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पद्य

चाँदनी रात
कविता

चाँदनी रात

सरला मेहता इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** चाँदनी रात तो खिली होगी आपसे बात भी तभी होगी इक मुलाकात आज है तुमसे शर्म से फ़िर पलक झुकी होगी बन्द आँखें दिखा रही सपने धड़कनें आपने सुनी होगी भोर होते चली कहाँ तुम हो धूप तो आज गुनगुनी होगी ख़्वाब में खो गए भुला मुझको राज की बात तो सुनी होगी दरमियाँ दूरियाँ न हो साजन पास बैठो ज़रा खुशी होगी रूठना आपको नहीं भाता यार मुझमें कहीं कमी होगी बेटियाँ रोज क्यों छली जाती खोट नियमों में ही रही होगी परिचय : सरला मेहता निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अप...
माँ के दर्द का अहसास है
कविता

माँ के दर्द का अहसास है

प्रमेशदीप मानिकपुरी भोथीडीह, धमतरी (छतीसगढ़) ******************** एक लड़की जिसे माँ के दर्द का अहसास है सामान्य सी दिखती लड़की, सब से खास है दर्द में पली लड़की, जिसे दर्द का अहसास है एक लड़की जिसे माँ के दर्द का अहसास है उसकी सोच सामान्य लड़कीयों से भिन्न है उसकी गम माँ के गम से सदैव अभिन्न है जिसे माँ मे ही करनी, बाप की भी तलाश है एक लड़की जिसे माँ के दर्द का अहसास है उमड़ आते है गम के, आंसू आँखों में अक्सर सोचती है क्या आयेगी कभी खुशी के अवसर कितने गम है मगर, अभी भी जीने की आश है एक लड़की जिसे माँ के दर्द का अहसास है अजीब से सवाल उसके जहन में उठती है जवाब के तलाश में, अपने आप से रूठती है जवाब मिलने का, अब भी उसे आश है एक लड़की जिसे माँ के दर्द का अहसास है किसी के सब कुछ रहकर कुछ भी नहीं होता है ऐसा अजीब इत्तेफाक दुनिया में क्यूंकर होता है तब से अब तक हमें उसके उत्तर की...
शोर विभोर करे अँगना
गीत

शोर विभोर करे अँगना

आचार्य डाॅ. वीरेन्द्र प्रताप सिंह 'भ्रमर' चित्रकूट धाम कर्वी, (उत्तर प्रदेश) ********************  "छंद परिचय" छंद का नाम-  शैल सुता वर्णिक छंद वर्णवृत-  नगण, जगण, जगण, जगण, जगण, जगण, जगण, लघु गुरु। अंकावलि -  १११, १२१, १२१, १२१, १२१, १२१, १२१, १२। शिल्प-  प्रति चरण २३ वर्ण, दो-दो चरण समतुकांत। नायिका की स्वप्निल कल्पनाओं का चित्रण पुहुप पलाश निकुंज निमीलित नैनन ओझल सांझ ढले। प्रिय पुलकावलि निर्भय निश्छल निर्मल भाव उजास मले।। मधुमय गंधिल याद पुरातन अक्षर-अक्षर प्रीति पढ़ें। प्रियतम प्यार पगी गलियाँ पथ आज निशीथ दुलार गढ़ें।। तन मन की अभिलाषित आकृति आतुरता सँग साथ चले। प्रिय पुलकावलि निर्भय निश्छल निर्मल भाव उजास मले।। अधर धरे अधरोष्ठ परागित स्वप्निल भव्य वितान बने। थर-थर काँप रहे अधराधर भावुकता पुरुषार्थ जने।। मधुरिम मादकता ऋतु कीअति भीतर बाहर नित्य ...
नदावत हे
आंचलिक बोली

नदावत हे

परमानंद सिवना "परमा" बलौद (छत्तीसगढ) ******************** छत्तीसगढ़ी कविता खेत-खेत भारा राखे, कोठार बनाई नदावत हे, थ्रेसर के जमाना आगे, गाडा-बइला के मिजाई नदावत हे.! पहली लइका मन सीला बिने ला जाये, सीला बिने अउ बेचे मुर्रा अउ लाडु लाके खाये, अबके लइका स्कुल ले आये मोबाइल मा बीजी हो जाये.! पाठ चुड़ी बोईर काटा घलो नदावत हे, कोठार मा झाला बनाई सब्बो माजा बुलावत हे.! अब खेते मा मिन्जे अउनचे ले धान ला सोसाइटी ले जावत हे, हमर संस्कृति परम्परा नदावत हे, सुर कलारी नेग जोग सब मजाक बनावत हे.!! परिचय :- परमानंद सिवना "परमा" निवासी : मडियाकट्टा डौन्डी लोहारा जिला- बालोद (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्...
पुरुष
कविता

