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पद्य

ज़ुल्म और दर्द
कविता

ज़ुल्म और दर्द

शशि चन्दन इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** होती जब-जब अस्मिता की हानि, उठती ज़ुल्म और दर्द की आंधी, पौरुष तो रहता जन्मजात अंधा, स्त्रियाँ भी नेत्रों पर पट्टियां बांध लेती हैं।। भीष्म प्रतिज्ञा लेने वाले गंगा पुत्र भी भरी सभा बीच मौन हो पछताते हैं.., गुरुजन और नीति श्रेष्ठ विदुर भी,, हाथ पे हाथ धरे फफकते रह जाते हैं।। झूठी दुनिया के संगी साथी देव पुत्र, हर कर अपना सब कुछ हाय कैसे, ये दांव अपनी ही स्त्री को लगाते हैं, बाजुओं के बल पर धिक्कारे जातें हैं।। खींचता है जब साड़ी दुर्शासन., झूठे रिश्तों से भीख मांग हरती अस्मिता, तब कृष्णा को फिर कृष्ण ही याद आते हैं, और अम्बर से चीर बढ़ा वो..., रेशम के एक धागे का मोल चुकाते हैं..।। कटी थी जब ऊंगली केशव की.., कृष्णा ने अपने आंचल का चीर फाड़, कृष्ण की ऊंगली पर बांधा था..., कृष्ण एक भाई का फर्ज निभाने आते हैं...
उद्यमशील पिता की बेटी
कविता

उद्यमशील पिता की बेटी

अंजनी कुमार चतुर्वेदी निवाड़ी (मध्य प्रदेश) ******************** खनन उपकरण काँधे पर रख, खेती करने जाती। पढ़ी-लिखी, शिक्षित श्रमिका है, हरसाती मुस्काती। खेतों में श्रम बिंदु बहाते, बाबुल थक जाते हैं। लिए कुदाल हाथ में अपनी, बेटी को पाते हैं। निकल पड़ी है वीर यौवना, मेहनत गले लगाने। हँसती और मुस्कुरा गाती, है बरसाती गाने। स्वयं पिता का हाथ बटाने, खेतों पर जाती है। खेती के सब काम देखती, हरबोला गाती है। नारी को जो अबला कहते, उनको है बतलाती है। कुछ भी कर सकती है नारी, जब अपने पर आती। कठिन परिश्रम करके तन से, जब श्रम बिंदु बहाती। उद्यमशील पिता की छाती, गजभर फूली जाती। साहस और समर्पण लख कर, युवा शर्म खाते हैं। चुल्लू भर पानी में कायर, डूब मरे जाते हैं। बिटिया की मेहनत रँग लाई, फसल लहलहाती है। हरे भरे खेतों को लखकर, बिटिया मुस्काती है। हम सबको श...
आगे दिन किसानी के
आंचलिक बोली

आगे दिन किसानी के

अशोक पटेल "आशु" धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** काँटा खूंटी ल बिन ले सँगी मेड़ पार ल चतवार ले। आगे हे दिन किसानी के सँकेल के आगी बार दे। चारो कोती खातु कुड़हा टेपरी डोली भर म पाल दे। बाढ़े सब कांदी-कचरा ल खन-खन के ओला टार दे। परछी उतरे हे मेड़ पार म तीरे-तार ल ढेलवानी दे-दे। खेत के भोरका डबरा ल खन के रापा-रापा पाट दे। मेड़ बनगे हे रोठ-रोठ मुही ओ मेड़ जम्मो ल सुधार दे। मेड़ जम्मो म माटी भर के सुग्घर मेड़-पर ला सवाँर दे। बिजहा तिल राहेर हिरवा ल मेड़-पार सब्बो कती छिंच दे। खेत के सुग्घर जोताई करके धान बिजहा ल बोवाई कर दे। परिचय :- अशोक पटेल "आशु" निवासी : मेघा-धमतरी (छत्तीसगढ़) सम्प्रति : हिंदी- व्याख्याता घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आद...
अपनी ख्याति में
कविता

अपनी ख्याति में

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** व्यक्ति व्यक्ति का निर्बल संगम कर रहा मानवता को कायर बढ़ रही आज अमानवता कर रहे मानवता में दानवता। सत्य, स्पूर्ति स्पंदन गया आज उड़ मानवता से जागे आज अनेक रावण करवातेे नित नए क़दम। एक पुरुष का पौरूष जागे करें क्या एक अकेला इस नर्तन में। रक्त देख रक्त खौलता था शिराएं थी तनजाती वर्कका मनु, मनु सानहीहै मग न केवल अपनी छाती में। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ीआप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं व वर्तम...
बरसात
कविता

