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कहानी

रंगमंच
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रंगमंच

अमिता मराठे इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** नाटक और अभिनय के शौकिन रघुवीर जी आज शांत मुद्रा में लाॅन में बैठे थे। मौन चिंतन में मग्न थे। वे अपने अतीत की रमणीक स्मृतियों में विचरण करने लगे। रंगमंच से उपजा प्यार कब स्नेह पाश में बंध गया पता ही नहीं चला था। सीमा के साथ गृहस्थी की गाड़ी सुख से चलाते पचास साल गुजर गये थे। वाह ! 'सभी प्रकार के रोल अदा करने के बाद 'उम्र ने भी आराम करने का संकेत दे दिया था।' लेकिन रघुवीर का मन अभी भी अभिनय करना चाहता था। उन्हें याद आया, पत्नी सीमा भी बार बार कहती हैं, अब नाटक देखने नहीं जाना चाहिए और रंगमंच पर अभिनय भी नहीं करना चाहिए। उठने, बैठने, चलने में होने वाली तकलीफ कहती हैं रघुवीर जी अब घर में आराम करो। सीमा जानती है टीवी पर आने वाले नाटक, शहर के बड़े हाॅल में रंगमंचित नाटक देखना ही इनका जीवन था। अपने नाटक के हुनर को दिखाने के लिए जब-तक रंगम...
बदलता वक्त… बदलते लोग…
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बदलता वक्त… बदलते लोग…

अरविन्द सिंह गौर इंदौर (मध्यप्रदेश) ******************** राकेश के पिता का देहांत १० वर्ष की उम्र में ही हो गया वह गांव में रहता था। उसकी मां ने उसे शहर लाकर पढ़ाने के लिए सब जमीन जायदाद छोड़कर वो शहर में आ गए और उसकी जमीन जायदाद पर उनके रिश्तेदारों ने कब्जा कर लिया। इस बीच जब थोड़ा बहुत समझदार हुआ तो उसने अपने गांव जाकर अपनी जमीन जाकर को देखनी चाही‌। राकेश की जमीन में अच्छी पैदावार नहीं होती थी पर वहां नहर निकलने के कारण वह जमीन पर अच्छी पैदावार होने लगी कीमत भी बढ़ गई। जब वह अपने गांव गया तो उनके रिश्तेदारों ने उसे जमीन कि कागजात भी दिए ना ही जमीन के पैसे भी दिए और उन्हें उल्टा मारने की धमकी दी इस कारण वह वापस शहर में आ गए। वक्त बदलता गया पढ़ाई करके राकेश सरकारी महकमे में बड़ा अधिकारी बन गया था उसकी शादी हो गई और शहर में उसने अपना स्वयं का बड़ा मकान बना लिया था। राकेश के एक लड़का एक...
बदलाव निश्चित है चाहे समय हो या भाग्य
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बदलाव निश्चित है चाहे समय हो या भाग्य

अतुल भगत्या तम्बोली सनावद (मध्य प्रदेश) ******************** रघु बड़ा उदास लग रहा था। उसके मन में न जाने कैसे कैसे विचार जन्म ले रहे थे जिसका कारण था उसके खेत की फसल। जी तोड़ मेहनत करने के बाद भी अब हर बार उसकी फसल बहुत कम आ रही थी। निराशा उसके मन मे घर बना रही थी। अखबारों में आए दिन किसानों के आत्महत्याओं की खबरें सुन-सुनकर उसका मन पसीजने लगा था, करे भी तो क्या? सामने बेटी ब्याह लायक हो चुकी और बेटा खेती करना नही चाहता उसका मन पढ़ लिखकर अफसर बनने के सपने देख रहा था। कर्जदारों का कर्ज चुकाना है, बेटे जो पढ़ाना है और बेटी ब्याहना है। कैसे होगा सब सोच सोचकर ही वह टूटता जा रहा है। अंततः उसने भी आत्महत्या का विचार बना ही लिया लेकिन वह एक दिन वह अपने परिवार के साथ सुकून से रहना चाह रहा था तभी उसकी पत्नी उसके पास आकर कहने लगी "आप व्यर्थ चिंता करते हो। इस पूरी दुनिया में सिर्फ हम ह...
जीवन के रंग
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जीवन के रंग

