बकुल वीथिका के सौरभ में
भीमराव झरबड़े 'जीवन'
बैतूल (मध्य प्रदेश)
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आधार छंद - सार छंद
बकुल वीथिका के सौरभ में, प्रेम-पंथ महमाता।
गंधसार तुम बन खंजन मैं, देख तुम्हें ललचाता।।१
विधुवदनी तुम पूरनमासी, बन छत पर जब आती,
दृग-सागर में प्रणय-पुस्तिका, पढ़ मैं नित्य नहाता।।२
सांध्य दीप-सी ढ्योड़ी को तुम, जगमग ज्यों कर देती,
हृदयांचल के मंदिर में मैं, तुम्हें सजा हर्षाता।।३
अवगुंठन की आड़ लिए तुम, मंद-मंद शर्माती,
पाटल अधरों पर प्रियता का, चुंबन मैं धर जाता।।४
रति रंभा तुम परिरंभन की, आस लगा जब बैठी,
यह मन वासव प्रमुदित होकर, ठुमके साथ लगाता।।५
प्यास पपीहे सा तड़पाती, मन के मरुथल को जब,
तुहिन कणों को भर सीपी में, तुम्हें पिलाने आता।।६
सुधियाँ ओढ़े सो जाती तुम, सपनों के बस्ती में।
चंचरीक मैं सारंगी पर, लोरी मधुर सुनाता।।७
परिचय :- भीमराव झरबड़े 'जीवन'
निवासी : बैतूल मध्य प्र...
