बरसात

रशीद अहमद शेख 'रशीद' इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** जीवन के नवगीत मनोहर, चारों ओर सुनाने आई। प्यासी धरती की आशाएँ, फिर बरसात जगाने आई। बूँदों की मोती मालाएँ, अंबर से भू तक आएँगी। गहन घाटियों से शिखरों तक, चाँदी की पर्तें छाएँगी। तपते कण-कण को सुखदाई, शीतलता पहुँचाने आई। प्यासी धरती की आशाएँ, फिर बरसात जगाने आई। सावन में रिमझिम झड़ियाँ तो, भादौ में घनघोर घटाएँ। वन-उपवन में मेघपुष्प की, बिखराएँगी रम्य छटाएँ। नयनों को आकर्षक सुन्दर, अनुपम दृश्य दिखाने आई। प्यासी धरती की आशाएँ, फिर बरसात जगाने आई। मतवारी बदरी के पीछे, कजरारे बादल आएँगे। गाज गिरेगी जब अलगावी, नीर नयन से बरसाएँगे। प्रेमी युगलों को अनुरागी, पाठ कठिन सिखलाने आई। प्यासी धरती की आशाएँ, फिर बरसात जगाने आई। परिचय -  रशीद अहमद शेख 'रशीद' साहित्यिक उपनाम ~ ‘रशीद’ जन्मतिथि~ ०१/०४/१...
रिति गागर
कविता

रिति गागर

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मन की रीति गागर में आ गया समंदर का घेरा इन अलको में इन पलकों में भटक गया चंचल मन मेरा। कंपीत लहरों सी अलके है। ्दृगके प्याले भरे भरे। तिरछी चितवन ने देखो कर दिए दिल के कतरे कतरे,। द्वार खुल गए मन के मेरे मनभावन ने खोल दिए बैठे किनारे द्वारे चौखट दृग पथमे है बिछा दिए परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ीआप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं व वर्तमान में इंदौर लेखिका संघ से जुड़ी हैं। घोषणा पत्र : मैं यह प्...
हमर छत्तीसगढ़
आंचलिक बोली

हमर छत्तीसगढ़

डोमेन्द्र नेताम (डोमू) डौण्डीलोहारा बालोद (छत्तीसगढ़) ******************** गाँव-गाँव म शीतला बिराजे, मन मयारुक उजागर हे । हमर छत्तीसगढ़ आगर हे, देवता धामी के सागर हे ।। दंत्तेवाड़ा म तही बिराजे हस, दंत्तेश्वरी महारानी । आंनद मंगल भरें जंगल म, बरसावत हस बरदानी ।। रतनपुर म महामाया बिराजे, महिमा जेकर हे भारी । गंगरेल म अंगार मोती दाई, दु:ख दरिद्रा ल संघारी ।। डोगरगढ़ म बम्लेश्वरी ह बैइठें, चूरी कंगना साजे । राजनांदगाँव म पताल भैरवी, सबों के मन ल भाते ।। राइपुर के दुंधाधारी, बंजारी हे पावन जेकर धाम । धमतरी म बिलाई माता, जेला मेहां करव प्रणाम ।। झलमला म सुग्घर बिराजे हावे, जय हो गंगा मैय्या । चैंत कुंवार म मेला भराथे, पापी मन के पाप धोवइय्या ।। राजिम म राजीव लोचन, अरपा, पैरी के सुग्घर धार हे । मया-दुलार मिले आशीष सुग्घर, डोमू के इंही गोहार हे।। परिचय :- डोमेन्द्र ने...
कुंडलियाँ
कुण्डलियाँ

