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कविता

बसंती बयार
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बसंती बयार

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** बसंती बयार बह रही घर आंगन चौखट द्वारे रवि किरण लजा रही छुप, चुप कर गगन में।। पेड़ों के झुरमुट से झांकती कलियां भौरो का गुंजन होता पुष्प पराग से पेड़ों के पत्ते हिल-हिल कर लेते बलैय्या मां सरस्वती को बसंत देता बधाइयां कहीं कोयल कुकती स्वागत में कहीं झरनों की फुहारें भरें स्फुरण। कहीं झरना नहलाता बसंत को तो पलाश टेसु टीका लगाता रक्तिम भरमाए भागते बादल बसंत से धूप-छांव का खेल खेलते। नदी, तडाग की लहरें देती बसंत को झूले मीन मिलकर नृत्य करती बसंत की अगवानी में। आओ देखे हम भी मिलकर नर्तन बसंत आगमन में। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं ...
रास्ते का अंधा बटोही …
कविता

रास्ते का अंधा बटोही …

मानाराम राठौड़ जालौर (राजस्थान) ******************** मंजिल कितनी दूर है! देख ले सपना कितना सच है! देख ले सपना है! मंजिल की पहुंच अपना है! सपने का मंजिल देख ले मंजिल की राह कांटो से भरी कंकड़ सड़क जाते मंजिल चटक-भटक मंजिल कितनी दूर है! सपना कितना सुदूर है! बटोही नहीं देखे राह अपनी कौन कहे यह कहानी अपनी घर आते आते ढल जाती है! संध्या सुबह होते-होते भूल जाते हैं! सपना परिचय :- मानाराम राठौड़ निवासी : आखराड रानीवाड़ा जालौर (राजस्थान) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहान...
बहराइच
कविता

बहराइच

अनुराधा प्रियदर्शिनी प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) ******************** भारत में उत्तर प्रदेश का एक जिला बहराइच देवीपाटन क्षेत्र का एक भाग है बहराइच घना जंगल और नदी की बहाव यहाँ पर तेज भर राजवंश की राजधानी बहराइच, भारिच प्रकृति की मनोहर छटा बहराइच की पहचान ग्यारहवीं सदी में एक राजा हुए बहुत महान सैयद सालार मसूद गा़ज़ी को दी थी शिकस्त महाराज सुहेलदेव की गौरवगाथा महान उत्तर में नेपाल की है अंतरराष्ट्रीय सीमा दक्षिण भाग में है सीतापुर और बाराबंकी पूरब में श्रावस्ती से स्पर्श करता है बहराइच पश्चिम भाग में इसके गोंडा जिला और खीरी पुरूषोत्तम श्रीराम और लव का यहाँ राज्य कतर्निया वन्यजीव अभयारण्य यहाँ शान पर्यटकों को लुभाता है यहाँ का सुंदर दृश्य ब्रह्मा जी का रचा हुआ ऋषियों का स्थल जप तप और साधना को सुंदर बसा स्थान पांडव कालीन सिद्धनाथ मंदिर यहाँ बीच पांडव को जब वनवास बह...
भारत की प्रथम महिला सरोजनी नायडू
कविता

भारत की प्रथम महिला सरोजनी नायडू

प्रतिभा दुबे ग्वालियर (मध्य प्रदेश) ******************** सशक्तिकरण महिला का चेहरा सरोजिनी जी के रूप में जान रहे, उनके संघर्षों के पथ से उनको राजनीति तक आज पहचान रहे। स्वतंत्रता सेनानी के रूप में, वे सदैव बड़ा मनोवल रखती थी भारत को लेखन से जोड़कर वीर काव्य यह कहती थी यह भारत तुम्हारा है ... यह इतिहास तुम्हारा है ... झुक ना जाए जीवन पथ पर, सर ओ मातृभूमि के लाडलो रक्षा के अधिकारी बनो तुम, यह सर्वसिद्धि हित तुम्हारा है।। सरोजिनी जी के सम्मान में हम नमन आज करते हैं उनकी जैसा कोन यहां, भारत में कोई सितारा हैं।। परिचय :-  श्रीमती प्रतिभा दुबे (स्वतंत्र लेखिका) निवासी : ग्वालियर (मध्य प्रदेश) उद्घोषणा : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि ...
ख्वाब
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ख्वाब