राकेश कुमार तगाला पानीपत (हरियाणा) ******************** नीरा का रो-रो कर बुरा हाल था। आज होली के दिन,उसके परिवार पर ये कैसी आफत टूट पड़ी थी? पूरे मोहल्ले में इसी परिवार की चर्चा हो रही थी। सभी नीरा को हौसला देने की जी-तोड़ कोशिश कर रहे थे। पर सब बेकार था। उसने अपना पति खो दिया था। वह उसे बार-बार होली खेलने से रोक रही थीं। पर गगन ने उसकी एक ना सुनी थी। उसे होली खेलने का बहुत शौक था। अब वह उसके सामने खून से लथपथ पड़ा था। उसे लाल गुलाल बहुत पसंद था। हाय! यह लाल रंग। यह गगन को बार-बार उठाने का प्रयास कर रही थी। सास ने उसे खींच कर सीने से लगा लिया। मेरी बेटी मत रो, यह भगवान की मर्जी है। भगवान को हम पर दया क्यों नहीं आई?नीरा रो-रोकर चिल्ला रहीं थीं। माँ का भी रो-रो कर बुरा हाल था। वह भी भगवान से पूछ रही थी? मेरा लाल, मुझसे क्यों छीन लिया? भगवान, मेरे लाल की जगह मुझें उठा लेता। तुझें मुझ विध...
दावत
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दावत

नितिन राघव बुलन्दशहर (उत्तर प्रदेश) ******************** हमारे गाँव में एक बूढ़े बाबा थे जिनका नाम बनी सिंह था। जब मैंने उन्हें पहली बार देखा तब में सिर्फ दस साल का था। लोग उनकें बारे में बहुत भला बुरा कहते थे और वास्तव में वे थे भी बहुत बूरे। उनके बारे में एक बात तो प्रचलित थीं कि जब उनका परिवार साजे में रहता था तो वही अपने सभी भाईयों में मुखिया थे और उनके भाई उन पर आंख बंद कर के विश्वास करते थे। एक दिन सभी भाईयों ने मिलकर छ: बिघा जमीन खरीदी और बेनामा कराने सभी भाईयों ने बनीं सिंह जो मुखिया थे उन्हें तहसील भेज दिया और कोई भी भाई उनके साथ नहीं गया।बनी सिंह ने बिना किसी को बताए तीन बिघा जमीन अपने नाम करा ली और घर आकर कह दिया कि मैं पिता जी के नाम बेनामा करा आया। सभी ने कहा चलो अच्छा है, आखिर छ: बिघा जमीन खरीद ली चलो बच्चों के काम आएगी। दिन धीरे-धीरे बितते चले गए, ये तीन भाई थे, एक दिन बीच...
सुंदर अहसास
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सुंदर अहसास

राकेश कुमार तगाला पानीपत (हरियाणा) ******************** विनीता रिक्शा में नए घर की तरफ जा रही थी। उसे बार-बार ऐसा लग रहा था किसी की निगाहें उसका पीछा कर रही है। वह भी चाहती थी कि एक बार पलट कर देख लें। पर पता नहीं क्यों उसका मन नहीं मान रहा था? वह रिक्शा वाले से बोली, भैया थोड़ा जल्दी करो। मौसम खराब हो रहा है। ऐसा लग रहा है कोई तूफान आने वाला है। नहीं-नहीं, यह बस तेज हवाएं हैं। आप यहां पर नई है ना। इसलिए यहाँ के मौसम से अनजान हैं। यहाँ, मौसम पल-पल बदलता है। मेरा मतलब यह नहीं था। मैडम पहाडों में तो इस तरह की तेज हवाएं चलती रहती हैं। कभी-कभी तेज हवाओं के साथ तेज बौछारें भी हो जाती हैं। तभी तो यहाँ पर दूर-दूर से लोग घूमने आते हैं। इस शानदार मौसम का आनंद लेते हैं। विनीता, को वह रिक्शावाला कम, गाइड ज्यादा लग रहा था। वह पूरे रास्ते उसे पहाड़ियों के बारे में ही बताता रहा था। उसका सफर भी आराम ...
नीम की मौत
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नीम की मौत