कुंडलियाँ

कीर्ति मेहता "कोमल" इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** देख शिकारी आदमी, बिना लिए हथियार। तन पर उजला चैल है, मन में काली धार।। मन में काली धार, चले हैं वो व्यापारी। बिना लगाए दाँत, डसे है ये विषधारी।। कोमल होती दंग, फँसे जनता बेचारी। नेता करते घात, धूर्त हैं देख शिकारी।। बैठ शिकारी राह में, घात लगाए एक। सरल लक्ष्य को ताकता, आँख वहीं पर टेक।। आँख वहीं पर टेक, बालिका सुंदर प्यारी। जाल बिछाता देख, कलुष देखो व्यभिचारी।। कोमल करती क्रोध, पाप की ये बीमारी। हरो दुष्ट के प्राण, राह में बैठ शिकारी।। बनो शिकारी साधकों, शब्द बिछाओ जाल। रचो काव्य की योजना, छंद सोरठा माल।। छंद सोरठा माल, नाथ को करना अर्पण।। सुनो ध्वनि करताल, दमकना फिर तुम दर्पण।। कोमल बड़ी प्रसन्न, महालय है हितकारी। श्रोता से पा मान, शब्द के बनो शिकारी।। बनी शिकारी आज मैं, देखूँ कर की ताल। टेढ़ी-म...
तेरी तलाश में
कविता

तेरी तलाश में

राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मैं आज भी तुमको ढूंढता हूं तेरी अनकही बातों में, मैं आज भी तुमको ढूंढता हूं तेरी खामोश हुई चुपी में, मैं आज भी तुमको ढूंढता हूं इन बरसती हुई बरसातों में, मैं आज भी तुमको ढूंढता हूं इन मखमली सी शामों में, मैं आज भी तुमको ढूंढता हूं इन बहती हुई हवाओं में, मैं आज भी तुमको ढूंढता हूं इन गुमशुम रातों में, मैं आज भी तुमको ढूंढता हूं तुम से हुई मुलाकातों में, मैं आज भी तुमको ढूंढता हूं तुम से हुई छोटी-छोटी बातों में। परिचय :- राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि र...
कोई तो चीत्कार  सुने उसकी
कविता

कोई तो चीत्कार सुने उसकी

अशोक पटेल "आशु" धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** भरी बरसात के मौसम में भी नदियाँ वीरान सी लगती है कोई तो चीत्कार सुने उसकी वह खाली-खाली लगती है। सारी नदियाँ दूर-दूर तलक बंजर जमीन सी लगती है बन गई शहर का कूड़ादान इसे देख नदियाँ सिहरती है। आज नदियाँ मैली लगती है नाली सी वह काली हो गई गंदे पानी से हुई वह कुत्सित मीठे जल से वंचित हो गई। सारे घाटों का बंदरबाट हुआ सुना-सुना पनघट घाट हुआ सब जीव-जंतु पानी को तरसे पूरी नदियाँ श्मशान घाट हुआ। यह नदियाँ हमेशा चीख रहीं कोई तो उसकी पुकार सुनो गङ्गा की तरह यह भी लहराए कोई तो उसकी गुहार सुनो। परिचय :- अशोक पटेल "आशु" निवासी : मेघा-धमतरी (छत्तीसगढ़) सम्प्रति : हिंदी- व्याख्याता घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, क...
माँ मै दौडूंगा
कविता

माँ मै दौडूंगा

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** माँ मै तुम्हारे लिए दौडूंगा जीवन भर आप मेरे लिए दौड़ती रही कभी माँ ने यह नहीं दिखाया कि मै थकी हूँ। माँ ने दौड़ कर जीवन की सच्चाइयों का आईना दिखाया सच्चाई की राह पर चलना सिखाया। अपने आँचल से मुझे पंखा झलाया खुद भूखी रह कर मेरी तृप्ति की डकार खुद को संतुष्ट पाया। माँ आप ने मुझे अँगुली पकड़कर चलना बोलना लिखना सिखाया और बना दिया बड़ा आदमी मै खुद हैरान हूँ। मै सोचता हूँ मेरे बड़ा बनने पर मेरी माँ का हाथ और संग सदा उनका आशीर्वाद है यही तो सच्चाई का राज है। लोग देख रहे खुली आँखों से माँ के सपनों का सच जो उन्होंने मेहनत भाग दौड़ से पूरा किया माँ हो चली बूढ़ी अब उससे दौड़ा नहीं जाता किंतु मेरे लिए अब भी दौड़ने की इच्छा है मन में। माँ अब मै आप के लिए दौडूंगा ता उम्र तक दौडूंगा दुनिया को ये दिखा संकू ...
खुशबू
ग़ज़ल