किरण पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** ख्वाब में तुझे जब से देखा, चाहने की तमन्ना थी, मन में बड़ी उम्मीद थी, दिल में बड़ी उमंग थी, रब ने तुझे मेरे लिए ही भेजा, खयालों में दिन रात आती हो मेरे, ख्वाबों में सदा बस्ती हो तुम मेरे, नही ओझल होती हो तुम निगाहो से, वो नशीली आंखें मद होश, हर पल करती है मुझे, मुस्कान पर तेरी बिछा दूं, पलकों की चादर, मदहोश करती है हर अदा यह तेरी, वह होठ का तिल जो है वह जान है मेरी, गुलाबी होठों पर लाली जैसे गुलाबी फूल का खिलना, उड़ती जुल्फे है जो बिखरी, हवा की ओर जो उड़ती, लटकती लट जो हे तेरी, हर अदा पे वो बिखरी, ख्वाब तो बस ख्वाब था, जब होश है आया, वह अलग और मैं अलग, बस कहानी सपनों की थी। परिचय : किरण पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प...
चहुँ ओर
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चहुँ ओर

राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** तुम सृष्टि के कण-कण में हो। तुम मानव के मन-मन में हो। तुम बीतते वक्त के क्षण-क्षण में हो। तुम सोचते-विचारते जन-जन में हो। तुम बनती बिगड़ती परिकल्पना के पल-पल में। तुम अनंत व्योम के चमकते सितारे-सितारे में हो। परिचय :- राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में ट...
इतिहास गाथा
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इतिहास गाथा

कुंदन पांडेय रीवा (मध्य प्रदेश) ******************** है रही सुसज्जित ये धानी प्राचीन काल में वैभव से है पत्थर पर अभिलेख यहां पाषाण काल के उद्भव से सुनकर इस गौरव गाथा को अपने अतीत का मान करो जो इतिहासो के पन्नों में तुम कथा वही अविराम कहो। सोलंकी राज धवल के सुत गुजरात राज्य से थे आए जिनके कारण यह राज्य बना जो व्याघ्र देव थे कहलाए हो चंद्रवंश या सूर्यवंश या शीतल तपिश हि नाम कहो जो इतिहासो के पन्नों में तुम कथा वहीं अविराम कहो हो सारनाथ का वह वैभव सांची की अमर निशानी हो गौतम का हो उपदेश यहां चाहे संतों की वाणी हो जो क्रूर हृदय कोमल कर दे ऐसे जातक सरेआम कहो जो इतिहासो के पन्नों में तुम कथा वही अविराम कहो है धन्य धरा इस भारत की और धन्य हमारी माटी है हर पग में है संस्कार यहां यहां संस्कृत की परिपाटी है हर कला सुसज्जित पत्थर में चाहे खजु...
शब्दांजलि
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शब्दांजलि

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** ताऊ जी श्री रामचंद्रलाल श्रीवास्तव को विनम्र शब्दांजलि पिछले कुछ दिनों से मेरे मन में एक डर सा समाया रहता था, पर उसका आशय क्या है बस! यही समझ नहीं आ रहा था। पर आज सामने आ गया जब मेरे सिर पर अपनी अनवरत सुरक्षा छाया देने वाला विशालकाय वटवृक्ष अचानक ही गिर गया। निस्तेज, निष्प्राण, अनंत मौन होकर भी हमें संबल दे रहा था, जैसे अब भी हमारे पास होने का हमें विश्वास दिला रहा था। पर सच्चाई तो ये है कि हमें झूठी तसल्ली दे रहा था। या शायद हमें अपने कंधे मजबूत करने का संदेश दे रहा था। जो भी हो पर हमें भी पता है अब वो वटवृक्ष न कभी खड़ा होगा न शीतल हवा देगा न ही हमें सुरक्षा मिश्रित भाव ही देगा। क्योंकि वो तो जा चुका है अपनी अनंत यात्रा पर बहुत दूर जिसकी स्मृतियां हमें रुलाएगी दूर होक...
अधोगति होती मन की
कविता