नितिन राघव बुलन्दशहर (उत्तर प्रदेश) ******************** आपने बहुत से पेड़ों को घरों में, मोहल्लों में और सड़कों के किनारे खड़े अवश्य देखा होगा। प्रत्येक पेड़ का अपना कुछ न कुछ महत्व होता है। इस कहानी में मैने एक मोहल्ले में खड़े नीम के पेड़ के माध्यम से पेड़ों के महत्व को बताने का प्रयास किया है। गांव सलगवां के राघव मोहल्ले में एक विशाल नीम का पेड़ था। इसके अलावा पूरे गांव में कोई पेड़ न था। उसकी बनावट एक छाते कि तरह थी। लोग गर्मियों में उसकी छाया का आनंद लेते थे। बरसात में भी लोग उसके नीचे खड़े हो जाते थे और वह लोगों को विशाल गोवर्धन पर्वत की तरह ही बरसात से बचाता। लोग उसके नीचे रोज पत्ते भी खेला करते थे। मोहल्ले के बच्चे भी अपने दैमिक खेल उसके नीचे खेलते थे। कुछ बुजुर्ग उसकी टहनियों से दातुन करते थे। इस प्रकार बच्चे, बड़े और बुजुर्ग लोगों को वह कुछ न कुछ देता था। ये लोग पेड़ को पसंद ...
उदास फूल
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उदास फूल

पारस परिहार मेडक कल्ला ******************** वह मुझे देख रहा था और मैं उसे... लेकिन... लेकिन... हम दोनों में से किसी ने भी कुछ भी पूछने की हिम्मत नहीं की। ये माजरा करीब आधे घंटे तक यू ही चलता रहा। आखिरकर...मैं समझ गया कि गलती मेरी ही थी क्योंकि उसको अपना जीवन समाप्त किए पूरे बारह महीने हो चुके थे, सो कैसे बोलता और मैं तो एक जिंदा इंसान था पूछना तो मुझे चाहिए था। फिर एकाएक स्मरण हो आया कि किससे पूछूं वह तो बोलता ही नहीं था। उसको एक दुकानदार नए वर्ष की नई तारीख को तोड़कर लाया था और नए वर्ष की नई तारीख को ही बाहर फेंका गया था। भाग्यवश...मै भी उसी दिन उस दुकान पर पहुंच गया। वह फूल मुझे उदास भाव से अपनी आंखों से देख रहा था। मानो कह रहा हो जब मैं डाली पर था तब सुंदर लग रहा था, वहां मेरी इज्जत थी, लोग मुझे बड़े आदर से देखते थे, हर रोज मुझे पानी दिया जाता था और वही लोग आज मुझे अपने पैरों क...
मासूम सपने
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मासूम सपने

कीर्ति मेहता "कोमल" इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** ये कहानी है सपनों की नगरी कहे जाने वाले, मुंबई जैसे महानगर की एक, नाले के पास बसी छोटी सी बस्ती में रहने वाले, १३ साल के लड़के साहेब की। जो कूड़े के ढेर से ओर गन्दे नालों से कूड़ा बीनने का काम करता है! इस उम्मीद में की इस कूड़े के ढेर में या नाले में कही कुछ सिक्के मिल जाये जो उसके खाली पेट को थोड़ा सा भर सके। "मैं हूँ उस बस्ती के पास ही बनी एक २५ मंजिला बिल्डिंग में रहने वाली एक वर्किंग वीमेन जो अपने ऑफिस आते-जाते समय अक्सर उस बच्चे को देखती हूँ!!!" उसको देख कर लगता ही नहीं की उसका वो गंदगी में कुछ ढूंढने का काम उस पर भारी है, अपने कंधे पर वो टाट की बोरी लेकर, बेफिक्र हो, इस अंदाज में घूमता है, मानो कहीं का बादशाह हो। छोटी छोटी मगर, एक अजीब सी चमक ओर गहराई लिए उसकी वो आँखें, ऐसी थी मानो दुनिया भर की समझदारी उनमें भरी हो!! उसके ...
उसका नाम कला है
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उसका नाम कला है

