जाने क्या बात है
विजय गुप्ता
दुर्ग (छत्तीसगढ़)
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हर गुफ्तगू कही अनकही में निश्चित कोई जात है,
दिल बेचारा हलाकान हो सोचे, जाने क्या बात है।
इर्द गिर्द चक्रव्यूह माहौल छिपी उलझन तो मात है,
हर व्यूह रचना तोड़ बाहर आना, जाने क्या बात है।
नेक सलाह काम परिणाम में अक्सर कोई हाथ है,
खुद की दम से नेक काज सधे, जाने क्या बात है।
हर वक्त जड़ तना फलती फूलती शाख की पात है,
हवा खाद पानी लबालब हमेशा, जाने क्या बात है।
गुजरते जीवन के धुंधलके में छिपी बैठी तो घात है,
निडर एकाकी जीवन का सफर, जाने क्या बात है।
दिन महीने साल गुजारते जब आया दशक सात है,
पर देखी वही मशक्कत जुस्तजू, जाने क्या बात है।
सुना छप्पर फाड़ धन मिले यकायक दिन या रात है,
कुआं खोद प्यास बुझे चकाचक जाने क्या बात है।
संघर्ष योद्धा की चुप्पी भली लगती जब मुलाकात है,
चूंकि माना अपने तो अपने होते, जाने क्या बात ह...





















