छाते में गुज़रे …
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डॉ. बी.के. दीक्षित
इंदौर म.प्र.
छाते में गुज़रे दिनों की कहानी।
सारा शहर, हो गया पानी पानी।
जाती नहीं, है डटी कब से वर्षा।
सूरज के दर्शन को, हर कोई तरसा।
ज्यों ही कदम को बाहर निकालें।
खुद, कपड़े और क्या क्या संभालें।
छायी है काई, दीवालों और दर पे।
कीचड़ दिखे है आंगन और घर पे।
कहीं डोम गिरते, कहीं लोग मरते।
अफ़सोस दिल से करें डरते डरते।
हरक़त बढ़ाता ,,,,,,,, दुश्मन हरामी।
कटोरे में भूचाल उसका सुनामी।
मिटकर ,,मिटाने के नारे लगाता।
पाक बेहूदा है,,,,, नहीं शरमाता।
चुनावों में मस्ती,कहीं नज़र नहीं आवे।
कोई, मम्मी, राहुल को, आंखें दिखावे।
सुशासन दिखे ना, ना दिखे कोई रुतबा।
डूब कर प्रलय बिच,,,,, करे तौबा तौबा।
परेशां बिहारी,,,,,,,,, है परेशान जनता।
बिगड़े सभी काम, हर कोई हाथ मलता।
करो बंद टोंटी, अब न बरसाओ पानी।
बिजू कहे,,,,,,,, जी हो गई बहुत हानी।
परिचय :- डॉ. बी.के. दीक्...





