मंजू लोढ़ा परेल मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** राजस्थान के एक छोटेसे गाव में उसका जन्म हुआ। पर उसके माता पिता ने निश्चय कर लिया कि, वह अपनी बेटी को कम से कम हाईस्कूल तक तो जरूर पढा़येंगे। बगल के गांव मे एक स्कूल था, माँ सुबह जल्दी उठकर, घर के सारे काम निपटाकर बच्ची को स्कूल लेकर जाने लगी। ज्यों-ज्यों कला बढी़ होती गई, नाम के अनुरूप, वह कई कार्यों मे दक्ष होती गयी। चित्रकारी, सिलाई, कशीदा, मेंहदी लगाना, रंगोली मांड़ना तथा साथ ही घर के कार्य में मां का हाथ बंटाने लगी। सुरत और सीरत दोनों ही सुंदर। और जब हाईस्कूल में दसवीं में वह पुरे स्कूल में अव्वल आयी तो अगल-बगल के गांवो तक उसकी चर्चा होने लगी। माँ-बाप को अब उसके विवाह की चिंता सताने लगी। कला आगे पढ़ना चाहती थी, पर गांव मे कॉलेज नहीं होने से उसे अपनी पढाई छोड़ देनी पडी़। पर उसे जहाँ से ज्ञान मिलता, वह उसे प्राप्त करती। जनवरी २०१६ ...
अपना कर्म सुधारों भाई, जीवन की यही सच्ची भलाई
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अपना कर्म सुधारों भाई, जीवन की यही सच्ची भलाई

धर्मेन्द्र कुमार श्रवण साहू बालोद (छत्तीसगढ़) ******************** लोग कहते है कि सतनाम कहो पाप कट जायेगा, राम नाम कहो पाप कट जायेगा, गंगा में नहा लो पाप कट जायेगा। इसलिए मैं मानता हूँ कि पाप, तुम करो ही मत। कभी हो गया तो हो गया, आगे अब गलती न करो। गलती तो इंसान से ही होती है, दिवार से नहीं। अत: गलती से बचने के लिये गलती का रास्ता छोड़ना है, यह नहीं कि कोई मंत्र-वंत्र जपकर उसको काटने की बात करनी है। कोई मंत्र-वंत्र जपने की आवश्यकता नहीं है कि जिससे आपका पाप कट जाए। सब कुछ सामने आता है। समझ है अपने कर्म को सुधार करने की, इसी में ही मानव समाज की भला है। मानव को समाज में रहकर जीवन जीने की कला सीखना चाहिए। सदाचार व नैतिकता पर आधारित मार्मिक कहानी का अंश राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच के पावन पटल पर रखने का प्रयास है। इसी आशा और विश्वास के साथ पाठकगण सहर्ष अपनाएंगे और इसके अध्ययन मनन से सच...
अपना लक पहन कर चलों
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अपना लक पहन कर चलों

विश्वनाथ शिरढोणकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ****************** मेरे बदन से मेरी कमीज किसी ने अलग कर ली। मेरी सीट के पीछे बैठे व्यक्ति ने यह कारनामा कैची से बड़ी खूबसूरती से किया। मै बस में झपकी ले रहा था। वह शरारती यही पर नहीं रुका, उसने उसी अंदाज में मेरी बनियान के भी टुकड़े करके उसे भी मेरे बदन से अलग कर दिया। न जाने कहाँ जा रहा था मैं। और क्यों जा रहा था? किसी मंजिल की तलाश थी या मंजिल मुझे अपनी ओर ले जा रही थी? शुक्र है कि वह मेरा पाजामा नहीं उतार पाया। मेरी गहरी नींद की मुझे गहरी कीमत चुकानी पड़ी। माँ हमेशा कहती थी, 'बेटा सफ़र में सावधान रहना चाहिए' पर सावधान रहने का यह मतलब तो नहीं कि सोया ही ना जाय? और फिर बदन से कोई कपडे उतार ले यह तो कल्पना से परे ही है। उसने चुराया कुछ नहीं पर उसकी शरारत मुझे महँगी ही पड़ने वाली थी। नीद में गाफिल लोग मालूम नहीं क्या क्या गवाते है? 'जो सोवत है सो खोवत है, जो...
आंखें … एक ऐतिहासिक कहानी
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आंखें … एक ऐतिहासिक कहानी

सुधा गोयल बुलंद शहर (उत्तर प्रदेश) ******************** शाम का धुंधलका फैलने में अभी देर थी। पवन में हलकी सी सरसराहट थी। पक्षी उद्यान में क्रीड़ारत थे। सरोवर के स्वच्छ जल में अस्ताचलगामी सूर्य का प्रतिबिंब किसी चपल बालक की तरह अठखेलियां कर रहा था। कमल हंस रहे थे। मोर नाच रहे थे। सुगंधित समीर उड़कर गवाक्ष में एकाकी, मौन, शून्य में निहारती महादेवी तिष्यरक्षिता की अलकों से अठखेलियां कर रहा था। परंतु वह इस समय इस सबसे बेखबर अपने ही विचारों में खोई थी। उनके रुप माधुर्य की आभा तिरोहित होते सूर्य की रश्मियों के साथ मिलकर दुगुनी हो गई थी। प्राकृतिक दृश्य पावक बनकर महादेवी के तन-मन को प्रज्वलित करने लगे थे। जब शाम अपने डैने फैलाए राजमहल की प्राचीरों पर उतरती तब महादेवी का मन उदास हो जाता। और सम्राट अशोक का इंतजार करते-करते वे कमलिनी सी मुरझा जाती। श्रृंगार ज्योति विहीन हो जाता। काम की दारुण ज्व...
परिवर्तन
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परिवर्तन