पुरुष

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** विधाता ने रचा मुझे स्त्री के स्वाभिमान ने संवरा माँ की ममता भी है है पिता का गौरव भी पूरे संसार की सख्ती भी है मुझमें खुद के ज़ज्बात भी छुपा लेता हूँ रो मैं नहीं सकता, हर कुछ सह भी नहीं सकता ऊपर से शिला हूँ मैं, पर भीतर से हूँ मोम मैं हूँ एक "पुरुष".... परिवार, समाज, देश का जिम्मेदार हूँ हर पल हर समय के लिए मददगार हूँ सबके सपनों का आधार हूँ किन्तु खुद के सपने बुनने का गुनाहगार भी हूँ क्युकी मैं हूँ एक "पुरुष"... पाँव थकते हैं तो क्या, थकान होती भी है तो क्या पत्नी की उम्मीद हूँ, बच्चों का हूँ भाग्यविधाता कर्म करता चल रहा हूँ, सबकी सुखद मुस्कान के लिए कर्मशील, धर्म-परायण, हर पल ध्यानी हूँ मैं हूँ एक "पुरुष "!... बहुत अधिक कुछ नहीं लिखा मेरे बारे में पर इस सृष्टि की रचना का रचनाकार...
मर्यादा
कविता

मर्यादा

रुचिता नीमा इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** इतिहास गवाह है, जब-जब तोड़ी गई है मर्यादा लेकर आई है धरती पर एक नए युग की परिभाषा रावण ने तोड़ी जब मर्यादा, सर्वनाश हुआ था असुरों का दुशासन के दुष्कृत्य से विध्वंश हुआ फिर कौरव का मर्यादा पालन कर श्री राम मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए श्री कृष्ण गीता के द्वारा, मर्यादा की सीमा बता गए समुद्र भी रहे मर्यादा में जब तक, शरण जीवों को देता है जब तोड़ता है मर्यादा तो, विध्वंश का रूप ले लेता है। मन भी हमारा मर्यादा में रहकर ही कर्तव्य निभा सकता है अगर भटकाव हो ज्यादा तो, जीवन व्यर्थ फिर होता है। परिचय :-  रुचिता नीमा जन्म २ जुलाई १९८२ आप एक कुशल ग्रहणी हैं, कविता लेखन व सोशल वर्क में आपकी गहरी रूचि है आपने जूलॉजी में एम.एस.सी., मइक्रोबॉयोलॉजी में बी.एस.सी. व इग्नू से बी.एड. किया है आप इंदौर निवासी हैं। घोषणा पत्र : मैं यह प्...
मुकाम ए दौर
कविता

मुकाम ए दौर

राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मत सोच ऐ शातिर अगर हार गया मैं तेरी खातिर। मुक़ाम-ऐ-दौर अभी बाकी है। आसमां को अपने हौसलों से थर-थराना तो अभी बाकी है। मत देख बहते हुए मेरे अश्कों को अश्क-ऐ-दरियाँ में नाँव बना अभी पार लांघना बाकी है। मत देख मेरे बिखरे लफ्ज़ो को इन्हें आगो़श में लेकर अभी अल्फ़ाज बनाना बाकी है। मत दिखा कि मुझसे भी बड़े बड़े अदीब हैं यहाँ इन सब को आदाब में लेकर अपना मुरीद बनना अभी बाकी है। मत बता कि मेरा अफ़सना भी अधूरा है अभी मुक़ाम-ऐ-पन्नों में नए अल्फ़ाज जोड़ आवाज़ह बटोरना अभी बाकी है। परिचय :- राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। ...
बात नहीं बन रही
कविता