अधोगति होती मन की

अंजनी कुमार चतुर्वेदी निवाड़ी (मध्य प्रदेश) ******************** अधोगति होती पानी की, नदिया हो या झरना। गिरता है स्वभाव बस अपने, फिर क्यों चिंतन करना। नीचे से ऊपर को जाना, है उत्थान कहाता। पाने को उत्थान सदा ही, मानव स्वेद बहाता। झरना झर झर नीचे गिरता, अठखेली करता है। धुवाँधार है दृश्य मनोरम, सबका मन हरता है। हों कितनी कठोर चट्टानें, भले कोई बाधा हो। झरना कभी नहीं रुकता है, कभी न वल आधा हो। वसुधा से वसुधा पर गिरता, इसमें पीड़ा कैसी। ऊँच नीच इसमें ना होती, माँ की ममता जैसी। गिरता जो मंजिल पाने को, यह उसकी ऊँचाई। मंजिल पा जाना ही सबके, जीवन की सच्चाई। झरने सभी उतरते नीचे, ऊँचाई पाने को। ऊँचाई पाकर तत्पर हैं, फिर नीचे जाने को। यही प्रकृति का नियम साथियो, हरदम आगे बढ़ना। चींटी सम सौ बार गिरें पर, फिर फिर ऊपर चढ़ना। झरना तो गिरता उमंग से, पी...
संत शिरोमणि रविदास
कविता

संत शिरोमणि रविदास

अशोक कुमार यादव मुंगेली (छत्तीसगढ़) ******************** स्वर्णयुग में निर्गुण धारा के भक्त कवि। अपनी वाणी से जनजागृति किया रवि।। लोक कल्याण करने जन्म लिया काशी। संतोख और कलसा के पूत अविनाशी।। कान्ता लोना, वत्स विजय से हुए विमुख। शिष्या झाला, मीराबाई के बने गुरु प्रमुख।। परहित, दयालु और आनंद का खजाना। ईश्वर-भजन, भक्ति और सत्संग दीवाना।। भवसागर पार कराने गुरु नाम है अग्रणी। रामानंद के शिष्य रैदास संत शिरोमणि।। मध्यकाल में कबीरदास के समकालीन। कार्य समय में करने हमेशा थे तल्लीन।। साधु-संतों की संगति से विज्ञान अर्जित। अध्यात्मिक ज्ञान जन-जन को अर्पित।। रैदास की वाणी समाज हित की भावना। मधुर, भक्तिमय भजनों की सुंदर रचना।। ऊंच-नीच की भावना निरर्थक यही संदेश। सबको प्रेमपूर्वक रहने का दिया उपदेश।। सतगुरु और जगतगुरु की मिली उपाधि। चित्तौड़गढ़ में है गुरुवर ...
मैं एक परिंदा हूँ
कविता

मैं एक परिंदा हूँ

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** मैं एक परिंदा हूँ इस जहां से ही शर्मिंदा हूँ, उड़ने को सारा आसमां है खाली पर कतर डाले मेरे फिर भी मैं जिंदा हूँ मैं एक परिंदा हूँ... हम परिंदे ऊंची उड़ान की ताक में हैं पर तीर आज हर मनुष की कमान में है सोचता था सब ठीक होगा एक दिन, पर मेरा भ्रम भ्रम ही रहा क्युकी मैं एक परिंदा ही तो हूँ....! मैं आजाद बेफिक्र सा पंछी, तुमने कैद कर चुरा डाली सांसे मेरी दिल पर मेरे क्या गुजरी ये तुम क्या समझो हे मानव कभी तूफ़ाँ ने उड़ा डाला घरौंदा मेरा, कभी टहनियों पर बसा उजाड़ डाला तुमने अभिलाषा उस नन्हें परिंदे सी तो थी, जो विशाल गगन में पखं फैलाने का दम भरता है क्योंकि मैं एक परिंदा हूँ...! लौट आता हूँ बार-बार उसी कूचे पर, रंग नया है पर मकां वही पुराना है, ये घर मेरा जाना पहचाना सा है, ...
युवाओं की झोली भर दो
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युवाओं की झोली भर दो