अनुराधा बक्शी "अनु" दुर्ग, (छत्तीसगढ़) ******************** "शरीर मिट्टी में शामिल हो मिट्टी का पुनर्निर्माण कर देता है, फिर क्या है जो मरता है? ये दिल इतना शोर क्यों करता है। किसी के जाने से असह्रा दर्द क्यों और कहां से आता है? खुद को समाप्त करते ही उनकी यादें भी खत्म हो जाएंगी और बेकाबू रुदन से जिंदा रहा नहीं जाता।" दर्द के अवसाद में सुबह-शाम डूबी अक्सर मैं अपनी दुनिया अपनी आंखों से निहारती। "इन दिनों प्रकृति जिस तरह अपने अदृश्य पन्नों पर अपने असहज घोटाले की कहानियां लिख रही थी और हम अपने हाथ हाथों में लिए दृष्टा की भांति उसे निहार रहे थे वो बहुत कुछ कह रही थी और बहुत कुछ सिखा भी रही थी।" कभी सोचा ना था दूध की चिंता बिस्तर छोड़ने पर और रोजमर्रा की जरूरतें है दरवाजे से बाहर निकलने पर मजबूर कर देंगी। स्कूल जाते वक्त वो मुझे बस स्टॉप पर छोड़ते और मेरे आने से पहले बस स्टॉप पर गाड़ी लिए...
मेरा बाप–तेरा बाप
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मेरा बाप–तेरा बाप

विश्वनाथ शिरढोणकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ****************** ‘मुझे घर जाना होगा I अम्मा कह रहीं थी कल मेरे बाप की तिथि हैं I श्राद्ध करना पड़ेगा I सारा सामान लाना हैं I पंडित को भी बुलाना पड़ेगा I ब्राह्मण भोज होगा I ग्यारह ब्राह्मण ढूंढने हैं I खाने की सारी व्यवस्था करनी हैं I किराना, सब्जी वगैरे, सभी सभी तो खरीदना पड़ेगा I पैसों का इंतजाम करना ही हैं I वह चिंता अलग खाएं जा रही हैं I ‘धनाजी बोला I ‘क्या रे तू .....? अभी तो आया हैं .... एक घूंट भी नहीं गया अंदर अभी .... और अभी से जाने की रट लगा रहा हैं ?’ भिकाजी बोला I ‘कल बाप का श्राद्ध करना हैं I जाना ही पड़ेगा I क्यों रे भीकू तेरे बाप का श्राद्ध कब आता हैं ? ‘धनाजी जाने के लिए खड़ा हो गया I भिकाजी रुआंसा हो गया I उसकी आँखें नम हो गई I धनाजी को दारु का ज्यादा असर नहीं हुआ था I उसे लगा भिकाजी को दारु चढ़ गई हैं , और वह किसी भी क्षण जोर जोर से रोने ...
परिचित-अपरिचित
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परिचित-अपरिचित

विश्वनाथ शिरढोणकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ****************** सुबह के नौ बजे थे I गुरु परिचित अपने नित्यकर्म निपट कर चिंतन की मुद्रा में अपने एसी कक्ष में बैठे थे I पर आज उनका मन चिंतन में नहीं लग रहा था I वह सुबह से ही अशांत था और सूर्योदय से अभी तक गुरु परिचित को स्वस्थ चिंतन नहीं करने दे रहा था I गुरु परिचित का मन अस्वस्थ होने का भी एक कारण था I कल देर रात को उनके ख़ास और परमप्रिय लाडले शिष्य कुमार अपरिचित को एक फार्महाउस में देर रात चलने वाली रेव्ह पार्टी में नशे में धुत , एक लड़की के साथ आपत्तिजनक अवस्था में पुलिस ने गिरफ्तार किया था I गुरु परिचित को यह बात रात में ही सेवक ने जगा कर बताई थी I गुरु परिचित तुरंत पुलिस थाने में जाकर उनके लाडले शिष्य कुमार अपरिचित को अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर छुड़ाकर लाए थे I इस बात की उन्होंने किसी को भी कानोकान हवा तक नहीं लगने दी और मिडिया से बचाते हुए नशे मे...
वह गाड़ी वाली लड़की
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वह गाड़ी वाली लड़की