बात नहीं बन रही

अशोक कुमार यादव मुंगेली (छत्तीसगढ़) ******************** देख लिया मेहनत करके, मैं अभी भी खड़ा हूं वहीं। अब क्या करूं तू ही बता? मेरी बात नहीं बन रही।। दावानल सदृश भ्रष्टाचार, निगल गया करके खाक। मृदु मांस के लोथे के लिए, चील, कौए रहे थे ताक।। बिखर गया चिता, भस्म धरा, आत्मा उड़ गयी नील गगन। चला गया एक प्रतिद्वंदी कह, भेड़िए नाच रहे थे हो मगन।। देख रहा था बनकर भूत-प्रेत, लेन-देन का था झोलम-झोल। नौकरी के नाम पर लुटाते जन, मची थी चहूं ओर हल्ला बोल।। यहां फले-फूले प्रभुत्व वनराज, निरीह प्राणी हो गए घर से बेघर। अंधी दौड़ में भाग रहे हैं कर्मवीर, सब डर से कांप रहे हैं थर-थर।। परिचय : अशोक कुमार यादव निवासी : मुंगेली, (छत्तीसगढ़) संप्राप्ति : सहायक शिक्षक सम्मान : मुख्यमंत्री शिक्षा गौरव अलंकरण 'शिक्षादूत' पुरस्कार से सम्मानित। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता ...
नेताओ का त्यौहार
कविता

नेताओ का त्यौहार

शैलेष कुमार कुचया कटनी (मध्य प्रदेश) ******************** नेताओ के दिन आ गए देखो अब चुनाव आ गए... गली मोहल्ला साफ मिलेगा गरीब के घर भी अनाज मिलेगा सारे काम ये निपटा देंगे विवाह बेटियों का करवा देंगे नेताओ के दिन आ गए देखो अब चुनाव आ गए... बिना गारंटी लोन मिलेगा युवाओ को रोजगार मिलेगा देखो अब चुनाव होंगा घोषणाओं का अंबार होगा नेताओ के दिन आ गए देखो अब चुनाव आ गए... वोटर अब ठगा जाएगा दारू साड़ी मुफ्त मिलेंगा जात धर्म पर बाटेंगे फिर वोट मांगने आएंगे नेताओ के दिन आ गए देखो अब चुनाव आ गए... कच्चे पक्के कर्मचारी भी बातो में आ जाएगे बड़ी-बड़ी घोषणाओं से लालच में आ जाएगे नेताओ के दिन आ गए देखो अब चुनाव आ गए... सरकार बनाना जैसे भी हो सरकार गिराना आसान हो गया खरीद फरोख्त आम हो गया लोकतंत्र भी बाजार हो गया नेताओ के दिन आ गए देखो अब चुनाव आ गए...... जनता...
कर गुजरने की चाह रख
कविता

कर गुजरने की चाह रख

प्रभात कुमार "प्रभात" हापुड़ (उत्तर प्रदेश) ******************** कुछ कर गुजरने की चाह रख, राह तो मिलेंगी अवश्य तू ह्रदय में दृढ़ संकल्प रख। तू कुछ कर गुजरने की चाह रख। राह मिलेंगी अनेक अवश्य किस राह पर चलना है यह निश्चय तू स्वयं ही कर क्योंकि जब हृदय में कर्म को सत्कर्म में बदलने की होती है चाह कदमों में आ जाती हैं अनेक स्वर्णिम राह कुछ कर गुजरने की चाह रख। तू हर कदम सशक्त कर और संभल-संभलकर रख जब इच्छा शक्ति होगी दृढ़ मंजिल तुझे मिलेगी अवश्य, ह्रदय में जीवनलक्ष्य साध कर, तू कुछ कर गुजरने की चाह रख। परिचय :-  प्रभात कुमार "प्रभात" निवासी : हापुड़, (उत्तर प्रदेश) भारत शिक्षा : एम.काम., एम.ए. राजनीति शास्त्र बी.एड. सम्प्रति : वाणिज्य प्रवक्ता टैगोर शिक्षा सदन इंटर कालेज हापुड़ विशेष रुचि : कविता, गीत व लघुकथा (सृजन) लेखन, समय-समय पर समाचारपत्र एवं पत्रिकाओं में रचनाओ...
नेह-डोर
कविता