खुशबू

गोपाल मोहन मिश्र लहेरियासराय, दरभंगा (बिहार) ******************** पलकों पर ठहरी है रात की खुशबू अनकही अधूरी हर बात की खुशबू साँसों की थिरकन पर चूड़ी का तरन्नुम माटी के जिस्म में बरसात की खुशबू पतझड़ पलट गया दहलीज तक आकर जीत गई अंकुरित ज़ज्बात की खुशबू अहसास-ऐ-मुहब्बत तड़प तड़प के मर गया जिंदा रही पहली मुलाकात की खुशबू पलकें झुका के कैफियत कबूल की मगर ज़वाबों से आती रही सवालात की खुशबू जुल्फों की कैद में कुछ अरसा ही रहे उम्र भर आती रही हवालात की खुशबू कली रो पड़ी हूर के गजरे में संवर कर भूल ना पाया पड़ोसी पात की खुशबू I परिचय :-  गोपाल मोहन मिश्र निवासी : लहेरियासराय, दरभंगा (बिहार) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अ...
दोहाष्टक
दोहा

दोहाष्टक

भीमराव झरबड़े 'जीवन' बैतूल (मध्य प्रदेश) ******************** यौवन रस बरसा मगर, हुई न प्रीति प्रगाढ़।। मृदु चुंबन की आस में, दुर्बल हुआ असाढ़।।१ चितवन ने होकर मुखर, बिछा दिया है जाल। चुग्गा चुगने को प्रणय, खग सा भरे उछाल।।२ मदिर नैन झुकते गये, रक्तिम हुए कपोल। चुंबन का प्रतिसाद पा, थिरक उठे रमझोल।।३ हृदय पृष्ठ पर प्रीति के, उग आये जलजात। नैनो से झरने लगे, प्रियता युक्त प्रपात।।४ ले स्वरूप संकल्पना, जोड़ - जोड़ संदर्भ। शब्द-बीज का प्रस्फुटन, हो जब कवि के गर्भ।।५ धरा मेघ मिल रच रहे, प्रियता के अनुबंध। रोम-रोम से आ रही, मदिर पावसी गंध।।६ जला दिये तारीफ कर, हीरामन ने दीप। रत्नसेन मन जा बसा, प्रिय के सिंहल द्वीप।।७ सम्बन्धों के दुर्ग की, कवच बने प्राचीर। मोती रखे सहेज कर, पड़ी सीप ज्यों नीर।।८ परिचय :- भीमराव झरबड़े 'जीवन' निवासी : बैतूल मध्य प्रदेश घोषणा पत्र...
किताब मैं तस्वीर
कविता

किताब मैं तस्वीर

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** किताबों मैं तेरी तस्वीर छुपा दी थी कभी तस्वीर नहीं दिखती खोजता हूँ तुझे अब किताबों में। हाथों की लकीरों में तेरा नाम देखूं अब यादों में कहीं उनका जिक्र हो । भीगी पलकों से याद करते हुए तुम्हें खोजा चाहत ही रही । तुम्हें पाने की ... किताबों में छुपी तस्वीरें अब सपने में ही देखता अब तो अनजान रिश्तों के लिए बेचैन हूं। ढूंढता हूँ तस्वीर को जो किताबों में छुपा दी। परिचय :- संजय कुमार नेमा निवासी : भोपाल (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि...
काश पंख होते मेरे…
कविता

काश पंख होते मेरे…

हरिदास बड़ोदे "हरिप्रेम" गंजबासौदा, विदिशा (मध्य प्रदेश) ******************** काश पंख होते मेरे, उड़ जाता, काश पंख होते मेरे, उड़ जाता। मनचाही जगह पर मैं, चला जाता, काश पंख होते मेरे, उड़ जाता। काश पंख होते मेरे, उड़ जाता।। कोई अपना दूर सही, याद सताती है, जिस पल में याद करूं, याद आती है। दिल जितना याद करे, मुझको रुलाती है, मेरा दिल धड़के यूं, मिल जाता। मनचाही जगह पर मैं, चला जाता, काश पंख होते मेरे, उड़ जाता। काश पंख होते मेरे, उड़ जाता।। दिन याद करूं दूनी, रात चौगुनी आती है, आकर मेरे सपनों में, समां जाती है। एहसान किया ऐसा, सपनों में आकर सही, मेरा सपना चाहे यूं, मिल जाता। मनचाही जगह पर मैं, चला जाता, काश पंख होते मेरे, उड़ जाता। काश पंख होते मेरे, उड़ जाता।। हर पल मैं याद करूं, एहसास मुझे ऐसा, जुदाई भी क्या ऐसी, मुझे तड़पाती है। देखो छलके आंसू मेरे, क...
तीन वर्ष के नीम तुम
कविता