राकेश कुमार तगाला पानीपत (हरियाणा) ******************** नीना जी, आज आप बहुत उदास लग रही है। क्या कोई खास कारण है? आपका हँसता हुआ चेहरा, आज मुरझाया हुआ क्यों लग रहा है? मैंने आपको इससे पहले कभी इतना उदास नहीं देखा। क्या आप मुझें अपनी परेशानी बता सकती हैं? अरे, सुरेश जी आप तो यूँ ही इतने परेशान हो रहे हैं। मेरे चेहरे पर लंबे सफर की थकान है। इससे ज्यादा कुछ भी नहीं है। थोड़ा आराम कर लूँगी। फिर सब ठीक हो जाएगा। क्या हम शाम को मिल सकते हैं, सुरेश जी? जी जरूर, आपकी हर फरमाइश सिर-आंखों पर। अच्छा मैं चलता हूँ, फिर मिलेंगे। वह सुरेश को जाते हुए देखती रही, जब तक वह आंखों से ओझल नहीं हो गया। सुरेश वर्षों से मेरे साथ हैं। यह साथ करीब-करीब बीस साल पुराना है। जब हम कॉलेज में पढ़ते थे। सुरेश हमेशा से ही मस्ती में रहता हैं। उसे तो सिर्फ मजाक करने का बहाना चाहिए। मुझें नहीं लगता वह कभी गंभीर भी होता हैं। म...
आदमी से गधा बेहतर
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आदमी से गधा बेहतर

विश्वनाथ शिरढोणकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ****************** ‘गाढवे, तुम वास्तव में गधे ही हो।' साहब ने भले ही क्रोध में यह कहाँ पर राजाभाऊ गाढवे बिलकुल शांत ही थे। साहब पर उनकों कतई गुस्सा नहीं आया, बल्कि उन्होंने विनम्रता से कहा, ‘धन्यवाद सर !‘ अब साहब ज्यादा ही नाराज हो गए। उन्हें लगा गाढवे उनका मजाक उड़ा रहें हैं। ‘गाढवे .....गाढवे, अरे मैं तुम्हें साफ़ साफ़ गधा कह रहा हूँ। धन्यवाद क्या दे रहे हो मुझे ?‘ ‘फिर क्या देना चाहिए सर आपको ? ‘ राजाभाऊ ने फिर विनम्रता से कहाँ। वह बिलकुल शांत थे। ‘कुछ भी नहीं।‘ साहब का पारा कुछ ज्यादा ही चढ़ गया था ।‘ मुझे कुछ देने की जरूरत नहीं है । तुम अपना काम ठीक से किया करो ।इतनी मेहरबानी तो कर सकते हो मेरे ऊपर ? ‘ ‘यस सर ।‘ राजाभाऊ गाढवे को यह समझ में ही नहीं आ रहा था कि उनकी गलती कहाँ हुई ? और साहब के इतना नाराज होने की वजह क्या हैं ? उन्होंने चुपचाप साहब के साम...
हजार मुंह का रावण …!!
कहानी

हजार मुंह का रावण …!!

विश्वनाथ शिरढोणकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ****************** “ठहरो !“ डायनासोर से भी कई गुना बड़ा और भारी भीमकाय भ्रष्टाचार दौड़-दौड़ते बड़ी मुश्किल से ठहर पाया I फिर भी वह बहुत आगे तक आ ही गया था I उसके पावों में लाखों अश्वों का बल आ गया था और अनेक हाथियों के पेट से भी बड़ा भारी उसके पेट का आकार हो गया था, इसलिए उसने खुद को सम्हालने में बड़ा समय लियाI ठहरने के बाद वहीँ खड़े-खड़े बड़े कष्ट से उसने अपनी गर्दन घुमा कर थोडा पीछे की ओर देखा और पाया कि लोकतंत्र उसके पीछे-पीछे दौड़ा चला आ रहा थाI भ्रष्टाचार ने यह भी देखा कि लोकतंत्र के पीछे-पीछे लोकतंत्र के प्रहरी आम मतदाताओं की भी बहुत बड़ी भीड़ चली आ रही थी I लोकतंत्र हांफते हांफते भ्रष्टाचार के पास आकर रुका I “अरे ! कब से आवाज लगा रहां हूँ ? ठहरने का नाम ही नहीं ले रहा? “थोडा ठहर जा !“ लोकतंत्र ने तनिक नाराजी भरे स्वर में कहाँ ! भ्रष्टाचार अपने भीमकाय शरीर क...
रंगबिरंगी
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रंगबिरंगी

