एक अजनबी
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विकास मिश्रा
एक अजनबी से सफर में एक अजनबी से मिलना.
पर लगता है ऐसे जैसे जानता हूँ सारा इतना..
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गुमसुम गुमसुम सी बैठी थी अकेली.
उलझी हुई लगती थी वो एक पहेली..
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होने लगी थी बाते कुछ इधर उधर की,
पूंछा ही नही मैंने तुम खोई कहा हो इतना..
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अब तो आंखों ही आंखों में बात होने लगी.
धीरे धीरे से वो भी करीब आने लगी..
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हम दोनों एक प्यारी सी मुस्कान में खो गए..
वर्षो से थे बिछड़े अनजाने में मिल गए..
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आंखों से लब्ज अब लब पे आ चुके थे ..
और वो अपनी आँखों से ही मेरे लफ़्ज़ों को चुरा रहे थे..
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फिर वो बेधड़क सी अपनी बातों को बोलने लगी..
कुछ थे पुराने राज जो वो अब खोलने लगी..
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अपनी नर्म उंगलियों से अपनी जुल्फों को सुलझाती..
इशारों ही इशारों में मुझे बहुत कुछ समझाती..
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हम सभी अजनबी थे पर अब दोनो घुलमिल गए थे..
कुछ सोए हुए थे ख्वाब धीरे धीरे वो भी जग रहे थे..
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परिचय :- गोपालगंज, बिहार न...



