तीन वर्ष के नीम तुम

सुरेश चन्द्र जोशी विनोद नगर (दिल्ली) ******************** तीन वर्ष के नीम तुम, तुमको मैं कैसे मिटने दूँ ? "वैद्य" मानव के नीम तुम, तुमको मैं कैसे मिटने दूँ ? तीन वर्ष के...... लगाये थे अभी उन्नीस में तुम , बाइस में कैसे मिटने दूँ ? अस्सी-नब्बे आयु प्रमाणी तुम, तीन में ही कैसे मिटने दूँ ? तीन वर्ष के....... प्रकृति की अद्भुत शोभा तुम , अस्तित्व कैसे मिटने दूँ ? एक अनिल ने गिराया तो, उठवा तुम्हें मैं "अनिल" से दूँ ||तीन वर्ष के........ मानव प्रकृति की औषधि तुम , तुमको मैं कैसे मिटने दूँ ? मेरी तो आत्मा हो तुम , तुमको मैं कैसे मिटने दूँ ? तीन वर्ष के....... तीन वर्ष के नीम तुम , तुमको मैं कैसे मिटने दूँ ? वैद्य मानव के नीम तुम , तुमको मैं कैसे मिटने दूँ ? तुमको मैं कैसे मिटने दूँ ? तुमको मैं कैसे ............... परिचय :- सुरेश चन्द्र जोशी शिक्षा : आचार्य, बीएड टीजी...
आप गुजरे जिस गली से
कविता

आप गुजरे जिस गली से

सरला मेहता इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** डा र डा डा डा र डा डा डा र डा डा डा र डा २१२२ २१२२ २१२२ २१२ आप गुजरे जिस गली से महफ़िलें गुलज़ार हैं चाँदनी बिखरे ज़मीं पे खुशनुमा अहसास है ये फ़िज़ाएँ गा रही हैं बानगी तारे दिखाते हर तऱफ छाया सुकूँ है रहनुमा भगवान हैं तू कदम रख दे जहाँ पर फूल खिलकर महकते हैं तू सभी का चहेता है दिलरुबा का मान है आज मेरे आँगना में माँडने की शान छाई दीप जोया साँझ आई शुभ घड़ी की शान है परिचय : सरला मेहता निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, ल...
नेता वफादार चाहिए
कविता

नेता वफादार चाहिए

प्रभात कुमार "प्रभात" हापुड़ (उत्तर प्रदेश) ******************** भारत को नेता गद्दार नहीं वफादार चाहिए। मंदिर में पंडित का मस्जिद में मौलवी का बहकावा नहीं सच्ची पूजा चाहिए। भारत का नेता गद्दार नहीं वफादार चाहिए । चर्च में पॉप का गुरुद्वारे में ग्रंथियों का बहकावा नहीं सत्उपदेश चाहिए। भारत को नेता गद्दार नहीं वफादार चाहिए। मत पथ भ्रमित हो मेरे भारत के युवान अंतर्मन का करो जागरण- तुम ही में छिपा है राम का चरित्र ही तुम ही में छिपी है शक्ति हनुमान की तुम ही में छिपा है सतीत्व सीता का ही बस ह्रदय में लो यह संकल्प ठान- तुम्हें तो आधुनिक रावणों का वध करना चाहिए, आधुनिक रावणों का वध ही नहीं वर्तमान कंसों का अंतिम संस्कार करना चाहिए। भारत को नेता गद्दार नहीं वफादार चाहिए। भारत को भगतसिंह सा देशभक्त, लक्ष्मीबाई सी वीरांगना, टैगोर सा विश्वकवि सुभाष बोस सा नेता चा...
वादा करो मेरे नए कान्हा बनोगे
कविता