विश्वनाथ शिरढोणकर इंदौर म.प्र. ****************** मंच पर से वक्ता बोल रहा था। अचानक वह बोलते बोलते रुक गया। सबसे अंतिम पंक्ति की ओर उसने टेढ़ी नजरों से देखा, एक क्षण देखता रहा और फिर विषय से हट कर बोला, “मुझे ऐसा लगता हैं कि अंतिम पंक्ति में बैठे हुए चारों सज्जन अगर मेरी बात शांति से सुने तो बेहतर होगा, इससे वें भी मेरी बात ठीक से समझ सकेंगे और दूसरों को भी कोई परेशानी नहीं होगी और वें सब भी शांति से मेरी बात सुन सकेंगे। आखिर हम लोग सेवानिवृत्ति के पश्चात् आने वाली समस्याओं पर ही तो चर्चा कर रहें हैं, और यह सबके भले के लिए ही तो हैं।“ वें चारों सकपका गए, फिर मुस्करा दिए और गर्दन हिला कर शांति से भाषण सुनने का वक्ता को आश्वासन दिया। वक्ता फिर से विषय पर बोलने लगा। परन्तु उन चारों की हरकते बदस्तूर जारी थी। इन अभिन्न मित्रों की शरारती चौकड़ी अनेक वर्षों के उपरान्त एकत्रित हुई थी और जिगरी दोस्त...
मृत्यु का सुख
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मृत्यु का सुख

विश्वनाथ शिरढोणकर इंदौर म.प्र. ****************** ताराबाई के शरीर से प्राण निकले और आखिरकार इस भवसागर से उसको मुक्ति मिल गई। अब ताराबाई के शरीर से प्राण निकले जरुर पर उसकी आत्मा का क्या? भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा हैं, ‘जो मरता हैं वह शरीर। आत्मा कभी नहीं मरती। और प्रत्येक शरीर में एक अदद आत्मा भी तो होती ही हैं। अर्थात जिसे मृत्यु के मुख में जाना होता हैं वह शरीर और जिसका मृत्यु कुछ भी नहीं बिगाड सकती वह अजरामर आत्मा। इसीलिए हम सब को हमेशा यहीं बताया जाता हैं कि आत्मा हर जन्म में हमेशा शरीर रूपी कपडे बदलती रहती हैं और यह कि आत्मा अमर होती हैं । अब सवाल यह कि ताराबाई की मृत्यु के बाद ताराबाई का शरीर छोड़ने वाली और ताराबाई की अमर कहलाने वाली आत्मा अभी तक कहाँ भटक रही होगी? ज़रा ठहरिए। कहाँ भटकेगी? अभी तो इसी घर में, नहीं-नहीं इसी कमरें में भटक रहीं होगी? अभी तो ताराबाई की मृत देह जम...
बस एक रात की बात
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बस एक रात की बात

राकेश कुमार तगाला पानीपत (हरियाणा) ******************** साक्षी सड़क के किनारे बने चबूतरे पर बैठी लगातार इधर-उधर देख रही थी, पता नहीं वह किसका इंतजार कर रही थी? पप्पू लगातार उसे देख रहा था, उसे देखकर पप्पू को अतीत की कुछ यादें स्मरण हो आई, जब पप्पू सोलह साल का था, वह घर से भागकर मुंबई जैसे शहर में आ गया था। उसके पास कोई ठोर ठिकाना नहीं था। उसे चारों तरफ इंसान ही इंसान दिखाई दे रहे थे। दिन हो या रात उसे भीड़ ही भीड़ दिखाई दे रही थी। वह मन ही मन में सोच रहा था, क्या यहाँ रात भी नहीं होती? रात को भी दिन से अधिक चकाचौंध रहती है। पर उसने सुन रखा था कि महानगरों में रात को भी लोग काम करते हैं। उनके के लिए दिन और रात एक समान होते है। पर हमारे गाँव में तो आठ बजे रात हो जाती है। पूरे गाँव में सन्नाटा पसर जाता है। आदमी तक दिखाई नहीं देता। वह अक्सर रात को घर से बाहर निकलने से घबराता था। वैसे भी उसे दाद...
प्रतिज्ञा
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प्रतिज्ञा

