीक्षा थी कर रही तुम कहीं हम कहीं यह कैसी मिलन यामिनी नीरज तरंगे भी टकरा रही कूल से अभी भी झूम रहे पाकर मधुपुष्प से कुमकुम रोली लिए मैं सजा रही आरती तुम कहीं हम कहीं यह कैसे मिलन यामिनी दामिनी की धमक से मेघ बोखला गए बरसा कर अमृत करण इंद्र छटा दिखा गए मैं भी गाती रही पुष्प लिए सारथी तुम कहीं हम कहीं यह कैसे मिलन यामिनी देखो अब मैंघो ने प्रृषठ् भाग दिखा दिया इंद्र धर्म के सप्तरंग लि...