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पद्य

बसंत के दिन
कविता

बसंत के दिन

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** तुम्हें देती हूँ बसंत के दो दिन क्या अपने हाथों की लकीरों से थोड़ी सी दूब मुझे दोगे, जिसको रख शिव के चरणों में मांग लूंगी तुम्हारे सुने पलों की रौनक !! प्रकृति का जो स्नेह बरसा है तुम पर वो स्नेह वो करुणा मुझे प्यारी है, ये धरा ये गगन ये जीव इन सभी में तुम्हें पाती हूँ, क्या इन बिखरे इंद्रधनुषी रंगों में मुझे समेट पाओगे ! क्या ले चलोगे एकबार नदी के तट पर मुझे मांग लूँगी उसकी कोमलता- निर्मलता, तुम्हारे उम्र भर के लिए , अच्छा लगता है रोज मुझे चांद को निहारना क्या थोड़ी देर मेरे पास बैठ पाओगे!! जीवन जीने का नाम है मगर जो कभी धड़कने टूटी मेरी, क्या ढलते सूरज के बसंती रंगों से मुझे सजा पाओगे !! ज्यादा कुछ नहीं मांगती इस पल-पल बदलते दौर मे, क्या आपने अंतर्मन में मुझे थोड़ी सी...
आज की विभिषिका
दोहा

आज की विभिषिका

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** चलें मिसाइल ध्वंस है, बम की है भरमार। जानें कैसा हो गया, अब तो यह संसार।। आग लगी धनहानि है, बरबादी का दौर। घातक सबके मन हुए, नहीं शांति पर गौर।। अहंकार में विश्व है, भाईचारा लुप्त। दिन पर दिन होने लगा, नेहभाव सब सुप्त।। अमरीका इजरायला, और आज ईरान। नहीं नियंत्रित आज ये, धारें मिथ्या मान।। मध्य-पूर्व में आग है, जीना हुआ मुहाल। जानें क्योंकर विश्व में, होता रोज़ बवाल।। घातक सबके मन हुए, ख़ूनी हैं अंदाज़। कपटी सब ही लग रहे, आवेशित आवाज़।। रोक नहीं सकता इन्हें, सारे धारें क्रोध। नहीं आज इनको रहा, मानवता का बोध।। हिंसा से मिलता नहीं, कुछ भी जग में सोच। धन-जन की बर्बादियां, करुणा के पग मोच।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) ...
संभल सको तो संभल
कविता

संभल सको तो संभल

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** देश से टूट कर प्यार करने वालों के लिए देश को समझना आसान है, जो देश को ना समझ पाने की बात करे वो या तो चालाक या नादान है, अधिकार बहुतों को पता है मगर कर्तव्य उनको पता नहीं, दूर प्रकृति की गोद में रचे बसे भोले भाले लोगों की खता नहीं, चालाक और धूर्त स्वार्थ में पूरी तरह अंधे होते हैं, गोली वो चलाता जरूर है पर किसी और के कंधे होते हैं, इनका फंडा एकदम न्यारा है, वतन से पहले जेब भरना ही इन्हें प्यारा है, ये उपद्रव या उन्माद फैला सकते हैं, शांत पानी में सैलाब ला सकते हैं, अपने इशारे पर ये दंगे भी फैलाते हैं, सर पर चोट दे पैरों पर मरहम लगाते हैं, धन की लालच में अपने आप वो चलते हैं, देश के दुश्मनों के धृष्ट इशारों पर मचलते हैं, अरे इस मिट्टी के कण कण से प्यार कर तो देख, मिला हुआ मौका यूं न फ...
लाला लाजपत राय : चरित्र की शिल्पशाला
कविता