रामेश्वर दास भांन करनाल (हरियाणा) ******************** सरकारी पद पड़े जो खाली देश में, उसको भर दो ए देश की सरकार, बेरोज़गारी कम होगी देश में हमारे, युवाओं को मिल पाऐगा रोज़गार , वादे जो तुमने किये सत्ता में आकर, वो भी कुछ पुरे हों जाएंगे, उम्मीद जगी थी जो युवाओं में, उनके चेहरे, दिल भी खिल जाएंगे, मजबूत होंगे जनता के संस्थान, सरकार भी मजबूती पाएगी, ना करो देश का प्राइवेटाइजेशन, देश की सम्पत्तियां बिक जाएंगी, शिक्षा, स्वास्थ बस मुफ्त तुम कर दो, हर घर रोशनी से यहांँ तुम भर दो, देकर रोज़गार युवाओं को देश में उनकी झोली ए मेरी सरकार भर दो, परिचय :-  रामेश्वर दास भांन निवासी : करनाल (हरियाणा) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्री...
मेरा वह परिवार कहाँ है
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मेरा वह परिवार कहाँ है

आनंद कुमार पांडेय बलिया (उत्तर प्रदेश) ******************** अपनो की वह हंसी ठिठोली, कोयल जैसी मीठी बोली। सबका एक समूह में रहना, था अपना परिवार हीं गहना।। दिखता वह अधिकार कहाँ है। मेरा वह परिवार कहाँ है।। भरा पूरा परिवार था अपना, अब क्यों हुआ आज है सपना। दादी का शाही फरमान, दादा का अपना पहचान।। वह चिट्ठी का आना जाना, पढ़ने सुनने का दौर निराला। वह क्षण तो अद्भुत लगता था, प्रेम का था हर-पल उजाला।। सपनों का वह संसार कहाँ है। मेरा वह परिवार कहाँ है।। मानू सब कुछ बदल गया है, नया दौर सब निगल गया है। मोबाइल के दौर में अब तो, अपना सब कुछ फिसल गया है।। घर परिवार तो नजर न आता, इंटरनेट से जुड़ गया नाता। बदल गया इंसान यहाँ का, अलग-थलग सब हुआ विधाता।। मां बेटे में प्यार कहाँ है, मेरा वह परिवार कहाँ है।। वह राजा रानी की कहानी, सुनते थे नानी की जुबानी। मां ...
मरना किसलिए
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मरना किसलिए

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मरना किसलिए जीने के लिए सिमट गया मानव अपने आप में ताशो के पत्तों सी फेटी जा रही है ज़िंदगी सिर्फ स्वयं के लिए, स्वयं के लिए पर सुनो तुम्हें बिखरना ही होगा बिखरना ही होगा चाहे छुपकर क्यों नहो बिखरना होगा वृक्ष के पत्तों की तरह पिलासपन लिए कहीं दूर बहुत दूर जा गिरना है अपनों से तू भूल गया की वृक्ष फल फूल लेते हैं दूसरों के लिए फिर तू क्यों सिमट रहा है अपनों में समाज देश में कुछ बाटता हुआ निकल जा ताश के पत्तों सा बादशाह बन निकल जा बेताज बादशाह। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय...
अब इसी बात का डर है !
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अब इसी बात का डर है !

डाॅ. रेश्मा पाटील निपाणी, बेलगम (कर्नाटक) ******************** अब शराबियों का कोई डर नहीं है बदमाशों के खौफ से भी गली नहीं कांपती शराब अपनी बोतल में ठंडी पडी होती है तिजोरियों के ताले बदमाशों के हाथ लगे हैं डर बंदूक का नहीं है डर तलवार का भी नहीं है अब मुझे रंगों से डर लगता है पड़ोस में रहने वाले पड़ोसी का अब पड़ोसी कट्टरता से हरा हो गया है धर्मांधता से भगवा हो गया है हठधर्मी से नीला हो गया है मुझे नहीं पता कि भारत में कितने गांव और कस्बे हैं लेकिन हर गांव में हर शहर में भारत है अब डर लगने लगा है की भारत का अंत हो रहा है यहां धर्मों की घोषणा के साथ विविधता से भरी गली हिल गई है और दिल्ली सोने का नाटक कर रही है और खर्राटे ले रही है दिल्ली क्या अब कभी जागृत नहीं होगी? मुझे अब इस बात का डर है नाथूराम गांधी की मूर्ति के सामने खड़े हैं लेकिन गांधी की ...
मित्रता के दोहे
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मित्रता के दोहे