राकेश कुमार तगाला पानीपत (हरियाणा) ******************** शालिनी घर लौट रही थी। उसकी आँखे नम थी। कितनी खुश थी वह अपनी शादी को लेकर। पर यह शादी उसके जी का जंजाल बन गई थी।रोज का झगड़ा, हाथा-पाई तंग आ गई थी इससे। उसके सारे सपने बिखर गए थे। वह पढ़ाई में कितनी अच्छी थी। सारा कॉलेज उसकी प्रतिभा को लोहा मानता था। किसी विषय पर वाद- विवाद हो। उसे सबसे पहले चुना जाता था। यह सब गुण उसे अपने पापा से ही मिले थे। प्रतिदिन उसे दो घंटे अखबार पढ़ना अनिवार्य था। ध्यान लगाना उसके पूरे परिवार की दिनचर्या में शामिल था। प्रतिदिन अखबार पढ़ना, शुरू में उसे बोर करता था। उसका मन नहीं चाहता था। राजनीतिक खबरें उसे बिल्कुल भी पसंद नहीं थी। वह राजनीतिक विषय पर कुछ भी बोलने से कतराती थी। पर पापा को राजनीति की खबरें बहुत पसन्द थीं। रोज दफ्तर से आते एक कप चाय पीते और चर्चाओं का दौर शुरू हो जाता। फिर तो समझो गए तीन-चार घंटे,...
क्षतिपूर्ति
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क्षतिपूर्ति

राकेश कुमार तगाला पानीपत (हरियाणा) ******************** गीतू ऐसा क्या हो गया हैं? जो नौबत यहाँ तक पहुँच गई है। मैं कभी सोच भी नहीं सकती थी, तुम्हारे साथ ऐसा हो सकता है। पति-पत्नी में कहा-सुनी होना कोई बड़ी बात नहीं है। हर घर में ऐसी स्थिति बन जाती है। इसका मतलब यह नहीं है कि एक-दूसरे को छोड़ने को तैयार हो जाओ। तुम तो पढ़ी-लिखी हो, फिर तुमने समझदारी से काम क्यों नहीं लिया? पति-पत्नी दोनों को ही कुछ बातों को नकार देना चाहिए। इससे रिश्तों में दरार पड़ने से बच जाती है। माँ कहे जा रही थी। गीतू चुपचाप सुन रही थी। आखिर कब तक अपने संबंधों में दरार पड़ने से बचाती। मैं तो हमेशा ही सतर्क रहती थी। झगड़े की हर वजह को उसी समय नकार देती थी। ताकि झगड़ा किसी बड़े कलह का कारण ना बन जाए। वह अपनी माँ की इकलौती संतान थी। पिता जी माँ को अकेला छोड़ कर जा चुके थे। किसी नाचने वाली के चक्कर में। जब मै दस वर्ष की हुई ...
स्वाभिमान
कहानी

स्वाभिमान

श्रीमती शोभारानी तिवारी इंदौर म.प्र. ********************                                                           सीमा एक पढ़ी-लिखी बेटी थी, वह एक प्राइवेट स्कूल में नौकरी करती थी। स्कूल के बच्चों की चहेती टीचर थी। बच्चे उसे बहुत प्यार करते थे। माता-पिता ने बहुत अच्छा लड़का देखकर उसकी शादी कर दी। माता-पिता को अपने बेटी पर पूर्ण विश्वास था, कि वह अपने ससुराल में सबका दिल जीत लेगी, और कुछ ऐसा काम नहीं करेगी, जिससे उसके स्वाभिमानको चोट पहुंचे। वह बहुत जल्दी अपने ससुराल में घुल मिल गयी। सब उसे प्यार करते थे, केवल छोटी नंनद को छोड़कर। नंनद रानी हमेशा उसे नीचा दिखाने की कोशिश में लगी रहती, और ऐसा कार्य करती जिसेसे उसके अहम को ठेंस लगता, लेकिन वह परिवार में एका बना रहे, इसलिए रानी की बातों का बुरा नहीं मानती, हंसकर टाल देती थी। सीमा समझदार थी, वह जानती थी कि परिवार में रिश्तों को बनाए रखने के...