नेह-डोर

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** मत जाना तुम कभी छोड़ कर, रात दिवस मैं जगता हूँ। तुम ही तुम हो इस जीवन में, याद तुम्हें बस करता हूँ।। प्रिये सामने जब तुम रहती, मन पुलकित हो जाता है। लेता है यौवन अँगडाई, माधव फिर प्रिय आता है।। प्रेम सुमन पल-पल खिल जाते, भौरों-सा मैं ठगता हूँ। मत जाना तुम कभी छोड़ कर, रात-दिवस मैं जगता हूँ।। नेह डोर तुमसे बाँधी है, जन्म-जन्म का बंधन है । साथ कभी छूटे ना अब ये, प्रेम ईश का वंदन है ।। मेरे हिय में तुम बसती हो, नाम सदा ही जपता हूँ । मत जाना तुम कभी छोड़ कर, रात-दिवस मैं जगता हूँ।। रूप अनूप बड़ा मनमोहन, तन में आग लगाता है । आलिंगन को तरस रहा मन, हमें बहुत तडपाता है।। चंचल चितवन नैन देख कर, ठंडी आहें भरता हूँ। मत जाना तुम कभी छोड़ कर, रात-दिवस मैं जगता हूँ।। परिचय :- मीना भट्ट "सि...
आना-जाना
कविता

आना-जाना

दिनेश कुमार किनकर पांढुर्ना, छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश) ******************** लगा हुआ है आना जाना! बंदे इस पर क्या पछताना! सृष्टि ने यह नियम बनाया, जो भी जीव यहां हैं आया, वक़्त सीमित सबने पाया, रह कर बंदे इस दुनिया में इक दिन सबको चले जाना!... सारे आने वाले यहां पर, देखे दुनियादारी यहां पर, मेरा मेरा ही करे यहां पर, इतना सा भूल है जाता, कुछ भी साथ नही जाना!... ये दुनिया जानी पहचानी, वो दुनिया तो है अनजानी, दोनों की हैं अजब कहानी, चले गए जो इस दुनिया से, वापस फिर ना कभी आना!... सुख-मंदिर जग में सारे, लगते जो हैं सब को प्यारे पर ये नही है तारणहारे करना होगा सत्कर्म फ़कत यही तो बस साथ हैं जाना!... परिचय -  दिनेश कुमार किनकर निवासी : पांढुर्ना, जिला-छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र :  मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलि...
दिल से प्यार क्या करते
कविता

दिल से प्यार क्या करते

रामेश्वर दास भांन करनाल (हरियाणा) ******************** दिल भला बेकरार क्या करते, हम तेरा इंतजार क्या करते, तुम तो उड़नेे वाला परिंदा हो, हम भला तेरा ऐतबार क्या करते, यादों से परे हो गये जब तुम मेरी, हम फिर तेरा इज़हार क्या करते, हो बेवफा तुम ये मालूम था हमें, हम ये दिल तलबगार क्या करते, दुनियाँ की भीड़ में खो गये हो तुम, हम तुम्हें दिल से प्यार क्या करते, परिचय :-  रामेश्वर दास भांन निवासी : करनाल (हरियाणा) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, ल...
देवालय
कविता

देवालय

अंजनी कुमार चतुर्वेदी निवाड़ी (मध्य प्रदेश) ******************** मन को बना स्वयं देवालय, करें विचारों को पावन। चहुँ दिश खुशहाली छाएगी, जैसे हरियाली सावन। राम दुलारे बजरंगी ने, ह्रदय चीर दिखलाया था। भक्ति भाव से सियाराम को, हृदय बीच बिठलाया था। देवालय पावन स्थल हैं, सब की पुण्य धरोहर हैं। सागर सप्त, पूजनिय पावन, सुंदर सलिल मनोहर हैं। सभी तीर्थ हैं नदियों के तट, भव्य मनोरम देवालय। स्वयं देव जिनमें स्थापित, प्रभु का घर है देवालय। प्राण प्रतिष्ठा कर देवों की, मंदिर में पधराते हैं। सुबह शाम आरती सजाकर, देव वंदना गाते हैं। देवालय में दर्शन पाकर, मन प्रमुदित हो जाता है। जीवन के जंजाल भूलकर, प्रभु से मन मिल जाता है। भागमभाग भरे जीवन में, चारों ओर तमस छाया। देवालय आकर मानव ने, अमन चैन सब कुछ पाया। शांति धाम भी हैं देवालय, प्रभु दर्शन भी होते हैं। पात...
चढ़ती उम्र
कविता