वादा करो मेरे नए कान्हा बनोगे

सिमरन कुमारी मुजफ्फरपुर (बिहार) ******************** वादा करो मेरे नए कान्हा बनोगे ........... विरह की नीर से महान नहीं बनना!! छोटी सी जिंदगी हैं उसे तेरे संग .......... हमें हरपल रंगना हैं प्रेम भरे रंग!! कुंज गली में रोये राधा बेसुध बन........ श्याम व्याकुल पाकर भी बेचैन!! अकेले छोड़ चले गए करके विरान........ इंतजार करते निकल गए प्राण!! वादा करो मेरे नए कान्हा बनोगे!! इंतजार में नहीं जीना हैं प्यार में........ ना मैं हूँ महान ना ही भगवान!! इस जन्म करना एक-दूसरे के नाम ......... पूरे प्रेम देकर भी नहीं मिला नाम तुम बनोगे मेरे नए मेरे घनश्याम !! प्रेमिका की तरह विरह में नहीं........ नए कान्हा के रूप में संग चलना !! मुझे कान्हा से प्रेम हैं अटूट........ पर राधा का तड़प से दिल जाता टूट!! हर रंग हर भाव में तुम रहना श्याम......... बस नहीं छोड़ना कभी भी अपन...
मोबाइल अवसाद
कविता

मोबाइल अवसाद

विजय गुप्ता दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** मोबाइल जीवन बना, आया बहुत करीब। निज सामाजिक खुशी का, सबका छिना नसीब।। डेसमंड टुटू का कथन, मिशन करे बदलाव। जमीन बाइबल बदले, लाया था ठहराव।। प्रार्थना के नाम पर, करना पड़ा विश्वास। आदत चाय ब्रिटिश की, लक्षण थे कुछ खास।। सोशल मीडिया भी यही, लाए हमें सौगात। मुट्ठी में संसार हुआ, खोए दूर जज्बात।। महत्ता मीडिया दिवस की, हो चुकी शुरुआत। सभी कुछ मोबाइल है, सब पिता बच्चे मात।। जिम्मा समाज कुटुंब का, बहुत हुआ है लोप। चुभन कसक संबंध की, बात बात पर कोप।। उच्च मध्यम गरीब वर्ग, प्रबल हुआ जुड़ाव। रिश्ता है मोबाइल पर, मिलते बहुत सुझाव।। निज दुनिया व्यस्त सभी, दोस्त बने हजार। दो और दो भूल गए, दो दूनी हैं चार। फोटोजीवी बन चुके, दिवस रैन प्रमाण। दिल मोबाइल साथ ही, दोनों बसते प्राण।। प्रगतिपथ का मंत्र है, मत पाओ अवसाद। ...
दिल्ली की औरतें
कविता

दिल्ली की औरतें

डॉ. जयलक्ष्मी विनायक भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** ये दिल्ली की औरतें कुछ मीठी और नमक सैंडिल ऊंची पहनती लगती है जैसे क्वीन। ये दिल्ली की औरतें कुछ मीठी कुछ नमकीन। पार्लर अक्सर जाती कारें रफ्तार से दौड़ाती तेज तर्राट और गर्म मिजाज़ तबीयत है इनकी रंगीन ये दिल्ली की औरतें कुछ मीठी और नमकीन। नौकरी बड़ी ऊंची करती पैसे खूब कमाती, भारत की नारियों में अग्रगणी ये किसी से कम नहीं। ये दिल्ली की औरतें कुछ मीठी कुछ नमकीन। शापिंग करने में सबसे आगे पैसे बचाने में गंभीर वाकपटुता में सबसे आगे वैभवी और महाजबीन, ये दिल्ली की औरतें कुछ मीठी कुछ नमकीन। दिल्ली की ठंडी-गर्मी सहती पर अपनी त्वचा को बकायदा संवारती, स्कूल टीचर से लेकर बिजनेस टायकून तक सब पर अपनी धाक जमाती। ये दिल्ली की औरतें कुछ मीठी कुछ नमकीन। जूते की नोक पर सभी मर्दों को रखती कोई अगर उनसे...
बेटियों के दर्द
कविता

बेटियों के दर्द

संध्या शुक्ला अमेठी (उत्तर प्रदेश) ******************** आइए महसूस करिए बेटियों के दर्द को, देखिए मतलब की गंगा में नहाते हुए मर्द को। वो औरत जिसने जन्म देकर है तुम्हे पाला यहां, जिसके दूध से जली जीवन की ज्वाला यहां। बहन जिसके धागे की अमानत है कलाई पर, हर बहन का कर्ज वो जो है चढ़ा हर भाई पर। वो बाप जिसकी इज्जत की हर कल्पना बेटी से है, घर की दीवारें सुने हर गर्जना बेटी से है। वो बाप जिसका पुत्र एक और बेटियां दो-तीन हैं, वो प्रेम के सागर तले बेटे में ही क्यों लीन है। इज्जत बचाना काम सबने सौंप बेटी को दिया, बेटा चाहे आबरू छीने बने या माफिया। आबरू को लूट कर भी बेटा कुल का अंश क्यों, बेटी जो बस प्रेम कर ले तो उठेगी उंगलियां। हर धर्म में बेबसी और यातना से ऊब कर, मर गई हैं जानें कितनी बेटियां यूं टूटकर। परिचय :-  संध्या शुक्ला शिक्षा : परास्नातक नि...
लेखनी मुझसे रूठ जाती है
कविता

