देह से परे
श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
********************
काया से परे,
एक स्त्री के भूगोल को
जान पाए हो कभी ?
उसके भीतर उलझी हुए
सडकों को कभी
समझ पाये हो क्या ?
एक खौलता हुआ
इतिहास है भीतर उसके,
क्या पढ़ पाये हो कभी!!
नहीं समझ पाये
आज तक उसको
रसोई और घर-परिवार से
परे भी एक दुनिया है उसकी,
पुरुष से परे क्या उसकी
जमीन समझा
सकते हो उसको ?
सदियों से तितर-बितर हुई
ढूंढ रही अपने घर का
पता बता सकते हो उसे ?
कभी विस्थापित कभी
निर्वाचित हुई उसके
सम्मान को समझा
सकते हो समाज को?
उसकी दहलीज पर
पड़े मौन शब्दों को
जाना है कभी ?
इस कुरुक्षेत्र में कई बार
छली गई उसके मर्म की
अनुभूति तुमको हुई है कभी ?
उसकी पीठ पर पड़े
अनगिनत गांठों को
टटोला है तुमने,
नहीं ना .....?
वो कहना चाहती है"
"इस देह से परे भी
स्त्री की एक दुनिया है!!
पर...




