लाला लाजपत राय : चरित्र की शिल्पशाला

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** पंजाब की माटी ने जिस दीप को थामा, त्याग की लौ में तपकर वह सूरज बन जाना। वाणी में वेदना, दृष्टि में निर्भीक राय, चरित्र की शिल्पशाला थे लाला लाजपत राय। जहाँ राष्ट्र प्रथम, वहाँ स्वार्थ का अंत हुआ, न्याय की कसौटी पर हर भय स्वयं झुक हुआ। कर्म ही उपासना, संघर्ष ही उनका मार्ग, आत्मबल से गढ़ा उन्होंने जीवन का सुदृढ़ शिल्पकार्ग। साइमन की लाठियाँ जब देह पर बरसीं घोर, अभिमान नहीं टूटा, बढ़ा स्वाधीनता का शोर। रक्त की स्याही से लिखी आज़ादी की गाथा, मौन शहादत बनकर भी बोल उठी उनकी व्यथा शिक्षा, समाज, स्वराज-तीनों का समन्वय भाव, विचारों की कार्यशाला, कर्मों का उज्ज्वल प्रभाव। युवक को साहस सिखाया, जन-जन को दिया विश्वास, चरित्र की गढ़ाई में था उनका प्रत्येक प्रयास। आज भी समय की भट्टी में जब मूल्य पिघलते जाएँ, लाला जी क...
स्वच्छ भारत स्वस्थ भारत
कविता

स्वच्छ भारत स्वस्थ भारत

निकिता तिवारी हलद्वानी (उत्तराखंड) ******************** एक ऐसा कदम बड़ाते है स्वच्छता को अपनाते हैं धरती के हर कोने पर हरियाली हम पाते हैं। स्वयं पहले खु से शुरुआत करना कर्त्तव्य समझते हैं आस-पास की मलिनता को स्वच्छ करके दिखलाते हैं, कूड़ा करकट ना जलाकर प्रदूषण संरक्षित करते हैं प्लास्टिक को हटाने की आज से हम ठानते हैं। रोज सवेरे स्नान करके खाने से पूर्व हाथ धोना शुद्ध कपड़े पहनने को स्वच्छता में सम्मलित करते हैं। स्वच्छता को संग लिए स्वस्थ की उम्मीद रखते हैं पौष्टिक आहार ग्रहण कर बीमारी को मात देते हैं। विकसित भारत के सपनों को साकारने में जुटते हैं स्वच्छ और स्वस्थ भारत की शुभकामनाएँ आज देते हैं परिचय :-  निकिता तिवारी निवासी : जयपुर बीसा, मोटाहल्दू, हलद्वानी (उत्तराखंड) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित म...
जोगिरा छंद (कबीर छंद)
छंद

जोगिरा छंद (कबीर छंद)

शिमला शर्मा "लक्ष्मी प्रिया" ग्वालियर (मध्यप्रदेश) ******************** जोगिरा छंद (कबीर छंद) पवन फागुनी बहे सुहानी, मन में भरे उमंग। झूम रही खिल के तरुणाई, घुली हवा में भंग।। जोगीरा सररर रा जोगीरा सररर रा....... आया फागुन लेकर खुशियाँ, मन में भरा उमंग। ब्रज की होली देख सभी का, मनवा होता चंग।। जोगिरा सररर रा जोगीरा सररर रा....... गोप-गोपियाँ राधा रानी, कृष्ण कन्हैया संग। भर पिचकारी रंग लगायें, बरसा प्रेमिल रंग।। जोगीरा सररर रा जोगीरा सररर रा....... बरसाने की मस्त गुजरियाॅं, ढूॅंढ रहीं गोपाल। आज नहीं छोड़ें कान्हा को, रंग दें दोनों गाल। जोगीरा सररर रा जोगीरा सररर रा....... वृंदावन बरसाने देखो, मची हुई हैं धूम। अद्भुत प्रेम समर्पण गाथा, हिय को लेती चूम। जोगीरा सररर रा जोगीरा सररर रा....... निर्मल मन से हम भी खेलें, होली सबके संग। मानवता की भर पिचकारी, डा...
चंद उदासियां
कविता

चंद उदासियां

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** बैठ जाता है इंसान शाम को, छत पर चंद उदासियों के साथ। समय और भाग्य कोसने को, हालात की सिसकियों के साथ। विचारों के घोर द्वन्द में उलझा, ओढ़े हुएं आशंका की कालिमा। अंधेरे की टीस में देखता नहीं, वह डूबते सूरज की लालिमा। कल की फिक्र में आज विकल, जबकी "कल किसने देखा" है। दिशा और दशा पलटती पल में, बहती हवा कान में समझाती है। जब हमारी चाहत के मुताबिक, यह ज़िंदगी थोड़ा मचलती नहीं। हो जाता है मन बड़ा दुखी जब, बेलगाम ख्वाहिशें मुस्कराती नहीं। रास्ता जारी हर दिन प्रयास कर, कुंदन निखरता है दहकने पर। लौटती है शाखाओं पर खुशबू, पतझड़ की जद से निकलने पर। परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्यापक राजस्थान सरकार) निवासी : बाड़ा पदम पुरा, जयपुर, राजस्थान घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार ...
एकाकीपन
कविता