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** मिले मित्रता निष्कलुष, मित्र निभाये साथ । मित्र वही जो मित्र का, कभी न छोडे़ हाथ ।। पथ दिखलाये सत्य का,आने नहिं दे आंच । रहता खुली किताब-सा, लो कितना भी बांच ।। मित्र सदा रवि-सा लगे, बिखराता आलोक । हर पल रहकर साथ जो, जगमग करता लोक ।। कभी न करने दे ग़लत, राहें ले जो रोक । सदा मित्र होता खरा, जो देता है टोक ।। बुरे काम से दूर रख, जो देता गुणधर्म । मित्र नाम ईमान का, नैतिकता का मर्म ।। नहीं मित्रता छल-कपट, ना ही कोई डाह । तत्पर करने को ‘शरद’, वाह-वाह बस वाह ।। खुशबू का झोंका बने, मीठी झिरिया नीर। मित्र रहे यदि संग तो, हो सकती ना पीर ।। मित्र मिले सौभाग्य से, बिखराता जो हर्ष । मिले मित्र का साथ तो, जीतोगे संघर्ष ।। भेदभाव को भूल जो, थामे रखता हाथ । कृष्ण-सुदामा सा ‘शरद’, बालसखा का साथ ।। ...
हिंदी जैसा शालीमार
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हिंदी जैसा शालीमार

सीताराम पवार धवली, बड़वानी (मध्य प्रदेश) ******************** विश्वगुरु की ये भाषा हिंदी सारी भाषाओं की महारानी है। हिंदी को छोटा न बोल हिंदी ने हिंदुस्तान का नाम बढ़ाया है। हिंदी से संस्कृति जन्मी हिंदी ने संस्कारों का पाठ पढ़ाया है हिंदी की इस दुर्दशा के असली जिम्मेदार हम ही तो हैं। हिंदी छोड़ हमने इन अंग्रेजों की अंग्रेजी को सिर पर चढ़ाया है हिंदी अगर जहां में नहीं होती तो फिर ये हिंदुस्तान नहीं होता हिंदुस्तान में आकर विदेशियों ने हिंदी का मजाक उड़ाया है आक्रांताओ ने हिंदी को अपमानित करने का काम किया फिरंगीयो ने आकर हिंदुस्तानी भाषाओं को आपस में लड़ाया है हिंदी आन हिंदी शान हिंदी हिंदुस्तान के जीवन की शैली है हिंद देश के वासीयो ने मिलकर हिंदी को इनके चंगुल से छुड़ाया है धरती पे अगर हिंदी नहीं होती तो दुनिया दिशाहीन हो जाती आतताईयों ने ये भोली हि...
अभिनंदन है…. शब्द पुष्प
कविता

अभिनंदन है…. शब्द पुष्प

अखिलेश राव इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** आप आए पुण्य धारा पर स्वागत वंदन अभिनंदन है। रोली कुमकुम हल्दी अक्षत संग सुभाषित चंदन भी है तुम आए हो पुण्य धारा पर स्वागत वंदन अभिनंदन है। महाकाल उज्जैन के राजे ओंकारेश्वर ओंकार विराजे खजराना की ख्याति राष्ट्र में पितरेश्वर,ऱंजीत सरकार विराजे अतिथि देवोभव, सहित पुण्य देव सादर नमन है स्वागत वंदन अभिनंदन है,... घर आंगन द्वार सजाये आगत पलक पावंड़े बिछाये मुदित मना स्वागत करते है बांरबार तुम्हे नमन है स्वागत वंदन अभिनंदन है ... पुलिस लगी है चप्पे चप्पे स्वाद बड़ा रहे गोल गप्पे ईमरती जलेबी उसलपोहा गीत गजल भजन दोहा भुट्टे का किश लेकर देखो बार बार ललचाये मन स्वागत वंदन अभिनंदन .... समिट मीट जो आगे बढेगी विकास का आकाश छुयेगी सुख समृद्धि पुष्पित होगी नभ से बरसेगा कुंदन स्वागत वंदन अभिनंदन। परिचय :- अखिल...
महामना पंडित मदन मोहन मालवीय
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महामना पंडित मदन मोहन मालवीय

