पृथ्वी दिवस
सुभाष बालकृष्ण सप्रे
भोपाल (मध्य प्रदेश)
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"लोग अक्सर करते हैं जिक्र हमारा,
देखते नहीं क्या हो रहा है, हश्र हनारा,
जल जंगल जमीन का बिखर रहा नाता,
मायूसी के आलम में टूट रहा, सब्र हमारा,
जहां, लहलहाते थे, मीलों हरे भरे, जंगल,
कुल्हाडी के घावों से रिस रहा लहू हमारा,
चीख-चीख कर आगाह कर रहे कई लोग,
मतिभ्रम से हो रहा पल पल विनाश हमारा,
अनियंत्रित हो रहे हैं, सारे दुनिया, में मौसम,
बढती उष्मा से पिघल रहा ग्लेशीयर हमारा,
प्रकृति हमेशा देती, इस बात की पूर्व चेतावनी,
समय रहते ही जाग कर, बचा लो संसार हमारा."
परिचय :- सुभाष बालकृष्ण सप्रे
शिक्षा :- एम॰कॉम, सी.ए.आई.आई.बी, पार्ट वन
प्रकाशित कृतियां :- लघु कथायें, कहानियां, मुक्तक, कविता, व्यंग लेख, आदि हिन्दी एवं, मराठी दोनों भाषा की पत्रीकाओं में, तथा, फेस बूक के अन्य हिन्दी ग्रूप्स में प्रकाशित, दोहे, मुक्तक लोक की, तन दोहा, मन...