एकाकीपन

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** अनमना सा बच्चा झांक रहा है खिड़की के पार करे भी तो क्या घर में होकर भी वह अकेला है बच्चा ... माँ को वक्त कहाँ है जी रही है आधुनिक परिवेश में व्यस्त है कभी कीट्टी में कभी किसी गोष्ठी में कभी किसी क्लब फंक्शन में तो कभी फैशन शो में वक्त बचता ही कहाँ है खबर लेने, संभालने बच्चा क्या चाहता है वह घर में निपट अकेला है वो मासूम बच्चा ... पिता उलझा है व्यवसायिक उलझनों में व्यवसाय हो या नौकरी समस्या बनी रहती है "कंपीटीटिव मार्केट" जिन्दगी भरी है भांति-भांति की व्यस्तताओं से येन-केन-प्रकारेण थका हारा घर पहुँचता है भान नहीं रहता अर्धरात्रि में सोई है आत्मा लेटता है काँटो भरी सुमन शैया पर वक्त बचता कहाँ जानने का वो चाहता है क्या घर में पड़ा निपट अकेला बच्चा ... टूट रहे संयुक्त परिव...
तेरी दोस्ती
कविता

तेरी दोस्ती

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** तेरी दोस्ती ने हमको जीवन जीना सिखा दिया उदास रहता था मेरा चेहरा उसको मुस्कुराना सिखा दिया। न मिली मोहब्बत जीवन में इसका अब कोई गम नहीं रहा तेरी दोस्ती ने मुझको हर लम्हा जीना सिखा दिया। रब करे तू हमेशा खुश रहे मेरी हर दुआ में शामिल रहे तेरी दोस्ती ने मुझको जीवन का बदलाव सिखा दिया। मेरी रिद्धियां मेरी सिद्धियां तुमको सदा सलामत रखें तेरी दोस्ती ने मुझको मानव से महामानव बना दिया। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को ल...
होली का गुलाल
कविता

होली का गुलाल

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** होली का एक रत्ती भर गुलाल का रंग जो घरों में रहने वाले वृद्ध के माथे पर नहीं सजा वो गुलाल, रंगहीन हो जाता है! वृद्ध होते-जन के लटकते चेहरे देखकर लगता है मानो वो जप कर रहे, रंगोत्सव में लीन नहीं होते, क्योंकि उनके परिजन उनसे कोसों दूर चले गए होते हैं ! आंगन में बँधी गाय और बकरियों की खुली खूंटी ये बताती है कि, इस आंगन की बेटियाँ खूंटी से बहुत दूर चली गई हैं, यदा कदा ही दिखती हैं ! किसी जानवर के रंगों में डूबे चेहरे और उसकी दर्दनाक बेचैनी, सारी खुशियों को मलिन कर जाते हैं , ये सोच कर की क्या इनके लिए खुशी नहीं बनी ?? दूर किसी मंदिर में कीर्तन बजता है लगता है कोई सोहर गीत गा रहा हो, साँझ ढले किसी पँछी की आवाज लगता है मानो कोई अपना दर्द बयान कर रहा है ! घर के आंगन में कहीं...
ऐ जिंदगी
कविता

ऐ जिंदगी

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** ऐ जिंदगी तूने हरदम भरपूर साथ निभाया है, जरा फुर्सत से बैठ और कर आकलन मैंने क्या खोया क्या पाया है, अमीरी गरीबी और घर देख किसी को भेजना आपके बस में नहीं, कोई घिसट रहा अव्यवस्था, गालियों के बीच तो कोई खेल रहा आनंद और सुयश में कहीं, आपका काम तो भरपूर वक्त देना है, अब इंसान छांटे क्या छोड़ना क्या लेना है, कष्टों से भरे जहां में कोई बचपन की खेल व मौज मस्ती चुना, तो कोई समय गंवाकर अपना सिर धुना, अभावों में भी रहकर कोई पढ़ा आगे बढ़ गया, ऊंचाइयां छुए और इतिहास गढ़ गया, तो कुछ दुर्गुणों को अपनाते रह गए, ताउम्र पछताते रह गए, अपनी व्यथा मसाले लगा सुनाते रह गए, तो कुछ जानबूझ जान गंवाते रह गए, कर आज मेरा भी आकलन आपने बचपन से सब कुछ देखा है, बता ऐसा क्या है जिसे मैं अपना तो सकता था पर हाथ...
मानवता
कविता