आशा जाकड़ इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** माँ भारती की महान सन्तान महामना पंडित मदन मोहन मां मुन्नी देवी, पिता ब्रजनाथ उनके चरण शत-शत नमन शिक्षा के थे वह अनुपम प्रेमी ५ वर्ष आयु से विद्यारंभ किया बाधाएं आई, पढना नही छोडा अध्यापन किया और पढ़ाई की महात्मा गांधी जी के बहुुत प्रिय युग के आदर्श पुरुष कहलाते पंडित मदनमोहन को महामना इस उपाधि से सम्मानित किया बसंत पंचमी को स्थापना की बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की विश्वविद्यालय के कहलाए प्रणेता एनी बेसेंट ने भी दिया सहयोग प्राचीन सभ्यता-संस्कृति के साथ आधुनिक ज्ञान का किया समर्थन शिक्षा की समृद्धि के लिए किया पूरा जीवन देेश उत्कर्ष समर्पण बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में ज्ञान का अनुपम दीप जलाया भारत ही नहीं सम्पूर्ण जगत में कण-कण प्रकाशित कराया।। परिचय :- आशा जाकड़ (शिक्षिका, साहित्यकार एवं समाजसेविका) शि...
वीर सैनिक वंदना
कविता

वीर सैनिक वंदना

राम स्वरूप राव "गम्भीर" सिरोंज- विदिशा (मध्य प्रदेश) ******************** धुन - बाबुल की दुआएँ लेती जा... हे सैनिक देश की सेना के, है सौ- सौ बार प्रणाम तुम्हें| है गर्व हमें तुम पर वीरों, अभिनन्दन, नमन प्रणाम तुम्हें। ... हे सैनिक देश... तुम को भी खुशियाँ दीं प्रभु ने, वह रास न आईं तुम्हारे लिए | परिजन ने तुमको समझाया, था वतन से प्रेम तुम्हारे लिए। साहस से खड़े सीना ताने, है आशिष, प्रीत प्रणाम तुम्हें। ... हे सैनिक देश.... जब-जब दुश्मन ने फुंकारा, फन कुचला उसका पावों से। ऐसा मारा इतना मारा, छू भागा हमरे गांवों से। हे काल हमारे शत्रु के, जग विजयी वीर प्रणाम तुम्हें।.. हे सैनिक देश की... सीने पे लगती है गोली, जय हिन्द के घोष निकलते हैं। जब तक न गिरा दें शत्रु को, नहीं तन से प्राण निकलते हैं। है विजयी तिरंगा हाथों में, या तन पे कफ़न प्रणाम तुम्हें। ह...
सैलाब
कविता

सैलाब

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** यादों के सैलाब में घूम गया कोई हवा के झोंकों सा छू गया कोई आया कोई तनहाई सा छा गया मंत्र सुमन सौरभ सा मन बहला गया कोई। सोचा यथार्थ है या स्वप्न कुछ समझ नहीं पाई कभी आभास होता बहुत करीब है कोई बहुत होता कभी आभास दूर बहुत दुर। चला गया कोई, चला गया कोई। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं व वर्तमान में इंदौर लेखिका संघ से जुड़ी हैं। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित क...
गणतंत्र दिवस
कविता