चढ़ती उम्र

रमाकान्त चौधरी लखीमपुर खीरी (उत्तर प्रदेश) ******************** बचपन पीछे छूट रहा हो, तन पर तरुणाई आने लगे। चंदा को मामा कहने में, जिभ्या खुद ही सकुचाने लगे। दर्पण में खुद को देख-देख, जब अंतर्मन हर्षाने लगे। जब अपना मुखड़ा अपने मन को, मन ही मन में भाने लगे। जब लोरी सुनने वाला बचपन, गीत प्यार के गाने लगे। जब प्रीति की बातें सुन कर कोई, अपने बाल बनाने लगे। तब दादा - दादी कहते हैं, कि पढ़ने में ध्यान लगाना है। चढ़ती उम्र यही होती है, इसको बहुत बचाना है। जब आँखों में चंचलता आए, होंठो पर मुस्कान सजे। पढ़ने से ज्यादा सजने पर, जब खुद का सारा ध्यान लगे। खींच - खींच कर सेल्फी कोई, जब देखा करे तन्हाई में। खुद की फोटो देख-देखकर, घूमे घर अंगनाई में। अपने कॉलेज दोस्तों से जब, देर तलक बतियाने लगे। कभी प्यार मनुहार करे, और कभी उन्हें धमकाने लगे। तब समझो उसका प्यारा ...
दिल में ग़म की किताब रखता है
ग़ज़ल

दिल में ग़म की किताब रखता है

गोपाल मोहन मिश्र लहेरियासराय, दरभंगा (बिहार) ******************** लिख के सबका हिसाब रखता है दिल में ग़म की किताब रखता है। कोई उसका बिगाड़ लेगा क्या खुद को खानाखराब रखता है। आग आँखों में और मुट्ठी में वो सदा इन्किलाब रखता है। जिसने है देखें जमाने की सूरत खुद को वो कामयाब रखता है। उसकी नाजुक अदा के क्या कहने मुट्ठी में वो माहताब रखता है। बाट खुशियों की जोहता है तू दिल में क्यों फिर अदाब रखता है। आइने से न कर लड़ाई, कि वो कब किसी का हिजाब रखता है। समय से गुफ़्तगू करोगे क्या वो सभी का जवाब रखता है। समय चितचोर, नचनिया है कैसे-कैसे खिताब रखता है। परिचय :-  गोपाल मोहन मिश्र निवासी : लहेरियासराय, दरभंगा (बिहार) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि र...
जाड़े की लंबी रातें
कविता

जाड़े की लंबी रातें

शिव चौहान शिव रतलाम (मध्यप्रदेश) ******************** जाड़े की लंबी रातें जिस्म पिघलकर रूह में उतरता हाड़ सख्त पहरेदार-सा ठिठुरते पैर घुटनों को मोड़े हाथ कांधों में बगल तलाशें ठिपुरन सिकुड़न को दाबे सांसें मंद आंच में पकती जैसे। परिचय :-  शिव चौहान शिव निवासी : रतलाम (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे न...
भला वो प्यार कैसा?
कविता

भला वो प्यार कैसा?

डॉ. संगीता आवचार परभणी (महाराष्ट्र) ******************** जो जानलेवा होता है वो प्यार कैसा? हवस को भला प्यार का नाम कैसा? इस्तेमाल कर फेंक दे वो मर्द कैसा? टुकड़े-टुकड़े कर दे वो हमदर्द कैसा? पैसों से प्यार करे वो है हैवान जैसा! भरी महफिल से उठाए वो दोस्त कैसा? जानवर से बदतर ये आशिक भी कैसा? अंग-अंग नोचनेवाला जाहिल मर्द ऐसा! नाम 'आफताब' और कर्म अंधेरे जैसा! नाम 'श्रद्धा' और असमंजस ये कैसा? देखा नहीं मीरा ने प्यार किया कैसा? रिश्ता राधा से मोहन का था कैसा! पसन्द चूक गई तो जीवन है नर्क सा, ऐरो-गैरों पे आजाये वो दिल भी कैसा? आँख मूँद के सब सहना भी नहीं ऐसा! ये सब है बस मौत को न्यौता देने जैसा! सच्चा प्यार होता है सींप के मोती जैसा, नसीबवालों को मिलता है तोहफ़े सा! औरत का सम्मान हर धर्म मे एक जैसा, बच्चों को समझाया करो जरा जरासा! प्यार होता है कालिदास ...
दौलत कमाने का नशा
कविता