मानवता

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** मानवता मानव का भूषण, नव समाज निर्माण है। खुशियों की होती है वर्षा, सतयुग-ओर प्रयाण है।। सेवा में सद्भाव समाहित, कर्मों का सम्मान है। सेवा से जीवन की शोभा, मिलता नित यशगान है।। दीन-दुखी के अश्रु पौंछकर, जो देता है सम्बल। Pपेट है भूखा,तो दे रोटी, दे सर्दी में कम्बल।। अंतर्मन में है करुणा तो, मानव गुण की खान है। सेवा से जीवन की शोभा, मिलता नित यशगान है।। धन-दौलत मत करो इकट्ठा, कुछ ना पाओगे। जब आएगा तुम्हें बुलावा, तुम पछताओगे।। हमको निज कर्त्तव्य निभाकर, पा लेनी पहचान है। सेवा से जीवन की शोभा, मिलता नित यशगान है।। शानोशौकत नहीं काम की, चमक-दमक में क्या रक्खा। वहीं जानता सेवा का फल, जिसने है इसको चक्खा। देव नहीं, मानव कहलाऊँ, यही आज अरमान है। सेवा से जीवन की शोभा, मिलता नित यशगान है।। परिचय :- प्रो. डॉ....
प्रेम-कुमुदिनी
गीत

प्रेम-कुमुदिनी

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** आग लगी तन मन में प्रियतम, व्याकुल उर मधुमास में। करें भ्रमर किलकारी उपवन, पागल हैं उल्लास में।। कली-कली मदमाती साजन, गंधिल भी हर डाल है। सम्मोहित करता वसंत है, आह्लादित सुर ताल है।। बहे प्रेम की मधुशाला तन, पिया मिलन की आस में। करें भ्रमर किलकारी उपवन, पागल हैं उल्लास में।। कंपित होते अधर हमारे, विरहाकुल हर रात है। नैन -प्रतीक्षा करते साजन, स्वप्न जगे क्या बात है।। बौराती है प्रेम- कुमुदिनी, सखियों के परिहास में। करें भ्रमर किलकारी उपवन, पागल हैं उल्लास में।। कुंतल की वेणी मुरझाई, चन्द्र वदन भी पीत है। खोया रंग कपोलों ने भी, रूठा दर्पण मीत है।। खड़ी द्वार बस अगवानी को, आने के विश्वास में। करें भ्रमर किलकारी उपवन, पागल हैं उल्लास में।। नैनों से निर्झर झरते हैं, चुप पायल झंकार भ...
नारी शक्ति की पहचान
कविता

नारी शक्ति की पहचान

प्रतिभा दुबे "आशी" ग्वालियर (मध्य प्रदेश) ******************** नारी साहस ही तो जग में नारी सम्मान नहीं अबला नारी, नारी शक्ति की पहचान।। ममता की धारा है नारी, दृढ़ता की मिसाल उसकी हिम्मत के आगे हर मुश्किल बेहाल।। कभी माँ बन कर जग को जीवन देने वाली सृजनकर्ता हैं नारी, इस जग का आधार ।। कभी बेटी बनकर हर आँगन को महकाती। बहन रूप में स्नेह के दीप सदा ही जलाती।। देकर आशीष सदा ममता लुटाने बाली स्त्री, पत्नी बनकर जीवन पथ को सरल बनाती॥ अन्याय की आँधी से, संसार में छाए बदहाली नारी ही दुर्गा बन जाए, रण में कहलाए काली।। कलम उठाए तो, नारी नया ही इतिहास रचाए अपने साहस से हर बंधन से नारी ने मुक्ति पाली।। जिस घर में नारी का, सम्मान पुष्प खिला रहेगा वहाँ सुख का हर दीप सदा ही, प्रज्वल होता रहेगा।। इस समाज में, नारी सशक्त हो, हो प्रतिभाशाली, तभी भविष्य भी उ...
सांसो की ङोर
कविता