गणतंत्र दिवस

डॉ. किरन अवस्थी मिनियापोलिसम (अमेरिका) ******************** गणतंत्र दिवस हम मना रहे, लहर लहर लहराए तिरंगा देशप्रेम की अलख जगी है, भारत की हर साँस तिरंगा। भारत की सीमाएँ, रक्षित बनी रहें सदा, भारत की सेना के बल, लहराए तिरंगा सदा सदा। चाहे बम हो या मिसाइल, या चाहे हनुमान-गदा भारत की दसों दिशाएं रक्षित रहें सदा सदा। भारत की सीमाओं का, होता जाए विस्तार सदा वैदिक युग का, हिंद महासागर, जो आर्यावर्त की मूल धरा। अमर रहे, सम्मानित, भारत का संविधान सदा बन जाए हमारी गीता, भारतवासी का ज्ञान सदा। देववाणी, सनातन संस्कृति कर्तव्य भाव का ध्यान सदा उपनिषदों की व्याख्या हो, वेदों का हो मान सदा।। परिचय :- डॉ. किरन अवस्थी सम्प्रति : सेवा निवृत्त लेक्चरर निवासी : सिलिकॉन सिटी इंदौर (मध्य प्रदेश) वर्तमान निवासी : मिनियापोलिस, (अमेरिका) शिक्षा : एम.ए. अंग्रेजी,...
ये मौसमी बहारें
कविता

ये मौसमी बहारें

सरला मेहता इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मौसम दे जाते संदेशें नसीहतें भी हैं दे जाते तालमेल रहे नियति से इसका सबको भान रहे बारी बारी से ये आते सारे नियम निभाते हैं आचरण से ही रहना है ये सबको सीख दे जाते गलतियाँ जो करोगे तुम भोगना तुमको ही होगा ये सारे बदलते मौसम प्रकृति के साथ चलते हैं झंझावात है आता तरु सब काँपने लगते हरित पल्लव सिहर जाते भय से रुग्ण हो जाते जो आया है उसे जाना झरकर उपदेश दे जाते ये सारे बदलते मौसम प्रकृति के साथ चलते हैं प्रस्फुटित नवकोपलें देखो स्वागत नवसृजन का है हलधर खेत में झूमे नदियाँ मल्हार हैं गाती सावनी बूंदे बरसकर के खुशियाँ धरा पर लाती ये सारे बदलते मौसम प्रकृति के साथ चलते हैं बसंत जब मुस्कुराता है सुहाने सफ़र सा अहसास माँ शारदे हो पुलकित वीणा तान झंकृत हो होता आल्हाद है चहुँ ओर नई उम्मीदें जगती है ये स...
जीने के कुछ सवाल
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जीने के कुछ सवाल

रामेश्वर दास भांन करनाल (हरियाणा) ******************** वो शख़्स आज भी, उसी गली पर मिलता है, गांव जाता हूंँ जब, वो शख़्स मुझे वहीं मिलता है, जानता हूंँ उसे अपने, बचपन के दौर से, आज भी मगर वो, उसी हाल में मिलता है, तंग रखा है शुरू से, मुफलिसी ने उसको, उससे निकलने की वो शख़्स, जिद्द लिए मिलता है, पढ़ते थे साथ तब कहता था, बदलेगी तक़दीर, मगर आज भी वो शख़्स, वो ही ख़्वाब लिए मिलता है, तोड़ दिए हैं सब सपने, हालातों ने उसके, अब तो बस जीने के, कुछ सवाल लिए मिलता है परिचय :-  रामेश्वर दास भांन निवासी : करनाल (हरियाणा) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते ह...
इस जमाने में
कविता

इस जमाने में

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** बहुत जोर लगाना पड़ेगा सदियों से खड़े खंभे को हिलाने में, बस प्रेम ही है एक आधार नफरत के जखीरे को मिटाने में, वजूद मिट जाने का न रख डर बन जा नींव अपने विचारों को सृजाने में, भिगो देना आसान है पर समय लगता है सूखने और सुखाने में, हाड़ मांस सुखा मेहनत किया हूं पेट भरने के लिए नहीं सेंध मारा निजी खजाने में, मेरी बातें उतनी बुरी भी नहीं फिर क्यों घिरा रहता हूं किसी के निशाने में, कोई कुछ भी कहे बोले जी जान लगाया है मैंने कमाने में, क्योंकि मुझे समझ आ गया कि पैसा बहुत जरूरी है इस जमाने में। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट...