नजा़रा
मनीष कुमार सिहारे
बालोद, (छत्तीसगढ़)
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क्या दिलचस्प नजा़रा है,
घर नदी के किनारा है।
ढलती सुरज की रक्त किरण से,
सारा घर उजियारा है।।
मानो घर में दीप प्रज्जवलित,
उस सा घर चमकाया है।
तट पर बैठे पथिक के मन में,
छोटा-सा मुस्कारा है।।
मानो उस मुस्कान के पाछे,
ये सारा का सारा नज़ारा है।
क्या दिलचस्प नजा़रा है,
क्या दिलचस्प नजा़रा है।।
पंछी सुर में तान भर रही,
नदिया छन छन छपक चल रही।
दो हंसो का जोड़ा संग में,
ऊंचे गगन में तान भर रही।।
देख जुगल दो हंसो को,
मन में ख्वाबों का छाया है।
बीती पल वो याद आ रही,
जो पंथि संग गुजारा है।
क्या दिलचस्प नजा़रा है,
क्या दिलचस्प नजा़रा है।।
हरीयाली ना पुछो यहां की,
हर एक प्यारा प्यारा है।
सुगंध युक्त पवमान यहां की,
पल पल बहनें वाला है।।
आओ तुम भी सांथ मे मेरे,
तर जाये इस दरिया पे।
सुन्दर जग की रचना करके,
र...

