सांसो की ङोर

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** दीये की टिमटिमाती लौ पवन से पुछती है क्या तुम मुझे बुझाने आई हो। पवन बोली अरे नहीं तुम, तुम तो अंघकार को चिरने की शक्ति रखती हो और जब अग्नीदेव तुम्हारे साथ है तुम्हे कौन बुझा सकता है। तुम भटके पथिक को पथ दिखाते हो तुम धन्य हो कि तूम्हारी उपस्थिती ईश्वर के समक्ष अनिवार्य है। मै, मै तुम्है कभी नही बुझा सकती मै दसो दिशाओं मे भ्रमण करती हूँ दिग दिगन्त मे विचरण करती हूँ जन जीवन के लिए सासों के स्पन्दन के लिए परन्तु, परन्तु क्या पवन लौ पुछती है दीये की, पवन बोली, मै कितना साथ दूँ मानव का देख रहे हो न जिन वक्षो के सहारे बहती हूँ स्वार्थी मानव वृक्ष ही काट रहे है मै कैसे बहुगी वृक्ष न होगे तो तुम्ही बताओ नन्हे दीये कैसे समझा उन स्वार्थी मानव को की तुम्हारा जीवन जल, पवन, माटी से बना है। हे दिप क्या तुम मेरा सन्...
मैं भारत की नारी हूं
कविता

मैं भारत की नारी हूं

डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' मंडला (मध्य प्रदेश) ******************** फूलों से कोमल मैं दिखती, शोला और चिनगारी हूं। मैं भारत की नारी हूं।। घर आंगन को हूं महकाती, पावन उपवन क्यारी हूं। मैं भारत की नारी हूं।। सृष्टि की मैं सुंदर सुंदरतम कृति, लगती बड़ी ही प्यारी हूं। मैं भारत की नारी हूं।। सीता सति और सावित्री, इंदिरा और गांधारी हूं। मैं भारत की नारी हूं।। अबला नहीं मैं सबला हूं, हर नारी से भारी हूं। मैं भारत की नारी हूं।। सृष्टि की मैं ही हूं रचयिता, जगत जननी प्यारी हूं। मैं भारत की नारी हूं।। करुणा और त्याग की मूरत, संघर्षों से कभी न हारी हूं। मैं भारत की नारी हूं।। परिचय :- डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' निवासी : मंडला (मध्य प्रदेश) सम्प्रति : प्रदेशाध्यक्ष- अखिल भारतीय हिंदी सेवा समिति म प्र., जिला संयोजक- मध्यप्रदेश राष्ट्र भाषा प्रचार समिति मंड...
नारी तुम
कविता

नारी तुम

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** नारी तुम वंदनीय हो, जीवन धन यंत्र हो, सृष्टि के कपाल पर लिखा हुआ मंत्र हो, ममता की खान हो, रिश्तों की आन हो1135 प्रकृति के माथे की बिंदिया की शान हो!! दुर्गा हो, काली हो, लक्ष्मी और माँ हो देवी के रूप मे विश्व मे पूजनीय हो!! जीवन है कष्टकार, राहें पथरीली हैं इतना सशक्त हो, अबला क्यों कहलाती हो?? पुरुष प्रधान देश मे आज भी परतंत्र हो खुद के अस्तित्व को चिता पर क्यों सजाती हो?? सजग बनो, सचेत हो, सबल और समर्थ हो निर्बल नहीं हो तुम, स्वयं में बलधारी हो!! ना झुका सके तुम्हें कभी वो प्रचंड आसमान हो, संघर्ष के चट्टानों का पूर्व होता आकाश हो!! शिव का गुमान हो, कण-कण में विराजमान हो, नारी ही नहीं जहान हो प्रकृति के माथे की बिंदिया की शान हो!! परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श...
हिंदी आत्मा में बस्ती
कविता

हिंदी आत्मा में बस्ती

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** हिंदी आत्मा में बस्ती है, संस्कारों की उजली हस्ती है। माँ की लोरी, पिता का विश्वास, मिट्टी की सोंधी खुशबू-सी पास- हर धड़कन में इसकी मस्ती है। यह भाषा केवल शब्द नहीं, यह भावों की निर्मल सरिता है। आँसू बनकर भी चुपके बहती, मुस्कान बन ओठों पर ठहरती- हिंदी जीवन की स्वर गीत है। तुलसी की चौपाइयों में धर्म, मीरा के पदों में प्रेम पुकारे। रसखान की भक्ति में डूबी हुई, कबीर की वाणी में सत्य जली- हिंदी युग-युग तक पथ रहे भली। यह खेतों की हरियाली बोले, यह श्रमिक के पसीने की गंध। यह पर्वों की थाली सजाए, यह त्याग, तपस्या का संदेश- जन-जन की आशा की है कंध। जब तक आत्मा में प्राण बसे, हिंदी का दीप जलता रहेगा। समय बदले, दुनिया बदले, पर संस्कृति का यह अमिट स्वर- हृदय-हृदय में पलता रहेगा। परिचय :- सुषमा शुक्ला ...
हिंदी करती प्रेरक मुझे
कविता