दौलत कमाने का नशा

संजय जैन मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** नशा जब दौलत का लग जाये तो जिंदगी दौड़ने लगती। सफर फिर जीवन का भी बिखरने सच में लगता। समय अभाव का कहकर निभा नहीं पाते अपना कर्तव्य। जिसके चलते भूलने लगते परिवार के सभी अपने भी।। बड़े धनवान होकर भी नहीं सम्मान पा पाते। कभी भी दान धर्म तो इन्होंने किया ही नहीं। तो फिर क्यों ये रोते है मान सम्मान के लिए। और स्वयं को पता होना चाहिए की हम नहीं है इसके हकदार।। न परिवार में मिलते-जुलते इस तरह के ये लोग। जिन्हें खुद ही नहीं पता की घर में क्या कुछ चल रहा। सुबह से रात तक बस इन्हें सिर्फ चिंता रहती व्यवसाय की। और हिसाब-किताब लगाते रहते है सदा ही फायदा और नुकसान का।। बड़ा बुरा है ये नशा जो न सोने देता है। और न ही अपनों से ये मिलने देता है। सभी से एक ही उम्मीद लगाकर ये बैठे है। कि किसी भी तरह से महीने में लाभ ज्...
बिछुड़न तेरी
कविता

बिछुड़न तेरी

सीमा रंगा "इन्द्रा" जींद (हरियाणा) ******************** बिछुड़न तेरी तड़प मेरी धड़कन तेरी आह! मेरी सौदाई तेरी मोहब्बत मेरी यादें तेरी इंतजार मेरा बेवफाई तेरी वफ़ा मेरी भूलना तेरा यादें मेरी लड़ाई तेरी प्रेम मेरा धोखा तेरा विश्वास मेरा फटकार तेरी मिलान मेरा महबूबा तेरी* हमदर्द मेरा जान तेरी दिल मेरा सांसे तेरी तू मेरा.... परिचय :-  सीमा रंगा "इन्द्रा" निवासी :  जींद (हरियाणा) विशेष : लेखिका कवयित्री व समाजसेविका, कोरोना काल में कविताओं के माध्यम से लोगों टीकाकरण के लिए, बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ हेतु प्रचार, रक्तदान शिविर में भाग लिया। उपलब्धियां : गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड से प्रशंसा पत्र, दैनिक भास्कर से रक्तदान प्रशंसा पत्र, सावित्रीबाई फुले अवार्ड, द प्रेसिडेंट गोल्स चेजमेकर अवार्ड, देश की अलग-अलग संस्थाओं द्वारा कई बार सम्मानित बीएसएफ द्वारा सम्मान...
ए चांद! जरा जल्दी आना
कविता

ए चांद! जरा जल्दी आना

दीप्ता नीमा इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** ए चांद! जरा जल्दी आना साजन का दीदार जल्दी कराना हाथों में देख मेहंदी लगाई है तेरे नाम की मेहंदी रचाई है माथे पर बिंदिया लगाई है मैंने पूजा की थाल सजाई है ए चांद! जरा जल्दी आना साजन का दीदार जल्दी कराना हाथों में चूड़ी और कंगना है कानों में झुमका पहना है सजना ही मेरा गहना है सजना के लिए ही सजना है ए चांद! जरा जल्दी आना साजन का दीदार जल्दी कराना करवा चौथ में चांद का इंतजार रहता है चांद के साथ में सजना का दीदार होता है उसके हाथ से पानी पीकर व्रत मेरा टूटता है हमारा प्यारा रिश्ता और परवान चढ़ता है ए चांद! जरा जल्दी आना साजन का दीदार जल्दी कराना।। परिचय :- दीप्ता मनोज नीमा निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप...
नैन बिंबित हैं
गीत, छंद

