पाती तेरे नाम
पूनम शर्मा
मेरठ
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कर्मों की खेती
कभी सूखती, तो कभी
लहराती थी पर,
तुझे काटने की
कितनी जल्दी थी,
काटता चला गया
उनींदी सी आंखों से,
आधा अधूरा छोड़,
सरक लिया,
मेरी आंखें ताउम्र
तलाशेंगी तुझे,
तू तस्वीर में
कैद हो गया मेरे भाई,
मोबाइल का दायरा उलांघ,
कानों में फुसफुसाता है,
ऐसा लगता है,
यहीं आसपास है
तू कब भाई का
दायरा लांघकर
दोस्त बन गया था मेरा,
खट्टी-मीठी सारी बातें
साझा करते-करते,
कौन से लोक चला गया,,
अब कभी फोन नहीं आएगा
ना मैं मैसेज करूंगी
ना ही नीला "टिक" बनेगा
मेरे छोटे भाई विजय !
तू कितना बड़ा हो गया रे
समझदारी की बातें
समझाते समझाते
फुर्र से उड़ चला,
अभी कल की ही तो बात है
"अस्पताल जा रहे हैं जीजी !"
झूठा...
तू तो निकला था
अनंत सफर को
नंगे पांव,
किसका हाथ थामा तूने !
हम सभी का हाथ छोड़
कहां चला गया मेरे भाई
मुझसे ज्यादा चाहने वाला
कौन मिल गया रे,
कितना चाहती थी ...