हिंदी करती प्रेरक मुझे

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** हिंदी करती प्रेरक मुझे। हिंदी मे लेखन करता हूँ। हिंदी है मेरी मातृभाषा। हिंदी मे गीत सुनाता हूँ। हिंदी….. हिंदी भाषा का उपासक हूँ। हिंदी भाषा पर आसक्त हूँ। हिंदी ही हिन्द की शान है। हिंदी पर मुझे अभिमान है। हिंदी…. बहु भाषी देश होने पर भी। हिंदी का जो मान बढ़ाते है। हिंदी लेखों से प्रेरित होकर। हिंदी को सुमन चढ़ाता हूँ। हिंदी…. हिंदी सेवा में समर्पित होते जीवन जो अपना लगाते है कर्म योगी डॉ. पवन जी को मैं अपना शीश नमाता हूँ हिंदी.... हिंदी का विश्व सम्मान करें हिंदी भाषा के प्रति आन बढ़े हिंदी रक्षक मंच से जुड़कर के मैं जय हिंद जय हिंद गाता हूँ हिंदी…. परिचय :- कमल किशोर नीमा पिता : मोतीलाल जी नीमा जन्म दिनांक : १४ नवम्बर १९४६ शिक्षा : एम.कॉम, एल.एल.बी. निवासी : उज्जैन (मध्य प्रदेश) रुचि : आप...
किरदार और वास्तविकता
कविता

किरदार और वास्तविकता

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** मैं देख रहा हूं कि बच्चे खेल रहे हैं होकर मस्ती में चूर, गम और चिंताओं से दूर, खेल जीवन का एक प्रयोग, शरीर के हलचल के लिए उपयोग, खाली समय वो बैठकर कैसे रहे, छल, प्रपंच, कपट से मतलब नहीं बड़ों की तरह ऐंठकर कैसे रहे, पढ़ाई के बीच थोड़ा समय मिलते ही वो ले आते हैं नए गेम रच लेते हैं अपना एक नया किरदार, ढल जाते हैं अपने पात्र में, और निभा लेते हैं भविष्य में निभाए जाने वाले अवतार, बिल्कुल नए और अलग रंग से फिर से निकल आते हैं वही किसी कक्षा का छात्र बनकर, लग जाते हैं पढ़ाई में पुनः डटकर, पालकों का मस्तिष्क पर डाला गया बोझ उठाए हुए, शिक्षा के बजाय कैरियर में नजर गड़ाए हुए। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुर...
हिन्दी मेरी पहचान
कविता

हिन्दी मेरी पहचान

पुष्पा खंगारोत जयपुर (राजस्थान) ******************** हर भाषा को मान मिला पर इसे अलग समान मिला, जो माँ समान पूजी जाती है उस भाषा को हिन्दी नाम मिला।। बिना स्वरो के ये गाई नही जाती बिना वर्णो के ये लिखी नही जाती, ये हिन्दी है हिन्दी मेरे माँझी बिना प्यार के ये कभी बोली नही जाती।। कोई मराठी मे मीठे बोल बोलता है कोई गुजराती मे रस घोलता है, और जिसे हिन्दी का ज्ञान है वो सब संग स्वर मे ताल ठोकता है।। माना हमें इतना ज्ञान नही कलम तो पकड़ ली पर, शब्दों पर कसी लगाम नहीं पर फिर भी ये हृदय यही बोल, बोल रहा है।। कितना भी घूम लो पूरे संसार मे आराम तो अपने घर मे ही आता है, किसी भी भाषा को बोल लो मिश्री के घुलने सा मिठा अहसास तो हिन्दी मे ही आता है।। परिचय : पुष्पा खंगारोत निवासी : जयपुर (राजस्थान) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षि...
वफ़ा
कविता

वफ़ा

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** फैला दो हवाओं में पैगाम मेरा कि हम तेरे शहर में वफ़ा बाटने आये है। लेकर ग़म तेरे नसीब में अपने, तेरा नाम अपनी तकदीर लिखने आये है। वो जो कहते हैं लोगों से कुछ भी न मिलता यूँ सोचने से उनको कह दो हम उनको अपने नसीब में लिखने आए हैं। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail....
नहीं मारो श्याम रंग पिचकारी
गीत

नहीं मारो श्याम रंग पिचकारी

शिमला शर्मा "लक्ष्मी प्रिया" ग्वालियर (मध्यप्रदेश) ******************** नहीं मारो श्याम रंग पिचकारी, मोरी कोरी चुनरिया रंग डारी। श्याम हमसे करों ना बरजोरी, बरसाने की हम राधा गोरी। ग्वाल बाल सॅंग मारग में ठाढ़ो, भर पिचकारी तन-मन पें मारो, हाथ पकड़ मोरी वैंया मरोड़ी चुनरी कन्हैया ने फा डारी। नहीं मारो श्याम रंग पिचकारी, मोरी कोरी चुनरिया रंग डारी। आओ सखी मिल श्याम को घेरें, आज पकड़ लै फिर न छोड़ें, मल- मल रंग अबीर लगावें, आज निकालें जाकी रंग दारी। नहीं मारो श्याम रंग पिचकारी, मोरी कोरी चुनरिया रंग डारी। आज न में तोकूं छोड़ुंगी, प्रेम रंग से खूब रंगुंगी। छलिया तेरे संग चलुंगी, तेरी अदाओं पे बलिहारी, नहीं मारो श्याम रंग पिचकारी, मोरी कोरी चुनरिया रंग डारी। परिचय :- श्रीमती शिमला शर्मा "लक्ष्मी प्रिया" निवासी : ग्वालियर (मध्यप्रदेश) रुचि : गद्य...
दर्शन को अँखियाँ प्यासी
गीत

दर्शन को अँखियाँ प्यासी

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** दर्शन को अँखियाँ प्यासी हैं, उर बसे मनमीत। चातक मन मेरा है व्याकुल, श्याम कैसी प्रीति।। मुझको नहीं दिन-रात चैना, है किशन संताप। चहुँओर दिखता है अँधेरा, हाथ थामो आप।। नित आचरण हो शुद्ध मेरा, दो प्रभु वरदान। कर क्षम्य सब अपराध मेरे, रख प्रभो कुछ ध्यान।। मीरा बनी भटकी किशन मैं, गा रही प्रभु गीत। चातक मन मेरा है व्याकुल, श्याम कैसी प्रीति।। पलकें बिछायें राह देखूँ, अब समझ लो पीर। सागर बिना प्यासी नदी मैं, अब नहीं है धीर।। चितचोर हो समझो प्रभो अब, श्याम हो आधार। मनमोहना दो मोक्ष मुझको, थाम लो पतवार।। जीवन सँवारों नाथ मेरा, भक्त की हो जीत। चातक मन मेरा है व्याकुल, श्याम कैसी प्रीति।। छोड़ मोह-माया सब आयी, बस तुम्हीं से आस। हूँ मूढ़मति पर दास तेरी, हो तुम्हीं विश्वास।। मिथ्या जगत कान्हा शरण लो, हो ...
आया फागुन झूम के
छंद

आया फागुन झूम के

धर्मेन्द्र कुमार श्रवण साहू बालोद (छत्तीसगढ़) ******************** (उल्लाला छंद) रंगों की बौछार है, खुशियों का त्यौहार है। पिचकारी भर रंग की, होली है आनंद की। नीला पीला लाल है, हरा गुलाबी गाल है। आया फागुन झूम के, रंग उड़ाता धूम के।। मस्ती में सब एक है, पहल बहुत ही नेक है। फागुन का जो राज है, लेकर आया आज है।। बजे नगाड़ा फाग का, अपनों के अनुराग का। आया फागुन झूम के, नाचो सारे घूम के।। इंद्रधनुष का रंग हो, रिश्ते सारे संग हो। ढोल नगाड़ा शोर है, नाचे मन का मोर है।। मिलकर सखी सहेलियांँ, करती है अठखेलियाँ। आया फागुन झूम के, सात रंग को चूम के।। भींगा तन मन साज है, खुशियों पर जो नाज़ है। रंग भरे संदेश है, रंगें सबके वेश है ।। बाजा भी है बाजता, जन-जन मन भर नाचता। आया फागुन झूम के, गाता मनवा घूम के।। आता जब मधुमास है, मन में तब उल्लास है। कोयल सुमधुर बोलती, मीठा र...