नैन बिंबित हैं

आचार्य डाॅ. वीरेन्द्र प्रताप सिंह 'भ्रमर' चित्रकूट धाम कर्वी, (उत्तर प्रदेश) ******************** छंद : मधुरागिनी छंद (वर्णिक) गीत विधान : वर्णवृत :- तगण, भगण, रगण, तगण, भगण, गा। शिल्प : १६ वर्ण, १०/६ वर्ण पर यति, समपाद वर्णिक छंद, दो-दो चरण समतुकांत। संकल्प से मन की मयूरी, नाचती वन में। सामर्थ से सपने सजाती, स्वयं के तन में।। आराधिके बन दामिनी की, नृत्य है करती। निर्विघ्न चंचल चंचला-सी, चूमती धरती।। आकाश से चुनती अपेक्षा, साधना घन में। सामर्थ से सपने सजाती, स्वयं के तन में।‌। अम्भोज-सा बिखरा पड़ा है, दिव्यता छहरे। दे ताल अंबर को पुकारे, धारणा लहरे।। झूमें लता तरु पुष्प डाली, प्रेम अर्चन में। सामर्थ्य से सपने सजाती, स्वयं के तन में।। प्रत्यूष की अभिलाष में द्वै, नैन बिंबित हैं। कौमार्य की वन वीथिका में, बिंब चिह्नित हैं।। वातास गंधिल शोभती है, प्...
मैं खुद पर अमल नहीं करता हूं
कविता

मैं खुद पर अमल नहीं करता हूं

किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया (महाराष्ट्र) ******************** मैं लोगों को बहुत ज्ञान बांटता हूं उदाहरण सहित नसीहतें देता हूं सचेत रहने की सलाहें देता हूं पर मैं खुद पर अमल नहीं करता हूं खास व्हाट्सएप ग्रुप में अच्छी पोस्ट डालने की सलाह देता हूं डर्टी बातें मीडिया में नहीं देखने की बातें जोर देकर बोलता हूं पर मैं खुद उस पर अमल नहीं करता हूं आध्यात्मिक वाणी वाचन बहुत करता हूं संगत को अमल करने की सलाह देता हूं बुरी चीजों से दूर रहने को बोलता हूं पर मैं खुद उस पर अमल नहीं करता हूं भाषणों में मैं विकास की बातें बहुत करता हूं याद से मेरे चिन्ह पर ठप्पा लगाने को कहता हूं जनता जनार्दन हित की बातें बहुत करता हूं पर मैं खुद उस पर अमल नहीं करता हूं समाज को प्रगति पथ पर चलने को कहता हूं उत्साह से उच्च पद कायम करने कहता हूं गरीबों की सेवा करने सबको उत्साहित करता ह...
मर गया
कविता

मर गया

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** पैदा हुआ, उठा बैठा, खेला कूदा, पढ़ा लिखा, पढ़ाया कभी नहीं, परिवार बनाया, खाया पीया, खिलाया कभी नहीं, सोकर जगा, जगाया कभी नहीं, न बोला, न चीखा न चिल्लाया, न हक़ बचाने सामने आया, ताउम्र मृत रहा, बस बेनाम मौत मर गया। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डा...
पितृ अभिव्यक्ति
दोहा

पितृ अभिव्यक्ति

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** पिता कह रहा है सुनो, पीर, दर्द की बात। जीवन उसका फर्ज़ है, बस केवल जज़्बात।। संतति के प्रति कर्म कर, रचता नव परिवेश। धन-अर्जन का लक्ष्य ले, सहता अनगिन क्लेश।। चाहत यह ऊँची उठे, उसकी हर संतान। पिता त्याग का नाम है,भावुकता का मान।। निर्धन पितु भी चाहता, सुख पाए औलाद। वह ही घर की पौध को, हवा, नीर अरु खाद।। भूखा रह, दुख को सहे, तो भी नहिं है पीर। कष्ट, व्यथा की सह रहा, पिता नित्य शमशीर।। है निर्धन कैसे करे, निज बेटी का ब्याह। ताने सहता अनगिनत, पर निकले नहिं आह।। धनलोलुप रिश्ता मिले, तो बढ़ जाता दर्द। निज बेटी की ज़िन्दगी, हो जाती जब सर्द।। पिता कहे किससे व्यथा, यहाँ सुनेगा कौन। नहिं भावों का मान है, यहाँ सभी हैं मौन।। पिता ईश का रूप है, है ग़म का प्रतिरूप। दायित्वों की पूर्णता, संघर्षों की ...