राज बताते नहीं
सीमा रंगा "इन्द्रा"
जींद (हरियाणा)
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प्रेम पत्र सभी को दिखाते नहीं
हाथों से लिखी भावनाएं मिटाते नहीं।
भेजा था चित्र सभी को दिखाते नहीं
खोलते चूमा जिसे बटुए से हटाते नहीं।
मन की बेचैनी को यूं जताते नहीं
ओ राज था राज को बताते नहीं।
महीने गुजारे इंतजार में सबको दिखाते नहीं
रात भर बातें की थी तन्हाई को दिखाते नहीं।
पेड़, झरने, पानी, बर्फ छोड़ कागज निहारते नहीं
वादियों के बीच में महबूबा-महबूबा चिल्लाते नहीं ।
९० दिन में हर एक दिन यूं काटते नहीं
बचे बस दिन कुछ,यह आश लगाते नहीं।
छुट्टी की खुशी में भागे-भागे यू आते नहीं
बचा हर पल को यूं खुद को परेशान करते नहीं।
आ कर जाने की तिथि बताते नहीं
खुशी में यूं जाना है रोज बताते नहीं।
जाते वक्त मुरझाया चेहरा दिखाते नहीं
पी आंसू नकली हंसी इन्द्रा हंसते नहीं।
हर बार छोड़ सीमा को यूं जाते नहीं
ज...
























