शब्दों के रणवीर
भीमराव झरबड़े 'जीवन'
बैतूल (मध्य प्रदेश)
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लगा रहे जयकारे केवल, शब्दों के रणवीर।
गीत हुए हैं चारण सारे, अब क्या करे कबीर।।
फुदक-फुदक ये बजा रहे हैं,वाह वाह की झाँझ।
लिपटे हैं पति-सी सत्ता से, ज्यों हो सौतन बाँझ।।
मगरमच्छ-से आँसू इनके, पल-पल हुए अधीर।।
चुन-चुन कर ये मार रहे हैं, पत्थर वाले फूल।
रीति नीति के काटें बोते, पथ पर ऊल-जलूल।।
तमगों के चाहत में डोले, इनका सर्प ज़मीर।।
छल-छंदों में लिप्त मिला है,लालकिले का फर्ज।
चढ़ा हुआ भाटों के सिर भी, इसी दुर्ग का मर्ज।।
रोज माॅबलिंचिंग कर ढोंगी, करते पेश नज़ीर।।
परिचय :- भीमराव झरबड़े 'जीवन'
निवासी : बैतूल मध्य प्रदेश
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।
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