लेखनी मुझसे रूठ जाती है

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* जब भी मैं लिखने बैठता कविता, लेखनी मुझसे रूठ जाती है, वह कहती मेरा पीछा छोड़ दो, मुझसे अपना नाता तोड़ दो, क्या तुम मुझे सौंदर्य में ढाल सकोगे, इस घुटन भरे माहौल से निकाल सकोगे, क्या तुम कुछ अलग लिख सकोगे, या तुम भी दुनिया की बुराइयों को, अपनी रचना में दोहराओगें? दहेज, भूख, बेकारी के शब्द में अब ना मुझको जकड़ना, हिंसा दंगों या अलगाव के चक्कर में ना पड़ना, नेताओं को बेनकाब करने में मेरा सहारा अब ना लेना, बुराइयां ना गिनाना अब बीड़ी सिगरेट या शराब की, उकता गई हूं अब मैं, बलात्कार हत्या या हो अपहरण, इन्हीं शब्दों ने किया है जैसे मेरे अस्तित्व का हरण। लेखनी बोलती रही, मुझे मालूम है तुम इंसानियत की दुहाई दोगे, इसलिए मैं पास होकर भी हूं पराई। अगर लिखना हो तो लिखो, प्रकृति की गोद में बैठ कर, ...
पति को भी इंसान मानो
कविता

पति को भी इंसान मानो

गरिमा खंडेलवाल उदयपुर (राजस्थान) ******************** उसके कंधे है इतने मजबूत वह सारी दुनिया को उठा लेगा तुम एक सुख दे कर देखो वो खुशियों की झड़ी लगा देगा। पति नहीं कोई जादूगर या कोई भगवान उसकी भी भावनाएं होती है वह भी हाड मास का इंसान प्रेम की चाहत बस उसकी करो तुम पति का सम्मान। भूख पसीना सब सहकर मेहनत कर जब वह घर लौटे मुस्कान भरे चेहरे से उसके तप का तुम करो सम्मान। अपने पति की ताकत बन कर परिवार बगिया सा महकाना होता है पति भी इंसान उसके दुख का कारण कभी मत बनना। शादी संस्कार दो लोगों का यह कोई व्यापार नहीं नफा नुकसान फायदे का साझेदारी का बाजार नहीं। तुम औरत हो शक्ति हो शिव संग सृष्टि रच डालो संग चलो संगिनी बन कर इसमें छोटे बड़े की बात नहीं। वो दुख तकलीफ नही बतलाता होसलो को पर्वत कर लेता परिवार पर कभी आंच ना आए हिम्मत पत्नी को बतलाता। प्रेम ...
तब ही भारत बन पाता है
कविता

तब ही भारत बन पाता है

महेश बड़सरे राजपूत इंद्र इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** नव उदय नव युवानों का नव कर्म प्रवीण महानों का जब रूप राष्ट्र को भाता है तब ही भारत बन पाता है दिग् दिगंत दिवाकर बनकर दौड़ रहे दिक्पाल ये तनकर नव संप्रेरक इन महानों का जब रूप राष्ट्र को भाता है तब ही भारत बन पाता है प्रचंड ज्वाल आँखों में पुरुषार्थ प्रबल हाथों में पाषाण लौह मिश्रित पुष्ट रक्त महानों का जब रूप राष्ट्र को भाता है तब ही भारत बन पाता है तिलक लगाकर तत्पर बनकर तुणीर थामे तेजस रणवर तापस संघ महानों का जब रूप राष्ट्र को भाता है तब ही भारत बन पाता है अरि के संमुख अडिग अचल अस्त्र-शस्त्र प्रहार प्रबल आयुध-वीर महानों का जब रूप राष्ट्र को भाता है तब ही भारत बन पाता है नहीं भ्रमित नहीं व्यथित उपहासों से नहीं श्रमित निःशंक तल्लीन महानों का जब रूप राष्ट्र को भाता ...